भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1039

भविष्यपर्व.] अष्टाशीतितमोऽध्यायः १०१३


उसके रूपमें आप ही परिणामको प्राप्त होकर उसके अधिष्ठाता बने रहते हैं ॥ १९-२० ॥

तस्मात्तु महतो घोरादहंकारो महानभूत् ।
स त्वमादौ जगन्नाथ परिणामस्तथा हि सः ॥ २१ ॥

उस घोर महान् (महत्तत्त्व) से महान् (समष्टिभूत) अहङ्कार प्रकट हुआ। जगन्नाथ! आदिकालमें प्रकट हुआ वह महत्तत्त्वका वैसा (अहंकारात्मक) परिणाम आप ही हैं ॥

अहंकारात् प्रभो देव कारणानि महान्ति च ।
तन्मात्राणि तथा पञ्च भूतानि प्रभवन्त्युत ॥ २२ ॥

प्रभो! देव! अहङ्कारसे 'तन्मात्र' नामक महान् कारण उत्पन्न हुए, जिनसे पञ्च महाभूतोंका प्राकट्य हुआ है ॥ २२ ॥

तानि त्वामाहुरीशानं भूतानीह जगत्पते ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ २३ ॥

जगत्पते! इस जगत्में जो वे पाँचों महाभूत हैं, उन्हें भी आप सर्वेश्वरका ही स्वरूप बताते हैं। उनके नाम ये हैं- पृथिवी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ भूत अग्नि ॥ २३ ॥

चक्षुर्घाणं तथा स्पर्शो रसनं श्रोत्रमेव च ।
मनः षष्ठं तथा देव प्रेरकं तत्र तत्र ह ॥ २४ ॥

देव! नेत्र, नासिका, त्वचा, रसना और कान—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन्हींके साथ छठा मन है, जो उन इन्द्रियोंको विभिन्न विषयोंमें जानेके लिये प्रेरित करता है ॥ २४ ॥

कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि वागादीनि जनार्दन ।
त्वमेव तानि सर्वाणि करोषि नियतात्मवान् ॥ २५ ॥
स्वेषु स्वेषु जगन्नाथ विषयेषु तथा हरे ।
निवेशयसि देवेश योग्यामिन्द्रियपद्धतिम् ॥ २६ ॥

जनार्दन! वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ और हैं। जगन्नाथ! हरे! अपने मनको संयममें रखनेवाले आप परमात्मा ही उन सब इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंमें नियुक्त करते हैं। देवेश्वर! आप ही योग्य इन्द्रिय-मार्गकी स्थापना करते हैं ॥ २५-२६ ॥

यदा त्वं रजसा युक्तस्तदा भूतानि सृष्टवान् ।
यदा च सत्त्वयुक्तोऽसि तदा पाता जगत्त्रयम् ॥ २७ ॥
यदा त्वं तमसाऽऽकृष्टस्तदा संहरसे जगत् ।

जब आप रजोगुणसे संयुक्त हुए, तब आपने समस्त प्राणियोंकी सृष्टि की। जब आप सत्त्वगुणसे युक्त होते हैं, तब तीनों लोकोंका पालन करते हैं और जब तमोगुणसे आकृष्ट होते हैं, तब जगत्का संहार करते हैं ॥ २७½ ॥

त्रिभिरेव गुणैर्युक्तः सृष्टिरक्षाविनाशने ॥ २८ ॥
धत्तसे त्रिविधां भूतिमादाय नियतात्मवान् ।

इस प्रकार आप नियतात्मा परमेश्वर तीनों ही गुणोंसे युक्त होकर अपनी त्रिविध ऐश्वर्य (शक्ति) को साथ रखते हुए सृष्टि, रक्षा और संहारके कार्यमें सदा संलग्न रहते हैं ॥

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नियोजयसि माधव ॥ २९ ॥
प्राणिनामुपभोगार्थमन्तः स्थित्वा जगद्गुरो ।
तस्मात् सर्वत्र भूतेषु वर्तते सर्वभोगवान् ॥ ३० ॥

माधव! जगद्गुरो! आप प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित होकर उनके उपभोगके लिये इन्द्रियोंको विषयोंमें लगाते हैं। इसलिये सम्पूर्ण भूतोंमें आप ही समस्त भोगोंसे सम्पन्न हैं ॥

ब्रह्मा त्वं सृष्टिकाले तु स्थितौ विष्णुरसि प्रभो ।
संहारे रुद्रनामासि त्रिधामा त्वमसि प्रभो ॥ ३१ ॥

प्रभो! सृष्टिकालमें आप ही ब्रह्मा हैं, पालनकालमें विष्णु कहलाते हैं तथा संहारकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं। भगवन्! इस प्रकार आप तीन धामवाले हैं ॥ ३१ ॥

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
एताः प्रकृतयो देव भिन्नाः सर्वत्र ते हरे ॥ ३२ ॥

हरे! देव! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि (और अहङ्कार)—ये सर्वत्र उपलब्ध होनेवाली आठ भिन्न-भिन्न प्रकृतियाँ आपकी ही हैं ॥ ३२ ॥

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
सहस्रधारः साहस्त्री सहस्रात्मा दिवस्पतिः ॥ ३३ ॥

आप सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित विराट् पुरुष हैं। आपके सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं, धारण करनेवाली भुजाएँ भी सहस्रों हैं। आपकी सभी वस्तुएँ सहस्रोंकी संख्यामें सुशोभित होती हैं। आपके सहस्रों रूप हैं और आप ही स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्र हैं ॥ ३३ ॥

भूमिं सर्वामिमां प्राप्य सप्तद्वीपां ससागराम् ।
अणुः सर्वत्रगो भूत्वा अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ॥ ३४ ॥

सातों द्वीपों और समुद्रोंसे युक्त इस सारी पृथ्वीको व्याप्त करके आप सूक्ष्म एवं सर्वव्यापी होकर इस ब्रह्माण्डसे दस अङ्गुल ऊपर उठे हुए हैं ॥ ३४ ॥

त्वमेवेदं जगत् सर्वं यद् भूतं यद् भविष्यति ।
त्वत्तो विराट् प्रादुर्भूतः सम्राट् चैव जनार्दन ॥ ३५ ॥

जो हुआ है और जो होनेवाला है, वह यह सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं। जनार्दन! आपसे ही विराट् और सम्राट् (विराटके अधिष्ठाता पुरुष) की उत्पत्ति हुई है ॥ ३५ ॥

तव वक्त्राज्जगन्नाथ ब्राह्मणो लोकरक्षकः ।
प्रादुरासीत् पुराणात्मन् षट्कर्मनिरतः सदा ॥ ३६ ॥

पुराणात्मन्! जगन्नाथ! आपके मुखसे यजन-याजन आदि छः कर्मोंमें सदा तत्पर रहनेवाला लोकरक्षक ब्राह्मण प्रकट हुआ है ॥ ३६ ॥