विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1097, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०७० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
है तथा जिनपर सौ-सौ चँवर डुलाये जाते हैं, उन जगदीश्वर श्रीकृष्ण हरिका मैंने दर्शन किया है ॥ ११ ॥
युवां विद्वेषयुक्तेन चेतसा यादवेश्वरम् ।
स्मरन्तं सर्वदा विष्णुं क चैवं क च वेत्ति कः ॥ १२ ॥
'वे यादवेश्वर विष्णु विद्वेषयुक्त चित्तसे सदा तुम दोनोंका स्मरण करते थे और जानना चाहते थे कि वे दोनों कहाँ हैं ? तथा कहाँ और कौन उन्हें जानता है ?॥
क्व च द्रक्ष्यामि तौ मन्दौ कुतो वा मत्पुरोगतौ ।
ध्यायन्तमित्थं देवेशं करे शङ्खवहं सदा ॥ १३ ॥
'उन दोनों मूर्खोंको मैं कब देखूँगा ? वे किस उपायसे मेरे सामने उपस्थित होंगे ? हाथमें शङ्ख लिये हुए वे देवेश्वर निरन्तर ऐसी ही बात सोच रहे थे ॥ १३ ॥
हसन्तमेनमद्राक्षं करदं हास्यतत्परम् ।
वदन्तं नारदे वाचं दुर्वाससि यतीश्वरे ॥ १४ ॥
'अपनेको करदाता सुनकर वे हँसने लगे और तुम्हारे उपहासमें तत्पर हो गये, उस अवस्थामें मैंने उन्हें देखा था । वे देवर्षि नारद तथा यतीश्वर दुर्वासासे बात करते थे ॥ १४ ॥
ब्रह्मसूत्रपदां वाणीं दापयन्तं मुनीश्वरम् ।
दृष्ट्वाहं तं हरिं देवं पुनः पुनरचिन्तयम् ॥ १५ ॥
'वे मुनीश्वर दुर्वासाको ब्रह्मसूत्रके पदोंसे युक्त वेदान्तमयी वाणीका शिष्योंको उपदेश देने या पढ़ानेके लिये अनुमति दे रहे थे । उस समय उन भगवान् श्रीहरिका दर्शन करके मैंने बारंबार इस प्रकार विचार किया ॥ १५ ॥
असाध्यमिदमारब्धं ताभ्यामिति नृपोत्तम ।
नारब्धव्यमिदं कार्यमितःप्रभृति भूमिप ॥ १६ ॥
'मेरे उन मित्रोंने यह असाध्य कार्य आरम्भ किया है। नृपश्रेष्ठ ! भूमिपाल ! अबसे आप दोनोंको इस कार्यका आरम्भ नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
निवृत्ता सा कथा हंसाचिन्तयद् ग्रहणं तव ।
तद् वृत्तमखिलं सर्वं वदिष्यति हि सात्यकिः ।
एतद् वचनमाकर्ण्य हंसः क्रुद्धोऽब्रवीद् वचः ॥ १७ ॥
'श्रीकृष्णसे कर लेना है, यह तुम्हारी बात जब वहाँ समाप्त हो गयी, तब भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हें कैद करनेकी बात सोची थी। यह सारा वृत्तान्त सात्यकि ही तुम्हें बतायेंगे।' जनार्दनकी यह बात सुनकर हंसने कुपित होकर कहा ॥१७॥
हंस उवाच
अरे ब्राह्मणदायाद का नाम तव वागियम् ।
आवयोः पुरतो वक्तुं त्रैलोक्यं जेतुमिच्छतोः ॥ १८ ॥
**हंस बोला—**अरे ओ ब्राह्मणके बेटे ! यह तुम्हारे मुखसे कैसी बात निकल रही है । तीनों लोकोंको जीतनेकी इच्छा करनेवाले हम दोनों वीरोंके आगे कहनेके लिये क्या तुम्हें यही बात मिली है ॥ १८ ॥
मायया त्वां भ्रामयति कृष्णो लीलाविधानवित् ।
तं दृष्ट्वा भ्रम एवैष तव संजायते महान् ॥ १९ ॥
लीलाविधानके ज्ञाता श्रीकृष्ण तुम्हें मायासे चक्करमें डाल रहे हैं । उनका दर्शन करके तुम्हारे मनमें यह महान् भ्रम ही उत्पन्न हो गया है ॥ १९ ॥
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवनमालाविभूषितम् ।
वृष्णिवीरं समावेक्ष्य समुच्छ्रितयशोधरम् ॥ २० ॥
सूतमागधसंस्तावप्रकटद्बाहुवीर्यकम् ।
अत्यद्भुतयशोराशिं विक्रमाल्लोकमण्डनम् ॥ २१ ॥
चतुर्भुजं वलाक्रान्तं वृष्णियादवसम्मतम् ।
अहोऽद्य भ्रम एवैष दर्शनात् तस्य चक्रिणः ॥ २२ ॥
जो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और वनमालासे विभूषित हैं, सब ओर फैले हुए यशको धारण करते हैं। सूतों और मागधोंद्वारा की गयी स्तुतिमात्रसे जिनके बाहुबलका कुछ पता चलता है। जो अत्यन्त अद्भुत यशकी राशि हैं और अपने पराक्रमसे लोकको अलंकृत करते हैं। जिनके चार भुजाएँ हैं । जो सेनाओंसे घिरे हुए तथा वृष्णि और यादवकुलके सम्मानित पुरुष हैं, उन वृष्णिवीर श्रीकृष्णका दर्शन करके तुम चक्करमें पड़ गये हो। अहो ! उस चक्रपाणिके दर्शनसे आज तुम्हें भ्रम ही हो गया ॥२०–२२॥
इदानीं च महाराज भ्रामयन्त्येव दुर्मतिः ।
त्वामेव विप्र मन्दात्मन्निन्द्रजालिकता हि या ॥ २३ ॥
महाराज ! मन्दमते विप्र ! इस समय भी यह दुर्बुद्धि कृष्ण तुम्हें चक्करमें ही डाले हुए है। उसकी जो इन्द्रजालिकता (बाजीगरी) है, वह तुमपर ही प्रभाव डालती है ॥ २३ ॥
चापत्यमिदमेवैतत् तव विप्र भ्रमोद्भवम् ।
अहो हि खलु सादृश्यं वक्तव्यं भवता मम ॥ २४ ॥
विप्र ! यह तुम्हारा भ्रमजनित चापल्य ही प्रकट हुआ है । अहो ! तुम्हें मेरी और उनकी समानता बतानी चाहिये थी (किंतु तुमने हमारी लघुता व्यक्त की है) ॥ २४ ॥
अहमेव त्वया विप्र मर्षये प्रोदितं वचः ।
सखिभावाद् द्विजश्रेष्ठ अन्यथा कः सहेदिदम् ॥ २५ ॥
ब्रह्मन् ! द्विजश्रेष्ठ ! एक मैं ही हूँ, जिसने मित्रताके कारण तुम्हारी इस अनुचित बातको सह लिया, अन्यथा कौन ऐसी बात सह सकता है ? ॥ २५ ॥
गच्छ मन्दमते विप्र यथेष्टं साम्प्रतं तव ।
द्विज गच्छ यथेष्टं त्वं पृथिवीं पृथिवी तव ॥ २६ ॥
मन्दबुद्धि ब्राह्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो चले जाओ, इस समय सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये खुली हुई है । द्विज ! तुम भूतलपर चाहे जहाँ जा सकते हो ॥ २६ ॥
जित्वा गोपालदायादं हत्वा यादवकान् बहून् ।
एष नः प्रथमः कल्पो जेष्याम इति यादवान् ॥ २७ ॥
मैं उस ग्वालबालको जीतकर और बहुत-से यादवोंका