विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०१२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
पुत्रो दत्तो मया देव पूर्वमेव जगत्पते। शृणु तत्रापि भगवन् कारणं कारणात्मक ॥ ५ ॥ 'हरे ! आप स्वयं नित्य-स्वरूप भगवान् विष्णु हैं, तपस्याओंकी भी तपस्या हैं। देव ! जनार्दन ! जगत्पते ! यदि आपकी यह तपस्या पुत्रके लिये हो रही है तो मैंने पहलेसे ही आपको पुत्र दे रखा है। देव ! भगवन् ! कारणात्मक नारायण ! इसमें जो कारण है, उसे आप सुनिये ॥ ४-५ ॥
तपश्चर्तुं प्रवृत्तोऽहं कुतश्चित् कारणाद्धरे । वर्षायुतं महाघोरं पुरा कृतयुगे तदा ॥ ६ ॥ 'हरे ! प्राचीन कालके कृतयुगकी बात है कि मैं उन दिनों किसी कारणवश दस हजार वर्षोंके लिये महाघोर तपस्यामें संलग्न हुआ था ॥ ६ ॥
भवानी तत्र मे देव परिचर्तुं तदाभवत् । पित्रा नियुक्ता देवेश उमैषा वरवर्णिनी ॥ ७ ॥ 'देव ! देवेश्वर ! उस समय वहाँ यह मेरी धर्मपत्नी परम सुन्दरी उमा अपने पिताकी आज्ञासे मेरी सेवा करती थी ॥
भीत इन्द्रस्तदा देव मारं मां प्रैषयत्तदा । मधुना सह संयुक्तो मारो मामागतस्तदा ॥ ८ ॥ 'देव ! मेरी उस तपस्यासे इन्द्रको भय हुआ, अतः उस समय उन्होंने कामदेवको मेरे पास भेजा। तब कामदेव अपने सखा वसन्तको साथ लेकर मेरे समीप आया ॥ ८ ॥
लक्ष्यं मामकरोत् तत्र बाणस्य प्रेषितस्य ह। एष मां सेवते तत्र दानात्पुष्पादिनां हरे ॥ ९ ॥ 'हरे ! वहाँ पहुँचते ही कामदेवने मुझे अपने चलाये हुए बाणका निशाना बनाया। यह पार्वती वहाँ फूल आदि जुटाने-के द्वारा मेरी सेवा करती थी ॥ ९ ॥
ततः क्रुद्धोऽहमभवं दृष्ट्वा मारं तथाविधम् । क्रुद्धवतो मम देवेश नेत्रादग्निः पपात ह ॥ १० ॥ 'देवेश्वर ! कामदेवको अपने ऊपर बाण चलाते देख मैं उसके ऊपर कुपित हो उठा। क्रोध करनेपर मेरे ललाटस्थ नेत्रसे सहसा अग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १० ॥
सोऽयमग्निस्तदा मारं भस्मसात् कृतवान् हरे । अचिन्तयं तदा विष्णो शक्रस्यैतच्चिकीर्षितम् ॥ ११ ॥ 'सर्वव्यापी हरे ! उस अग्निने उस समय कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया, तब मेरे ध्यानमें यह बात आयी कि यह सारी करतूत इन्द्रकी थी ॥ ११ ॥
ततः प्रभृति देवेश दया तं प्रति वर्तते। ब्रह्मणा च नियुक्तोऽस्मि प्रीतस्तत्र जनार्दन ॥ १२ ॥ 'देवेश्वर ! जनार्दन ! तभीसे कामदेवके प्रति मुझे बड़ी दया आती है। मैं मन-ही-मन उसपर प्रसन्न हूँ। ब्रह्माजीने भी मुझे प्रेरित किया है कि मैं उसके लिये नूतन शरीर-धारणका अवसर दूँ ॥ १२ ॥
नियुक्तः पुत्ररूपेण स ते देव जगत्पते। ज्येष्ठस्त्वं सुतो देव प्रद्युम्नेत्यभिविश्रुतः ॥ १३ ॥ स्मरं तं विद्धि देवेश नात्र कार्या विचारणा । 'देव ! जगत्पते ! अतः मैंने कामदेवको आपके पुत्र-रूपसे नियुक्त किया है। देव ! वह प्रद्युम्न नामसे विख्यात आपका ज्येष्ठ पुत्र होगा। देवेश्वर ! आप उसे कामदेव ही समझें, इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है' ॥ १३३॥
इत्युक्त्वा पुनराहेदं याथात्म्यं दर्शयन्निव ॥ १४ ॥ मुनीनां श्रोतुकामाનાં याथात्म्यं तत्र सत्तमः। अञ्जलिं सम्पुटं कृत्वा विष्णुमुद्दिश्य शंकरः ॥ १५ ॥ उमया सार्धमीशानो याथात्म्यं वक्तुमर्हत। ऐसा कहकर श्रीहरिके यथार्थ स्वरूपको सुननेकी इच्छा-वाले मुनियोंके समक्ष उनके यथावत् स्वरूपका परिचय देते हुए-से सत्पुरुषशिरोमणि सर्वेश्वर भगवान् शङ्कर उमादेवीके साथ श्रीकृष्णके लिये हाथ जोड़कर फिर इस प्रकार बोलने-उनकी यथार्थताका प्रतिपादन करनेको उद्यत हुए ॥
हरे कुर्वन्ति तत्रैवमञ्जलिं कुरुसत्तम ॥ १६ ॥ मुनयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह किन्नराः। अञ्जलिं चक्रिरे विष्णौ देवदेवेश्वरे हरौ ॥ १७ ॥ कुरुश्रेष्ठ ! वहाँ महादेवजीके इस प्रकार हाथ जोड़नेपर दूसरे-दूसरे मुनि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा किन्नरोंने भी उन सर्वव्यापी देवदेवेश्वर श्रीहरिके समीप हाथ जोड़ लिये ॥
महेश्वर उवाच
यत्तत् कारणमाहुस्तत् सांख्याः प्रकृतिसंज्ञकम्! ततो महान् समुत्पन्नः प्रकृतिर्यस्य कारणम् ॥ १८ ॥ महेश्वर बोले—सांख्यशास्त्रके विद्वान् जिस प्रकृति-संज्ञक कारणतत्त्वका वर्णन करते हैं, उससे 'महान्' (मह-त्तत्त्व या समष्टि बुद्धि) उत्पन्न हुआ, जिसका उपादान कारण प्रकृति है ॥ १८ ॥
त्रिधा भूतं जगद्योनिं प्रधानं कारणात्मकम् । सत्त्वं रजस्तमो विष्णो जगदण्डं जनार्दन ॥ १९ ॥ तस्य कारणमाहुस्त्वां सांख्यप्रकृतिसंज्ञकम् । तद्रूपेण भवान् विष्णो परिणम्याधितिष्ठति ॥ २० ॥ सर्वव्यापी जनार्दन ! कारणस्वरूप जो प्रधान (प्रकृति) है, वही इस जगत्की योनि है। उसके तीन भेद हैं—सत्त्व, रज और तम। इस त्रिगुणमयी प्रकृतिसे ही यह विश्व ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। इसका कारणभूत जो सांख्य-प्रकृति है, उसे विद्वान् पुरुष आपका ही स्वरूप बताते हैं । विष्णो !