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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

[भविष्यपर्व] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७५

उस शोभाशाली सरोवरको देखकर भगवान् गोविन्दने भी उसके जलमें आचमन किया और वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ यतियोंको नमस्कार करके हंस और डिम्भकके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए उसके तटपर सुखपूर्वक बैठे। वे भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सब ओर ब्राह्मणोंकी वेद-ध्वनि सुन रहे थे ॥ १८-१९ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने कृष्णपुष्करप्रवेशे विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकके उपाख्यानके प्रसंगमें श्रीकृष्णका पुष्करमें प्रवेशविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥


एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

हंस और डिम्भककी सेनाओंका पुष्करतीर्थमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

अथ तौ हंसडिम्भकौ जग्मतुः पुष्करं प्रति ।
प्रगृहीतमहाचापौ सरथौ सध्वजौ नृप ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर हंस और डिम्भक भी विशाल धनुष लिये रथ और ध्वजसहित पुष्करतीर्थमें गये ॥ १ ॥

पुरःसरमहाभूतौ संहरन्ताविबोल्बणौ ।
प्रकुर्वन्तौ सिंहरवं भस्मना परिलेपितौ ॥ २ ॥

उन दोनोंके आगे दो बड़े-बड़े भूत चल रहे थे। वे इतने भयङ्कर थे कि संहार करनेके लिये उद्यत-से जान पड़ते थे। उन्होंने अपने सारे अङ्गोंमें भस्म रमा रखा था तथा वे जोर-जोरसे सिंहनाद करते थे ॥ २ ॥

त्रिपुण्ड्रकललाटान्तौ रुद्राक्षपरिशोभितौ ।
अन्यौ द्वाविव रुद्रौ तौ लोकसंहारकारकौ ॥ ३ ॥

उनके ललाटके प्रान्तभागोंतक फैली हुई त्रिपुण्ड्रकी रेखा शोभा पाती थी। वे दोनों रुद्राक्षकी मालाओंसे सुशोभित थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो दो दूसरे रुद्र सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेके लिये आ गये हों ॥ ३ ॥

ततोऽनुजग्मुः शतशः सैन्यानि नृपसत्तम ।
अक्षौहिण्यो दशैवासंस्तयोरथ समागताः ॥ ४ ॥

नृपश्रेष्ठ! उन दोनोंके पीछे-पीछे सैकड़ों सैनिक चल रहे थे। हंस और डिम्भककी दस अक्षौहिणी सेनाएँ वहाँ आ गयी थीं ॥ ४ ॥

विचक्रस्तु महाराज दानवो नगसंनिभः ।
तयोरेव सखा पूर्वमासीच्च बलशालिनोः ॥ ५ ॥

महाराज! उन दोनोंके साथ विचक्र नामक पर्वताकार दानव भी था, जो उन बलशाली बन्धुओंका पहलेसे ही मित्र था ॥ ५ ॥

शक्रो यस्य पुरःसरः स्थातुं शक्तो न वज्रभृत् ।
यो हि वीरो महाराज देवदैत्यसमागमे ॥ ६ ॥
देवान् निघ्नंस्तथा राजन् देवेन्द्रमजयन्महान् ।

वज्रधारी इन्द्र भी उसके आगे आकर ठहर नहीं सकते थे। महाराज जनमेजय! देवताओं और दैत्योंके संग्राममें उस महान् वीरने देवताओंपर चोट करते हुए वहाँ देवराज इन्द्रको भी पराजित कर दिया था ॥ ६ १/२ ॥

अकरोच्च पुरा युद्धं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ७ ॥
यो हि द्वारवतीं प्राप्य बबाधे यदुपुङ्गवान् ।

पूर्वकालमे इस विचक्रने प्रभावशाली भगवान् विष्णुके साथ युद्ध किया था और द्वारकापुरीमें जाकर श्रेष्ठ यादवोंको बड़ा कष्ट दिया था ॥ ७ १/२ ॥

स तदानीं महाराज श्रुत्वा युद्धमुपस्थितम् ॥ ८ ॥
अनेकशतसाहस्रैर्दानवैः परिघायुधैः ।
वृतः समभवद् दैत्यो वृष्णिद्वेषान् नृपोत्तम ॥ ९ ॥
हंसस्य डिम्भकस्याथ साहाय्यं कर्तुमुद्यतः ।

महाराज नृपश्रेष्ठ! उस समय युद्ध उपस्थित हुआ सुनकर कई लाख परिघधारी दानवोंसे घिरा हुआ वह दैत्य वृष्णिवंशियोंसे द्वेष रखनेके कारण हंस और डिम्भककी सहायता करनेके लिये उद्यत हो गया ॥ ८-९ १/२ ॥

विचक्रस्याथ दैत्यस्य हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ॥ १० ॥
अतीव मित्रतां यातो दद्यात् प्राणान्श्च संयति ।

उन दिनों राक्षसराज हिडिम्ब विचक्रनामक दैत्यका बड़ा भारी मित्र हो गया था। वह युद्धमें उसके लिये प्राण भी दे सकता था ॥ १० १/२ ॥

राक्षसैरपरैः सार्धं शिलाशूलासिपाणिभिः ॥ ११ ॥
ययौ तस्य सहायार्थं हिडिम्बः पुरुषादपः ।

राक्षसराज हिडिम्ब शिला, शूल और खड्ग धारण करनेवाले दूसरे राक्षसोंके साथ विचक्रकी सहायताके लिये वहाँ गया ॥ ११ १/२ ॥

अष्टाशीति सहस्राणि राक्षसास्तस्य चाभवन् ॥ १२ ॥
अनुयाता महाराज शिलापरिघबाहवः ।

महाराज! अपने हाथोंमें शिला और परिघ लिये अठासी हजार राक्षस उस हिडिम्बके अनुगामी होकर वहाँ गये थे ॥ १२ १/२ ॥

तयोस्तत्र महासैन्यं गच्छतोः केशवं प्रति ॥ १३ ॥
मिश्रितं दैत्यसंघैश्च राक्षसैश्च समन्ततः ।

१०७६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


अन्यद्भूतं महारौद्रं त्रैलोक्यभयदायकम् ॥ १४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णपर चढ़ाईके लिये जाते हुए हंस और डिम्भककी विशाल सेना वहाँ सब ओरसे दैत्यसमूहों तथा राक्षसोंसे मिश्रित हो गयी। वह अत्यन्त अद्भुत और महा-भयंकर सेना तीनों लोकोंको भय देनेवाली थी ॥ १३-१४॥

दैत्येन सहितौ तौ हि जग्मतुः पुष्करं प्रति ।
तावेतो हंसडिम्भकौ हन्तुं केशवमञ्जसा ॥ १५ ॥
विचक्र नामक दैत्यके साथ ये दोनों हंस और डिम्भक श्रीकृष्णका अनायास वध करनेके लिये पुष्करतीर्थको गये ॥ १५ ॥

ततः श्रुत्वा जरासंधो विग्रहं यदुभिः सह ।
नाकरोन्नृपसाहाय्यं पापं मे भवितेति ह ॥ १६ ॥
तदनन्तर यादवोंके साथ हंस और डिम्भकके युद्धका समाचार सुनकर जरासंधने उन दोनों नरेशोंकी सहायता नहीं की । उसने सोचा कि ऐसा करनेसे मुझे पाप लगेगा*॥ १६ ॥

गच्छतोः समितिं राजन् हंसस्य डिम्भकस्य च ।
अतित्वरितविक्रान्तास्ते ययुः पुष्करं प्रति ॥ १७ ॥
राजन् ! युद्धमें जाते हुए हंस और डिम्भकके साथ वे शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले नरेशगण भी पुष्करको गये ॥ १७ ॥

सिंहनादं विमुञ्चन्तः कथयन्तः परस्परम् ।
अहमेव नृपा युद्धं करोमि प्रथमं हरेः ॥ १८ ॥
वे सब-के-सब सिंहनाद करते हुए परस्पर कहते थे कि 'राजाओ ! पहले मैं ही श्रीकृष्णके साथ युद्ध करूँगा' ॥ १८ ॥

इत्यब्रुवन् नृपा राजञ्छतशः केशवं प्रति ।
सम्प्राप्तास्ते नृपश्रेष्ठाः पुष्करं पुण्यवर्धनम् ॥ १९ ॥
राजन् ! इस तरह सैकड़ों नरेशोंने श्रीकृष्णसे युद्ध करनेकी बात कही । इस प्रकार बातचीत करते हुए वे श्रेष्ठ नरेश पुण्यवर्धक पुष्करतीर्थमें जा पहुँचे ॥ १९ ॥

मुनिजुष्टं तपोवृद्धैर्ऋषिभिश्च निषेवितम् ।
अत्यन्तभद्रं लोकेषु पुष्करं प्रथमं नृप ॥ २० ॥
नरेश्वर ! तपस्यामें बढ़े-चढ़े ऋषि-मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। पुष्कर ही वह प्रथम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें अत्यन्त कल्याणकारी बताया गया है ॥ २० ॥

पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव जगतीपते ।
दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव किल्विषच्छेदिनौ नृप ॥ २१ ॥
पृथ्वीनाथ ! राजा जनमेजय ! पुष्करतीर्थ और पुण्डरीकाक्ष भगवान् श्रीकृष्ण—ये दो ही ऐसे हैं, जो दर्शन और स्पर्शसे सारे पापोंका उच्छेद करनेवाले हैं ॥ २१ ॥

पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव नृपसत्तम ।
सेव्यमानौ मुनिश्रेष्ठैरमरैर्धर्महात्मभिः ॥ २२ ॥
नृपश्रेष्ठ ! पुष्कर और पुण्डरीकाक्ष—इन दोका ही श्रेष्ठ मुनि तथा महामनस्वी देववृन्द सेवन करते हैं ॥ २२ ॥

द्वावेव हि नृपश्रेष्ठ सर्वपापप्रणाशकौ ।
तावुभौ यत्र सहितौ तत्र ते संस्थिता नृपाः ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! वे दो ही सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। वे दोनों जहाँ एक साथ हो गये थे, वहाँ वे सब नरेश उपस्थित हुए ॥ २३ ॥

दृष्टवन्तो हरिं विष्णुं विश्रुतश्रवसं परम् ।
पुष्करं पुण्यनिलयं तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम् ॥ २४ ॥
उन सबने वहाँ विस्तृत यशवाले परम पुरुष भगवान् विष्णु हरिका तथा ब्रह्माजीके द्वारा सेवित पुण्य-स्थान पुष्करतीर्थका दर्शन साथ ही किया ॥ २४ ॥

ताभ्यां कुरु नमस्कारं मनसा नृपसत्तम ।
अहो निःशेषमभवत् तत्र भूयो न संशयः ॥ २५ ॥
सैन्यं तत्र च सम्प्राप्तं दैत्यरक्षःसमाकुलम् ।
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! तुम भी अपने मनसे पुष्करतीर्थ और भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करो। अहो ! वहाँ दैत्यों और राक्षसोंसे भरी हुई जो सेना पहुँची थी, वह सारी-की-सारी फिर नष्ट हो गयी, इसमें संशय नहीं है ॥ २५३/४ ॥

अनेकभेरीपणवझर्झरीडिण्डिमाकुलम् ॥ २६ ॥
नानापणवसम्मिश्रं रक्षोनादविनादितम् ।
वह सेना अनेकानेक भेरी, पणव, झाँझ और नगाड़ोंकी ध्वनिसे व्याप्त थी, नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे मिश्रित राक्षसोंके सिंहनादसे गूँज रही थी ॥ २६३/४ ॥

प्रविश्य सरसस्तीरं पुष्करस्य विशाम्पते ।
दर्शयामास देवेशं युद्धाय समुपस्थितम् ॥ २७ ॥
प्रजानाथ ! उस सेनाने पुष्कर-सरोवरके तटपर पहुँचकर युद्धके लिये उपस्थित हुए देवेश्वर श्रीकृष्णका एक दूसरेको दर्शन कराया ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने युद्धार्थं हंसडिम्भकसैन्यानां पुष्करागमने एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें युद्धके लिये हंस और डिम्भककी सेनाका पुष्करतीर्थमें आगमनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥


* शास्त्रकी आज्ञा है कि 'परासक्तः परेण न हन्तव्यः' (दूसरेके साथ युद्धमें फँसे हुए पुरुषको दूसरा न मारे), हंसकी सहायतामें जानेसे जरासंधको उक्त शास्त्राज्ञाके उल्लङ्घनजनित दोषकी प्राप्ति होती, इसलिये वह नहीं गया ।

भविष्यपर्व ] द्वविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७७

द्वविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः उभयपक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध

वैशम्पायन उवाच द्वे सेने संगते राजन् सध्वजे सपरिच्छदे । महापरिघसंकीर्णे गदाशक्तिसमाकुले ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन् ! वे दोनों ओरकी सेनाएँ वहाँ एक दूसरीसे मिल गयीं । वे ध्वज तथा अन्य उपकरणोंसे सम्पन्न थीं । दोनों ही दलोंमें बड़े-बड़े परिघ सञ्चित थे । दोनों ही सेनाएँ गदा और शक्तियोंसे भरी-पूरी थीं ॥ १ ॥

भेरीझर्झरसम्पूर्णे डिण्डिमारावसंकुले । प्रगृहीतमहाशस्त्रशूलासिवरकार्मुके ॥ २ ॥ दोनोंमें भेरी और झाँझकी ध्वनि हो रही थी । दोनों ही डिंडिम-घोषसे व्याप्त थीं। दोनों ही दलोंके सैनिकोंने बड़े-बड़े शस्त्र, शूल, खङ्ग और श्रेष्ठ धनुष ले रखे थे ॥ २॥

परस्परकृतोत्साहे चक्राते युद्धमुल्बणम् । ते शराः कार्मुकोत्सृष्टा निर्भिद्याथ शरीरिणाम् ॥ ३॥ शरीराणि महाराज जग्मुर्दूरं सहस्रशः । महाराज ! दोनों सेनाएँ एक दूसरीको जीतनेका उत्साह रखती थीं । दोनों भयंकर युद्ध करने लगीं । उनके धनुषोंसे छूटे हुए सहस्रों बाण देहधारियोंके शरीरोंको विदीर्ण करके दूरतक चले जाते थे ॥ ३ <sup></sup>/<sub></sub>

भटबाहुविनिर्मुक्ताः खङ्गा निर्भिद्य वक्षसि ॥ ४ ॥ स्फुरन्तश्च तथा राजञ्छिरांस्याहृत्य खं ययुः । राजन् ! योद्धाओंकी भुजाओंसे छूटे हुए खङ्ग शत्रु की छातीमे घाव करके जब उछलते, तब उनके सिर काटकर आकाशमें चले जाते ॥ ४ <sup></sup>/<sub></sub>

परिघाश्च तथा राज्ञां बाहुभिः परिचोदिताः ॥ ५ ॥ तिलशश्चक्रतुस्त्वं शरीरं नृपरक्षसाम् । दैत्यानां कुर्वतां नादमन्योन्यवधकाङ्क्षिणाम् ॥ ६ ॥ क्षत्रियोंकी भुजाओं द्वारा फेंके गये परिघ राजाओं तथा राक्षसोंके अनुपम शरीरको तिल-तिल करके काट डालते थे तथा एक दूसरेके वधकी इच्छासे गर्जना करनेवाले दैत्योंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ५-६ ॥

दैत्या रक्षांसि राजेन्द्र राजानश्च समन्ततः । अन्योन्यं परिघैर्जघ्नुश्चापमुक्तैः शिलाशितैः ॥ ७ ॥ शरैश्च भोगिभोगाभैस्तीक्ष्णमन्ये महाबलाः । राजेन्द्र ! दैत्य, राक्षस और राजा लोग सब ओर एक दूसरेपर परिघोंद्वारा प्रहार करते थे तथा अन्य महाबली वीर शिलापर तेज करके धनुषसे छोड़े गये सर्पाकार बाणोंद्वारा गहरा आघात करते थे ॥ ७ <sup></sup>/<sub></sub>

राक्षसा दानवाश्चान्ये मत्तमातङ्गविक्रमाः ॥ ८ ॥ अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैर्महाशरैः । राजन् ! मतवाले हाथियोंके समान पराक्रमी राक्षस और अन्य दानव धनुषसे छोड़े गये महान् बाणोंद्वारा परस्पर चोट पहुँचाते थे ॥ ८ <sup></sup>/<sub></sub>

नागा नागैर्महाराज हया अश्वैः समन्ततः ॥ ९ ॥ रथा रथैः समाजग्मुः सादिनः सादिभिस्तथा । महाराज ! वहाँ सब ओर हाथी हाथियोंसे, घोड़े घोड़ोंसे, रथ रथोंसे और सवार सवारोंसे भिड़ गये ॥ ९ <sup></sup>/<sub></sub>

पट्टिशाशिशरवातैः कुन्तैः सायककर्पणैः ॥ १० ॥ सशक्तिपरिघप्रासपरश्वधसमाकुलैः । भिन्दिपालैर्महारौद्रैरर्जुन्युरन्योन्यमाहवे ॥ ११ ॥ पट्टिश, खङ्ग, बाणसमूह, सायकोंको भी काट गिरानेवाले कुन्त, शक्ति, परिघ, प्रास और फरसोंसहित महाभयंकर भिन्दिपाल आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा सभी योद्धा रणभूमिमें एक दूसरेको मारने लगे ॥ १०-११ ॥

अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैः शिलाशितैः । राक्षसा दानवा राजन् क्षत्रियाश्च समन्ततः । इतश्चेतश्च धावन्तः कुर्वन्तो विस्तरं रवम् ॥ १२ ॥ राजन् ! इधर-उधर दौड़ते और विकट गर्जना करते हुए राक्षस, दानव तथा क्षत्रिय शिलापर तेज कर धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा सब ओर परस्पर प्रहार करते थे ॥ १२ ॥

हताः केचिन्महाराज पेतुरुर्व्यां महासिभिः । केचिन्मथितमस्तिष्का गदाभिर्वीर्यवत्तमाः ॥ १३ ॥ महाराज ! कोई बड़ी-बड़ी तलवारोंसे मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े । कितने ही महापराक्रमी वीरोंके मस्तक गदाओंके आघातसे चूर-चूर हो गये ॥ १३ ॥

भिन्नग्रीवा महाराज परिघैः परिघायुधैः । यमराष्ट्रं गताः केचित् केचित् स्वर्गं समाययुः ॥ १४ ॥ महाराज ! कितने ही परिघधारी योद्धाओंने अपने परिघोंद्वारा शत्रुओंकी गर्दनें तोड़ डालीं, उन मारे शत्रुओंमें से कुछ तो यमराजके राज्यमें गये और कुछ स्वर्गलोकमें जा पहुँचे ॥ १४ ॥

अप्सरोभिः समासेदुः पश्यन्तः स्वं कलेवरम् । केचित् स्वांश्च परांश्चैव हत्वा भ्रान्ता इवाभवन् ॥ १५ ॥ वे अपने मृत शरीरको देखते हुए अप्सराओंसे जा मिले । कितने ही योद्धा परायों तथा अपनोंको भी मारकर भ्रान्त-से हो गये थे ॥ १५ ॥

एतस्मिन्नन्तरे राजञ्छङ्खा भेर्यः सहस्रशः । सस्वनुः सर्वतः सैन्ये मृदङ्गा बहवस्तथा ॥ १६ ॥

१०७८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

राजन् ! इसी बीचमें सहस्रों शङ्खों और भेरियोंकी ध्वनि होने लगी। सेनामें सब ओर बहुत-से मृदङ्ग बजने लगे ॥ १६ ॥

मध्यंदिनगते सूर्ये तापं दधति घोरवत्।
ततः पिशाचा विकृताः करालचिततोदराः ॥ १७ ॥
राक्षसाश्च महाघोराः पिशितं केशशाद्वलम्।
मुदिता भक्षयामासुः पिबन्तः शोणितं बहु ॥ १८ ॥
सूर्य मध्याह्नकालमें पहुँचकर जब घोर ताप देने लगे, उस समय विशाल एवं विकराल पेटवाले विकृताकार पिशाच और महाघोर राक्षस आकर बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत-सा रक्त पीने और केशयुक्त मांस खाने लगे ॥ १७-१८ ॥

संचितानि शवान्यासन् कबन्धाः खड्गपातिताः।
विभज्य देशं बहुशो युद्धभूमौ शवाशिनः ॥ १९ ॥
वहाँ ढेर-की-ढेर लाशें पड़ीं थीं, खड्गोंद्वारा गिराये हुए बिना सिरके धड़ एकत्र हो गये थे। वे शवका भक्षण करनेवाले पिशाच युद्धभूमिमें परस्पर बहुत-से देशका विभाजन करके मृतकोंके मांस खाते थे ॥ १९ ॥

अथ श्येना मृगाश्चैव कङ्का गृध्रास्तथा परे।
तुण्डैः शवान् विनिष्कृष्य भक्षयन्ति ततस्ततः ॥ २० ॥
तदनन्तर बहुत-से बाज, हिंसक जन्तु, कंक, गृध्र तथा अन्य पक्षी इधर-उधरसे आकर अपनी चोंचोंसे मुर्दोंको खींच-खींचकर खाने लगे ॥ २० ॥

सप्ताशीतिसहस्राणि हता नागा नृपोत्तम।
त्रिंशत्सहस्रायुतं निहता हयसत्तमाः ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस युद्धमें सत्तासी हजार हाथी मारे गये तथा तीस करोड़ अच्छे घोड़ोंका संहार हुआ ॥ २१ ॥

हतं लक्षं महाराज रथानां रथिभिः सह।
त्रिंशत्कोट्यो हतास्तत्र सादिनः सायुधा भृशम् ॥ २२ ॥
महाराज ! रथियोंसहित एक लाख रथ नष्ट हुए तथा वहाँ तीस करोड़ शस्त्रधारी घुड़सवार गहरी चोट खाकर मारे गये थे ॥ २२ ॥

मध्यंदिनगते सूर्ये हताः केचन निर्गताः।
केचिच्च तृषिता राजन् विविशुः पुष्करं सरः ॥ २३ ॥
राजन् ! सूर्यके मध्याह्नकालमें पहुँचते-पहुँचते कितने ही योद्धा घायल होकर रणभूमिसे निकल गये और कितने ही प्याससे पीड़ित हो पुष्कर सरोवरमें घुस गये ॥ २३ ॥

केचिद् भूमिं समालिङ्ग्य भीता इत्यब्रुवन् रणे।
मुक्तकेशाः पतन्ति स्म रथान् संत्यज्य केचन ॥ २४ ॥
कितने ही सैनिक पृथ्वीका आलिङ्गन करके पड़ गये और रणभूमिमें अपनेको भयभीत बताने लगे। कितने ही योद्धा केश खोले हुए रथोंको छोड़कर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ २४ ॥

संदष्टौष्ठपुटाः केचित् सादिनः पुरतो हताः।
अत्यद्भुतं महायुद्धमासीत् पुष्करतीर्थके।
यथा देवासुरं युद्धमासीत् पूर्वे नृपोत्तम ॥ २५ ॥
कितने ही घुड़सवार दाँतोंसे ओठ दबाये सामने मारे गये। नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार पुष्करतीर्थमें अत्यन्त अद्भुत महान् युद्ध हुआ। पूर्वकालमें जिस प्रकार देवासुर-संग्राम हुआ था, वैसा ही यह भी था ॥ २५ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने संकुलयुद्धे द्वार्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें संकुल-युद्धविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥


त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और विचक्रका घोर युद्ध तथा विचक्रका वध

वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्वन्द्वयुद्धमवर्तत।
विचक्रं योधयामास शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इसी बीचमें वहाँ द्वन्द्वयुद्ध होने लगा। शार्ङ्गधन्वा गदाधारी श्रीकृष्णने विचक्रके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥

बलभद्रोऽथ हंसेन डिम्भकेन च सात्यकिः।
वसुदेवोग्रसेनाभ्यां हिडिम्बः पुरुषादकः ॥ २ ॥
बलभद्रने हंसके साथ और सात्यकिने डिम्भकके साथ लोहा लिया। नरभक्षी हिडिम्ब वसुदेव तथा उग्रसेनके साथ युद्ध करने लगा ॥ २ ॥

शेषाश्च शेषै राजेन्द्र चक्रुर्युद्धमदीनगाः।
वासुदेवस्त्रिसप्तत्या दैत्यं वक्षस्यताडयत् ॥ ३ ॥
राजेन्द्र ! किसीके सामने दीनता न प्रकट करनेवाले शेष वीर शेष योद्धाओंके साथ जूझने लगे। भगवान् श्रीकृष्णने दैत्यकी छातीमें तिहत्तर बाण मारे ॥ ३ ॥

शरैर्निशितधाराग्रैर्विस्मयं दर्शयन् रणे।
दानवो देवदेवेशं दृढेन निशितेन च ॥ ४ ॥
शरेणाकर्णमाकृष्य धनुःप्रवरमीश्वरम्।
जघान स्तनमध्ये च पश्यतस्तु शचीपतेः ॥ ५ ॥
उन बाणोंकी धार बड़ी तीखी थी। उन्होंने रणभूमिमें विस्मय प्रकट करते हुए उस दैत्यपर प्रहार किया था। तब उस दानवने भी अपने श्रेष्ठ धनुषको कानतक खींचकर एक सुदृढ़ और पैने बाणसे देवदेवेश्वर भगवान् श्रीकृष्णकी छातीमें

भविष्यपर्व ] त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०७९


शचीपति इन्द्रके देखते-देखते प्रहार किया ॥ ४-५ ॥

तेन विद्धोऽथ भगवान् वक्षोदेशे जनार्दनः।
अवमच्छोणितं विष्णुरादिकाले यथा प्रजाः ॥ ६ ॥

वक्षःस्थलमें उसके बाणकी चोट खाकर भगवान् जनार्दन विष्णु रक्त वमन करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सृष्टिके आदि कालमें उन्होंने प्रजावर्गको अपने मुखसे प्रकट किया था॥

ततः क्रुद्धो हृषीकेशः क्षुरप्रेणाहनद् ध्वजम्।
अश्वांश्च चतुरो हत्वा सारथिं च शरैस्त्रिभिः ॥ ७ ॥
ततो दध्मौ महाशङ्खं यथा तारामये रणे।

तदनन्तर कुपित हुए भगवान् हृषीकेशने एक क्षुरप्रसे उस दानवकी ध्वजा काट डाली, फिर उसके चारों घोड़ोंको मारकर तीन बाणोंसे सारथिको भी कालके गालमें डाल दिया। तदनन्तर तारकामय संग्रामकी भाँति उन्होंने अपना महान् शङ्ख बजाया ॥ ७ १/२ ॥

रथादुत्प्लुत्य सहसा दानवः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ८ ॥
गदां गृह्य महाघोरां दुःसहां वीर्यशालिनीम्।
तया जघान दैत्येन्द्रः किरीटे केशवस्य ह ॥ ९ ॥
ललाटे च पुनुर्विष्णुं सिंहनादं व्यनीनदत्।

तब क्रोधसे मूर्च्छित हुए उस दानवने सहसा रथसे उछलकर एक दुःसह शक्तिशाली एवं महाभयंकर गदा हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस दैत्यराजने पहले तो श्रीकृष्णके किरीटपर आघात किया, फिर उनके ललाटमें चोट पहुँचायी। तत्पश्चात् वह जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा ॥ ८-९ १/२ ॥

ततः शिलां च महतीं प्रगृह्य दनुजः किल ॥ १० ॥
भ्रामयित्वा दशगुणं प्राहरत् केशवोरसि।

इसके बाद उस दानवने एक बहुत बड़ी शिला उठायी और उसे दस बार घुमाकर भगवान् श्रीकृष्णकी छातीपर दे मारा॥

तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य हस्तेनादाय केशवः ॥ ११ ॥
जघान च तया दैत्यं स पपातार्दितः क्षितौ।
गतासुरिव संजज्ञे श्वसन्निव पपात ह ॥ १२ ॥

उस शिलाको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्णने हाथसे पकड़ लिया और उसीसे उस दैत्यपर आघात किया। उस प्रहारसे पीड़ित हो वह दैत्य प्राणहीन-सा हो गया और लंबी साँस-सा खींचता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११-१२ ॥

प्राप्य संज्ञां ततो दैत्यः क्रोधाद् द्विगुणमाबभौ।
आदाय परिघं घोरमिदमाह जनार्दनम् ॥ १३ ॥

तदनन्तर होशमें आकर वह दैत्य कुपित हो उठा। क्रोधसे उसकी आभा दुगुनी हो गयी। उसने भयंकर परिघ लेकर भगवान् जनार्दनसे इस प्रकार कहा—॥ १३ ॥

अनेन तव गोविन्द दर्पजातं निहन्म्यहम्।
विक्रमज्ञस्तदा चासि मम देवासुरे रणे ॥ १४ ॥

'गोविन्द ! इस परिघसे मैं तुम्हारा सारा घमंड चूर्ण किये देता हूँ। उन दिनों जब देवासुर-संग्राम हो रहा था, तुम मेरा पराक्रम जान चुके हो ॥ १४ ॥'

तावेव विपुलौ बाहू स एवास्मि जनार्दन।
तथापि युध्यसे वीर ज्ञात्वा त्वं मामकं बलम् ॥ १५ ॥
वारयैनं महाबाहो परिघं बाहुनिःसृतम्।

'जनार्दन ! वे ही दोनों मेरी विशाल भुजाएँ हैं और वही मैं हूँ। वीर ! तुम मेरे बलको जान चुके हो, तो भी मुझसे युद्ध करते हो। महाबाहो ! मेरी भुजाओंसे छूटे हुए इस परिघको रोको तो सही' ॥ १५ १/२ ॥

इत्युक्त्वा देवदेवेशं शङ्खचक्रगदाधरम्।
चिक्षेप दैत्यो लोकेशं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ १६ ॥

ऐसा कहकर उस दैत्यने सब लोगोंके देखते-देखते शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर जगदीश्वर श्रीकृष्णपर वह परिघ चला दिया ॥ १६ ॥

तं गृह्य बाहुना कृष्णो हतोऽसीति वदन् हरिः।
खण्डशः कारयामास खड्गेन निशितेन ह ॥ १७ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने उस परिघको हाथसे पकड़ लिया और 'अब तू शीघ्र ही मारा जायगा' ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी तीखी तलवारसे उस परिघके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥

उत्पाट्य वृक्षं दैत्येशः शतशाखं महाशिखम्।
तेन सम्पोथयामास विष्टरश्रवसं विभुम् ॥ १८ ॥

तब उस दैत्यराजने सौ शाखा और बहुत ऊँची शिखा-वाले एक विशाल वृक्षको उखाड़कर उसे विस्तृत यशवाले भगवान् श्रीकृष्णपर दे मारा ॥ १८ ॥

छित्त्वा तं चापि खड्गेन तिलशश्च चकार ह।
विक्रीड्य सुचिरं विष्णुस्तेन दैत्येन माधवः ॥ १९ ॥
हन्तुमैच्छत् तदा दैत्यमादाय निशितं शरम्।
आग्नेयास्त्रेण संयोज्य जघानैनं महान् हरिः ॥ २० ॥

माधव श्रीकृष्णने अपनी तलवारसे उस वृक्षको भी तिल-तिल करके काट डाला। इस प्रकार उस दैत्यके साथ चिरकालतक क्रीड़ा करके भगवान् महाविष्णुने उस समय उसे मार डालनेकी इच्छा की और एक तीखा बाण हाथमें लेकर उसे आग्नेयास्त्रसे संयुक्त करके उसके द्वारा उस दैत्य-पर आघात किया ॥ १९-२० ॥

संदह्य स शरो दैत्यं सर्वलोकस्य पश्यतः।
यथापूर्वं जगामाशु करं भगवतः पुनः ॥ २१ ॥

उस बाणने सब लोगोंके देखते-देखते दैत्यको जलाकर भस्म कर दिया और पहलेकी भाँति वह शीघ्र ही भगवान्‌के हाथमें चला गया ॥ २१ ॥

१०८० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


हतशिष्टास्ततो दैत्याः पलायन्तो दिशो दश ।
अद्यापि न निवर्तन्ते गच्छन्तो वै महोदधिम् ॥ २२ ॥

फिर मरनेसे बचे हुए दैत्य दसों दिशाओंमें भागते हुए महासागरको चले गये। वे अब भी वहाँसे लौट नहीं रहे हैं॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने कृष्णस्योत्कर्षे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें श्रीकृष्णकी विजयविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥


चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

हंस और बलभद्रका युद्ध

वैशम्पायन उवाच<br>बलदेवस्तु धर्मात्मा धनुरुदाय सत्वरम्<br>जघान हंसं दशभिर्बाणैर्बाणभृतां वर ॥ १ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बाणधारियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा बलदेवजीने तुरंत धनुष लेकर दस बाणोंसे हंसको घायल कर दिया ॥ १ ॥ते मुक्ता निशिता घोरा नाराचाश्च सुवाजिनः ॥ ७ ॥<br>रथे ध्वजे तथा चापे चक्रे तूणीद्वये नृप ।<br>पतिताः सर्वतो राजन् व्यथां चैव तथा ददुः ॥ ८ ॥<br><br>राजन् ! उनके धनुषसे छूटे हुए वे सुन्दर पंखवाले तीखे और भयंकर नाराच हंसके रथ, ध्वज, धनुष, चक्र और दोनों तरकसपर पड़कर सब ओरसे पीड़ा देने लगे ॥ ७-८ ॥
तं प्रत्यविध्यन्नाराचैर्हंसः पञ्चभिराशुगैः<br>तानन्तरे हली छित्त्वा नाराचैर्दशभिः पुनः ।<br>नाराचेनाशु विव्याध ललाटे हंसमोजसा ॥ २ ॥<br><br>हंसने भी बदलेमें पाँच शीघ्रगामी नाराचोंद्वारा उनपर प्रहार किया; परंतु हलधरने पुनः दस नाराच मारकर बीच-में ही उन्हें काट दिया और शीघ्र ही एक नाराचसे हंसके ललाटमें बलपूर्वक आघात किया ॥ २ ॥ततः क्रुद्धो महाराज हंसो वीर्यमदान्वितः ।<br>शरेण हलिनं विद्ध्वा ध्वजं चिच्छेद कालवित् ॥ ९ ॥<br>शरैश्चतुर्भिंरश्वांश्च सूतं प्रेताधिपे ददौ ।<br><br>महाराज ! तब बल-पराक्रमके मदसे उन्मत्त हुए और समयका ज्ञान रखनेवाले हंसने कुपित होकर एक बाणसे हलधरको घायल करके उनकी ध्वजा काट डाली; फिर चार बाणोंसे चारों घोड़ोंको मारकर एक बाणसे उनके सारथिको भी यमराजके हवाले कर दिया ॥ ९½ ॥
दृढं पतन् स नाराचस्तस्य संज्ञां समाददे ।<br>रथोपस्थे चिरं स्थित्वा तूणाद् बाणं समाददे ॥ ३ ॥<br>लब्ध्वा हंसः स संज्ञां तु विद्ध्वा तेन यदूत्तमम् ।<br>सिंहवद् व्यनदद्धंसो देवान् विस्मापयन् रणे ॥ ४ ॥<br><br>उस नाराचने गहरी चोट पहुँचाकर हंसको अचेत कर दिया । वह देरतक रथके पिछले भागमें बैठा रहा । इसके बाद होशमें आकर हंसने तरकससे बाण निकाला और उससे यदुश्रेष्ठ बलभद्रको घायल करके रणभूमिमें देवताओंको विस्मयमें डालते हुए उसने सिंहके समान गर्जना की ॥ ३-४॥ततः क्रुद्धो हली तस्मै गदां गृह्य महारणे ॥ १० ॥<br>आपपात महाबाहुर्हंसं शेष इव श्वसन् ।<br><br>तब क्रोधमें भरे हुए महाबाहु हलधर उस महान् समर-में गदा लेकर फुफकारते हुए शेषनागके समान हंसपर टूट पड़े ॥ १०½ ॥
ततः क्रुद्धो हली विद्धस्तेन बाणेन माधवः ।<br>वमञ्शोणितमत्युष्णं निःश्वसंश्च रणाजिरे ॥ ५ ॥<br><br>उसके बाणसे आहत होकर माधव हलधर कुपित हो उठे और समराङ्गणमें अत्यन्त उष्ण रक्त वमन करते हुए लंबी साँस खींचने लगे ॥ ५ ॥तया रथं ध्वजं चक्रमश्वान् सूतं हलायुधः ।<br>बभञ्ज तिलशः सर्वं ननाद च पुनः पुनः ॥ ११ ॥<br><br>हलधर बलरामजीने उस गदाके द्वारा हंसके रथ, ध्वज, चक्र, अश्व तथा सारथि सबको तिल-तिल करके काट डाला और बारंबार गर्जना की ॥ ११ ॥
लोहिताविष्टगात्रस्तु कुंकुमार्ड्र इवाभवत् ।<br>नाराचैः शतसाहस्रैरर्दयामास माधवः ॥ ६ ॥<br>हंसं हंसगतिं वीरं नीलवासा हलायुधः ।<br><br>उनका शरीर रक्तसे रञ्जित हो कुङ्कुमसे भीगा हुआ सा प्रतीत होने लगा । तब नीलवस्त्रधारी हलधर माधवने हंसके समान गतिवाले वीर हंसको लाखों नाराचोंसे पीड़ित कर दिया ॥ ६½ ॥भूयश्च गदया हंसं चिक्षेप च बली किल ।<br>सोऽपि हंसो गदां गृह्य रथात् तस्मादवापतत् ॥ १२ ॥<br><br>बलवान् वीर बलभद्रने पुनः गदाद्वारा हंसको चोट पहुँचायी । यह देख हंस भी गदा लेकर अपने रथसे कूद पड़ा ॥ १२ ॥
ततस्तौ हंसहलिनौ युयुधाते महारणे ।<br>महारथौ महाबाहू लोके प्रथिततेजसौ ॥ १३ ॥<br><br>तदनन्तर लोकमें विख्यात तेजवाले महाबाहु महारथी हंस और हलधर उस महासमरमें युद्ध करने लगे ॥ १३ ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८१

अत्यद्भुतं सुविक्रान्तौ परस्परवधैषिणौ ।
कृतश्रमौ महायुद्धे हंसविक्रान्तगामिनौ ॥ १४ ॥

वे दोनों परम पराक्रमी, एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले, महायुद्धके लिये परिश्रम करनेवाले और हंसके समान चलनेवाले थे। उनमें अत्यन्त अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ १४ ॥

यथा देवासुरे युद्धे शक्रवृत्रौ पुराम्वरे ।
उभौ संसिक्तसर्वाङ्गौ शोणितेन महारणे ॥ १५ ॥

जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर इन्द्र और वृत्रासुर आकाशमें जूझते थे, उसी प्रकार वे हंस और बलभद्र भी परस्पर युद्ध कर रहे थे। उस महासमरमें दोनोंके सारे अङ्ग खूनसे रँग गये थे ॥ १५ ॥

अत्यन्तखेदिनौ युद्धे परस्परबलेन ह ।
ततश्च दक्षिणं मार्गं बलभद्रोऽन्वगच्छत ॥ १६ ॥

उस युद्धस्थलमें एक-दूसरेके बलसे दोनोंको अत्यन्त खेद हो रहा था। तदनन्तर बलभद्रने दाहिने मार्गका अनुसरण किया ॥ १६ ॥

सव्यं तु हंसो राजेन्द्र व्यगृह्लात् स्वयमेव हि ।
पोथयाञ्चक्रतुर्युद्धे गदाभ्यां गजविक्रमौ ॥ १७ ॥

राजेन्द्र ! हंसने स्वयं ही बायें पैंतरेको अपनाया। हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों वीरोंने युद्धमें एक दूसरेको गदाद्वारा घायल किया ॥ १७ ॥

यथाप्राणं महाबाहू जघ्नतुर्मरणाय तौ ।
अतिप्रवृद्धं संग्रामं देवासुररणोपमम् ॥ १८ ॥
विदधाते महारङ्गे पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ।

उन महाबाहु वीरोंने पूरा बल लगाकर एक दूसरेके वधके लिये परस्पर प्रहार किया। उस महान् समराङ्गणमें समस्त देवताओंके देखते-देखते वे दोनों वीर देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध करने लगे ॥ १८ ॥

देवाश्च मुनयश्चैव विस्मयं परिजग्मिरे ॥ १९ ॥
अहो खल्वीदृशं युद्धं दृष्टं पूर्वं न च श्रुतम् ।
इत्यूचुर्विस्मयवशाद् देवगन्धर्वकिन्नराः ॥ २० ॥

देवता और मुनि भी बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। देवता, गन्धर्व और किन्नर विस्मयके वशीभूत होकर इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! ऐसा युद्ध हमने न तो पहले कभी देखा है और न सुना ही है' ॥ १९-२० ॥

परस्परकृतोत्साहौ चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।
अथ हंसो महारङ्गे दक्षिणं दक्षिणोत्तमः ॥
व्यचरन्मार्गमप्यर्थं सव्यं तु बलवान् बलः ॥ २१ ॥

एक दूसरेको जीतनेका उत्साह मनमें लिये वे दोनों वीर उत्तम युद्ध कर रहे थे। तदनन्तर उदार पुरुषोंमें श्रेष्ठ हंसने उस महासमरमें दाहिने पैंतरेपर विचरना आरम्भ किया और बलवान् बलभद्र बायें पैंतरेपर अत्यन्त तीव्र गतिसे विचरने लगे ॥ २१ ॥

निकुञ्च्य जानुनी पूर्वं चक्रतुर्गदया भृशम् ।
रणे रणविदां श्रेष्ठौ पश्यतां त्रिदिवौकसाम् ॥ २२ ॥

युद्धकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ बलभद्र और हंसने देवताओंके देखते-देखते पहले दोनों घुटनोंको मोड़कर रणभूमिमें एक-दूसरेको गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसबलभद्रयुद्धे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंस और बलभद्रका युद्ध-विषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥


पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकि और डिम्भकका युद्ध

वैशम्पायन उवाच
युद्धं चक्रतुरत्यर्थं ततो डिम्भकसात्यकी ।
तावुभौ बलिनौ वीरौ विख्यातौ क्षत्रियेषु च ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर डिम्भक और सात्यकि अत्यन्त घोर युद्ध करने लगे। वे दोनों बलवान् वीर क्षत्रियोंमें विख्यात थे ॥ १ ॥

कृतश्रमौ महायुद्धे सततं वृद्धसेविनौ ।
सात्यकिर्दशभिर्वीरौ डिम्भकं वेदपारगम् ॥ २ ॥
अविध्यन्निशितैर्बाणैः स्तने वक्त्रे तथोरसि ।

उन्होंने महायुद्धमें बड़ा परिश्रम किया था। वे दोनों सदा वृद्ध पुरुषोंका सेवन करनेवाले थे। वीर सात्यकिने वेदोंके पारङ्गत विद्वान् डिम्भकके स्तन, मुख और छातीमें दस पैने बाणोंसे प्रहार किया ॥ २ ॥

स तेन विद्धो बलिना डिम्भकः क्षत्रियोत्तमः ॥ ३ ॥
नाराचैः पञ्चसाहस्रैर्विव्याध युधि गर्वितः ।
तानन्तरे वृष्णिवीरो निभिन्दन् निनदन् ब्रुवन् ॥ ४ ॥

उस बलवान् वीरके द्वारा घायल किये गये क्षत्रियशिरोमणि डिम्भकने जिसे युद्धमें अपने पराक्रमपर बड़ा गर्व था, सात्यकिको पाँच हजार नाराचोंद्वारा चोट पहुँचायी, परंतु वृष्णिवीर सात्यकिने उन नाराचोंको बीचमें ही गर्जना करके तथा बोलकर हुंकारमात्रसे ही खण्डित कर दिया ॥ ३-४ ॥

अथ क्रुद्धो नृपवरो विद्धः सप्तभिराशुगैः ।

१०८२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

पुनः शतसहस्रेण प्रत्यविध्यत सात्यकिम् ॥ ५ ॥ तब सात शीघ्रगामी बाणोंसे घायल होकर कुपित हुए नृपश्रेष्ठ डिम्भकने पुनः एक लाख बाणोंसे सात्यकिको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५ ॥

सात्यकिस्त्वथ विक्रान्तो धनुश्चिच्छेद तस्य तत् । अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन डिम्भकस्य स यादवः ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् पराक्रमी यादव वीर सात्यकिने एक तीखे अर्धचन्द्राकार बाणसे डिम्भकके उस धनुषको काट डाला ॥ ६ ॥

आजघ्ने डिम्भको वीरश्चापमादाय चापरम् । क्षुरप्रेणाथ रौद्रेण तैलधौतेन विक्रमी ॥ ७ ॥ तब पराक्रमी वीर डिम्भकने दूसरा धनुष लेकर तेलसे धुले हुए भयंकर क्षुरप्रके द्वारा सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७ ॥

स तेन विद्धो बाणेन वमञ्छोणितकं नृप । अतीव शुशुभे राजन् वसन्ते किंशुको यथा ॥ ८ ॥ राजन् ! उस बाणसे घायल हो रक्त वमन करते हुए सात्यकि वसन्तमें खिले हुए पलाशके समान बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ८ ॥

धनुश्चिच्छेद भूयस्तु गृहीतं यत् पुनर्महत् । ततोऽन्यद् धनुरादाय डिम्भको यादवेश्वरम् ॥ ९ ॥ जघान निशितैर्बाणैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । तब उन्होंने पुनः डिम्भकके उस विशाल धनुषको काट डाला, जिसको उसने दुबारा हाथमें लिया था। तदनन्तर डिम्भकने पुनः दूसरा धनुष हाथमें लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते यादवेश्वर सात्यकिको पैने बाणोंसे घायल करना आरम्भ किया ॥ ९ १/२ ॥

स धनुः पुनरत्युग्रं चिच्छेद युधि सात्यकिः ॥ १० ॥ शरेण तीक्ष्णपुङ्खेन डिम्भकस्य दुरात्मनः । सात्यकिने युद्धस्थलमें दुरात्मा डिम्भकके उस अत्यन्त भयंकर धनुषको तीखे पंखवाले बाणसे पुनः काट डाला ॥ १० १/२ ॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय सत्वरं स नृपोत्तमः ॥ ११ ॥ धनुषा तेन राजेन्द्र सात्यकिं विव्यधे पुनः । राजेन्द्र ! फिर नृपश्रेष्ठ डिम्भकने तुरंत दूसरा धनुष लेकर उसके द्वारा सात्यकिको पुनः बींधना आरम्भ किया ॥ ११ १/२ ॥

एवं धनूंषि राजेन्द्र शतं पञ्च च पञ्च च ॥ १२ ॥ छित्त्वा ननाद शैनेयः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । राजाधिराज जनमेजय ! इस प्रकार सात्यकिने सब क्षत्रियोंके देखते-देखते डिम्भकके एक सौ दस धनुष काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १२ १/२ ॥

धनुषी तौ परित्यज्य वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १३ ॥ खड्गौ प्रगृह्य बाल्यग्रौ युद्धाय समुपस्थितौ । तौ हि खड्गविदां श्रेष्ठौ वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १४ ॥ तब डिम्भक और सात्यकि दोनों वीर अपने धनुषोंको त्यागकर अत्यन्त भयंकर खड्ग हाथमें ले परस्पर युद्धके लिये उपस्थित हुए। वे दोनों वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे ॥ १३-१४ ॥

दौःशासनिर्महाभागः सोमदत्तिस्तथैव च । अभिमन्युश्च विक्रान्तो नकुलश्च तथैव च ॥ १५ ॥ एते खड्गविदां श्रेष्ठाः कीर्तिता युधि सत्समाः । महाभाग दुःशासनकुमार, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, पराक्रमी अभिमन्यु तथा नकुल (और डिम्भक, सात्यकि)—ये युद्धस्थलके छः श्रेष्ठतम वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें उत्कृष्ट माने गये हैं ॥ १५ १/२ ॥

एतेष्वेतो नृपश्रेष्ठौ षट्सु वै नृपसत्तम ॥ १६ ॥ तावेतावासिना युद्धं चक्रतुर्युद्धलालसौ । नृपश्रेष्ठ ! इन छहोंमें भी ये दोनों श्रेष्ठ नरेश सर्वोत्तम कहे गये हैं। वे ही दोनों युद्धकी लालसा लेकर खड्गद्वारा परस्पर जूझने लगे ॥ १६ १/२ ॥

भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धं प्रविद्धं बाहुनिःसृतम् ॥ १७ ॥ आकरं विकरं भिन्नं निर्मर्यादममानुषम् । संकोचितं कुलचितं सव्यजानु विजानु च ॥ १८ ॥ आह्निकं चित्रकं क्षिप्तं कुसुम्यं लम्बनं धुतम् । सर्वबाहु विनिर्बाहु सव्येतरमथोत्तरम् ॥ १९ ॥ त्रिबाहु तुङ्गबाहुञ्च सन्योन्नसमुदासि च । पट्टिकं मौष्टिकं चैव यौधिकं प्रथितं तथा ॥ २० ॥ इति प्रकारान् द्वात्रिंशच्चक्रतुः खड्गयोधिनौ । पुनः पुनः प्रहरन्तौ न च श्रममुपेयतुः ॥ २१ ॥ पुष्करस्थौ महाराज युद्धाय कृतनिश्चयौ । भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, प्रविद्ध, बाहुनिःसृत, आकर, विकर, भिन्न, निर्मर्याद, अमानुष, संकोचित, कुलचित, सव्यजानु, विजानु, आह्निक, चित्रक, क्षिप्त, कुसुम्य, लम्बन, धुत, सर्वबाहु, विनिर्बाहु, दक्षिण, उत्तर, त्रिबाहु, तुङ्गबाहु, सन्योन्नत, उदासि, पट्टिक, मौष्टिक, यौधिक और प्रथित--ये खड्गयुद्धके बत्तीस पैंतरे हैं। खड्गयुद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंने ये सभी पैंतरे वहाँ प्रकट किये। वे बारंवार प्रहार करते हुए भी थकते नहीं थे। महाराज ! पुष्करमें रहकर उन दोनों वीरोंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १७--२१ १/२ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ २२ ॥ तुष्टुवुस्तौ महाराज जये कृतपरिश्रमौ । जनमेजय ! तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि विजयके लिये परिश्रम करनेवाले उन दोनों वीरोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे- ॥ २२ १/२ ॥

अहो वीर्यमहो धैर्यमनयोर्बाहुशालिनोः ॥ २३ ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८३

एतावेव रणे शक्तौ खड्गे धनुषि पारगौ।
एकः शिष्यो गिरीशस्य द्रोणस्यान्यो हि धीमतः॥ २४॥
'अहो ! बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले इन दोनों वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों युद्धमें समर्थ हैं तथा खड्गविद्या और धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् हैं। इनमेंसे एक तो भगवान् शङ्करका शिष्य है और दूसरा बुद्धिमान् द्रोणाचार्यका ॥ २३-२४ ॥

अर्जुनः सात्यकिश्चैव वासुदेवो जगत्पतिः।
त्रय एते महावीराः प्रथिताः सङ्गरे सदा ॥ २५ ॥
'अर्जुन, सात्यकि और जगदीश्वर भगवान् वासुदेव— ये तीन सदा ही युद्धस्थलमें 'महावीर' के नामसे विख्यात हैं॥ २५॥

डिम्भकः शक्तिभृच्छर्वस्त्रय एते महारथाः।
प्रसिद्धाः सर्व एवैते वीर्येषु च बलेषु च ॥ २६ ॥
'डिम्भक, कुमार कार्तिकेय और भगवान् शिव— ये तीन मुख्य 'महारथी' हैं। ये सभी बल और वीर्यमें विख्यात हैं'॥ २६ ॥

इति ते देवगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महोरगाः।
दिविस्थिताः समं ब्रूयुर्युद्धदर्शनलालसाः ॥ २७॥
इस प्रकार वे देवता, गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और बड़े-बड़े नाग युद्ध देखनेकी इच्छासे खड़े होकर एक साथ उपर्युक्त बातें कर रहे थे ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सात्यकिडिम्भकयुद्धे पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें सात्यकि और डिम्भकका युद्धविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥


षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

हिडिम्बके साथ वसुदेव और उग्रसेनका युद्ध तथा बलभद्रके द्वारा हिडिम्बका वध

वैशम्पायन उवाच

वसुदेवोग्रसेनौ च वृद्धौ युद्धे सुनिर्वृतौ।
जराजर्जरितसर्वाङ्गौ पलितार्द्धशिरोरुहौ ॥ १ ॥
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नौ राजमार्गाविशारदौ।
युयुधाते महारङ्गे राक्षसेन दुरात्मना ॥ २ ॥
शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामासतू रणे।
राक्षसेन्द्रं दुरात्मानं हिडिम्बं पुरुषादकम् ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेव और उग्रसेन बूढ़े होनेपर भी युद्धमें परम सुख माननेवाले थे। उनके सारे अङ्ग जरासे जीर्ण हो गये थे, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं और सिरके बाल सफेद हो गये थे ॥ १॥ वे ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा राजमार्ग (क्षत्रियधर्म—युद्ध) में चतुर थे। ये दोनों उस महासमरमें दुरात्मा राक्षस हिडिम्बके साथ युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ उन दोनोंने अनेक सहस्र बाणोंद्वारा रणभूमिमें नरभक्षी राक्षसराज दुरात्मा हिडिम्बको पीड़ित कर दिया ॥ ३ ॥

हिडिम्बो राक्षसेन्द्रस्तु भक्षयन् सर्वतो नरान्।
अतिप्रवृद्धो दुष्टात्मा लम्बबाहुर्महाहनुः ॥ ४ ॥
लम्बोदरो विरूपाक्षः पिङ्गकेशो विलोचनः।
श्येननासो महारौद्र ऊर्ध्वरोमा महाभुजः ॥ ५ ॥

राक्षसराज हिडिम्ब सब ओरसे मनुष्योंको खाता हुआ अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट हो गया था। उसकी भुजाएँ और ठोढ़ी विशाल थी। वह बड़ा दुष्टात्मा था, पेट लंबा और नेत्र विकराल थे। सिरके बाल पिंगल वर्णके दिखायी देते थे। उसकी आँखें विकृत थीं। नासिका बाजकी चोंचके समान जान पड़ती थी। वह महाभयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके रोम ऊपरको उठे हुए थे ॥ ४-५ ॥

पर्वताकारवर्ष्मा च दीर्घदंष्ट्रः शिवाननः।
लम्बोदरो दीर्घदन्तो जगद्ग्रासपरस्तथा ॥ ६ ॥
शरीर पर्वताकार दिखायी देता था। दाढ़ें बड़ी-बड़ी थीं और मुँह गीदड़के समान प्रतीत होता था। लंबे पेट और बड़े-बड़े दाँतोंवाला वह राक्षस सम्पूर्ण जगत्‌को अपना ग्रास बना लेनेके लिये तत्पर जान पड़ता था ॥ ६ ॥

उत्तुङ्गांसो महोरस्को दीर्घग्रीवो गजॊपमः।
भक्षयन् मांसपिटकं पिवञ्शोणितसंचयम् ॥ ७ ॥
उसके कंधे ऊँचे, छाती चौड़ी और गर्दन लंबी थी। वह देखनेमें हाथी-जैसा जान पड़ता था। वह पिटारी भर मांस खाता और संचित करके रखे हुए घड़ों रक्त पी जाता था ॥ ७ ॥

गजान् नागैः समाहत्य हयैरश्वान् नृपोत्तम।
रथान् रथैः समाहत्य सादिनः सादिभिस्तथा ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ ! वह हाथियोंसे हाथियोंको, घोड़ोंसे घोड़ोंको, रथोंसे रथोंको और सवारोंसे सवारोंको मारकर कुचल देता था ॥ ८ ॥

...यान् स पुरो दृष्ट्वा नास्यत्रासं चकार सः।
...ाडयित्वा महाराज वृष्णिपालान् समन्ततः ॥ ९ ॥

१०८४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भक्षयामास सहसा हिडिम्बः पुरुषादकः ।
यान् पश्यन् पुरतो रक्षस्तांश्चघान विरूपधृक् ॥ १० ॥
वह मनुष्योंको अपने सामने देखकर उन्हें नासिकाका ग्रास बना लेता था—नसकी तरह श्वासमार्गसे भीतर खींच लेता था। महाराज ! नरभक्षी हिडिम्बने सब ओरसे आक्रमण करके कुछ वृष्णिपालक योद्धाओंको मारकर सहसा अपना आहार बना लिया। उस विकराल रूपधारी राक्षसने जिन्हें सामने देखा, उन्हींका वध कर डाला ॥ ९-१० ॥

भक्षयन्नपरान् वृष्णीन् यादवान् राक्षसेश्वरः ।
चिक्षेप सहसा कांश्चिद्धिडिम्बः पुरुषादकः ॥ ११ ॥
पुरुषभक्षी राक्षसराज हिडिम्बने कितने ही वृष्णियों और यादवोंको खाते हुए उनमेंसे कुछको उठाकर सहसा दूर फेंक दिया ॥ ११ ॥

अन्तकाले यथा क्रुद्धो रुद्रः प्राणभृतो नृप ।
क्षणेनैकेन सर्वांस्तान् भक्षयामास राक्षसः ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! जैसे कुपित हुए रुद्रदेव अन्तकालमें प्राणियोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार उस राक्षसने एक ही क्षणमें उन सबका भक्षण कर लिया ॥ १२ ॥

केचिद् भीता दिशः प्रापुर्वृष्णयो वीर्यशालिनः ।
केचित् तु भक्षितास्तेन रक्षसा वृष्णिपुङ्गवाः ॥ १३ ॥
कुछ पराक्रमशाली वृष्णिवंशी भयभीत हो विभिन्न दिशाओंमें भाग गये तथा कितने ही वृष्णिवंशके श्रेष्ठ योद्धा उस राक्षसके आहार बन गये ॥ १३ ॥

कुम्भकर्णो यथा राजन् भक्षयामास वानरान् ।
निःशेषं वृष्णिसैन्यं तु चकार पुरुषादकः ॥ १४ ॥
राजन् ! जैसे कुम्भकर्ण वानरोंको खा गया था। उसी प्रकार उस नरभक्षी निशाचरने वृष्णिवंशकी सेनाको समाप्त-सी कर दिया ॥ १४ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धौ वृद्धौ यादवपुङ्गवौ ।
धनुर्गृह्य महाघोरं राक्षसस्य पुरः स्थितौ ॥ १५ ॥
यथा क्रुद्धस्य सिंहस्य मृगौ वृद्धतमाविव ।
इसी बीचमें बूढ़े यादवशिरोमणि वसुदेव और उग्रसेन कुपित हो महाभयंकर धनुष हाथमें लेकर उस राक्षसके सामने खड़े हुए, मानो क्रोधमें भरे हुए सिंहके समक्ष दो अत्यन्त वृद्ध मृग आ गये हों ॥ १५½ ॥

व्यादायास्यं महारक्षस्तौ वृद्धावभ्यधावत ॥ १६ ॥
विखादिषुर्विरूपाक्षः पातालतलसंनिभः ।
उस समय वह महाराक्षस मुँह बाकर उन दोनों बूढ़ोंको खा जानेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़ा। उसके नेत्र बड़े भयंकर थे। वह अपने खुले हुए मुखसे पाताल-तलके समान प्रतीत होता था ॥ १६½ ॥

ततोरक्षः पर्यधावत् खादत् खादत् कलेवरम् ॥ १७ ॥
पूरयामासतुर्वीरौ शरैर्युद्धधुरंधरौ नृप ।
हिडिम्बस्य महाघोरं व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥ १८ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर मनुष्यके शरीरको बारंबार चबाता हुआ वह राक्षस उन दोनोंकी ओर वेगपूर्वक दौड़ा। उस समय उन युद्धश्रेष्ठ वीरोंने अपने बाणोंद्वारा हिडिम्बके महाभयंकर खुले हुए मुखको, जो मुँह बाये हुए यमराजके समान जान पड़ता था, अपने बाणोंसे भर दिया ॥ १७-१८॥

सर्वोस्तान् वारयामास देवशत्रुर्विरूपधृक् ।
धावति स्म ततो रक्षो व्यादितास्यं भयानकम् ॥ १९ ॥
तब उस विकराल रूपधारी देवद्रोही भयानक राक्षसने उन सब बाणोंका निवारण कर दिया और पुनः मुँह फैलाकर उनपर धावा किया ॥ १९ ॥

तयोर्गृहीत्वा धनुषी बभञ्ज युधि सत्वरम् ।
बाहू प्रसार्य दुष्टात्मा राक्षसो विकृताननः ॥ २० ॥
वसुदेवं महीपालं राजानं वृद्धसेविनम् ।
ग्रहीतुं राक्षसंश्रेष्ठो यतते नृपसंसदि ॥ २१ ॥
उसने उन दोनोंके धनुष छीनकर तुरंत उस युद्धस्थलमें ही तोड़ डाले; फिर वह विकराल मुखवाला दुष्टात्मा राक्षस अपनी दोनों बाहें फैलाकर वृद्धसेवी भूपाल राजा वसुदेवको उस राजसमाजमें ही पकड़नेकी चेष्टा करने लगा। वह राक्षसोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था ॥ २०-२१ ॥

हिडिम्ब उवाच

एष वां भक्षयिष्यामि वसुदेवं त्वया सह ।
उग्रसेन किमर्थं त्वं तिष्ठसे मत्पुरोगमः ॥ २२ ॥
हिडिम्ब बोला—उग्रसेन ! तुम किस लिये मेरे सामने खड़े हो। मैं अभी तुम दोनोंको खा जाऊँगा । तुम्हारे साथ वसुदेवको भी चट कर जाऊँगा ॥ २२ ॥

आगच्छ प्रविशास्यं मे ग्रासभूतौ तु वां मम ।
विधिना निर्मितो वृद्धो वसुदेवो हरेः पिता ॥ २३ ॥
बुभुक्षितः श्रमात्तश्च युद्धे त्वरितविक्रमः ।
मन्मुखान्नैव गच्छेतां प्रविशेतां त्वरान्वितौ ॥ २४ ॥
आओ ! मेरे मुखमें प्रवेश करो। तुम दोनों मेरे ग्रास-स्वरूप हो। जिसे विधाताने श्रीकृष्णका पिता बना दिया है, वह बूढ़ा वसुदेव भूखसे पीड़ित है, परिश्रमसे कष्ट पाता है और युद्धमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करता है। अब तुम दोनों मेरे मुँहसे छूटकर नहीं जा सकते, तुरंत ही मेरे मुखके भीतर प्रवेश करो ॥ २३-२४ ॥

युवयोः शोणितं पीत्वा तृप्तिं यास्यामि निर्वृतः ।
खादामि च पुनर्मांसं वृद्धयोर्युवयोः सुखम् ॥ २५ ॥
तुम दोनोंका रक्त पीकर मैं तृप्त होऊँगा और संतोष प्राप्त करूँगा । इसके बाद तुम दोनों वृद्धोंके मांसको मैं सुखपूर्वक खाऊँगा ॥ २५ ॥

इति ब्रुवंस्तथा रक्षो व्यादितास्यो महाहनुः ।

भविष्यपर्व] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०८५


धावति स्म; तदा क्षिप्रं हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ॥ २६ ॥
ऐसा कहता हुआ विशाल ठोड़ीवाला राक्षसराज निशाचर हिडिम्ब उस समय मुँह वाकर उनकी ओर दौड़ा ॥ २६ ॥
वसुदेवोग्रसेनौ च भीतौ विप्रेक्ष्य सर्वतः ।
दिशोऽभ्यभजतां राजन् निःशस्त्रौ वृष्णिपुङ्गवौ ॥ २७॥
राजन् ! तब शस्त्रहीन हुए वृष्णिशिरोमणि वसुदेव और उग्रसेन भयभीत हो सब ओर देखकर विभिन्न दिशाओंमें भागने लगे ॥ २७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा बलभद्रः प्रतापवान् ।
दृष्ट्वा च तौ तथाभूतौ वसुदेवोग्रसेनकौ ॥ २८ ॥
वासुदेवे समादिश्य हंसं युध्यन्तमीश्वरे ।
निर्गत्य चान्तरं तस्य राक्षसस्य दुरात्मनः ॥ २९ ॥
इसी बीचमें प्रतापी बलभद्रने वसुदेव और उग्रसेनको वैसी अवस्थामें पड़ा देख, जूझते हुए हंसका भार बलवान् श्रीकृष्णको सौंप दिया और स्वयं वे उस दुरात्मा राक्षसके बीचमें आकर इस प्रकार बोले—॥ २८-२९ ॥
मा कृथाः साहसं रक्षो मुञ्चैतौ राजसत्तमौ ।
स्थितोऽस्मि युध्यतां रक्षो मया शत्रूञ्जिघांसता ॥३०॥
अहमेव हनिष्ये त्वां का चेयं तव भीषिका ।
'ओ राक्षस ! ऐसा दुःसाहस न कर। इन दोनों भूप-शिरोमणियोंको छोड़ दे। मैं खड़ा हूँ। शत्रुओंके वधकी इच्छा-से यहाँ आये हुए मुझ बलभद्रके साथ तू युद्ध कर। केवल मैं ही तुझे मार डालूँगा, यह क्या तेरी विभीषिका है ! ॥
इति ब्रुवाणं हलिनं तौ विसृज्य महारणे ॥ ३१ ॥
महानयमसो दुष्टो भक्षयाम्येनमग्रतः ।
विदार्य पूर्ववद् वक्त्रं बलभद्रमुपाद्रवत् ॥ ३२ ॥
इस तरह बोलते हुए हलधरकी बात सुनकर हिडिम्बने उस महासमरमें वसुदेव और उग्रसेनको तो छोड़ दिया और सोचा—'यह महान् दुष्ट है, अतः पहले इसीको खा जाऊँ' ऐसा विचारकर पूर्ववत् मुँह फैलाये हुए उसने बलभद्रपर धावा किया ॥ ३१-३२ ॥
विसृज्य सशरं चापं राक्षसस्य पुरः स्थितः ।
मुष्टिं प्रगृह्य बलवान् स्फोटयन् बाहुमुत्तमम् ॥ ३३ ॥
बलवान् बलभद्र बाणसहित धनुषको त्यागकर अपनी उत्तम भुजापर ताल ठोंकते हुए उस राक्षसके आगे मुट्ठी बाँधकर खड़े हो गये ॥ ३३ ॥
हिडिम्बस्त्वथ दुष्टात्मा मुष्टिकृत्वा भयानकम्।
जघान वक्षो रामस्य व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३४ ॥
दुष्टात्मा हिडिम्बने भी मुँह बाये हुए यमराजकी भाँति भयंकर मुट्ठी बाँधकर बलरामके वक्षःस्थलपर प्रहार किया ॥
क्रुद्धोऽथ गलभद्रस्तु मुष्टिना तेन ताडितः ।
जघान मुष्टिना तेन राक्षसेशमनिन्दितः ॥ ३५ ॥
उसके मुक्केकी मार खाकर अनिन्द्य बलशाली बलभद्रजी कुपित हो उठे। फिर उन्होंने भी उस राक्षसराजको मुक्केसे मारा॥
मुष्टियुद्धं समभवन्नरराक्षसवीरयोः ।
युध्यतोर्युद्धरङ्गेऽथ नरराक्षससिंहयोः ॥ ३६ ॥
तयोश्चटचटाशब्दः प्रादुरासीद् भयानकः ।
फिर तो उन नर और निशाचर वीरोंमें मुक्केसे ही युद्ध होने लगा। युद्धकी रङ्गभूमिमे जूझते हुए नरसिंह बलभद्र और राक्षससिंह हिडिम्बके मुक्कोंका भयंकर चट-चट शब्द प्रकट होने लगा ॥ ३६१/२ ॥
अथ राक्षसराजस्तु मुष्टिना राममाहवे ॥ ३७॥
जघान वक्षोदेशे तु वज्रेणेव पुरंदरः ।
तदनन्तर राक्षसराज हिडिम्बने समराङ्गणमें बलरामके वक्षःस्थलपर मुक्केसे प्रहार किया, मानो देवराज इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्रसे आघात किया हो ॥ ३७१/२ ॥
अथ रामो बली साक्षान्मुष्टिं संवर्त्य यत्नतः ॥ ३८ ॥
हिडिम्बं ताडयामास वक्षस्यमरविद्विषम् ।
तलाभ्यामथ रामस्तु वक्त्रे हत्वा स राक्षसम् ॥ ३९ ॥
इसके बाद साक्षात् बलवान् बलरामने यत्नपूर्वक मुट्ठी बाँधकर देवद्रोही हिडिम्बके वक्षःस्थलपर बड़े जोरसे आघात किया। तत्पश्चात् उन्होंने उस राक्षसके मुँहपर दो तमाचे जड़ दिये ॥ ३८-३९ ॥
आहतस्तलघातेन हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ।
जानुभ्यामपतद् भूमौ गतासुर्वीरराक्षसः ॥ ४० ॥
उनके तमाचेकी मार खाकर वीर निशाचर राक्षसराज हिडिम्ब प्राणहीन-सा होकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़ा।
तत उत्पत्य रामस्तु दोर्भ्यां संगृह्य राक्षसम् ।
आदाय बहुवेगेन भ्रामयित्वा पदात् पदम् ॥ ४१ ॥
व्याविध्यत् सुचिरं रामो दर्शयन्नात्मनो बलम् ।
उत्क्षिप्य राक्षसेन्द्रं तं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४२ ॥
गव्यूतिमात्रं चिक्षेप ततो देशाद्धलायुधः ।
गतासू राक्षसश्रेष्ठस्ततो देशान्निराक्रमत् ॥ ४३ ॥
फिर बलरामजीने उछलकर उस राक्षसको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और उसे उठाकर पग-पगपर बड़े वेगसे घुमाया। इस तरह अपना बल दिखाते हुए बलरामजी देरतक उसे घुमाते रहे। फिर सब लोगोंके देखते-देखते हलधरने उस राक्षसराजको उछालकर वहाँसे दो कोस दूर फेंक दिया। इस प्रकार राक्षसप्रवर हिडिम्ब प्राणशून्य होकर उस स्थानसे दूर निकल गया* ॥ ४१-४३ ॥
ये केचिद् राक्षसास्तत्र हतशेषा महारणे ।
बलभद्रात् ततो भीता जगमुश्चैव दिशो दश ॥ ४४ ॥


* पाण्डव भीमसेनने एकचक्रा नगरीमें जानेसे पूर्व जिस हिडिम्ब नामक राक्षसको मारा था, वह इससे भिन्न था और वह इससे पहले ही मारा जा चुका था। यह दूसरा हिडिम्ब बलभद्रजीके हाथों मारा गया।

१०८६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


उस महासमरमें जो कोई भी राक्षस वहाँ मरनेसे बचे हुए थे, वे बलभद्रजी से भयभीत हो वहाँसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥

अथांशुमाली भगवान् दिनेशः संहृत्य तेजांसि सहस्ररश्मिः।
अस्तं ययौ चक्षुरपि प्रजानामीषत्तमश्चापि समाविवेश॥ ४५ ॥

तदनन्तर सहस्रों किरणोंसे सुशोभित दिनके स्वामी अंशुमाली भगवान् सूर्य अपने तेज समेटकर अस्ताचलको चले गये और प्रजाजनोंके नेत्रोंमें कुछ-कुछ अन्धकारका समावेश हो गया ॥ ४५ ॥

तस्मिन् प्रविष्टेऽथ समुद्रतोयं प्रजापतौ विश्वमुखे जगद्गुरौ।
नक्षत्रनाथः समुपाजगाम संध्यातमोऽपि व्यनशन्नृपोत्तम॥ ४६ ॥

नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! सम्पूर्ण विश्वके मुखस्वरूप प्रजापालक जगद्गुरु सूर्यदेवके समुद्रके जलमें प्रवेश कर जानेपर नक्षत्रनाथ चन्द्रमाका उदय हुआ, जिससे संध्याकालका अन्धकार भी नष्ट हो गया ॥ ४६ ॥

प्रभातकाले नृप सत्तमो रणे गोवर्धने किन्नरगीतनादिते।
इति ब्रुवन्तो नृपसत्तमास्तदा व्युपारमंस्तत्र रणोत्सवे नृप॥ ४७ ॥

जनमेजय ! उस समय हंसकी सेनामें जो श्रेष्ठ नरेश थे, वे यह कहते हुए वहाँ समरोत्सवसे विरत हो गये कि 'राजन् ! कल प्रातःकालका युद्ध किन्नरोंके गीतसे गूँजते हुए गोवर्धन पर्वतपर हो तो अच्छा होगा' (ऐसा कहकर वे सब नरेश वहाँसे भागकर गोवर्धन पर्वतपर चले गये) ॥ ४७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हिडिम्बपराभवे षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२६ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हिडिम्बका पराभवविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२६॥


सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

गोवर्धन पर्वतके समीप हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भूतेश्वरोंकी पराजय तथा श्रीकृष्ण और हंसका घोर युद्ध

वैशम्पायन उवाच

उभौ तौ हंसडिम्भकौ रात्रावेव महागिरिम्।
जग्मतुः सहितौ राजन् गोवर्धनमथो नृप॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नरेश्वर ! तदनन्तर वे दोनों भाई हंस और डिम्भक रातमें ही एक साथ महागिरि गोवर्धन पर्वतको चल दिये ॥ १ ॥

अथ प्रभाते विमले सूर्ये चाभ्युदिते सति ।
गोवर्धनं जगामाशु केशवः केशिसूदनः ॥ २ ॥

जब निर्मल प्रभातकाल आनेपर सूर्यदेवका उदय हुआ, तब केशिहन्ता भगवान् केशव भी शीघ्रतापूर्वक गोवर्धन पर्वतकी ओर चले ॥ २ ॥

शैनेयो बलभद्रश्च यादवाः सारणादयः ।
गन्धर्वरप्सरोभिश्च नादितं बहुधा गिरिम् ॥ ३ ॥

सात्यकि, बलभद्र और सारण आदि यादव भी गन्धर्वों और अप्सराओंके नाना प्रकारके गीतोंसे निनादित गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ ३ ॥

जग्मुस्ते सहिता राजन् गोवर्धनमथो गिरिम्।
गोधनैश्च सैन्यैश्च नादितं बहुधा गिरिम् ॥ ४ ॥

राजन् ! वे सब लोग एक साथ गोवर्धन पर्वतपर जा पहुँचे। वह पर्वत गोधनों और सेनाओंके नाना प्रकारके शब्दोंसे प्रतिध्वनित हो रहा था ॥ ४ ॥

तस्योत्तरं नृपश्रेष्ठ पार्श्वं सम्प्राप्य यादवाः ।
निकषा यमुनां राजंस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ५ ॥

नृपश्रेष्ठ ! राजन् ! जब यादव उस पर्वतके उत्तर तटपर पहुँच गये, तब यमुनाके निकट पुनः युद्ध आरम्भ हुआ ॥ ५ ॥

विव्याध हंसडिम्भकौ वसुदेवं सप्तभिः ।
सारणः पञ्चविंशत्या दशभिः कङ्क एव च ॥ ६ ॥

वसुदेवने सात बाणोंसे हंस और डिम्भकको घायल कर दिया। सारणने पच्चीस और कङ्कने दस बाण मारे ॥ ६ ॥

हंसेन डिम्भकेनाथ यादवैश्च समन्ततः ।
उग्रसेनस्त्रिसप्तत्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ७ ॥

इस प्रकार हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका सब ओरसे युद्ध छिड़ गया । उग्रसेनने झुकी हुई गाँठवाले तिहत्तर बाण मारे ॥ ७ ॥

विराटस्त्रिंशता राजन् सात्यकिश्चापि सप्तभिः ।
अशीत्या विष्पृशू राजन्नुद्धवो दशभिः शरैः ॥ ८ ॥

राजन् ! विराटने तीस, सात्यकिने सात, विष्पृशुने अस्सी तथा उद्धवने दस बाणोंका प्रहार किया ॥ ८ ॥

भविष्यपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०८७


प्रद्युम्नस्त्रिंशतां राजन् साम्बश्चापि च सप्तभिः ।
अनाधृष्टिस्त्वेकषष्ट्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ९ ॥
जनमेजय ! प्रद्युम्नने तीस, साम्बने सात और अनाधृष्टि-ने झुकी हुई गाँठवाले इकसठ बाणोंद्वारा शत्रुओंको घायल कर दिया ॥ ९ ॥

एवं ते संहता राजंश्चक्रुर्युद्धमदीनवत् ।
अत्यद्भुतं महाघोरं यादवाः सर्व एव हि ॥ १० ॥
राजन् ! इस प्रकार वे समस्त यादव एक साथ होकर उत्साहसम्पन्न पुरुषकी भाँति अत्यन्त अद्भुत और महाघोर युद्ध करने लगे ॥ १० ॥

चक्रुस्ताभ्यां महायुद्धं वासुदेवस्य पश्यतः ।
सर्वानपि महाराज यादवान् बलदर्पितान् ॥ ११ ॥
तावुभौ हंसडिम्भकौ नृपांस्तान् प्रत्यविध्यताम् ।
महाराज ! भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते समस्त यादवोंने हंस और डिम्भकके साथ महान् युद्ध छेड़ दिया। दोनों भाई हंस और डिम्भकने भी उन समस्त यादवनरेशोंको अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ११ १/२ ॥

प्रत्येकं दशभिर्विद्ध्वा बाणैर्निशितनिर्मलैः ॥ १२ ॥
जघ्नतुश्च शरैस्तीक्ष्णैरत्यर्थं यादवेश्वरान् ।
उन दोनोंने तेज धारवाले चमचमाते हुए दस-दस बाणोंद्वारा प्रत्येकको घायल करके पैने बाणोंसे समस्त यादवेश्वरोंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२ १/२ ॥

व्यथिताः सर्व एवैते वमन्तः शोणितं बहु ॥ १३ ॥
माधवे किंशुका राजन् पुष्पिता इव ते बभुः ।
राजन् ! उन बाणोंसे व्यथित हो ये सब-के-सब मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन करते हुए वसन्त ऋतुमें खिले हुए पलाशवृक्षोंके समान शोभा पाने लगे ॥ १३ १/२ ॥

भीताश्च यादवा राजन् पलायनपरायणाः ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजन् वसुदेवात्मजो नृप ।
वासुदेवो हली युद्धे प्रमुखे धन्विनौ तयोः ॥ १५ ॥
चक्रतुर्युद्धमतुलं स्कन्दशक्राविवाम्बरे ।
राजन् ! उस समय यादव सैनिक भयभीत होकर भागने लगे। महाराज जनमेजय ! इसी बीचमें वसुदेवके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण और हलधर बलराम धनुष हाथमें लिये युद्धके मुहानेपर उन दोनोंके सामने आकर उसी तरह अनुपम संग्राम करने लगे, जैसे इन्द्र और कार्तिकेय आकाशमें खड़े होकर असुरोंसे युद्ध करते हैं ॥ १४-१५ १/२ ॥

तयोरेव सगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महर्षयः ॥ १६ ॥
विमानस्थाश्च ददृशुर्युद्धं देवासुरोपमम् ।
उस समय विमानोंपर बैठे हुए गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और महर्षि देवासुर-संग्रामके समान उन दोनोंका युद्ध देखने लगे ॥ १६ १/२ ॥

ततः प्रादुर्भूतां तौ दूतौ भूतेश्वरौ नृप ॥ १७ ॥
शूलिना प्रेषितौ युद्धे रक्षार्थं बलिनोस्तयोः ।
नरेश्वर ! तदनन्तर वहाँ युद्धमें उन दोनों बलवान् वीर हंस और डिम्भककी रक्षा करनेके लिये महादेवजीके भेजे हुए वे दोनों भूतेश्वर दूत प्रकट हुए ॥ १७ १/२ ॥

हंसोऽथ वासुदेवश्च युद्धं चक्रतुरीश्वरौ ॥ १८ ॥
रामश्च डिम्भकश्चैव संयुगौ युद्धकाङ्क्षया ।
उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और हंस दोनों सामर्थ्यशाली वीर एक दूसरेके साथ युद्ध करने लगे। उधर बलराम और डिम्भक भी युद्ध करनेकी इच्छासे परस्पर उलझ गये ॥ १८ १/२ ॥

विक्रान्ताः सर्व एवैते ह्यस्त्रे शस्त्रे तथा बले ॥ १९ ॥
शङ्खान् दध्मुः पृथग्भावं स्वे स्वे सर्वे रथे स्थिताः ।
ये सब-के-सब अस्त्र, शस्त्र और बलमें पराक्रमी थे। इन सबने अपने-अपने रथमें स्थित होकर पृथक्-पृथक् शङ्ख बजाना आरम्भ किया ॥ १९ १/२ ॥

अथ कृष्णो हृषीकेशः पाञ्चजन्यं महारवम् ॥ २० ॥
दध्मौ पद्मपलाशाक्षः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने सबको विस्मयमे डालते हुए-से महान् शब्द करनेवाले पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया ॥ २० १/२ ॥

अथ भूतौ महाघोरौ लम्बोदरशरीरिणौ ॥ २१ ॥
दुद्रुवतुर्महाराज शूलमादाय केशवम् ।
महाराज ! इतनेमें ही लंबे पेट और विशाल शरीरवाले उन महाभयंकर भूतोंने शूल लेकर भगवान् श्रीकृष्णपर आक्रमण किया ॥ २१ १/२ ॥

शूलेन पोथयां राजञ्चक्रतुर्यादवेश्वरम् ॥ २२ ॥
ताभ्यां समाहतो विष्णुर्देवगन्धर्वसंनिधौ ।
ईषत्स्सिताधरो देवः किंचिदुत्प्लुत्य सत्वरम् ॥ २३ ॥
रथाद् रथिवरश्रेष्ठस्तौ प्रगृह्य जनार्दनः ।
भ्रामयित्वा शतगुणमलातमिव केशवः ॥ २४ ॥
कैलासं च समुद्दिश्य प्रचिक्षेप ततो हरिः ।
राजन् ! उन दोनोंने यादवेश्वर श्रीकृष्णपर एक साथ ही शूलसे प्रहार किया। देवताओं और गन्धर्वोंके समीप उन दोनोंके आघातसे आहत हो भगवान् श्रीकृष्णके अधरपर मन्द मुसकानकी छटा बिखर गयी। वे रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान् जनार्दन कुछ उछलकर तुरंत रथसे कूद पड़े और दोनों भूतेश्वरोंको पकड़कर उन्हें अलातचक्रके समान सौ बार घुमानेके पश्चात् उन केशव हरिने कैलासपर्वतकी ओर फेंक दिया ॥ २२-२४ १/२ ॥

तावुपेत्य गिरेः शृङ्गं कैलासस्य महामते ॥ २५ ॥
दृष्ट्वा तत्कर्म देवस्य विस्मयं जग्मतुः परम् ।
महामते ! वे दोनों कैलासपर्वतके शिखरपर पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णका वह पराक्रम देख बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ २५ १/२ ॥

१०८८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हंसश्च दृष्ट्वा तत्कर्म रोषात्ताम्रायतेक्षणः ॥ २६ ॥
उवाच वचनं हंसः शृण्वतां त्रिदिवौकसाम् ।
श्रीकृष्णका वह कर्म देखकर हंसके बड़े-बड़े नेत्र रोषसे लाल हो गये। उसने समस्त देवताओंके सुनते हुए यह बात कही—॥ २६ १/२ ॥

किमर्थं राजसूयस्य विघ्नं चरसि केशव ॥ २७ ॥
ब्रह्मदत्तो महीपालो यष्टा तस्य महाक्रतोः ।
करं दिश यथायोगं यदि प्राणान् हि रक्षसि ॥ २८ ॥
'केशव ! हमारे राजसूय यज्ञमें क्यों विघ्न डाल रहे हो ? महाराज ब्रह्मदत्त उस महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे। यदि अपने प्राणोंकी रक्षा चाहते हो तो उसमें यथायोग्य कर दो ॥

अथवा त्वं क्षणं तिष्ठ ततो ज्ञात्वा परं बहु ।
ददासि त्वं नन्दपुत्र ततो यष्टा स मे गुरुः ॥ २९ ॥
'अथवा नन्दपुत्र ! तुम क्षणभर मेरे सामने खड़े रहो, फिर मेरी श्रेष्ठताको जानकर स्वयं ही बहुत सा कर प्रदान करोगे; फिर मेरे पिता यज्ञका आरम्भ करेंगे ॥ २९ ॥

ईश्वरोऽहं सदा राज्ञां देवानामिव शूलभृत् ।
एष ते वीर्यमतुलं नाशयिष्यामि संयुगे ॥ ३० ॥
'जैसे देवताओंके ईश्वर शूलधारी महादेव हैं; उसी प्रकार सदा समस्त राजाओंका ईश्वर मैं हूँ। इस युद्धमें मैं तुम्हारे अनुपम बलको अभी नष्ट किये देता हूँ' ॥ ३० ॥

इत्युक्त्वा सशरं चापं शालतालोपमं नृप ।
आकृष्य च यथाप्राणं नाराचेन च केशवम् ॥ ३१ ॥
ललाटे विक्षिपे हंसो ललाम इव सोऽभवत् ।
नरेश्वर ! ऐसा कहकर हंसने शाल और तालके समान विशाल धनुष और बाण ले उसे बलपूर्वक खींचकर उस नाराचके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके ललाटमें प्रहार किया । वह नाराच उनके लिये मनोहर आभूषण-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ३१ १/२ ॥

उवाच सात्यकिं कृष्णो रथं वाहय मे प्रभो ॥ ३२ ॥
दारुकं पृष्ठवाहं तं कृत्वा देशं तमीश्वरः ।
अथ तेन समादिष्टः सात्यकिर्वाहयन् रथम् ॥ ३३ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसे कहा—'प्रभावशाली वीर ! तुम मेरा रथ हाँको।' भगवान्‌ने जब सात्यकिको इस प्रकार आदेश दिया, तब वे दारुकको पीछे करके उस स्थानपर बैठकर उनका रथ हाँकने लगे ॥ ३२-३३ ॥

मण्डलानि बहून्याजौ दर्शयामास सत्वरम् ।
अथ विद्धो दृढं तेन शरेण हरिरीश्वरः ॥ ३४ ॥
आग्नेयमस्त्रं संयोज्य शरे कस्मिंश्चिदव्ययः ।
उवाच हंसं राजेन्द्र सात्यकिं प्रेरयन् रणे ॥ ३५ ॥
राजेन्द्र ! सात्यकिने युद्धस्थलमें शीघ्रतापूर्वक रथके बहुत-से पैंतरे दिखाये। उधर हंसके बाणसे गहरी चोट खाकर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णने किसी बाणपर आग्नेयास्त्रका आधान करके सात्यकिको रणभूमिमें आगे बढ़नेके लिये प्रेरित करते हुए हंससे कहा—॥ ३४-३५ ॥

अनेन त्वां दहे पाप यदि शक्तोऽसि वारय ।
अलं ते बह्वबद्धेन क्षत्रियोऽसि सदा शठ ॥ ३६ ॥
'पापी ! शठ ! मैं इस बाणसे तुझे अभी दग्ध किये देता हूँ, यदि शक्ति हो तो इसे रोक । अब तेरे लिये बहुत-सी असङ्गत बातें बकनेसे कोई लाभ न होगा। तू क्षत्रिय है, सदा अपने कर्तव्यका पालन कर ॥ ३६ ॥

मत्तश्चेत् करमिच्छेस्त्वं दर्शयाद्य पराक्रमम् ।
यतयो बाधिता हंस पुष्करे संस्थितास्त्वया ॥ ३७ ॥
'यदि मुझसे कर लेना चाहता है तो आज दिखा अपना पराक्रम ! हंस ! तूने पुष्करमें रहनेवाले यतियोंको सताया है ॥

शास्ता त्वं खलु विप्राणां स्थिते मयि नराधम ।
स्थिते मयि जगन्नाथे हत्वा क्षत्रियकण्टकान् ॥ ३८ ॥
शास्तास्म्यद्य सतां लोके दुष्टानां ब्रह्मविद्विषाम् ।
'नराधम ! मैं इस सम्पूर्ण जगत्‌का ईश्वर हूँ। तू मेरे रहते ब्राह्मणोंपर शासन करता है। मैं तुझ-जैसे क्षत्रियरूपी कण्टकोंका वध करके सत्पुरुषोंके जगत्‌में ब्रह्मद्रोही दुष्टोंका शासन करनेवाला हूँ ॥ ३८ १/२ ॥

शापेन यतिमुख्यानां हत एव नराधम ॥ ३९॥
मृत्युवे त्वां नियोद्याद्य रक्षिता ब्राह्मणानहम् ।
'नराधम ! तू मुख्य-मुख्य यतियोंके शापसे ही मर चुका है। आज तुझे मृत्युके हवाले करके मैं ब्राह्मणोंकी रक्षा करूँगा' ॥ ३९ १/२ ॥

इति ब्रुवंस्तदस्त्रं तु मुमोच युधि केशवः ॥ ४० ॥
तदस्त्रं वारुणेनाथ हंसोऽपि प्रत्यपेधयत् ।
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें हंसपर उस आग्नेयास्त्रको छोड़ दिया; तब हंसने भी वारुणास्त्रसे उस अस्त्रका निवारण कर दिया ॥ ४० १/२ ॥

वायव्यमथ गोविन्दो मुमोच युधि हंसके ॥ ४१ ॥
तदस्त्रं वारयामास माहेन्द्रेण नृपोत्तमः ।
यह देख गोविन्दने रणभूमिमें हंसपर वायव्यास्त्र चलाया, किंतु नृपश्रेष्ठ हंसने माहेन्द्रास्त्रसे उसका वारण कर दिया ॥ ४१ १/२ ॥

अथ माहेश्वरं कृष्णो मुमोचात्युग्रमाहवे ॥ ४२ ॥
रौद्रेण तत् ततो हंसो वारयामास तत्क्षणात् ।
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अत्यन्त भयंकर माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, परंतु हंसने रौद्रास्त्रद्वारा तत्काल उसका निवारण कर दिया ॥ ४२ १/२ ॥

गान्धर्वं राक्षसं चैव पैशाचमथ केशवः ॥ ४३ ॥
ब्रह्मास्त्रमथ कौवेरमासुरं याम्यमेव च ।
चत्वार्येतानि हंसस्तु मुमोच युधि सत्वरम् ॥ ४४ ॥
वारणार्थं तदस्त्राणां चतुर्णां माधवस्य ह ।

भविष्यपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८९

तत्र श्रीकृष्णने लगातार गान्धर्व, राक्षस और पैशाच अस्त्र छोड़े (पूर्वोक्त माहेश्वर अस्त्रको लेकर ये चार हुए)। माधवके उन चारों अस्त्रोंका निवारण करनेके लिये हंसने युद्धस्थलमें तुरंत ही ब्रह्मास्त्र, कौवेरास्त्र, आगुरास्त्र और याम्यास्त्र—ये चार अस्त्र छोड़े ॥ ४२-४४ ½ ॥
अथ ब्रह्मशिरो नाम घोरमस्त्रं विनाशकम् ॥ ४५ ॥
मुमोच हंसमुद्दिश्य देवदेवो जनार्दनः ।
योजयामास तद्धंसे महाघोरपराक्रमम् ॥ ४६ ॥
तदनन्तर देवाधिदेव जनार्दनने ब्रह्मशिर नामक महान् विनाशकारी भयानक अस्त्र हंसपर छोड़ा। उन्होंने महान् एवं घोर पराक्रमवाले उस अस्त्रका हंसके लिये ही प्रयोग किया था ॥ ४५-४६ ॥
अथ भीतो महारौद्रमस्त्रं दृष्ट्वा नृपोत्तमः ।
हंसोऽपि तेन राजेन्द्र वारयामास तं शरम् ॥ ४७ ॥
राजेन्द्र ! उस महाभयंकर अस्त्रको देखकर नृपश्रेष्ठ हंस भयभीत हो उठा; फिर उसने भी उसी अस्त्रसे उस बाणका वारण किया ॥ ४७ ॥
यमुनाप उपस्पृश्य देवदेवो जनार्दनः ।
अस्त्रं वैष्णवमादाय शरे सं निशिते हरिः ॥ ४८ ॥
योजयामास भूतात्मा भूतभावनभावनः ।
तदनन्तर सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले भूतात्मा देवाधिदेव जनार्दन हरिने यमुनाजीके जलका आचमन करके एक तीखे बाणपर वैष्णवास्त्रकी संयोजना की ॥
येन देवा रणे हत्वा राज्यमापुः पुरासुरान् ।
तदस्त्रं योजयामास वधार्थं तस्य भूपतेः ॥ ४९ ॥
पूर्वकालमें देवताओंने रणभूमिमें जिसके द्वारा असुरोंका वध करके अपना राज्य प्राप्त किया था, उसी अस्त्रका राजा हंसके वधके लिये श्रीकृष्णने प्रयोग किया ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसकेशवयुद्धे
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंस और श्रीकृष्णका युद्धविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥


अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा हंसका वध

वैशम्पायन उवाच
अथ भीतो महारौद्रमस्त्रं दृष्ट्वा नृपोत्तम ।
हंसो राजा महाराज निश्चेष्ट इव सम्बभौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ ! महाराज ! उस महाभयंकर अस्त्रको देखकर राजा हंस भयके मारे निश्चेष्ट-सा प्रतीत होने लगा ॥ १ ॥

उत्प्लुत्य स रथात् तस्माद् यमुनाम्अभ्यधावत ।
यत्र कृष्णो हृषीकेशः कालियाहिं ममर्द्द ह ॥ २ ॥
वह उस रथसे उछलकर यमुनाजीकी ओर भागा, जहाँ पूर्वकालमे हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णने कालियनागका मर्दन किया था ॥ २ ॥

महाह्रदं महारौद्रं यावत्पातालसंस्थितम् ।
तावद्वतीर्णं महानीलं कालाञ्जननिभं हि यत् ॥ ३ ॥
वह महान् ह्रद बड़ा भयंकर और पातालपर्यन्त गहरा था। उसका विस्तार भी उतना ही था। वह काली अञ्जन-राशि (अथवा कोयले) के समान महानील (या काला) प्रतीत होता था ॥ ३ ॥

तस्मिन् हृदे महाघोरे पपाताथ स हंसकः ।
हंसे पतति तस्मिंस्तु महान् रावो बभूव ह ॥ ४ ॥
गिरीणां पात्यमानानां समुद्रे इव वज्रिणा ।
उसी महाघोर कालियह्रदमें हंस कूद पड़ा। उसके कूदनेपर वहाँ बड़ा भारी धमाके-सा शब्द हुआ, मानो इन्द्रके द्वारा समुद्रमें गिराये जाते हुए पर्वतोंका कोलाहल प्रकट हुआ हो ॥ ४ ½ ॥

रथादुत्प्लुत्य कृष्णोऽपि तस्योपरि पपात ह ॥ ५ ॥
देवदेवो जगन्नाथो जगद् विस्मापयन्निव ।
तब जगदीश्वर देवाधिदेव श्रीकृष्ण भी सम्पूर्ण जगत्को विस्मयमें डालते हुए-से रथसे उछलकर उस कुण्डमें हंसके ऊपर कूद पड़े ॥ ५ ½ ॥

प्राहरन् तं महाबाहुः पादाभ्यामथ केशवः ॥ ६ ॥
पादक्षेपं नृपस्तस्माल्लब्ध्वा हंसो नृपोत्तम ।
ममार च नृपश्रेष्ठ केचिदेवं वदन्ति हि ॥ ७ ॥
उस समय महाबाहु केशवने उसपर दोनों पैरोंसे प्रहार किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! श्रीकृष्णके चरणोंका प्रहार पाकर राजा हंस मर गया—ऐसा कुछ लोग कहते हैं ॥ ६-७ ॥

अन्ये पातालमायातो भक्षितः पन्नगैरिति ।
अद्यापि नैव राजेन्द्र दृष्ट इत्यनुशुश्रुम ॥ ८ ॥
राजेन्द्र ! दूसरोंका कहना है कि वह पातालमें धँस गया और वहाँ सर्प उसे खा गये। वह अबतक वहाँसे लौटा नहीं देखा गया—ऐसा उसके विषयमें हमने सुना है ॥ ८ ॥

यथापूर्वं जगन्नाथो रथं समुपजग्मिवान् ।
हते तस्मिन् महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥

१०९०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अकरोद् राजसूयं च तव पूर्वपितामहः।
यदि जीवेदसौ हंसः को नमस्यति तं क्रतुम् ॥ १० ॥
तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्ण पूर्ववत् रथपर आ गये। महाराज ! हंसके मारे जानेपर ही तुम्हारे पूर्वपितामह धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने राजसूय यज्ञ किया था। यदि हंस जीवित होता तो कौन उस यज्ञके सामने मस्तक झुकाता ॥ ९-१० ॥

स च सर्वास्त्रविन्नित्यं रुद्राल्लब्धवरः प्रभो।
क्षणादेव महाराज वार्तेयं गामगाहत ॥ ११ ॥
हतो हंसो हतो हंसः कृष्णेन रिपुमर्दिना।
जगुर्गन्धर्वपतयो देवलोके दिवानिशम् ॥ १२ ॥
प्रभो ! वह भगवान् रुद्रसे वर पाकर सदाके लिये सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता हो गया था। महाराज ! क्षणभरमें यह समाचार भूमण्डलमें फैल गया। 'शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णने हंसको मार डाला, हंसको मार डाला'—यह गन्धर्वराजगण देवलोकमें दिन-रात गान करने लगे ॥ ११-१२ ॥

कृष्णेन लोकनाथेन विष्णुना प्रभविष्णुना।
यमुनाया ह्रदे घोरे हंसो निहत इत्यपि ॥ १३ ॥
'सम्पूर्ण जगत्के स्वामी प्रभावशाली विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाके भयंकर ह्रदमें हंसको मार डाला।' इस प्रकार उनके यशका सर्वत्र गान होने लगा ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवधे अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंसका वधविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥


एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

डिम्भककी आत्महत्या

वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा निहतमत्युग्रं भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
बलदेवं परित्यज्य युध्यमानं महारणे ॥ १ ॥
डिम्भको वीर्यसम्पन्नो यमुनामनुजग्मिवान्।
तमन्वधावद् वेगेन बलभद्रो हलायुधः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! अपने पराक्रमशाली भाई अत्यन्त उग्र हंसको उस महासमरमें मारा गया सुनकर बलवान् डिम्भक जूझते हुए बलभद्रको वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर गया। उस समय हलधर बलभद्रने बड़े वेगसे उसका पीछा किया ॥ १-२ ॥

हंसो हि यत्र पतितस्तत्रासौ निपपात ह।
यमुनायां महाराज विलोड्य जलसंचयम् ॥ ३ ॥
महाराज ! हंस जहाँ यमुनाजीमें कूदा था, वहीं डिम्भक भी कूद पड़ा। उसने यमुनाकी जलराशिको मथ डाला ॥ ३ ॥

अथ क्रुद्धः स डिम्भको भ्रामयित्वा जलं बहु।
उन्मज्ज्योन्मज्ज्य सहसा निमज्ज्य च पुनः पुनः ॥ ४ ॥
न ददर्श तदा राजन् भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
क्रोधमें भरा हुआ डिम्भक उस जलमें चक्कर लगाकर सहसा गोता लगाता और ऊपरको निकल आता था। राजन् ! इस प्रकार बारंबार डुबकी लगानेपर भी उसने अपने पराक्रमशाली भाईको वहाँ नहीं देखा ॥ ४ ॥

उन्मज्ज्याथ महाबाहुर्वासुदेवं विलोक्य च ॥ ५ ॥
उवाच वचनं राजन् डिम्भको वीर्यवत्तमः।
राजन् ! तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु डिम्भक जलसे ऊपर आकर वासुदेव श्रीकृष्णको सामने देख उनसे इस प्रकार बोला—॥ ५½ ॥

अरे गोपप्रदायाद क्वासौ हंस इति स्थितः ॥ ६ ॥
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा यमुनां पृच्छ राजक।
'अरे गोपपुत्र ! वह हंस कहाँ है ?' धर्मात्मा वासुदेवने भी उत्तर दिया—'नीच नरेश ! यमुनाजीसे पूछ' ॥ ६½ ॥

इत्यब्रवीत् प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ७ ॥
तच्छ्रुत्वा यमुनां भूयः प्रविश्य डिम्भकः किल।
बहुप्रकारमुद्वीक्ष्य भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ॥ ८ ॥
विललाप ततो राजा डिम्भको भ्रान्तमानसः।
प्रतापी वासुदेवने जब प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार कहा, तब भ्रातृवत्सल डिम्भकने उनकी बात सुनकर पुनः यमुनामें प्रवेश किया और नाना प्रकारसे अपने भाईकी खोज करके भ्रान्तचित्त हुआ वह राजा विलाप करने लगा ॥ ७-८½ ॥

क्व नु गच्छसि राजेन्द्र विहायैनमबान्धवम् ॥ ९ ॥
कुतो भ्रातरितो गच्छेः परित्यज्यैव मामिह।
'राजेन्द्र ! इस बन्धुहीन डिम्भकको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? भैया ! मुझे यहीं छोड़कर यहाँसे कहाँ चले जा रहे हो ?' ॥ ९½ ॥

विलप्यैवं नृपश्रेष्ठ डिम्भको भ्रातृवत्सलः ॥ १० ॥
आत्मत्यागे मनः कुर्वन् यमुनाया महाह्रदे।
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! इस प्रकार विलाप करके भ्रातृवत्सल

भविष्यपर्व ] त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९१


डिम्भकने यमुनाजीके महान् कुण्डमें अपने शरीरको त्याग देनेका विचार किया ॥ १०१/२ ॥

निमज्ज्योन्मज्ज्य सहसा मरणे कृतनिश्चयः ॥ ११ ॥
हस्तेन जिह्वामाकृष्य भूयो भूयो विलप्य च ।
ततः समूलामाकृष्य जिह्वां साहसकृत् स्वयम् ॥ १२ ॥
ममारान्तर्जले राजन् डिम्भको नरकाय वै ।

सहसा गोता लगाकर वह जलसे ऊपरको उठा और मरनेका निश्चय करके बारंबार विलाप करनेके पश्चात् स्वयं दुःसाहस करनेवाला वह डिम्भक हाथसे जिह्वाको जड़सहित बाहर खींचकर जलके भीतर मर गया। राजन्! उसका यह दुर्मरण नरककी प्राप्ति करानेवाला था ॥ ११-१२१/२ ॥

एवं तु निहते हंसे डिम्भके वीर्यशालिनि ॥ १३ ॥
आगमत् पुण्डरीकाक्षो भूतान् विस्मापयन्निव ।

इस प्रकार पराक्रमशाली हंस और डिम्भकके मारे जाने पर कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण भूतोंको विस्मयमें डालते हुए-से लौट आये ॥ १३१/२ ॥

ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १४ ॥
गोवर्धनेऽथ विश्रम्य वलभद्रसहायवान् ।
कंचित् कालं महाराज पूर्वभुक्तमुवास ह ॥ १५ ॥

महाराज ! इससे प्रीतियुक्त और प्रसन्नचित्त हुए प्रतापी भगवान् वासुदेवने वलभद्रजीके साथ गोवर्धन पर्वतपर विश्राम करके अपने पूर्वभुक्त स्थानपर कुछ कालतक निवास किया ॥ १४-१५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि डिम्भकमरणे एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें डिम्भकका मरणविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥


त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

गोप-गोपियोंसहित यशोदा और नन्दका गोवर्धन पर्वतपर आकर श्रीकृष्ण और वलभद्रसे मिलना

वैशम्पायन उवाच

यशोदा नन्दगोपश्च कृष्णदर्शनलालसौ ।
गोवर्धनगतं श्रुत्वा वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ १ ॥
नवनीतं च दधि च पायसं कृसरं तथा ।
वन्यं पुष्पं महाराज मयूराङ्गमथैव च ॥ २ ॥
वल्लवैरपरैः सार्धं गोपिभिश्च समन्ततः ।
जग्मतुः सहसा प्रीतौ गोवर्धनमथो नृप ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! यशोदा और नन्दगोपके मनमें श्रीकृष्णको देखनेके लिये बड़ी लालसा थी। जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण अपने बड़े भाईके साथ गोवर्धन पर्वतपर आये हैं, तब वे दोनों सहसा बड़े प्रसन्न हुए और मक्खन, दही, खीर, खिचड़ी, जंगली फूल तथा मोरपंखके बाजूबंद लेकर सब ओरसे एकत्र हुए दूसरे गोपों और गोपियोंके साथ गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ १-३ ॥

क्वचिद् वृक्षे समासक्तं कृष्णं कृष्णमृगेक्षणम् ।
ददर्शतुरमहाबाहुं वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ ४ ॥

वहाँ उन्होंने कृष्णमृगके समान विशाल नेत्रवाले वसुदेव-नन्दन महाबाहु श्रीकृष्णको अपने बड़े भाईके साथ कहीं वृक्षके नीचे उससे सटकर बैठे देखा ॥ ४ ॥

प्रणेमतुः सुसंहृष्टौ तत्र दृष्ट्वा महाबलौ ।
दर्शयामासतुर्देवौ पायसानि महान्ति च ॥ ५ ॥

उन्हें देखकर नन्द और यशोदा बड़े प्रसन्न हुए, फिर उन महाबली देवता श्रीकृष्ण-बलदेवने नन्द और यशोदाको प्रणाम किया। इसके बाद यशोदा और नन्दने खीर आदि महत्त्वपूर्ण उपहार उनके सामने प्रस्तुत किया ॥ ५ ॥

तात मातर्व्रजे गोष्ठे कुशलं वा स्वगोधनम् ।
अपि गावः क्षीरवत्यो वत्सा वत्सतराः पितः ॥ ६ ॥

उस समय श्रीकृष्णने पूछा—चाचा! मैया! व्रजके गोष्ठमें अपने सभी गोधन सकुशल तो हैं न? पिताजी! गौएँ दूध देती हैं न? उनके बड़े-छोटे बछड़े सुखी हैं न ॥ ६ ॥

अपि वा सुशुभं क्षीरमपि गावः सुशोभनाः ।
अपि वा दारका मातर्वत्सपालाः पिबन्ति च ॥ ७ ॥

'क्या व्रजकी गोओंका दूध शुद्ध एवं मङ्गलकारी होता है? क्या अपने यहाँ सुन्दर शोभामयी गौएँ हैं! मैया! छोटे-छोटे बच्चे और बछड़े चरानेवाले बालक भरपूर दूध पीते हैं न ? ॥ ७ ॥

बहूनि चापि दामानि कीलका अपि वा बहु ।
तृणानि बहुरूपाणि किं वा सन्ति पितः सदा ॥ ८ ॥

'तात! क्या अपने यहाँ बहुत-सी रस्सियाँ, बहुतेरे खूँटे तथा अनेक प्रकारकी घासें सदा प्रस्तुत रहती हैं? ॥ ८ ॥

शकटानि सुगन्धीनि किं वा सन्ति पितुर्गृहम् ।
अपि गोप्यः पुत्रवत्यो दारकान् किमजीजनन् ॥ ९ ॥

'पिताजी! क्या छकड़े सदा गोरससे सुगन्धित रहते हैं? क्या गोपियाँ पुत्रवती हुई हैं? क्या उन्होंने बच्चोंको जन्म दिया है ? ॥ ९ ॥

१०९२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

घटाः किं बहवो मातरभिन्नाः सर्वतो व्रजे ।
किं गावः क्षीरमतुलं स्रवन्त्यहरहः पितः ॥ १० ॥
'मैया ! क्या ब्रजमें सब ओर बिना फूटे हुए बहुत-से घड़े हैं ? बाबा ! क्या गौएँ प्रतिदिन अतुलनीय दुग्ध प्रदान करती हैं ? ॥ १० ॥

हैयङ्गवीनं क्षीराणि दधि वा किमजीजनन् ।
गोधनं सर्वमेवेदं नीरोगं प्रतिपद्यते ॥ ११ ॥
'क्या अपनी गौओंने दूध-दही और मक्खनकी उपज बढ़ायी है ? अपना सारा गोधन नीरोग तो है न ?' ॥ ११ ॥

नन्द उवाच
सर्वमेतद् यदुश्रेष्ठ नीरोगं बहुशः प्रभो ।
कुशलं गोधनस्यैव सर्वकालेषु केशव ॥ १२ ॥
नन्द बोले--'प्रभो ! यदुश्रेष्ठ ! अपना यह सारा गोधन प्रायः नीरोग ही है । केशव ! गोधन तो सदा ही सकुशल है ॥ १२ ॥

रक्षणात् तव देवेश सदा कुशलिनो वयम् ।
सगोधनाः सवत्साश्च नीरोगा इव केशव ॥ १३ ॥
देवेश्वर ! तुम्हारे संरक्षणसे हमलोग सदा कुशलपूर्वक रहते हैं । केशव ! हम गोधन और बछड़ोंसहित नीरोग-से ही हैं ॥ १३ ॥

एकमेव सदा दुःखं न त्वां द्रक्ष्यामि केशव ।
यदेतत् केवलं दुःखमिति धीः शीर्यते सदा ॥ १४ ॥
श्रीकृष्ण ! मुझे तो सदा एक ही दुःख बना रहता है कि मैं तुम्हें भर आँख देख नहीं पाता हूँ । यह जो एक ही दुःख है, इससे सदा मेरा अन्तःकरण व्यथित रहता है ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमादि विलप्यन्तं गच्छेत्याह स केशवः ।
यशोदां पुनराहेदं मातर्गच्छ गृहं प्रति ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! इस तरह विलाप करते हुए नन्दसे भगवान् श्रीकृष्णने कहा--'बाबा ! रोओ मत ! अपने घरको जाओ।' फिर उन्होंने यशोदासे कहा--'मैया ! तुम भी घर जाओ ॥ १५ ॥

ये च त्वां कीर्तयिष्यन्ति ते च स्वर्गमवाप्नुयुः ।
ये केचित् त्वां नमस्यन्ति ते मे प्रियतराः सदा ॥ १६ ॥
मद्भक्ताः सर्वदा सन्तु गच्छेत्याह च तां हरिः ।
'जो लोग तुम्हारा कीर्तन करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायेंगे तथा जो कोई तुम्हे नमस्कार करेंगे, वे सदा-सर्वदा मेरे परम प्रिय भक्त होंगे।' ऐसा कहकर श्रीहरिने मैयासे कहा--'तुम जाओ' ॥ १६ १/२ ॥

इत्युक्त्वा पितरौ देवो वासुदेवः सनातनः ॥ १७ ॥
गाढमालिङ्ग्य तौ प्रीतौ प्रेषयामास केशवः ।
यशोदा नन्दगोपश्च जग्मतुः स्वगृहं प्रति ॥ १८ ॥
माता-पितासे ऐसा कहकर सनातन भगवान् वासुदेवने प्रसन्नतापूर्वक उनके गलेसे लगकर उन्हें विदा किया। तत्पश्चात् यशोदा और नन्दगोप अपने घरको लौट गये ॥ १७-१८ ॥

ततः कृष्णो हृषीकेशो यादवैः सह वृष्णिभिः ।
गन्तुमैच्छत् तदा विष्णुः पुरीं द्वारवतीं किल ॥ १९ ॥
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक विष्णुरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवों तथा वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीको लौट जानेकी इच्छा की ॥ १९ ॥

य एतच्छृणुयान्नित्यं पठेद् वापि समाहितः ।
पुत्रवान् धनवांश्चैव अन्ते मोक्षं च गच्छति ॥ २० ॥
जो एकाग्रचित्त हो सदा इस प्रसंगको सुनता अथवा पढ़ता है, वह इस लोकमें पुत्रवान् और धनवान् होता है तथा अन्तमे मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि यशोदानन्दगोपबलभद्रकृष्णसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें यशोदा, नन्दगोप, बलभद्र और श्रीकृष्णका समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥


एकत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः

द्वारका जाते हुए श्रीकृष्णका पुष्करमें ऋषियोंसे मिलना तथा ऋषियोंद्वारा उनका स्तवन

वैशम्पायन उवाच<br>गच्छन्नथ महाविष्णुः पुष्करं प्राप्य यादवैः ।<br>अपश्यन्मुनिमुख्यांस्तु पुष्करस्थान् नृपोत्तम ॥ १ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! वहाँसे जाते हुए महाविष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंके साथ पुष्करमें पहुँचकर वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ मुनियोंका दर्शन किया ॥ १ ॥ते समेत्य महादेवमुपयो वीतमत्सराः ।<br>अर्घ्यादिसमुदाचारं कृत्वैनं यादवोत्तमम् ॥ २ ॥<br>प्रोचुर्विश्वेश्वरं विष्णुं भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।<br><br>उन मात्सर्यरहित ऋषियोंने इन यदुकुलतिलक महान् देव श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें अर्घ्य आदि निवेदन करनेके पश्चात् भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा--॥ २ १/२ ॥

भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ १०९३


अत्यद्भुतमिदं विष्णो तव वीर्यं जनार्दन ॥ ३ ॥
येन तौ निहतौ युद्धे हंसो डिम्भक एव च।
'विष्णो ! जनार्दन ! आपका यह बल-पराक्रम अत्यन्त अद्भुत है, जिससे आपने युद्धमें हंस और डिम्भकको मार डाला ॥ ३½ ॥'
यो विचक्रो दुराधर्षो देवैरपि सुदुःसहः ॥ ४ ॥
संगरे निहतो देव दुःसाध्य इति नो मतिः ।
'देव ! जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह था। उस दुर्जय वीर विचक्रको भी आपने युद्धस्थलमें मार डाला ! उसे पराजित करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। ऐसा हमारा विश्वास है ॥ ४½ ॥'
क्षेमो नः सर्वकार्येषु चरतां तप उत्तमम् ॥ ५ ॥
निष्कल्मषा भविष्यामस्त्वत्संस्मरणाद्धरे ।
'अब उत्तम तपका आचरण करनेवाले हमलोगोंके सभी कार्योंमें क्षेम सुलभ हो गया। हरे ! हम आपके स्मरणसे सर्वथा निष्पाप हो जायेंगे ॥ ५½ ॥'
त्वं हि सर्वस्य दुःखस्य हर्तात्वां ध्यायतां सदा॥ ६ ॥
त्वदनुस्मरणं जन्तोः सदा पुण्यप्रदं प्रभो।
'जो सदा आपका ध्यान करते हैं, उनके सभी दुःखोंको आप हर लेते हैं। प्रभो ! आपका वारंवार चिन्तन प्राणिमात्रके लिये सदा पुण्य-प्रदान करनेवाला है ॥ ६½ ॥'
त्वं हि नः सततं धाता विधाता तपसो हरे ॥ ७ ॥
त्वमोंकारो वषट्कारस्त्वं यज्ञस्त्वं पितामहः ।
'हरे ! आप ही सदा हमारी तपस्याके धारण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही ओंकार हैं। आप ही वषट्कार हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही पितामह हैं ॥ ७½ ॥'
त्वं ज्योतिर्ब्रह्मणो मूर्तिंस्त्वं ब्रह्मा रुद्र एव च ॥ ८ ॥
प्राणस्त्वं सर्वभूतानामन्तरात्मेति कथ्यते।
उपास्यः सर्वभूतानां यज्ञैर्दानैर्जगत्पते ॥ ९ ॥
'आप ही ज्योति हैं। आप ही ब्रह्ममूर्ति हैं। आप ही ब्रह्मा और रुद्र हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके प्राण हैं। आप ही अन्तरात्मा कहलाते हैं। जगत्पते ! यज्ञों और दानोंद्वारा समस्त प्राणियोंके लिये उपासना करने योग्य आप ही हैं ॥ ८-९ ॥'
नमो विश्वसृजे देव नमस्ते विश्वमूर्तये ।
पाहि लोकमिमं देव हत्वा ब्रह्मद्विषः सदा ॥ १० ॥
'देव ! आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपकी मूर्ति है, आपको नमस्कार है। देव ! आप ब्रह्मद्रोहियोंका वध करके सदा इस विश्वका पालन कीजिये' ॥ १० ॥
स तथेति हरिर्विष्णुर्ययौ द्वारवतीं पुरीम् ।
अवसद् वृष्णिभिः सार्धं स्तूयमानः समागधैः ॥ ११ ॥
अथ 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीविष्णु हरि द्वारकापुरीको गये और मागधोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वृष्णिवंशियोंके साथ वहाँ निवास करने लगे ॥ ११ ॥
इयं च देवदेवस्य चेष्टा हि जनमेजय ।
प्रोक्ता ते पृच्छते राजन् किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
राजा जनमेजय ! तुम्हारे पूछनेपर मैंने देवाधिदेव श्रीकृष्णकी यह लीला तुम्हें बतायी है। तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ १२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि द्वारकायां कृष्णस्य प्रत्यागमने एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रत्यागमन-विषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥


द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत और हरिवंशके श्रवणकी विधि और फल, वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य वस्तु, एकसे लेकर दस पारणाओंकी महत्ता तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य

जनमेजय उवाच
भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधैः ।
फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्ठिषु ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—भगवन् ! विद्वान् पुरुषोंको महाभारतका श्रवण किस विधिसे करना चाहिये ? इसका फल क्या है ? तथा इसकी समाप्तिपर किन-किन देवताओंका पूजन करना चाहिये ? ॥ १ ॥

देयं समाप्तौ भगवन् किं च पर्वणि पर्वणि ।
वाचकः कीदृशश्चात्र यष्टव्यस्तद् ब्रवीहि मे ॥ २ ॥
भगवन् ! प्रत्येक पर्वके समाप्त होनेपर क्या दान देना चाहिये ? तथा इसमे कैसे वाचकका पूजन करना चाहिये ? यह सब मुझे बताइये ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् विधिमिमं फलं यच्चापि भारतात् ।
श्रुताद् भवति राजेन्द्र यत् त्वं मामनुपृच्छसि ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! महाभारत सुननेकी इस विधिको सुनिये। राजेन्द्र ! महाभारत श्रवण करनेसे जो फल होता है, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वह भी बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥

१०९४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

दिवि देवा महीपाल क्रीडार्थमवनिं गताः ।
कृत्वा कार्यमिदं चैव ततश्च दिवमागताः ॥ ४ ॥
महीपाल ! स्वर्गके देवता लीलाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे। वे यह (अवतार-) कार्य करके वहाँसे देवलोकको लौट आये ॥ ४ ॥

हन्त यत् ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः ।
ऋषीणां देवतानां च सम्भवं वसुधातले ॥ ५ ॥
जनमेजय ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। भूतलपर ऋषियों और देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ५ ॥

अत्र रुद्रास्तथा साध्या विश्वेदेवाश्च शाश्वताः ।
आदित्याश्चाश्विनौ देवौ लोकपाला महर्षयः ॥ ६ ॥
गुह्यकाश्च सगन्धर्वा नागा विद्याधरास्तथा ।
सिद्धा धर्मः स्वयम्भूश्च मुनिः कात्यायनोवरः ॥ ७ ॥
गिरयः सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणाः ।
ग्रहाः संवत्सराश्चैव अयनान्यृतवस्तथा ॥ ८ ॥
स्थावरं जङ्गमं चैव जगत् सर्वं सुरासुरम् ।
भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमारनामक देवता, लोकपाल, महर्षि, गुह्यक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्माजी, श्रेष्ठ कात्यायन मुनि, पर्वत, सागर, नदियाँ, अप्सराएँ, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, स्थावर-जङ्गमस्वरूप सारा जगत्, देवता और असुर—ये इस महाभारतमें एकत्र स्थित देखे जाते हैं ॥ ६–९ ॥

तेषां श्रुतिप्रतिष्ठानां नामकर्मानुकीर्तनात् ।
कृत्वापि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानवः ॥ १० ॥
श्रुतिमें प्रतिष्ठित हुए इन सबके नाम और कर्मोंका बारंबार कीर्तन करनेसे मनुष्य घोर पातक करनेपर भी उससे तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥

इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वशः ।
संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते ॥ ११ ॥
तेषां शृणु त्वं श्राद्धानि श्रुत्वा भारत भारतम् ।
ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्त्या च भरतर्षभ ॥ १२ ॥
महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च ।
गावः कांस्योपदोहाश्च कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥ १३ ॥
भारत ! मनुष्य संयतचित्त एवं पवित्र हो इस इतिहासको क्रमशः यथावत् रूपसे सुनकर समूचे महाभारतके पार जाकर भारतयुद्धमें काम आये हुए वीरोंके किस प्रकार श्राद्ध करने चाहिये, यह बताता हूँ सुनो। भरतश्रेष्ठ ! महाभारत सुनकर यथाशक्ति भक्तिपूर्वक उनके लिये ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न एवं बड़े-बड़े दान देने चाहिये। गौएँ, काँसके दुग्धपात्र तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याएँ देनी चाहिये ॥ ११–१३ ॥

सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च ।
भाजनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञ्चनम् ॥ १४ ॥
वे कन्याएँ सम्पूर्ण कमनीय गुणोंसे सम्पन्न हों। इनके सिवा, नाना प्रकारके वाहन, विचित्र पात्र, पृथ्वी, वस्त्र एवं सुवर्णका दान करना चाहिये ॥ १४ ॥

वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्च वारणाः ।
शयनं शिविकाश्चैव स्यन्दनाश्च स्वलंकृताः ॥ १५ ॥
वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिविका और सजे-सजाये रथ भी देने चाहिये ॥ १५ ॥

यद् यद् गृहे वरं किंचिद् यद् यदस्ति महद्धसु ।
तत् तद् देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्च सूनवः ॥ १६ ॥
अपने घरमें जो-जो कोई श्रेष्ठ वस्तु हो और जो-जो महान् धन हो, उसका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। अपने स्त्री-पुत्र और शरीरको भी उनकी सेवामें अर्पण कर देना चाहिये ॥ १६ ॥

श्रद्धया परया दद्यात् क्रमशस्तस्य पारगः ।
शक्तितः सुमना हृष्टः शुश्रूषुरविकत्थनः ॥ १७ ॥
क्रमशः महाभारतको समाप्त करनेवाला पुरुष शुद्ध हृदयसे हर्षपूर्वक मनमें सेवाभाव रखते हुए स्थिरतापूर्वक बड़ी श्रद्धाके साथ यथाशक्ति पूर्वोक्त वस्तुओंका दान करे ॥ १७ ॥

सत्यार्जवरतो यत्तः शुचिः शौचपरायणः ।
श्रद्दधानो जितक्रोधो यथा सिद्ध्यति तच्छृणु ॥ १८ ॥
सत्य और सरलतामे तत्पर, प्रयत्नशील, पवित्र, शौचाचारपरायण, क्रोधको जीतनेवाला तथा श्रद्धालु श्रोताको जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त होती है, वह बताता हूँ, सुनो ॥ १८ ॥

शुचिः शीलान्विताचारः शुक्लवासा जितेन्द्रियः ।
संस्कृतः सर्वशास्त्रज्ञः श्रद्दधानोऽनसूयकः ॥ १९ ॥
रूपवान् सुभगो दान्तः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
दानमानग्रहीता च कार्यो भवति वाचकः ॥ २० ॥
जो शुद्ध, सुशील, सदाचारी, श्वेतवस्त्रधारी, जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता, श्रद्धालु, अदोषदर्शी, रूपवान्, सौभाग्यशाली, मन और इन्द्रियोंका दमन करनेवाला, सत्यवादी, इन्द्रियविजयी तथा दान-मानको ग्रहण करनेवाला हो, ऐसे विद्वान् पुरुषको ही वाचक बनाना चाहिये ॥ १९-२० ॥

अविलम्बितमनायस्तमद्रुतं घोरमूर्जितम् ।
असंसक्ताक्षरपदं न च भावसमन्वितम् ॥ २१ ॥
त्रिषष्टिवर्णसंयुक्तमष्टस्थानसमीरितम् ।
वाचयेद् वाचकः स्वस्थः स्वाधीनः सुसमाहितः ॥ २२ ॥