भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1035, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1035

भविष्यपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः [ १००९


सप्ताशीतितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णद्वारा महादेवजीकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

एवं बहुविधैर्भूतैः पिशाचैरुरागैः सह।
आगत्य भगवान् रुद्रः शंकरो वृषवाहनः ॥ १ ॥
ददर्श विष्णुं देवेशं तपन्तं तप उत्तमम्।
जुह्वानमग्निं विधिवद् द्रव्यैर्मेध्यैर्जगत्पतिम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस तरह नाना प्रकारके भूतों, पिशाचों और सर्पोंके साथ आकर सबका कल्याण करनेवाले वृषभवाहन भगवान् रुद्रने उत्तम तपस्या करते हुए देवेश्वर विष्णु (कृष्ण) को देखा। वे जगदीश्वर श्रीकृष्ण भाँति-भाँतिके पवित्र द्रव्योंद्वारा विधिपूर्वक अग्निमें आहुति देते थे ॥ १-२ ॥

गरुडाहृतकाष्ठं तु जटिलं चीरवाससम्।
चक्रेणानीतकुसुमं खड्गानीतकुशं तथा ॥ ३ ॥
गदाकृतसमाचारं देवदेवं जनार्दनम्।
इन्द्राद्यैर्देवसंघैश्च वृतं मुनिगणैः सह ॥ ४ ॥

वे सिरपर जटा और अङ्गोंमें चीर वस्त्र धारण किये बैठे थे। गरुड़जी उनके लिये समिधा ला देते थे, चक्र फूल चुन लाता था, खड्ग कुशा लाया करता था तथा गदा भी उन देवाधिदेव जनार्दनकी आवश्यक परिचर्या करती थी। वे इन्द्र आदि देवसमूहों तथा मुनिगणोंसे घिरे हुए थे ॥ ३-४ ॥

अचिन्त्यं सर्वभूतानां ध्यायन्तं किमपि प्रभुम्।
अवरुह्य वृषाच्छर्वो भगवान् भूतभावनः ॥ ५ ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा ललाटाक्ष उमापतिः।

समस्त प्राणियोंके लिये अचिन्त्य वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी अनिर्वचनीय ध्येय वस्तुका चिन्तन कर रहे थे। उन्हें देखते ही ललाटनेत्रधारी, प्रसन्नचित्त, उमावल्लभ, भूतभावन भगवान् शर्व अपने वाहन वृषभसे उतर पड़े। उस समय वे बड़े प्रसन्न थे ॥ ५ ॥

ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसा गुह्यकास्तथा ॥ ६ ॥
मुनयो विप्रवर्याश्च जयशब्दं प्रचक्रिरे।
जय देव जगन्नाथ जय रुद्र जनार्दन ॥ ७ ॥

तदनन्तर भूत, पिशाच, राक्षस, गुह्यक तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ मुनिगण वहाँ जय-जयकार करने लगे—'देव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। रुद्रस्वरूप जनार्दन ! आपकी जय हो ॥ ६-७ ॥

जय विष्णो हृषीकेश नारायण परायण।
जय रुद्र पुराणात्मन्नजय देव हरेश्वर ॥ ८ ॥

'इन्द्रियोंके प्रेरक, सर्वव्यापी, नारायण ! आपकी जय हो। सबको आश्रय देनेवाले रुद्रदेव ! आपकी जय हो ! पुराणात्मन् ! देव ! हरेश्वर ! आपकी जय हो ॥ ८ ॥

आदिदेव जगन्नाथ जय शंकर भावन।
जय कौस्तुभदीप्ताङ्ग जय भस्मविराजित ॥ ९ ॥

'आदिदेव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। शङ्कर ! सबके पालक एवं उत्पादक देव ! आपकी जय हो। कौस्तुभमणिसे उद्भासित अङ्गवाले नारायण ! आपकी जय हो। भस्ममय अङ्गरागसे विराजमान शिव ! आपकी जय हो ॥ ९ ॥

जय चक्रगदापाणे जय शूलित्रिलोचन।
जय मौक्तिकदीप्ताङ्ग जय नागविभूषण ॥ १० ॥

'हाथोंमें चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायण ! आपकी जय हो। शूलधारी त्रिलोचन ! आपकी जय हो। मोतियोंकी मालासे उद्भासित अङ्गवाले श्रीकृष्ण ! आपकी जय हो। नागहारसे विभूषित महादेव ! आपकी जय हो' ॥

इति ते मुनयः सर्वे प्रणामं चक्रिरे हरिम्।
तत उत्थाय भगवान् दृष्ट्वा देवमवस्थितम् ॥ ११ ॥
वृषध्वजं विरूपाक्षं शंकरं नीललोहितम्।
ततो हृष्टमना विष्णुस्तुष्टाव हरमीश्वरम् ॥ १२ ॥

इस प्रकार स्तुति करके उन समस्त मुनियोंने वहाँ श्रीहरिको प्रणाम किया। उस समय वृषभध्वज, विरूपाक्ष, एवं नीललोहित रूपवाले पापहारी, ईश्वर, शङ्करदेवको वहाँ उपस्थित देख श्रीकृष्णका चित्त हर्षसे खिल उठा और उन्होंने महादेवजीकी स्तुति आरम्भ की ॥ ११-१२ ॥

श्रीभगवानुवाच

नमस्ते शितिकण्ठाय नीलग्रीवाय वेधसे।
नमस्ते शोचिषे अस्तु नमस्ते उपवासिने ॥ १३ ॥

श्रीभगवान् बोले—जिनके कण्ठमें हालाहल विष है, अतएव जो नीलग्रीव (नीलकण्ठ) कहे गये हैं। वेधा (जगत्के स्रष्टा), दीप्तिमान् तथा उपवास-व्रतमें तत्पर उन महादेवजीको नमस्कार है ॥ १३ ॥

नमस्ते मीडुषे अस्तु नमस्ते गदिने हर।
नमस्ते विश्वतनवे वृषाय वृषरूपिणे ॥ १४ ॥

हर ! आप सेचन करनेमें समर्थ हैं, आपको नमस्कार है। आप गदाधारी हैं, आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है, आपको नमस्कार है। आप वृषभरूपधारीधर्म हैं, आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥

अमूर्ताय च देवाय नमस्तेऽस्तु पिनाकिने।
नमः कुञ्जाय कूपाय शिवाय शिवरूपिणे ॥ १५ ॥

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