विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1044, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०१८ | महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तथा जिन्होंने सम्पूर्ण वेदोंको धारण किया है, वे ब्रह्मा आप ही हैं। आपको नमस्कार है॥ ५ १/२ ॥
सर्वान् संहरते यस्तु संहारे विश्वदृक् सदा ॥ ६ ॥
क्रोधात्मासि विरूपोऽसि तुभ्यं रुद्रात्मने नमः।
जो विश्वद्रष्टा भगवान् संहारकालमें सदा समस्त लोकोंका संहार करते हैं, वे आप ही हैं। आप क्रोधरूप, विकरालरूप तथा रुद्रस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है॥ ६ १/२ ॥
सृष्टौ स्रष्टा समस्तानां प्राणिनां प्राणदायिने ॥ ७ ॥
अजाय विष्णवे तुभ्यं स्रष्ट्रे विश्वसृजे नमः।
जो सृष्टिकालमें स्रष्टा बनकर समस्त प्राणियोंको प्राणदान करते हैं, उन अजन्मा, विश्वस्रष्टा, विधाता आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है॥ ७ १/२ ॥
आदौ प्रकृतिमूलाय भूतानां प्रभवाय च ॥ ८ ॥
नमस्ते देवदेवेश प्रधानाय नमो नमः।
देवदेवेश्वर ! जो आदिमें मूल-प्रकृतिरूप है और गुणोंमें क्षोभ होनेपर क्रमशः पञ्च-महाभूतोंका उत्पादक होता है, उन प्रधानस्वरूप आपको बारंबार नमस्कार है॥ ८ १/२ ॥
पृथिव्यां गन्धरूपेण संस्थितः प्राणिनां हरे ॥ ९ ॥
दृढाय दृढरूपाय तुभ्यं गन्धात्मने नमः।
प्राणियों(के पापों)का अपहरण करनेवाले हरे! आप पृथिवीमें गन्धरूपसे स्थित हैं। आप दृढ़ हैं, दृढ़ रूपधारी हैं तथा गन्धस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है॥ ९ १/२ ॥
अपां रसाय सर्वत्र प्राणिनां सुखहेतवे ॥ १० ॥
नमस्ते विश्वरूपाय रसाय च नमो नमः।
जो प्राणियोंको सुख देनेके लिये सर्वत्र जलमें रसरूपसे निवास करते हैं, उन विश्वरूपधारी रसस्वरूप आपको बारंबार नमस्कार है॥ १० १/२ ॥
तेजसा भास्करो यस्तु घृणिर्जन्तुहितः सदा ॥ ११ ॥
तस्मै देव जगन्नाथ नमो भास्कररूपिणे।
देव ! जगन्नाथ ! जो तेजसे सूर्यतुल्य, किरणोंसे प्रकाशित तथा सदा सभी जीवोंका हित करनेवाले हैं, उन भास्कररूप आपको नमस्कार है॥ ११ १/२ ॥
वायोः स्पर्शगुणो यत्र शीतोष्णसुखदुःखदः ॥ १२ ॥
नमस्ते वायुरूपाय नमः स्पर्शात्मने हरे।
हरे ! जहाँ वायुका स्पर्श नामक गुण शीत, उष्ण एवं सुख-दुःख प्रदान करनेवाला है, वहाँ उस गुणके आश्रयभूत वायु आपके ही स्वरूप हैं। स्पर्श भी आपका ही रूप है, आपको नमस्कार है॥ १२ १/२ ॥
आकाशेऽवस्थितः शब्दः सर्वश्रोत्रनिवेशनः ॥ १३ ॥
नमस्ते भगवन् विष्णो तुभ्यं सर्वात्मने नमः।
भगवन् ! विष्णो ! आकाशस्वरूप आपमें स्थित शब्द सबके कानोंमें प्रवेश करता है। आप सर्वात्मा हैं, आपको नमस्कार है॥ १३ १/२ ॥
यो दधार जगत् सर्वं मायामानुषदेहवान् ॥ १४ ॥
नमस्तुभ्यं जगन्नाथ मायिनेऽमायदायिने।
जगन्नाथ ! आपने मायामय मनुष्य-देह धारण करके भी सम्पूर्ण जगत्को स्वयं ही धारण कर रखा है। आप मायाके स्वामी हैं तथा मायारहित मोक्षतक प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है॥ १४ १/२ ॥
नम आद्याय बीजाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ १५ ॥
अचिन्त्याय सुचिन्त्याय तस्मै चिन्त्यात्मने नमः।
आप सबके आदिकारण, निर्गुण, गुणस्वरूप, अचिन्त्य, सुचिन्त्य एवं चिन्त्यरूप हैं, उन आप परमात्माको नमस्कार है॥ १५ १/२ ॥
हराय हरिरूपाय ब्रह्मणे ब्रह्मदायिने ॥ १६ ॥
नमो ब्रह्मविदे तुभ्यं ब्रह्मब्रह्मात्मने नमः।
आप हरिरूपधारी हर हैं, ब्रह्माको वेद प्रदान करनेवाले हैं, ब्रह्मवेत्ता तथा ब्रह्म और यज्ञरूप हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !!॥ १६ १/२ ॥
नमः सहस्रशिरसे सहस्रकिरणाय च ॥ १७ ॥
नमः सहस्रवक्त्राय सहस्रनयनाय च।
आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। आपके मुख और नेत्र भी सहस्र (अनन्त) हैं, आपको नमस्कार है॥ १७ १/२ ॥
विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्त्रे नमो नमः ॥ १८ ॥
विश्ववक्त्रे नमो नित्यं भूतावास नमो नमः।
आप विश्व, विश्वरूप और विश्वकर्ता हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप सम्पूर्ण विश्वको उपदेश देनेवाले (जगद्-गुरु) हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतोंके आवासस्थान विष्णुदेव ! आपको बारंबार नमस्कार है॥
इन्द्रियायेन्द्ररूपाय विषयाय सदा हरे ॥ १९ ॥
नमोऽश्वशिरसे तुभ्यं वेदाभरणरूपिणे।
हरे ! आप इन्द्रियरूप, विषयरूप और इन्द्ररूप हैं, आपको सदा नमस्कार है। वेद ही जिनका आभरण और रूप हैं, उन हयग्रीवरूपधारी आपको नमस्कार है॥ १९ १/२ ॥
अग्नयेऽग्निपते तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः ॥ २० ॥
सूर्याय सूर्यपुत्राय तेजसां पतये नमः।
अग्निपते ! आप अग्निरूप हैं, ग्रह-नक्षत्रोंके अधिपति हैं, सूर्य, सूर्यपुत्र तथा तेजके स्वामी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है॥ २० १/२ ॥