भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1101, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1101

१०७४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

ततः प्रभाते विमले केशवः केशिसूदनः ।
बलाध्यक्षानुवाचेदं चक्रपाणिर्गदाधरः ॥ २ ॥

तदनन्तर निर्मल प्रातःकाल आनेपर हाथमें चक्र और गदा धारण करनेवाले केशिहन्ता केशवने समस्त सेनापतियोंसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥

संह्यतां बलं सर्वं रथकुञ्जरवाजिमत् ।
अनेकभेरीपणवं प्रासासिसपरिघाकुलम् ॥ ३ ॥
सध्वजं सपताकं च सालंकारपरिच्छदम् ।

'रथ, हाथी और घोड़ोंसे युक्त सारी सेनाको युद्धके लिये तैयार करो। उसके साथ अनेकानेक भेरी, पणव आदि बाजे भी होने चाहिये। प्रास, खड्ग और परिघ आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे वह सेना सम्पन्न होनी चाहिये। ध्वजा, पताका, अलङ्कार तथा अन्य आवश्यक उपकरणोंसे सारी सेनाको सुसज्जित किया जाय' ॥ ३॥

ते तथेति प्रतिज्ञाय सर्वे चक्रुरधीनगाः ॥ ४ ॥
आदाय सुदृढं चापं रथमारुह्य दंशिताः ।
अग्रतो जग्मुरत्यर्थं सेनायाः पुरुषोत्तमाः ॥ ५ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीकृष्णके अधीन रहनेवाले उन सेनापतियोंने सब कुछ उसी प्रकार किया। वे पुरुषप्रवर वीर कवच धारण करके रथपर आरूढ़ हो सुदृढ़ धनुष ले सेनाके आगे-आगे तीव्रगतिसे चलने लगे ॥ ४-५ ॥

सात्यकिश्च तथा राजन् प्रगृहीतशरासनः ।
बभौ क्रोधसमायुक्तो जगामाग्रे महाबलः ॥ ६ ॥

राजन् ! महाबली सात्यकि भी धनुष हाथमें लेकर अद्भुत शोभा पाने लगे। वे क्रोधमें भरकर आगे-आगे चले ॥ ६ ॥

अन्ये च यादवाः शूराः प्रगृहीतमहायुधाः ।
सिंहनादं प्रकुर्वन्तो जग्मुरत्यर्थमुत्तमाः ॥ ७ ॥

अन्य श्रेष्ठ एवं शूरवीर यादव भी महान् आयुध लेकर सिंहनाद करते हुए तीव्र गतिसे चल दिये ॥ ७ ॥

हरिस्तु रथमारुह्य संस्कृतं दारुकेण ह ।
शार्ङ्गं भारसहं घोरं गृहीत्वा सशरं धनुः ॥ ८ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण दारुकके द्वारा सुसज्जित किये गये रथपर आरूढ़ हो, भार सहन करनेमें समर्थ भयङ्कर शार्ङ्ग-धनुष और बाण लेकर प्रस्थित हुए ॥ ८ ॥

चक्रपाणिस्तदा शङ्खी गदाशरवरासिमान् ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पीतवासा जनार्दनः ॥ ९ ॥
पद्ममालावृतोरस्को नवजीमूतसंनिभः ।
ययौ रथगतो विप्रैः स्तूयमानो मुदान्वितः ॥ १० ॥

उस समय उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा, बाण और उत्तम खड्ग शोभा पाते थे। उन्होंने हाथोंमें गोह-चर्मके बने दस्ताने भी बाँध रखे थे। वे पीताम्बरधारी जनार्दन नूतन जलधरके समान श्याम कान्तिसे सुशोभित थे। उनका वक्षःस्थल कमलपुष्पोंकी मालासे आच्छादित था। वे रथपर बैठ-कर आनन्दमग्न ब्राह्मणोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए जा रहे थे ॥ ९-१० ॥

सूतैर्मागधपुत्रैश्च गीयमानस्ततस्ततः ।
आनीय सेनां सकलां ययौ काष्ठामथोत्तराम ॥ ११ ॥

जहाँ-तहाँ सूत, मागध और वन्दीजन उनके गुण गाते रहते थे। उन्होंने सारी सेनाको एकत्रित करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ ११ ॥

पाञ्चजन्यं मुखे न्यस्य सर्वप्राणेन केशवः ।
दध्मौ महारवं कुर्वञ्छत्रूणां भयवर्धनम् ॥ १२ ॥

पाञ्चजन्य शङ्खको अपने मुखपर रखकर केशवने सम्पूर्ण प्राणशक्ति लगाकर उसे बड़े जोरसे बजाया। उसका महान् शब्द प्रकट करके वे शत्रुओंके भयकी वृद्धि करने लगे ॥ १२॥

आध्मातस्तेन हरिणा सचक्रे शङ्खराड् ध्रुवम् ।
रवः स रोदसी राजन् पूरयामास सर्वतः ॥ १३ ॥

राजन् ! श्रीहरिके बजानेपर उस शङ्खराज पाञ्चजन्यने महानाद किया। उसका वह शब्द पृथ्वी और आकाशमें सब ओर व्याप्त हो गया ॥ १३ ॥

तस्मिञ्छङ्खे तथाऽऽध्माते दध्मुः शङ्खान् सहस्रशः ।
भेर्यश्चापि समाध्माता मृदङ्गा बहवो नृप ॥ १४ ॥

नरेश्वर ! पाञ्चजन्य शङ्खके उस प्रकार बजाये जानेपर दूसरे-दूसरे वीरोंने भी सहस्रों शङ्ख बजाये। बहुत-सी भेरियाँ और मृदङ्ग भी बज उठे ॥ १४ ॥

नेदुरत्यर्थमतुलं घर्मान्ते जलदा यथा ।
अथाययुर्महाराज पुष्करं पुण्यवर्धनम् ॥ १५ ॥

महाराज ! वर्षाऋतुमें जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले मेघोंकी भाँति वे मृदङ्ग आदि बाजे अनुपम गम्भीर स्वरमें बजने लगे। इस प्रकार समस्त यादव सैनिक पुण्यवर्धक पुष्करतीर्थमें जा पहुँचे ॥ १५ ॥

सरसस्तस्य राजेन्द्र पुष्करस्य नृपोत्तमाः ।
प्रतीक्ष्य हंसडिम्भकौ युद्धाय समवस्थिताः ॥ १६ ॥

राजेन्द्र ! वे नृपश्रेष्ठ यादव वीर युद्धके लिये हंस और डिम्भककी प्रतीक्षा करते हुए उस पुष्कर सरोवरके तटपर ठहर गये ॥ १६ ॥

निवेशं कारयामासुर्यादवाः सर्व एव हि ।
स्वं स्वं ययुः सुखं राजन् प्रगृहीतकुटीमठम् ॥ १७ ॥

राजन् ! सभी यादवोंने वहाँ सेनाकी छावनी डाल दी। सब लोग अपने-अपने लिये स्वीकृत कुटी और मठ आदिमें सुखपूर्वक गये ॥ १७ ॥

भगवानपि गोविन्दः सरो दृष्ट्वा सुशोभनम् ।
उपस्पृश्य जले तस्मिन् प्रणम्य यतिपुङ्गवान् ॥ १८ ॥
तयोरागमनं लिप्सुरास्ते तीरे यथासुखम् ।
शृण्वन् वेदध्वनिं विष्णुर्ब्राह्मणानां समन्ततः ॥ १९ ॥

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