भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1078
१०५२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

इत्युक्त्वा गच्छ गच्छेति हंसं प्राह पुनः पुनः॥ १७॥
जनार्दनमुवाचेदं दुर्वासा यतिसत्तमः।
स्वस्त्यस्तु तव विप्रेन्द्र भक्तिरस्तु जनार्दने ॥ १८॥
संस्तुतिस्तच तस्यास्तु शङ्खचक्रगदाभृतः।
अद्य श्वो वा परश्वो वा साधुरेव सदा भवान् ॥ १९॥

ऐसा कहकर दुर्वासाने पुनः हंससे बारंबार कहा—'चले जाओ! चले जाओ!' तदनन्तर यतिश्रेष्ठ दुर्वासा जनार्दनसे इस प्रकार बोले—'विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो! भगवान् जनार्दनमें तुम्हारी भक्ति बनी रहे। शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन भगवान्‌के साथ आज, कल या परसोंतक तुम्हारा समागम होगा। तुम सदा साधुस्वभावके ही बने रहोगे॥ १७-१९॥

न हि साधोर्विनाशोऽस्ति लोकयोरुभयोरपि।
गच्छ सर्वं पितुर्ब्रूहि ज्ञात्वा वृत्तं यथाखिलम् ॥ २०॥

'साधु पुरुषका दोनों लोकोंमें कभी विनाश नहीं होता। जाओ, सारी बातें जानकर अपने पिताको बताओ' ॥ २०॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने दुर्वासोभाषणे नवाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०९॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसंगमें दुर्वासाका भाषणविषयक एक सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०९॥


दशाधिकशततमोऽध्यायः

दुर्वासा आदि मुनियोंका द्वारकागमन

वैशम्पायन उवाच

ततस्तौ हंसडिम्भकौ क्रुद्धौ कालेन चोदितौ।
शिक्यं कमण्डलुं चैव द्विदलं दारुमेव च ॥ १ ॥
दण्डान् पात्रविशेषांश्च छित्त्वा भित्त्वा च सर्वशः।
तस्मिन् देशे महाराज व्याधैर्मांसान्यदीदहन् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! तदनन्तर कालसे प्रेरित हो क्रोधमें भरे हुए हंस और डिम्भकने उन यतियोंके छींके, कमण्डलु, दो दलोंसे युक्त काष्ठमय भोजनपात्र, दण्ड और दूसरे-दूसरे विभिन्न पात्रोंको तोड़-फोड़कर उसी स्थानमें व्याधोंद्वारा मांस पकवाये॥ १-२॥

भक्षयित्वा ततो देशात् स्वपुरीं तौ प्रजग्मतुः।
जनार्दनश्च धर्मात्मा स्नेहादनुययौ तयोः ॥ ३ ॥

उन्हें खाकर वे दोनों उस स्थानसे अपने नगरको गये। धर्मात्मा जनार्दन भी स्नेहवश उन दोनोंका अनुसरण करता रहा॥ ३॥

नष्टाविमाविति तदा स मेने दुःखितः परम्।

उसने अत्यन्त दुःखित होकर यह विश्वास कर लिया कि अब इन दोनोंके नष्ट होनेमें कोई संदेह नहीं है॥ ३½॥

गतेषु तेषु सर्वेषु दुर्वासा यतिसत्तमः ॥ ४ ॥
पलायनपरान् सर्वानिदं प्राह यतीश्वरान्।

उन सबके चले जानेपर यतियोंमें श्रेष्ठ दुर्वासाने यहाँसे पलायन करनेवाले समस्त यतीश्वरोंसे इस प्रकार कहा—॥४½॥

इतो देशाद् विनिर्गत्य पुष्करात् पुण्यसंयुतात् ॥ ५ ॥
मन्दं मन्दं समाश्वस्य विश्रम्य च ततस्ततः।
प्रविश्य द्वारकां देवं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा च तस्मै प्रभवे वक्ष्यामो यतिसत्तमाः।

'यतिवरो! इस पुण्ययुक्त देश पुष्करसे निकलकर धीरे-धीरे सुस्ताते और यत्र-तत्र विश्राम करते हुए द्वारकापुरीमें प्रवेश करके हमलोग शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे मिलेंगे और उनसे अपनी सारी कष्ट-कथा कहेंगे॥ ५-६½॥

स हि रक्षन्नगदिदं धर्मवर्त्मनि संस्थितः ॥ ७ ॥
आद्यो लोकगुरुर्विष्णुर्यतात्मा तत्त्ववित्प्रियः।
उद्धृत्य कण्टकान् सर्वाञ्छशास पृथिवीमिमाम् ॥ ८ ॥

'वे इस सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करते हुए धर्मके मार्गपर स्थित हैं। वे ही आदिपुरुष, लोकगुरु, सर्वव्यापी, मनको वशमें रखनेवाले और तत्त्ववेत्ताओंके प्रिय हैं। उन्होंने सारे कण्टकोंका उन्मूलन करके इस पृथिवीका शासन किया है॥७-८॥

स च पापान् महागोरान् सर्वान् पापकृतान् प्रभुः।
रक्षेन्नः शुक्लकान् सर्वाञ्ज्ञानेषु नियतात्मनः ॥ ९ ॥

'वे ही प्रभु समस्त महाभयंकर, पापजन्मा पापियोंका उच्छेद करके अमानित्व और अदम्भित्व आदि ज्ञानसाधनोंमें नियतरूपसे मन लगानेवाले हम सम्पूर्ण यतियोंकी रक्षा करेंगे॥ ९॥

इदमद्य क्षमं विप्रा यानमद्य विधीयताम्।
साहसं यत्कृतं ताभ्यां पात्रभेदादि सत्तमाः ॥ १०॥
एतत् सर्वमशेषेण दर्शयाम जनार्दनम्।

'ब्राह्मणो! इस समय यही हमारे योग्य है; अतः अब द्वारकाकी यात्रा करो। साधुशिरोमणियो! हंस और डिम्भकने जो हमारे पात्रोंके तोड़ने-फोड़ने आदिका दुःसाहस किया है, ये सारी वस्तुएँ हमलोग भगवान् जनार्दनको दिखायें'॥१०½॥

तथेति ते प्रतिज्ञाय यतयो ज्ञानचक्षुषः ॥ ११ ॥
छिन्नं ताभ्यां समादाय शिक्यं दारुमयं तथा।
द्विदलं कर्पटं चैव कौपीनमथ वल्कलम् ॥ १२ ॥
कमण्डलुं तथा राजन्नर्घप्रोतकपालकम्।
एतानन्यान समादाय द्रष्टुं केशवमाययुः ॥ १३ ॥