विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1100, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७३
'तुमने जिन सहायकोंके नाम बताये हैं, वे सब-के-सब युद्धमें अत्यन्त कायर हैं। मैं रणभूमिमें सेनासहित उन सबको मारकर फिर केशवको पराजित करूँगा ॥ १० ॥
संहर्तव्या महासेना प्रगृहीतशरासना ।
गृहीतप्रासमुशला गृहीतकवचा सदा ॥ ११ ॥
आरूढरथसाहस्रा गदापरिघसंकुला ।
सुप्रभूतेन्धनवती प्रभूतबलसाधना ॥ १२ ॥
चाल्यतां वाहिनी घोरा बलाध्यक्षाः समन्ततः ।
अवध्य एव गच्छ त्वं न ते मरणतो भयम् ॥ १३ ॥
'इस समय धनुष-बाण धारण करनेवाली विशाल सेनाका संग्रह करना है। वह प्रास, मुसल, कवच आदिसे सम्पन्न होगी। उसमें सहस्रों रथ होंगे, जिनमें रथी वीर आरूढ रहेंगे। वह सेना गदा और परिघ आदि अस्त्रोंसे भरी-पूरी होगी, उसके पास बहुत-से ईंधन होंगे तथा वह प्रचुर बल एवं साधनसे सम्पन्न होगी। ऐसी भयङ्कर वाहिनी युद्धके लिये कूच करे। सेनानायकगण चारों ओरसे इसकी देख-रेख करें, तू अवध्य रहकर ही चला जा। तुझे यहाँ मृत्युसे भय नहीं है ॥ ११-१३ ॥
संग्रामः पुष्करेऽस्माकं श्वः परश्वोऽपि वा नृप ।
ततो ज्ञास्यामहे वीर्यं केशवस्य बलस्य च ।
ये त्वयोक्ता नृपाः संख्ये तेषामपि च यद् बलम् ॥ १४ ॥
'नरेश्वर ! कल-परसोंतक हमलोगोंका पुष्करमें संग्राम होगा। उस समय हम समझ लेंगे कि श्रीकृष्ण और बलराममें कितना बल है। तूने जिन नरेशोंके नाम बताये हैं, उनमें भी युद्धके मुहानेपर कितना बल है, इसका पता लग जायगा' ॥ १४ ॥
सात्यकिरुवाच
हंसागच्छामि वां हन्तुं श्वः परश्वोऽपि वा नृप ।
अद्यैव हि मया वध्यौ न चेद् दूतो भवाम्यहम् ॥ १५ ॥
सात्यकि बोले—राजा हंस ! मैं तुम दोनों भाइयोंका वध करनेके लिये कल या परसों भी आऊँगा। यदि मैं दूत न होता तो आज ही तुम दोनों मेरे हाथसे मार डाले जाते ॥ १५ ॥
न हि श्वो वा परश्वो वा युवां कटुकभाषिणौ ।
दौत्ये हि दुःखमतुलं वहाम्येव सदा नृणाम् ॥ १६ ॥
तुम दोनों कटुभाषियोंको मैं कल या परसोंके लिये जीवित नहीं छोड़ता। मनुष्योंको दूत बननेपर भी सदा अनुपम दुःखका सामना करना पड़ता है। मैं भी उस महान् दुःख-का भार ढो रहा हूँ ॥ १६ ॥
अन्यथाहं युवां हत्वा ततो यास्यामि निर्वृतिम् ।
स्ववीर्यं बाहुदर्पं च दर्शयन् वां नृपाधमौ ॥ १७ ॥
अन्यथा नीच नरेशो ! मैं अपने पराक्रम और बाहुबल-का घमंड दिखाता हुआ तुम दोनों भाइयोंको मारकर परम संतोष प्राप्त करता ॥ १७ ॥
शङ्खचक्रगदापाणिः शाङ्खधन्वा किरीटभृत् ।
नीलकुञ्चितकेशाढ्यो लम्बबाहुः श्रिया वृतः ॥ १८ ॥
स सर्वलोकप्रभवो विश्वरूपः सुरूपवान् ।
दैत्यदानवहन्तासौ योगिध्येयः पुरातनः ॥ १९ ॥
पद्मकिञ्जल्कनयनः श्यामलः सिंहविक्रमः ।
सृष्टिस्थितिलयेष्वेकः कर्ता त्रिजगतो गुरुः ॥ २० ॥
शरेण निशितेनाजौ दर्पं वां व्यपनेष्यति ।
इत्युक्त्वा रथमारुह्य प्रययौ सात्यकिः किल ॥ २१ ॥
जो अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और शार्ङ्गधनुष धारण करते हैं, जिनके मस्तकपर मुकुट शोभा पाता है, जो काले-काले घुँघराले केशोंसे अलंकृत हैं, जिनकी भुजाएँ बहुत बड़ी हैं, जो अनुपम शोभासे सम्पन्न हैं, सम्पूर्ण जगत्-की उत्पत्तिके कारण हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो परम सुन्दर रूपसे सुशोभित हैं, योगीजन जिनका ध्यान करते हैं, जो दैत्यों और दानवोंका वध करनेवाले पुराणपुरुष हैं, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर हैं, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम है, जो सिंहके समान बल-विक्रमशाली तथा सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कर्ता हैं, वे तीनों लोकोंके गुरु भगवान् श्रीकृष्ण युद्धस्थलमें तीखे बाणोंसे तुम दोनों भाइयोंका घमंड चूर करेंगे। ऐसा कहकर सात्यकि रथपर आरूढ़ हो चले गये ॥ १८-२१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सात्यकिप्रतिप्रयाणे एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें सात्यकिका प्रत्यागमनविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्ण तथा यादवसेनाका पुष्करतीर्थमें जाकर हंस और डिम्भककी प्रतीक्षा करना
वैशम्पायन उवाच
प्रविश्य स पुरं विष्णोः सात्यकिः शिनिपुङ्गवः ।
आचचक्षेऽथ कृष्णाय यथा वृत्तं तयोस्तथा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! शिनिवंश-शिरोमणि सात्यकिने श्रीकृष्णपुरीमें प्रवेश करके उनसे हंस और डिम्भकका सारा समाचार ज्यों-का-त्यों कह सुनाया ॥ १ ॥