विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1075, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ भविष्यपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः १०४९
स्थापयिष्यामहे सर्वान् मन्दबुद्धीनिमान् गृहे।
बलादेव द्विजानेतान् मूढविज्ञानतत्परान् ॥ २६ ॥
'ये प्राकृत ज्ञानवाले मनुष्य क्यों कुछ ध्यान-सा कर रहे हैं, इनके लिये उन्नतिके पथपर आरूढ़ होना सर्वथा कठिन है। ये दूसरे आश्रमोंकी कल्पना करनेवाले हैं। हम इन समस्त मन्दबुद्धि द्विजोंको, जो मूढ ज्ञानमें तत्पर हैं, बलपूर्वक गृहस्थाश्रमके भीतर स्थापित करेंगे ॥ २५-२६ ॥
असम्राहगृहीतांश्च बालिशान् दुर्मतीनिमान्।
एषां शास्ता च को मूढो न विप्रो वयमत्र ह ॥ २७ ॥
धर्म्ये वर्त्मनि संस्थाप्य पुनर्यास्याव निर्वृतौ।
'क्योंकि ये मूर्ख लोग दुराग्रहसे गृहीत हैं और इनकी बुद्धि खोटी है। इन सबको उपदेश देनेवाला यह कौन मूर्ख बैठा है? यह ब्राह्मण तो नहीं है! अब हमलोग यहाँ आ गये हैं तो पहले इनके इस गुरुको ही धर्मके मार्गपर स्थापित करके फिर संतोषपूर्वक यहाँसे घरको जायेंगे' ॥२७॥
इति संचिन्त्य तौ वीरौ विप्रेण सहितौ नृप ॥ २८ ॥
जनार्दनेन राजानौ मोहाद् भाग्यक्षयान्नृप ।
समीपं तस्य राजेन्द्र यतेः संयतचेतसः ॥ २९ ॥
गत्वा च प्रोचतुरभौ दुर्वाससमतीन्द्रियम्।
यतींश्च नियतान् क्रुद्धौ राजानौ राजसत्तम ॥ ३० ॥
नरेश्वर ! ऐसा निश्चय करके ब्राह्मण जनार्दनके साथ वे दोनों वीर राजा मोह अथवा भाग्यक्षयके कारण उन संयतचित्त यतिके पास गये। राजेन्द्र ! नृपशिरोमणे ! वहाँ जाकर क्रोधमें भरे हुए उन दोनों राजाओंने इन्द्रियातीत दुर्वासा तथा नियमपरायण यतियोंसे इस प्रकार कहा २८-३०
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
हंस और डिम्भकद्वारा संन्यासकी निन्दा तथा जनार्दनद्वारा संन्यास-आश्रमका मण्डन
हंसडिम्भकावूचतुः
ज्ञानलेशाद् विहीनात्मन् किं ते व्यवसितं द्विज ।
कश्चायमाश्रमो विप्र भवता यः समाश्रितः ॥ १ ॥
हंस और डिम्भक बोले-ओ द्विज ! यह तूने क्या करनेका निश्चय किया है ? तेरा अन्तःकरण तो लेशमात्र ज्ञानसे भी शून्य जान पड़ता है। विप्र ! तूने जिसका आश्रय लिया है, यह कौन-सा आश्रम है ? ॥ १ ॥
गृहमेधं परित्यज्य किं त्वया साधितं पदम्।
दम्भ एव भवान् व्यक्तं शङ्के नास्त्यत्र कारणम् ॥ २ ॥
गृहस्थाश्रमको त्यागकर तूने किस अभिलषित वस्तुकी सिद्धि प्राप्त कर ली है; मुझे संदेह है कि 'तू स्पष्ट ही मूर्तिमन् दम्भ है', इसके सिवा इस त्यागमें दूसरा कोई कारण नहीं है ॥ २ ॥
लोकांश्चेमान् सदा मूढ नाशयिष्यसि निर्वृतः।
एतान् सर्वान् विनेतासि नरके पातयिष्यसि ॥ ३ ॥
मूढ ! तू सदा इन सब लोगोंका नाश करेगा और इसीमें सुख मानेगा। इन सबका शिक्षक बना हुआ है, अतः अपने साथ इन्हें भी नरकमें गिरायेगा ॥ ३ ॥
स्वयं नष्टः परान् मूर्ख नाशयिष्यसि यत्नतः।
अहो शास्ता कथं नास्ति तव मन्दमतेर्द्विज ॥ ४ ॥
सर्वथा त्वद्विनेता च पापो नास्त्यत्र संशयः ।
मूढ ब्राह्मण ! तू स्वयं तो नष्ट हो ही गया है, दूसरोंका भी यत्नपूर्वक नाश करेगा। अहो ! तुझ मन्दबुद्धि द्विजका कोई शासन क्यो नहीं करता है ? जिसने तुझे ऐसी शिक्षा दी है, वह भी सर्वथा पापी है; इसमें संशय नहीं है ॥४॥
त्यक्त्वेममाश्रमं विप्र गृही भव यतात्मवान् ॥ ५ ॥
पञ्च यज्ञान् सदा विप्र कुरु यत्नपरो भव ।
ततः स्वर्गं परं गत्वा स्वर्गे हि सुमहत् सुखम् ॥ ६ ॥
एष श्रेयःपथो विप्र जीविते चेत् स्पृहा तव।
विप्र ! इस आश्रमको छोड़कर गृहस्थ हो जा और मनको संयममे रख । ब्रह्मन् ! पाँच महायज्ञोंका अनुष्ठान कर और इसीके लिये निरन्तर प्रयत्नशील बना रह। तदनन्तर उत्तम स्वर्गलोकमे जाकर सुखी हो जा; क्योंकि स्वर्गलोकमें महान् सुख प्राप्त होता है। बाबाजी ! यही कल्याणका मार्ग है; यदि तुझे जीनेकी इच्छा हो तो यही कर ॥ ५-६॥
इत्युक्तवन्तौ धर्मात्मा श्रुत्वा विप्रो जनार्दनः ॥ ७ ॥
उवाच च यतिं दृष्ट्वा प्रणम्यासौ सुनीतवत् ।
धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दनने उन दोनोंकी कही हुई ऐसी बात सुनकर यति दुर्वासाकी ओर देखा और अत्यन्त विनीतकी भाँति उनके चरणोंमें प्रणाम करके अपने मित्रोंसे कहा-॥
मा ब्रूतामीदृशं वाक्यं राजानौ मन्दतेजसौ ॥ ८ ॥
अश्राव्यमीदृशं घोरं लोकयोरुभयोरपि ।
को वक्तुमीशो मन्दात्मा यदि जीवेत् सबान्धवः ॥ ९ ॥
'राजाओ ! तुम दोनोंकी बुद्धि और तेज दोनों मन्द हो गये हैं। मित्रो ! ऐसी बात मुँहसे न निकालो। ऐसा घोर अमङ्गलकारी वचन इहलोक और परलोकमें भी सुनने योग्य नहीं