विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1102, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[भविष्यपर्व] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७५
उस शोभाशाली सरोवरको देखकर भगवान् गोविन्दने भी उसके जलमें आचमन किया और वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ यतियोंको नमस्कार करके हंस और डिम्भकके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए उसके तटपर सुखपूर्वक बैठे। वे भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सब ओर ब्राह्मणोंकी वेद-ध्वनि सुन रहे थे ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने कृष्णपुष्करप्रवेशे विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकके उपाख्यानके प्रसंगमें श्रीकृष्णका पुष्करमें प्रवेशविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
हंस और डिम्भककी सेनाओंका पुष्करतीर्थमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
अथ तौ हंसडिम्भकौ जग्मतुः पुष्करं प्रति ।
प्रगृहीतमहाचापौ सरथौ सध्वजौ नृप ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर हंस और डिम्भक भी विशाल धनुष लिये रथ और ध्वजसहित पुष्करतीर्थमें गये ॥ १ ॥
पुरःसरमहाभूतौ संहरन्ताविबोल्बणौ ।
प्रकुर्वन्तौ सिंहरवं भस्मना परिलेपितौ ॥ २ ॥
उन दोनोंके आगे दो बड़े-बड़े भूत चल रहे थे। वे इतने भयङ्कर थे कि संहार करनेके लिये उद्यत-से जान पड़ते थे। उन्होंने अपने सारे अङ्गोंमें भस्म रमा रखा था तथा वे जोर-जोरसे सिंहनाद करते थे ॥ २ ॥
त्रिपुण्ड्रकललाटान्तौ रुद्राक्षपरिशोभितौ ।
अन्यौ द्वाविव रुद्रौ तौ लोकसंहारकारकौ ॥ ३ ॥
उनके ललाटके प्रान्तभागोंतक फैली हुई त्रिपुण्ड्रकी रेखा शोभा पाती थी। वे दोनों रुद्राक्षकी मालाओंसे सुशोभित थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो दो दूसरे रुद्र सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेके लिये आ गये हों ॥ ३ ॥
ततोऽनुजग्मुः शतशः सैन्यानि नृपसत्तम ।
अक्षौहिण्यो दशैवासंस्तयोरथ समागताः ॥ ४ ॥
नृपश्रेष्ठ! उन दोनोंके पीछे-पीछे सैकड़ों सैनिक चल रहे थे। हंस और डिम्भककी दस अक्षौहिणी सेनाएँ वहाँ आ गयी थीं ॥ ४ ॥
विचक्रस्तु महाराज दानवो नगसंनिभः ।
तयोरेव सखा पूर्वमासीच्च बलशालिनोः ॥ ५ ॥
महाराज! उन दोनोंके साथ विचक्र नामक पर्वताकार दानव भी था, जो उन बलशाली बन्धुओंका पहलेसे ही मित्र था ॥ ५ ॥
शक्रो यस्य पुरःसरः स्थातुं शक्तो न वज्रभृत् ।
यो हि वीरो महाराज देवदैत्यसमागमे ॥ ६ ॥
देवान् निघ्नंस्तथा राजन् देवेन्द्रमजयन्महान् ।
वज्रधारी इन्द्र भी उसके आगे आकर ठहर नहीं सकते थे। महाराज जनमेजय! देवताओं और दैत्योंके संग्राममें उस महान् वीरने देवताओंपर चोट करते हुए वहाँ देवराज इन्द्रको भी पराजित कर दिया था ॥ ६ १/२ ॥
अकरोच्च पुरा युद्धं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ७ ॥
यो हि द्वारवतीं प्राप्य बबाधे यदुपुङ्गवान् ।
पूर्वकालमे इस विचक्रने प्रभावशाली भगवान् विष्णुके साथ युद्ध किया था और द्वारकापुरीमें जाकर श्रेष्ठ यादवोंको बड़ा कष्ट दिया था ॥ ७ १/२ ॥
स तदानीं महाराज श्रुत्वा युद्धमुपस्थितम् ॥ ८ ॥
अनेकशतसाहस्रैर्दानवैः परिघायुधैः ।
वृतः समभवद् दैत्यो वृष्णिद्वेषान् नृपोत्तम ॥ ९ ॥
हंसस्य डिम्भकस्याथ साहाय्यं कर्तुमुद्यतः ।
महाराज नृपश्रेष्ठ! उस समय युद्ध उपस्थित हुआ सुनकर कई लाख परिघधारी दानवोंसे घिरा हुआ वह दैत्य वृष्णिवंशियोंसे द्वेष रखनेके कारण हंस और डिम्भककी सहायता करनेके लिये उद्यत हो गया ॥ ८-९ १/२ ॥
विचक्रस्याथ दैत्यस्य हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ॥ १० ॥
अतीव मित्रतां यातो दद्यात् प्राणान्श्च संयति ।
उन दिनों राक्षसराज हिडिम्ब विचक्रनामक दैत्यका बड़ा भारी मित्र हो गया था। वह युद्धमें उसके लिये प्राण भी दे सकता था ॥ १० १/२ ॥
राक्षसैरपरैः सार्धं शिलाशूलासिपाणिभिः ॥ ११ ॥
ययौ तस्य सहायार्थं हिडिम्बः पुरुषादपः ।
राक्षसराज हिडिम्ब शिला, शूल और खड्ग धारण करनेवाले दूसरे राक्षसोंके साथ विचक्रकी सहायताके लिये वहाँ गया ॥ ११ १/२ ॥
अष्टाशीति सहस्राणि राक्षसास्तस्य चाभवन् ॥ १२ ॥
अनुयाता महाराज शिलापरिघबाहवः ।
महाराज! अपने हाथोंमें शिला और परिघ लिये अठासी हजार राक्षस उस हिडिम्बके अनुगामी होकर वहाँ गये थे ॥ १२ १/२ ॥
तयोस्तत्र महासैन्यं गच्छतोः केशवं प्रति ॥ १३ ॥
मिश्रितं दैत्यसंघैश्च राक्षसैश्च समन्ततः ।