भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1104

भविष्यपर्व ] द्वविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७७

द्वविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः उभयपक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध

वैशम्पायन उवाच द्वे सेने संगते राजन् सध्वजे सपरिच्छदे । महापरिघसंकीर्णे गदाशक्तिसमाकुले ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन् ! वे दोनों ओरकी सेनाएँ वहाँ एक दूसरीसे मिल गयीं । वे ध्वज तथा अन्य उपकरणोंसे सम्पन्न थीं । दोनों ही दलोंमें बड़े-बड़े परिघ सञ्चित थे । दोनों ही सेनाएँ गदा और शक्तियोंसे भरी-पूरी थीं ॥ १ ॥

भेरीझर्झरसम्पूर्णे डिण्डिमारावसंकुले । प्रगृहीतमहाशस्त्रशूलासिवरकार्मुके ॥ २ ॥ दोनोंमें भेरी और झाँझकी ध्वनि हो रही थी । दोनों ही डिंडिम-घोषसे व्याप्त थीं। दोनों ही दलोंके सैनिकोंने बड़े-बड़े शस्त्र, शूल, खङ्ग और श्रेष्ठ धनुष ले रखे थे ॥ २॥

परस्परकृतोत्साहे चक्राते युद्धमुल्बणम् । ते शराः कार्मुकोत्सृष्टा निर्भिद्याथ शरीरिणाम् ॥ ३॥ शरीराणि महाराज जग्मुर्दूरं सहस्रशः । महाराज ! दोनों सेनाएँ एक दूसरीको जीतनेका उत्साह रखती थीं । दोनों भयंकर युद्ध करने लगीं । उनके धनुषोंसे छूटे हुए सहस्रों बाण देहधारियोंके शरीरोंको विदीर्ण करके दूरतक चले जाते थे ॥ ३ <sup></sup>/<sub></sub>

भटबाहुविनिर्मुक्ताः खङ्गा निर्भिद्य वक्षसि ॥ ४ ॥ स्फुरन्तश्च तथा राजञ्छिरांस्याहृत्य खं ययुः । राजन् ! योद्धाओंकी भुजाओंसे छूटे हुए खङ्ग शत्रु की छातीमे घाव करके जब उछलते, तब उनके सिर काटकर आकाशमें चले जाते ॥ ४ <sup></sup>/<sub></sub>

परिघाश्च तथा राज्ञां बाहुभिः परिचोदिताः ॥ ५ ॥ तिलशश्चक्रतुस्त्वं शरीरं नृपरक्षसाम् । दैत्यानां कुर्वतां नादमन्योन्यवधकाङ्क्षिणाम् ॥ ६ ॥ क्षत्रियोंकी भुजाओं द्वारा फेंके गये परिघ राजाओं तथा राक्षसोंके अनुपम शरीरको तिल-तिल करके काट डालते थे तथा एक दूसरेके वधकी इच्छासे गर्जना करनेवाले दैत्योंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ५-६ ॥

दैत्या रक्षांसि राजेन्द्र राजानश्च समन्ततः । अन्योन्यं परिघैर्जघ्नुश्चापमुक्तैः शिलाशितैः ॥ ७ ॥ शरैश्च भोगिभोगाभैस्तीक्ष्णमन्ये महाबलाः । राजेन्द्र ! दैत्य, राक्षस और राजा लोग सब ओर एक दूसरेपर परिघोंद्वारा प्रहार करते थे तथा अन्य महाबली वीर शिलापर तेज करके धनुषसे छोड़े गये सर्पाकार बाणोंद्वारा गहरा आघात करते थे ॥ ७ <sup></sup>/<sub></sub>

राक्षसा दानवाश्चान्ये मत्तमातङ्गविक्रमाः ॥ ८ ॥ अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैर्महाशरैः । राजन् ! मतवाले हाथियोंके समान पराक्रमी राक्षस और अन्य दानव धनुषसे छोड़े गये महान् बाणोंद्वारा परस्पर चोट पहुँचाते थे ॥ ८ <sup></sup>/<sub></sub>

नागा नागैर्महाराज हया अश्वैः समन्ततः ॥ ९ ॥ रथा रथैः समाजग्मुः सादिनः सादिभिस्तथा । महाराज ! वहाँ सब ओर हाथी हाथियोंसे, घोड़े घोड़ोंसे, रथ रथोंसे और सवार सवारोंसे भिड़ गये ॥ ९ <sup></sup>/<sub></sub>

पट्टिशाशिशरवातैः कुन्तैः सायककर्पणैः ॥ १० ॥ सशक्तिपरिघप्रासपरश्वधसमाकुलैः । भिन्दिपालैर्महारौद्रैरर्जुन्युरन्योन्यमाहवे ॥ ११ ॥ पट्टिश, खङ्ग, बाणसमूह, सायकोंको भी काट गिरानेवाले कुन्त, शक्ति, परिघ, प्रास और फरसोंसहित महाभयंकर भिन्दिपाल आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा सभी योद्धा रणभूमिमें एक दूसरेको मारने लगे ॥ १०-११ ॥

अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैः शिलाशितैः । राक्षसा दानवा राजन् क्षत्रियाश्च समन्ततः । इतश्चेतश्च धावन्तः कुर्वन्तो विस्तरं रवम् ॥ १२ ॥ राजन् ! इधर-उधर दौड़ते और विकट गर्जना करते हुए राक्षस, दानव तथा क्षत्रिय शिलापर तेज कर धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा सब ओर परस्पर प्रहार करते थे ॥ १२ ॥

हताः केचिन्महाराज पेतुरुर्व्यां महासिभिः । केचिन्मथितमस्तिष्का गदाभिर्वीर्यवत्तमाः ॥ १३ ॥ महाराज ! कोई बड़ी-बड़ी तलवारोंसे मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े । कितने ही महापराक्रमी वीरोंके मस्तक गदाओंके आघातसे चूर-चूर हो गये ॥ १३ ॥

भिन्नग्रीवा महाराज परिघैः परिघायुधैः । यमराष्ट्रं गताः केचित् केचित् स्वर्गं समाययुः ॥ १४ ॥ महाराज ! कितने ही परिघधारी योद्धाओंने अपने परिघोंद्वारा शत्रुओंकी गर्दनें तोड़ डालीं, उन मारे शत्रुओंमें से कुछ तो यमराजके राज्यमें गये और कुछ स्वर्गलोकमें जा पहुँचे ॥ १४ ॥

अप्सरोभिः समासेदुः पश्यन्तः स्वं कलेवरम् । केचित् स्वांश्च परांश्चैव हत्वा भ्रान्ता इवाभवन् ॥ १५ ॥ वे अपने मृत शरीरको देखते हुए अप्सराओंसे जा मिले । कितने ही योद्धा परायों तथा अपनोंको भी मारकर भ्रान्त-से हो गये थे ॥ १५ ॥

एतस्मिन्नन्तरे राजञ्छङ्खा भेर्यः सहस्रशः । सस्वनुः सर्वतः सैन्ये मृदङ्गा बहवस्तथा ॥ १६ ॥