विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1077, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः [ १०५१
मानो उन दोनोंके प्राणोंको दग्ध कर डालेंगे ॥ १ ॥
पश्यंस्तौ च दुरात्मानौ रोषव्याकुलेतेन्द्रियः।
कुर्वन्निव तदा लोकान् भस्मभूतानिमान् नृप ॥ २ ॥
नरेश्वर ! उनकी इन्द्रियाँ रोषसे व्याकुल हो रही थीं। वे उस समय उन दुरात्मा राजकुमारोंकी ओर इस तरह देख रहे थे मानो इन सम्पूर्ण लोकोंको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ २ ॥
ब्राह्मणं चक्षुषा पश्यन् सौम्येनान्येन केवलम् ।
उवाच वचनं राजन् ध्वंसत ध्वंसतेतरान् ॥ ३ ॥
साथ ही वे उस ब्राह्मण जनार्दनकी ओर दूसरे नेत्रसे, जो केवल सौम्यभावसे युक्त था, देख रहे थे। राजन् ! इस तरह देखते हुए वे उन राजाओंसे बोले—'अरे ! अपने स्वजनोंके पास भाग जाओ ! भाग जाओ !!' ॥ ३ ॥
इतो गच्छत राजानौ किं विलम्बत मा चिरम् ।
न वां वचनसम्भूतं रोषं धारयितुं क्षमे ॥ ४ ॥
'यहाँसे जाओ ! क्यों विलम्ब करते हो ! शीघ्र भाग जाओ ! राजाओ ! तुम दोनोंकी बातोंसे जो रोष प्रकट हुआ है, उसे मैं अपने भीतर रोक रखनेमें असमर्थ हूँ ॥ ४ ॥
अन्यथा वो महीपालान् सर्वान् दग्धुमहं क्षमः।
किमतः साहसं वक्तुं कश्च शक्नोति मत्परः ॥ ५ ॥
'चले जाओ ! नहीं तो मैं तुम सभी भूपालोंको जलाकर भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ। इससे बढ़कर दुःसाहसकी बात और क्या होगी ? कौन मेरे सामने ऐसी बात कह सकता है ? ॥ ५ ॥
दर्पं वां लोकविख्यातः शङ्खचक्रगदाधरः।
व्यपनेष्यति मन्दबुद्धी किंवां वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ ६ ॥
'मन्दबुद्धि राजकुमारो ! इस समय तुम दोनोंसे क्या कहूँ ? तुम्हारे बढ़े हुए घमंडको शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले लोकविख्यात भगवान् श्रीकृष्ण चूर्ण कर देंगे' ॥ ६ ॥
तत उत्थाय धर्मात्मा गन्तुमैच्छद् यतीश्वरः।
ततो निषेद्धुं हंसस्तं यतते स्म यतीश्वरम् ॥ ७ ॥
यह कहकर धर्मात्मा यतिराज दुर्वासा वहाँसे उठकर अन्यत्र जानेकी इच्छा करने लगे। तब हंस उन यतीश्वरको रोकनेका प्रयत्न करने लगा ॥ ७ ॥
तस्य बाहुं समादाय हंसो नृपवरोत्तम ।
कौपीनं चिच्छिदे क्रूरः कृतान्त इव सत्तम ॥ ८ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! साधुशिरोमणे ! कृतान्तके समान क्रूर हंसने दुर्वासाकी बाँह पकड़कर उनका कौपीन फाड़ डाला ॥ ८ ॥
यतयोऽन्ये पलायन्ति दिशो दश विचेतसः।
कष्टं हेति वदन् विप्रो मित्रभावाज्जनार्दनः ॥ ९ ॥
न्यवारयद् यथाशक्ति किमिदं साहसं त्विति ।
यह देख दूसरे यति होश-हवास खोकर दसों दिशाओंमें भागने लगे। ब्राह्मण जनार्दन मित्रताके कारण 'हाय ! बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहता हुआ विलाप करने लगा । उसने यथाशक्ति रोका और कहा—'यह क्या दुःसाहस कर रहे हो ?' ॥ ९½ ॥
दुर्वासाः सत्यधर्मस्तु हन्तुमीशोऽपि तं ततः ॥ १० ॥
मन्दं मन्दमुवाचेदं हंसं डिम्भकमेव च।
सत्यधर्मपरायण दुर्वासा उसे मार डालनेमें समर्थ होते हुए भी उस समय हंस और डिम्भकसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले—॥ १०½ ॥
शापेनाहं समर्थोऽपि हन्तुं राजकुलाधमौ ॥ ११ ॥
तथापि न करोम्यन्तं यतयो ह्यत्र ते वयम्।
'राजवंशके नीच पुरुषो ! मैं शापद्वारा तुम दोनोंको मार डालनेमें समर्थ हूँ, तो भी तुम्हारा विनाश नहीं कर रहा हूँ; क्योंकि यहाँ हमलोग यतिधर्ममें प्रतिष्ठित हैं ॥ ११½ ॥
यो हि देवो जगन्नाथः केशवो यादवेश्वरः ॥ १२ ॥
शङ्खचक्रगदापाणिर्गर्वं वां व्यपनेष्यति।
'जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, यदुकुलके नायक तथा हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे ही तुम दोनोंके दर्पका दलन करेंगे ॥ १२½ ॥
लोके तस्मिन् यदुश्रेष्ठे रक्षत्येवं जगत्पतौ ॥ १३ ॥
युवयोः सर्वथा जीवः सञ्जीव इति मे मतिः।
'वे यदुश्रेष्ठ जगदीश्वर जब जगत्में इस प्रकार संरक्षण-कार्य कर रहे हैं, तब तुम दोनोंका पृथक्-पृथक् जीव सर्वथा श्रेष्ठ जीव है; ऐसा मेरा विश्वास है (क्योंकि उनके हाथसे मारे जानेपर तुम दोनोंकी सद्गति होगी) ॥ १३½ ॥
जरासंधोऽपि वां बन्धुः स च वक्तुं न चेच्छति ॥ १४ ॥
ईदृशं लोकविद्विष्टं स हि धर्मपथे सदा।
'तुम दोनोंका सहायक बन्धु जरासंध भी कभी ऐसी लोकनिन्दित बात मुँहसे नहीं निकालना चाहता है। वह सदा धर्मके मार्गपर स्थित रहता है ॥ १४½ ॥
एतावता स वां बन्धुर्न हि भूयो भविष्यति ॥ १५ ॥
विद्वेषो ह्यस्तु वां तस्य मागधस्य महीपतेः।
'तुम्हारे इस अपराधके कारण जरासंध अब फिर तुम्हारा बन्धु नहीं रह जायगा। उस मगधनरेशके साथ तुम्हारा विद्वेष हो जायगा ॥ १५½ ॥
श्रुत्वेदं घोररूपं तु स हि बन्धुः सहेत चेत् ॥ १६ ॥
धर्मनाशो भवेत् तस्य नात्र कार्या विचारणा।
'यदि तुम्हारे इस भयंकर अपराधको सुनकर भी वह बन्धुभावसे चुपचाप सह लेगा तो उसके भी धर्मका नाश हो जायगा। इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है' ॥ १६½ ॥