विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1043, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] नवतितमोऽध्यायः [ १०१७
उपायोऽयं मया प्रोक्तो नात्र संदेह इत्यपि ।
अयं मायी सदा विप्रा यतध्वमघनाशने ॥ १५ ॥
'विप्रगण ! यह मैंने भगवान्की प्राप्तिका उपाय बताया, इसमें संदेह नहीं है। ये भगवान् मायाके अधिपति हैं, तुम सब लोग इन पापहारी हरिकी प्राप्तिके लिये सदा प्रयत्न करते रहो ॥ १५ ॥
यथा वो बुद्धिरखिला शुद्धा भवति यत्नतः ।
तथा कुरुत विप्रेन्द्रा यथा देवः प्रसीदति ॥ १६ ॥
'विप्रवरो ! जिस प्रकारसे यत्न करनेपर तुम्हारी सारी बुद्धि शुद्ध हो जाय और जिससे भगवान् प्रसन्न हो जायें, वैसा करो' ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तास्ततः सर्वे मुनयः पुण्यशीलिनः ।
यथावदुपगृह्णाना निरसन् संशयं नृप ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! भगवान् शङ्करके ऐसा कहनेपर उन समस्त पुण्यशील मुनियोंने यथावत् रूपसे उनके उपदेशको ग्रहण किया और अपने मनसे संशयको निकाल दिया ॥ १७ ॥
एवमेवेति तं विप्राः प्राहुः प्राञ्जलयो हरम् ।
छिन्नो नः संशयः सर्वो गृहीतोऽर्थः स तादृशः ॥ १८ ॥
उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर महादेवजीसे कहा—'भगवन् ! आपने जैसा कहा है, ऐसी ही बात है। हमारा सारा संशय नष्ट हो गया और हमने वैसा ही सिद्धान्त स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥
एतदर्थं समायाता वयमद्य तवालयम् ।
संगमाद् युवयोः सर्वो नष्टो मोहो महानिह ॥ १९ ॥
'प्रभो ! हम इसीलिये आज आपके निवासस्थानपर आये थे। आप दोनोंके समागमसे यहाँ हमारा सारा महान् मोह नष्ट हो गया ॥ १९ ॥
यथा वदसि देवेश तथा नः श्रेयसे परम् ।
यथाऽऽह भगवान् रुद्रो यतामः सततं हरौ ।
इति ते मुनयः प्रीताः प्रणेमुः केशवं हरिम् ॥ २० ॥
'देवेश्वर ! आप जैसा कहते हैं, वैसा करनेसे ही हमारा परम कल्याण होगा। आप भगवान् रुद्रने जैसा कहा है, उसके अनुसार हम सदा श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये यत्न करते रहेंगे। ऐसा कहकर उन प्रसन्न हुए मुनियोंने श्रीकृष्णव हरिको प्रणाम किया ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां ऋष्युपदेशे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें भगवान् शिवका ऋषियोंको उपदेशविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥
नवतितमोऽध्यायः
भगवान् शंकरद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका कैलाससे बदरिकाश्रममें लौटना
वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् रुद्रः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
स्तुत्या प्रचक्रमे स्तोतुं विष्णुं विश्वेश्वरं हरिम् ।
अर्थाभिस्तु तदा वाग्भिर्मुनीनां शृण्वतां तथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् रुद्र सबको विस्मयमें डालते हुए-से सर्वव्यापी जगदीश्वर श्रीहरिकी स्तोत्रद्वारा स्तुति करनेको उद्यत हुए। उन्होंने उस समय मुनियोंके सुनते हुए अर्थयुक्त वाणीद्वारा इस प्रकार स्तुति आरम्भ की ॥ १ ॥
महेश्वर उवाच
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ।
यस्य भासा जगत् सर्वं भासते नित्यमच्युत ॥ २ ॥
नमो भगवते देव नित्यं सूर्यात्मने नमः ।
महेश्वर बोले—आप परम बुद्धिमान् भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। अच्युत देव ! जिनके प्रकाशसे ही यह सारा जगत् सदा प्रकाशित होता है, उन सूर्यरूप आप भगवान्को नित्य बारंबार नमस्कार है ॥ २ ॥
यः शीतयति शीतांगुर्लोकान् सर्वानिमान् विभुः ॥ ३ ॥
नमस्ते विष्णवे देव नित्यं सोमात्मने नमः ।
देव ! जो शीतरश्मि भगवान् चन्द्रमा इन सम्पूर्ण लोकोंको शीतलता प्रदान करते हैं, उन सोमरूप आप श्रीहरिको नित्य नमस्कार है ! नमस्कार है ॥ ३ ॥
यः प्रजाः प्रीणयत्येको विश्वात्मा भूतभावनः ॥ ४ ॥
नमः सर्वात्मने देव नमो वागात्मने हरे ।
देव ! हरे ! जो एकमात्र विश्वात्मा भूतभावन भगवान् समस्त प्रजाको तृप्ति प्रदान करते हैं, उन सर्वरूप और वाणीस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ४ ॥
यो दधार करेणासौ कुशचीरादि यत् सदा ॥ ५ ॥
दधार वेदान् सर्वांश्च तुभ्यं ब्रह्मात्मने नमः ।
जो सदा अपने हाथसे कुश, चीर आदि धारण करते हैं