भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1098

भविष्यपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः [ १०७१


संहार करके अपना यज्ञ करूँगा। हमारा पहला संकल्प यही है कि 'हम यादवोंको जीतेंगे'॥ २७॥

गच्छ गच्छेति विप्र त्वं धृष्टं परुषवादिनम्।
शत्रुपक्षस्तुतिपरं सह युक्तवा सदा मया ॥ २८॥
ब्राह्मण ! जाओ ! जाओ !! तुम धृष्ट और कटुवादी हो ! सदा मेरे साथ रहकर भी शत्रुपक्षकी स्तुतिमें लगे रहे हो (इसलिये मैंने तुम्हें त्याग दिया) ॥ २८॥

न मे विप्रवधः कार्यः कष्टादपि हि सर्वतः।
इत्युक्त्वा ब्राह्मणं भूयो हंसः सात्यकिमब्रवीत् ॥ २९॥
सब ओरसे कष्ट प्राप्त होनेपर भी मुझे ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये (इसीलिये तुम्हें जीवित छोड़ रहा हूँ)। ब्राह्मणसे ऐसा कहकर हंसने फिर सात्यकिसे कहा—॥ २९॥

भो भो यादवदायाद किमर्थं प्राप्तवानिह।
किमब्रवीन्नन्दसुतः किं वाऽसौ मेऽदिशत् करम् ॥ ३०॥
'ओ यादवकुमार ! तुम किसलिये यहाँ आये हो ? उस नन्दपुत्रने तुमसे क्या कहा है ? अथवा उसने मेरे लिये कौन-सा कर प्रदान किया है ?' ॥ ३० ॥

सात्यकिरुवाच
इदं सत्यं वचो हंस शङ्खचक्रगदाभृतः।
शरैर्निशितधाराग्रैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः ॥ ३१ ॥
दास्यामि करसर्वस्वमसिना निशितेन ते।
शिरश्छेत्स्यामि ते हंस करदानस्य संग्रहम् ॥ ३२॥
सात्यकि बोले—हंस ! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका यह सत्य वचन सुनो। उनका कहना है कि 'मैं शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए, शिलापर तेज किये गये और पैनी धारवाले बाणोंद्वारा तुम्हारा सारा कर चुका दूँगा। हंस ! अपनी तीखी तलवारसे तेरा सिर काट लूँगा' यह तेरे लिये करदानका अच्छा संग्रह होगा' ॥ ३१-३२॥

धार्ष्ट्यं हि तव मन्दात्मन् किमतोऽपि नृपाधम।
देवदेवाज्जगन्नाथात् करमिच्छति यो नृपः ॥ ३३ ॥
तस्यैष करसंक्षेपो जिह्वाच्छेदो नराधम।
मन्दात्मन् ! नृपाधम ! इससे बढ़कर तेरी धृष्टता क्या हो सकती है ? नराधम ! जो राजा देवाधिदेव जगन्नाथसे कर लेना चाहता है, उसकी जीभ काट ली जाय, यही उसके करको समाप्त करनेका उपाय है ॥ ३३॥

तस्य शार्ङ्गरवं श्रुत्वा शङ्खस्य च हरेः पुनः ॥ ३४ ॥
को नाम जीवितं काङ्क्षेत् तिष्ठेदानीं त्वमद्य वै।
श्रीहरिके शार्ङ्गधनुषकी टङ्कार और पाञ्चजन्य शङ्खका हुंकार सुनकर कौन जीवित रहनेकी आशा कर सकता है। तू अब हमारे सामने खड़ा तो हो ॥ ३४॥

गिरीशवरदर्पेण को ब्रूयादीदृशं वचः ॥ ३५ ॥
सहाया वयमेवैते बलभद्रपुरोगमाः।
भगवान् शङ्करसे मिले वरके घमंडमें आकर कौन पुरुष भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसी बात कह सकता है, जैसी तूने कही है। बलभद्र आदि हम सभी वीर श्रीकृष्णके सहायक हैं॥

प्रथमो बलभद्रोऽसौ द्वितीयोऽहं च सात्यकिः ॥ ३६॥
कृतवर्मा तृतीयस्तु चतुर्थो निशठो बली।
पञ्चमोऽथ च बभ्रुस्तु षष्ठश्चैवोल्कलः स्मृतः ॥ ३७ ॥
सप्तमस्तारणो धीमानस्त्रशस्त्रविशारदः।
अष्टमस्त्वथ सारङ्गो नवमो विप्रथुस्तथा ॥ ३८॥
दशमश्चोद्धवो धीमान् वयमेते बलान्विताः।
प्रथम तो बलभद्रजी हैं, दूसरा मैं सात्यकि हूँ, तीसरा कृतवर्मा है, चौथा बलवान् निशठ है, पाँचवाँ बभ्रु, छठा उल्कल, सातवाँ अस्त्रशस्त्रविशारद बुद्धिमान् तारण, आठवाँ सारङ्ग, नवाँ विपृथु और दसवें बुद्धिमान् उद्धवजी हैं। ये हम सभी सहायक बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ३६-३८॥

त एते पुरतो गोप्तुः शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ३९ ॥
देवदेवस्य युद्धेषु तिष्ठन्त्येव दिवानिशम्।
ये सभी वीर समस्त युद्धोंमें अपने रक्षक शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव श्रीकृष्णके आगे ही खड़े होते हैं ॥ ३९॥

यौ हि वीरौ सुतौ तस्य नासत्यसदृशौ बले ॥ ४० ॥
तावेव वां क्षमौ युद्धे हन्तुं बलमदान्वितौ।
उनके जो दो विख्यात पुत्र (प्रद्युम्न और साम्ब) हैं, वे दोनों बलमें अश्विनीकुमारोंके समान हैं। केवल वे दोनों ही युद्धमें बलके मदसे उन्मत्त हुए तुम दोनों भाइयोंको मार सकते हैं ॥ ४०॥

यो गिरीशो गिरां देवो वरं दत्त्वा स तिष्ठति ॥ ४१ ॥
युवां हि किंबलौ युद्धे तिष्ठतः सशरं धनुः।
गृहीत्वा शत्रुभिः सार्धं युद्धं कर्तुं समुद्यतौ ॥ ४२ ॥
वाणीके देवता जो गिरीश शिव हैं, वे तो वर देकर अलग खड़े हैं। तुम दोनों किसके बलका सहारा लेकर युद्धमें खड़े हुए हो और धनुष-बाण लेकर शत्रुओंके साथ जूझनेको तैयार हुए हो ? ॥ ४१-४२ ॥

ईदृशेष्वथ भृत्येषु युद्धं कुर्वत्सु शत्रुभिः।
त्रैलोक्यं रक्षतस्तस्मात् करमिच्छन् व्रजेत्कः॥ ४३॥
जिनके हम-जैसे सेवक शत्रुओंके साथ युद्ध कर रहे हों, त्रिलोकीकी रक्षा करनेवाले उन जगदीश्वरसे कर लेनेकी इच्छा रखकर कौन जीवित लौट सकता है ? ॥ ४३ ॥

हनिष्यत्येव वां युद्धे त्रैलोक्यं यो हि रक्षति।
शरेण निशितेनाऽसौ शार्ङ्गमुक्तेन केवलम् ॥ ४४॥
जो तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण युद्धस्थलमें केवल शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए पैने बाणसे तुम दोनोंको अवश्य मार डालेंगे ॥ ४४ ॥

क्व नः संग्राम इत्येवं पुनराह जगत्पतिः।
पुष्करे पुण्यदे नित्यमुत गोवर्धने गिरौ ॥ ४५॥