विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1076, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०५० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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है; कौन मन्दबुद्धि मानव यदि वह बन्धु बान्धवोंसहित जीवित रहना चाहता हो तो ऐसी बात कह सकता है? ॥ ८-९ ॥
सर्वथा काल एवायं युवयोर्मन्दचेतसोः।
समाप्त मायुरः शेषो ब्रह्मदण्डहतौ युवाम् ॥ १०॥
'ये महात्मा तुम दोनों मन्दबुद्धि राजाओंके लिये सर्वथा कालरूप ही हैं ! जान पड़ता है तुम्हारी शेष आयु भी आज समाप्त हो गयी । तुम दोनों ब्रह्मदण्डद्वारा मारे गये ॥ १० ॥
एते हि यतयः शुद्धा ज्ञानदीपितचेतसः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ॥ ११ ॥
'ये सब-के-सब शुद्ध हृदयवाले यति (संन्यासी) हैं। इनका अन्तःकरण ज्ञानके तेजसे प्रकाशित है। इन्होंने ज्ञानाग्निके द्वारा अपनी सारी संचित कर्मराशि दग्ध कर डाली है और ये अब अपने प्राणोंका ही प्राणस्वरूप अग्नियोंमें होम करते हैं ॥ ११ ॥
श्रुते वामीदृशं वाक्यं कः समर्थो ह्यनुब्रुवन्।
सर्वथा ज्ञातमस्माभिः समाप्तमिह जीवितम् ॥ १२ ॥
'ऐसे महात्माओंके प्रति तुम दोनोंको छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य बारंबार ऐसी अनुचित बात कहनेमें समर्थ है ? हमने सर्वथा समझ लिया, तुम दोनोंकी जीवनलीला यहीं समाप्त हो गयी ॥ १२ ॥
चत्वार आश्रमाः पूर्वमृषिभिर्विहिता नृपौ।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः ॥ १३ ॥
'नरेश्वरो ! मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंने पूर्वकालसे ही चार आश्रमोंका विधान किया है। उनके नाम इस प्रकार हैं— ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक (संन्यासी) ॥ १३॥
तेषामग्र्यश्चतुर्थोऽयमाश्रमो भिक्षुकः स्मृतः।
आस्ते तस्मिन् महाबुद्धिः स हि पुण्यतरः स्मृतः॥ १४॥
'इनमें सबसे श्रेष्ठ यह चौथा आश्रम, जिसका नाम भिक्षु या संन्यास है, माना गया है। उस आश्रममें जिसकी महत्त्वपूर्ण बुद्धि है, वह महान् पुण्यात्मा बताया गया है ॥ १४ ॥
नोपासिता भवद्भ्यां च वृद्धाः सम्यग् विनीतवत्।
ज्ञानं नाप्तं तपस्विभ्यस्तथा चैवं वदेत कः ॥ १५॥
'तुम दोनोंने भलीभाँति विनीत पुरुषके समान कभी वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या सेवा नहीं की है तथा तपस्वी मुनियोंसे ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, यह बात स्पष्ट हो गयी; अन्यथा उस प्रकार सत्सङ्ग एवं ज्ञान प्राप्त करनेवाला कौन पुरुष ऐसी बात कह सकता है ? ॥ १५ ॥
अश्राव्यमीदृशं घोरं मया प्राणभृता नृप।
किंकरिष्यामि मन्दात्मन् मित्रत्वाद् भवतो नृप॥ १६ ॥
'राजा हंस ! मैं प्राण रहते ऐसा घोर अनुचित शब्द नहीं सुन सकता; किंतु क्या करूँ ? मन्दात्मन् ! तू मेरा मित्र है, इसलिये कुछ करते नहीं बनता ॥ १६ ॥
ज्ञानं यदाप्तं भवता गुरुभ्य-
स्तदत्र दुःखाय हि केवलं नृप।
ज्ञानं हि धर्मप्रभवं यथेष्टं
बलाद्धि पापस्य विधातुरूपम् ॥ १७ ॥
'नरेश्वर ! तूने गुरुजनोंसे जो ज्ञान प्राप्त किया था, वह तो यहाँ केवल दुःखका ही जनक हुआ। जो ज्ञान धर्माचरणसे प्राप्त होता है, वही यथेष्ट फलकी प्राप्ति करानेवाला है । बल अथवा हठसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान तो पापका ही विधायक होता है ॥ १७ ॥
युवां विहाय यास्ये वा पतेयं वा शिलातलम्।
पिबेयं वा विषं घोरं पतेयं वा महोर्मिषु ॥ १८ ॥
'मैं तुम दोनोंको छोड़कर चला जाऊँ, या ऊँचेसे पत्थरपर कूद पहूँ अथवा घोर विष पी लूँ किंवा महासागरकी तरङ्गोंमें गिर जाऊँ ॥ १८ ॥
आत्मानं वात्र संत्यक्ष्ये पश्यतां शृण्वतां पुनः।
इत्युक्त्वा विललापैवं मा ब्रूतमिति तौ वदन् ॥ १९ ॥
'अथवा तुम सबके देखते-सुनते आत्महत्या कर लूँ।' ऐसा कहकर जनार्दन उन दोनों राजाओंसे 'ऐसी बात न कहो, न कहो' यह कहता हुआ इस प्रकार विलाप करने लगा ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस और डिम्भकका उपाख्यानविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
नवाधिकशततमोऽध्यायः
दुर्वासाका रोष, हंसद्वारा उनका तिरस्कार, दुर्वासाद्वारा उन दोनोंके लिये शाप और जनार्दनके लिये वरदान
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— |
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| ततः क्रुद्धोऽथ दुर्वासा धक्ष्यन्निव तयोस्तनू ।<br>एकेनाक्ष्णाथ दुर्वासा रौद्रेणाग्नियुजा सदा ॥ १ ॥ | जनमेजय ! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए दुर्वासाने सदा रौद्र अग्निसे युक्त एक नेत्रद्वारा इस प्रकार उन राजकुमारोंकी ओर देखा, |