विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1037, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [ १०११
नमस्ते शक्तियुक्ताय नागपाशप्रियाय च।
विरूपाय सुरूपाय भद्रपानप्रियाय च॥ ३०॥
आप शक्तिसे संयुक्त, नागपाशको पसंद करनेवाले, विरूप एवं सुन्दर रूप धारण करनेवाले तथा मद्यपान (मङ्गलकारी पेय रस) के प्रेमी हैं, आपको नमस्कार है॥ ३०॥
श्मशानरतये नित्यं जयशब्दप्रियाय च।
खरप्रियाय खर्वाय खराय खररूपिणे॥ ३१॥
आप श्मशानभूमिमें प्रसन्नताका अनुभव करते हैं, जय-जयकारका शब्द आपको सदा ही प्रिय है, खर नामक राक्षस आपकी प्रीतिका पात्र था, आपका स्वरूप खर्व (नाटा) है, आप खर (तीव्र या कर्कश स्वभाववाले) हैं, खर (गर्दभ या राक्षस) आपका ही रूप है, आपको नमस्कार है॥ ३१॥
भद्रप्रियाय भद्राय भद्ररूपधराय च।
विरूपाय सुरूपाय महाघोराय ते नमः॥ ३२॥
आपको माङ्गलिक वस्तु प्रिय है, आप मङ्गलमय हैं, मङ्गलरूपधारी हैं, विरूप, सुन्दर रूपवाले तथा महाभयंकर हैं, आपको नमस्कार है॥ ३२॥
घण्टाय घण्टभूषाय घण्टभूषणभूषिणे।
तीव्राय तीव्ररूपाय तीव्ररूपप्रियाय च॥ ३३॥
आप घण्टारूप हैं, घण्टासे विभूषित हैं और घण्टायुक्त भूषण धारण करते हैं। आप तीव्र हैं, तीव्र रूपधारी हैं तथा तीव्र रूपवाले पदार्थ आपको विशेष प्रिय हैं, आपको नमस्कार है॥ ३३॥
नग्नाय नग्नरूपाय नग्नरूपप्रियाय च।
भूतावास नमस्तुभ्यं सर्वावास नमो नमः॥ ३४॥
आप नग्न हैं, नग्नरूपधारी हैं तथा नग्नरूपवाले आपको विशेष प्रिय हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंके आवासस्थान हैं, आपको नमस्कार है। सबके आश्रयभूत महेश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ३४॥
नमः सर्वात्मने तुभ्यं नमस्ते भूतिदायक।
नमस्ते वामदेवाय महादेवाय ते नमः॥ ३५॥
आप सर्वात्माको नमस्कार है। ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले रुद्रदेव! आपको नमस्कार है। आप वामदेव हैं, आपको नमस्कार है। आप महादेव हैं, आपको नमस्कार है॥ ३५॥
का नु वाक्स्तुतिरूपा ते को नु स्तोतुं प्रशक्नुयात्।
कस्य वा स्फुरते जिह्वा स्तुतौ स्तुतिमतां वर॥ ३६॥
भला कौन ऐसी वाणी है, जो आपकी स्तुतिके अनुरूप होगी (आपकी महिमा वाणीकी पहुँचसे बाहर है)? कौन पुरुष आपकी स्तुति कर सकता है? स्तुतिमानों (स्तवनीय महापुरुषों) में श्रेष्ठ महेश्वर! किसकी जिह्वा आपकी स्तुतिके लिये सचेष्ट हो सकती है?॥ ३६॥
क्षमस्व भगवन् देव भक्तोऽहं त्राहि मां हर।
सर्वात्मन् सर्वभूतेश त्राहि मां सततं हर॥ ३७॥
रक्ष देव जगन्नाथ लोकान् सर्वात्मना हर।
त्राहि भक्तान् सदा देव भक्तप्रिय सदा हर॥ ३८॥
भगवन्! महादेव! मेरा अपराध क्षमा कीजिये। हर! मैं आपका भक्त हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। सर्वात्मन्! सर्वभूतेश्वर हर! आप निरन्तर मेरा संरक्षण करें। देव! जगन्नाथ! हर! आप सम्पूर्ण लोकोंका सब प्रकारसे संरक्षण करें। देव! सदा अपने भक्तोंसे प्रेम करनेवाले हर! भक्तजनोंकी सदा रक्षा कीजिये॥ ३७-३८॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां विष्णुकृतेश्वरस्तुतौ सप्ताशीतितमोऽध्यायः॥ ८७॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकृत महादेवस्तुतिविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८७॥
अष्टाशीतितमोऽध्यायः
भगवान् शिवद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति
वैशम्पायन उवाच
ततो वृषध्वजो देवः शूली साक्षादुमापतिः।
करं करेण संस्पृश्य विष्णोश्चक्रधरस्य ह॥ १॥
प्रोवाच भगवान् रुद्रः केशवं गरुडध्वजम्।
शृण्वतां सर्वदेवानां मुनीनां भावितात्मनाम्॥ २॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले देवता, त्रिशूलधारी साक्षात् उमावल्लभ भगवान् रुद्र चक्रधारी श्रीकृष्णका हाथ अपने हाथमें लेकर समस्त देवताओं तथा पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके सुनते हुए गरुड़ध्वज केशवसे इस प्रकार बोले—॥ १-२॥
किमिदं देवदेवेश चक्रपाणे जनार्दन।
तपश्चर्या किमर्थं ते प्रार्थना तव का विभो॥ ३॥
‘देवदेवेश्वर! चक्रपाणे! जनार्दन! आप यह क्या कर रहे हैं? आपकी यह तपश्चर्या किसलिये हो रही है? प्रभो! आपकी प्रार्थना क्या है?॥ ३॥
स्वयं विष्णुर्भवान् नित्यस्तपस्त्वं तपसां हरे।
पुत्रार्थे यदि ते देव तपश्चर्या जनार्दन॥ ४॥