विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1045, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] नवतितमोऽध्यायः १०१९
नमः सोमाय सौम्याय नमः शीतात्मने हरे ॥ २१ ॥
नमो वषट्कृते तुभ्यं स्वाहास्वधास्वरूपिणे ।
नमो यज्ञाय इज्याय हविषे हव्यसंस्कृते ।
नमः स्रुवाय पात्राय यज्ञाङ्गाय पराय च ॥ २२ ॥
हरे ! आप सोम, सौम्य तथा शीतात्मा हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । आप वषट्कार तथा स्वाहा-स्वधा-स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है । आप यज्ञ, यज्ञोंद्वारा पूज-नीय तथा हविष्यरूप हैं, आपको नमस्कार है । हव्योंद्वारा संस्कृत आप परमात्माके प्रति नमस्कार है । आप स्रुव हैं, यज्ञपात्र हैं, यज्ञोंके अङ्गभूत उपकरण हैं और इन सबसे परे भी हैं, आपको नमस्कार है ॥ २१-२२ ॥
नमः प्रणवदेहाय क्षरायाप्यक्षराय च ।
वेदाय वेदरूपाय शङ्खिणे शङ्खरूपिणे ॥ २३ ॥
प्रणव आपका शरीर है । आप क्षर ( सम्पूर्ण भूत ) और अक्षर ( कूटस्थ ) हैं, आपको नमस्कार है । आप वेद हैं, वेदरूप हैं, शङ्ख ग्रहण करनेवाले और शङ्खरूपधारी हैं, आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥
गदिने खङ्गिने तुभ्यं शङ्खिने चक्रिणे नमः ।
शूलिने चर्मिणे नित्यं वरदाय नमो नमः ॥ २४ ॥
आप गदा, खड्ग, शङ्ख, चक्र, शूल और ढाल धारण करते हैं तथा सदा वर देनेवाले हैं, आपको बारंबार नम-स्कार है ॥ २४ ॥
बुद्धिप्रियाय बुद्धाय प्रबुद्धाय सुखाय च ।
हरये विष्णवे तुभ्यं नमः सर्वात्मने गुरो ॥ २५ ॥
गुरुदेव ! आप बुद्धिप्रिय, बोधसम्पन्न, प्रबुद्धस्वरूप एवं सुखरूप हैं । आप ही सबके आत्मा पापहारी विष्णु हैं, आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥
नमस्ते सर्वलोकेश सर्वकर्त्रे नमो नमः ।
नमः स्वभावशुद्धाय नमस्ते यज्ञसूकर ॥ २६ ॥
सर्वलोकेश्वर ! आप सबके कर्ता हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । यज्ञवाराह ! आप स्वभावसे ही शुद्ध हैं, आप-को बारंबार नमस्कार है ॥ २६ ॥
नमो विष्णो नमो विष्णो नमो विष्णो नमो हरे ।
नमस्ते वासुदेवाय वासुदेवाय धीमते ॥ २७ ॥
विष्णो ! आपको नमस्कार है । विष्णो ! आपको नम-स्कार है । विष्णो ! आपको नमस्कार है । हरे ! आपको नमस्कार है । सबके भीतर निवास करनेवाले बुद्धिमान् देवता वसुदेवनन्दन ! आपको नमस्कार है ॥ २७ ॥
नमः कृष्णाय कृष्णाय सर्वावास नमो नमः ।
नमो भूयो नमस्तेऽस्तु पाहि लोकान् जनार्दन ॥ २८ ॥
सबके आवासस्थान जनार्दन ! आप नामसे कृष्ण हैं, वर्णसे भी कृष्ण ही हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । आप-को पुनः नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये ॥ २८ ॥
इति स्तुत्वा जगन्नाथमुवाच मुनिसत्तमान् ।
इदं स्तोत्रमधीयाना नित्यं व्रजत केशवम् ॥ २९ ॥
शरण्यं सर्वभूतानां तत्र श्रेयो विधास्यति ।
इस प्रकार जगदीश्वर श्रीहरिकी स्तुति करके भगवान् शिवने उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा—'इस स्तोत्रका नित्य पाठ करते हुए तुम सब लोग भगवान् केशवकी शरणमें जाओ । वे समस्त भूतोंको शरण देनेवाले हैं, अतः तुम्हारा कल्याण करेंगे ॥ २९½ ॥
ये चेमं धारयिष्यन्ति स्तवं पापविमोचनम् ॥ ३० ॥
तेषां प्रीतः प्रसन्नात्मा पठतां शृण्वतां हरिः ।
श्रेयो दास्यति धर्मात्मा नात्र कार्या विचारणा॥ ३१ ॥
'जो लोग इस पापनाशक स्तोत्रको अपने हृदयमें धारण करेंगे; उनपर भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होंगे । प्रसन्नचित्त हुए धर्मात्मा विष्णु इसका पाठ और श्रवण करनेवाले पुरुषों-को कल्याण प्रदान करेंगे । इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३०-३१ ॥
अवश्यं मनसा ध्यात केशवं भक्तवत्सलम् ।
श्रेयः प्राप्तुं यदीच्छन्ति भवन्तः शंसितव्रताः॥ ३२ ॥
'यदि तुमलोग कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो उत्तम व्रतका पालन करते हुए निश्चय ही अपने मनसे भक्तवत्सल केशवका चिन्तन करो' ॥ ३२ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत ।
सगणः शंकरः साक्षादुमया भूतभावनः ॥ ३३ ॥
ऐसा कहकर उमासहित भूतभावन कल्याणकारी साक्षात् भगवान् रुद्र अपने गणोंके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये ॥
नेमुस्तं मुनयः सर्वे परां निर्वृतिमाययुः ।
तमेव परमं तत्त्वं मत्वा नारायणं हरिम् ।
विस्मयं परमं गत्वा मेनिरे स्वकृतार्थताम् ॥ ३४ ॥
सब मुनियोंने उन्हें नमस्कार किया और परम संतोष प्राप्त किया । पापहारी नारायणदेवको ही परम तत्त्व मानकर उन सबको बड़ा विस्मय हुआ और उन सबने अपने-आपको कृतकृत्य माना ॥ ३४ ॥
लोकपालास्तदा विष्णुं नमस्कृत्य हरिं मुदा ।
जग्मुः स्वान्यथ वेश्मानि गणैः सर्वैर्नृपोत्तम ॥ ३५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस समय लोकपाल भी भगवान् विष्णु श्रीहरिको प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार करके समस्त सेवकगणोंके साथ अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३५ ॥