विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1099, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०७२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मथुरायां प्रयागे वा दर्शयन्तो बलानि मे ।
उन जगदीश्वरने फिर यह पूछा था कि हमलोगोंका यह संग्राम कहाँ होगा ? सदा ही पुण्य प्रदान करनेवाले पुष्करमें, गोवर्धन पर्वतपर, मथुरामें अथवा प्रयागमें । जहाँ इच्छा हो मुझे अपना बल दिखानेके लिये आ जायँ ॥ ४५ ॥
शङ्खचक्रधरे देवे जगत्पालनतत्परे ॥ ४६ ॥
राजसूयं महायज्ञं कर्तुमिच्छति कः स्वयम् ।
वदन् वा स्वस्तिमान् मर्त्यस्त्वां विना को व्रजेत् सुखम्
शङ्ख और चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण जब जगत्के पालनमें तत्पर हों, उस समय कौन उनकी आज्ञा लिये बिना स्वयं राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करना चाहेगा ? अथवा तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य है, जो ऐसी बात कहकर सकुशल एवं सुखपूर्वक घरको जा सकता है ?॥ ४६-४७ ॥
इदमीच्छसि चेन्मूढ हास्यतां यासि भूतले ।
इत्युक्त्वा सात्यकिर्वीरो हसन्निव भुवि स्थितः ॥ ४८ ॥
मूढ ! यदि तू ऐसा चाहता है तो इस भूतलपर उपहासका पात्र बनेगा । ऐसा कहकर वीर सात्यकि हँसते हुए-से भूतलपर खड़े हो गये ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सात्यकिवाक्ये
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें
सात्यकिका वाक्यविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
एकोनविंशाधिकशततमोऽध्यायः
हंस और डिम्भकके सात्यकिके प्रति रोषपूर्ण वचन तथा सात्यकिका उन्हें वैसा ही उत्तर देकर द्वारकाको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धौ महाराज हंसो डिम्भक एव च ।
इदं वै प्रोचतुर्वाक्यं रोषव्याकुलितेक्षणौ ॥ १ ॥
विधक्षन्तौ दिशः सर्वाः सर्वान् वीक्ष्य नृपोत्तमान् ।
करेण निष्पीड्य करं स्मरन्तौ तद्वचो महत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज ! सात्यकिकी यह बात सुनकर हंस और डिम्भक कुपित हो उठे । उनके नेत्र रोषसे चञ्चल हो उठे । वे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं । उन्होंने समस्त श्रेष्ठ नरेशोंकी ओर देखकर और एक हाथसे दूसरे हाथको दबाकर सात्यकिके उस महान् वचनका स्मरण करते हुए इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥
क्व नु क्व वा नन्दसूनुः क्व वा रामो बलोत्कटः ।
इति ब्रुवाणौ साक्षेपौ सात्यकिं सत्यसंगरम् ॥ ३ ॥
'कहाँ है ? कहाँ है ? वह नन्दका बेटा, और कहाँ है वह बलोन्मत्त बलराम' सत्यप्रतिज्ञ सात्यकिपर आक्षेप करके ऐसी बातें कहते हुए वे दोनों फिर बोले—॥ ३ ॥
अरे यादवदायाद किं ब्रूषे नः पुरो गतः ।
इतो निर्गच्छ मन्दात्मन् दूतस्त्वमसि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥
अन्यथा वध्य एव त्वं प्रलपन् परुषं वचः ।
'अरे ओ यादवके बच्चे ! हमारे सामने आकर तू यह क्या बक रहा है ? मन्दात्मन् ! तू यहाँसे निकल जा । इस समय दूत बनकर आया है, नहीं तो ऐसा कठोर वचन कहनेके कारण तू मार डालनेके योग्य था ॥ ४ ॥
सत्यं निर्लज्ज एवासि यद् ब्रूया ईदृशं वचः ॥ ५ ॥
आवामिदं जगत् सर्वं शासितुं संयतौ नृपौ ।
को नाम मानुषे लोके करदो नैव जीवति ॥ ६ ॥
'सचमुच तू निर्लज्ज ही है, जो ऐसी बातें बक रहा है । हम दोनों नरेश इस सम्पूर्ण जगत्पर शासन करनेके लिये उद्यत हैं । मनुष्यलोकमें कौन ऐसा पुरुष है, जो हमें कर न देकर जीवित रह सके ? ॥ ५-६ ॥
हत्वा गोपालकान् सर्वान् बद्ध्वा यादवकान् बहून् ।
गृहीमः सर्वसर्वस्वं ततो गच्छ नराधम ॥ ७ ॥
'हम समस्त ग्वालों और बहुसंख्यक यादवोंको कैद करके उनका सर्वस्व करके रूपमें ग्रहण करेंगे । अतः नराधम ! तू यहाँसे चला जा ॥ ७ ॥
अवध्यो दूततां प्राप्तो बह्वबद्धं प्रभाषसे ।
ईश्वरो नौ वरं दाता ह्याह्वानानामपि च प्रभुः ॥ ८ ॥
रक्षितारौ महाभूतौ संग्रामं गच्छतोश्च नौ ।
पितरं याजयिष्यावो जित्वा गोपालकं रणे ॥ ९ ॥
'तू बहुत अंट-संट बक रहा है, किंतु क्या किया जाय, दूत बनकर आया है, इसलिये अवध्य है । भगवान् शङ्करने हम दोनोंको वर दिया है और वे ही हमारे आह्वानोंके भी दाता हैं । संग्राममें जाते समय दो महाभूत हम दोनोंकी रक्षा करते हैं । हमलोग उस ग्वालेको जीतकर अपने पितासे राजसूय यज्ञ करायेंगे ॥ ८-९ ॥
एते प्रोक्ता भृशं युद्धे कातराः सर्व एव ते ।
हत्वा तान् सबलान् युद्धे पुनर्जेष्यामि केशवम् ॥ १०