विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1031, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १००६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णके समीप इन्द्र आदि देवताओं तथा उमासहित भगवान् शिवका आगमन
वैशम्पायन उवाच
तत इन्द्रः स्वयं तत्र आरुह्य गजमुत्तमम्।
द्रष्टुं सर्वेश्वरं विष्णुं तपस्यन्तं समाययौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर साक्षात् इन्द्र अपने उत्तम हाथी ऐरावतपर आरूढ़ हो तपस्यामें लगे हुए सर्वेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये ॥ १ ॥
ततो यमस्तु भगवानारुह्य महिषं वरम्।
किंकरैश्च स्वयं साक्षादाययौ नगमुत्तमम् ॥ २ ॥
इसके बाद साक्षात् भगवान् यम श्रेष्ठ महिषपर आरूढ़ हो अपने किङ्करोंके साथ उस उत्तम पर्वतपर आये ॥ २ ॥
प्रचेता हंसमारुह्य वारुणैश्च समन्वितः।
श्वेतच्छत्रसमायुक्तः श्वेतव्यजनवीजितः ॥ ३ ॥
श्वेत छत्रसे युक्त वरुण हंसपर आरूढ़ हो अपने सेवकोंके साथ वहाँ पधारे। उनके सेवक श्वेत चँवरसे उनके लिये हवा कर रहे थे ॥ ३ ॥
ययौ कैलासशिखरं द्रष्टुं केशवमञ्जसा।
अन्ये चापि तथा देवा आदित्या वसवस्तथा ॥ ४ ॥
रुद्राश्चैव तथा राजन् द्रष्टुं केशवमाययुः।
वे वरुण भी तपस्वी केशवका दर्शन करनेके लिये कैलास-शिखरपर गये थे। राजन् ! इसी प्रकार दूसरे देवता आदित्य, वसु और रुद्र आदि भी केशवका दर्शन करनेके लिये वहाँ पधारे थे ॥ ४½ ॥
सिद्धाश्च मुनयश्चैव गन्धर्वा यक्षकिन्नराः ॥ ५ ॥
सर्वाश्चाप्सरसो राजन् नृत्यगीतविशारदाः।
राजन् ! सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा नृत्य और गीतमें निपुण समस्त अप्सराएँ भी वहाँ आयीं ॥ ५½ ॥
ततो देवगणः सर्वः कैलासं समपद्यत ॥ ६ ॥
पर्वतो नारदश्चैव तथान्ये मुनिसत्तमाः।
विस्मयस्थितलोलाक्षाः सर्वदेवगणास्तथा ॥ ७ ॥
आश्चर्यं खलु पश्यध्वं न भूतं न भविष्यति।
योगिध्येयः स्वयं कृष्णो यत् तप्यति गुरुः स्वयम्।
को न्वत्र समयो भूयादिति ते मेनिरे गणाः ॥ ८ ॥
इस प्रकार सब देवता कैलास पर्वतपर आये । पर्वत, नारद तथा अन्य श्रेष्ठ मुनि एवं समस्त देवता आश्चर्यसे चकित-नेत्र होकर परस्पर कहने लगे—'यह आश्चर्यकी बात देखो ! ऐसा न तो हुआ है और न होगा । जो योगियोंके ध्येय हैं, वे साक्षात् जगद्गुरु श्रीकृष्ण स्वयं ही तप कर रहे हैं। इस तपस्याका क्या उद्देश्य हो सकता है, इसपर वे सभी समुदायोंके लोग विचार करने लगे ॥ ६-८ ॥
ततः समाप्ते सकले जगत्पते-
र्व्रते समूले सकलेश्वरः शिवः।
द्रष्टुं हरिं लोकहितैषिणं प्रभुं
ययौ भवान्या सह भूतसंघैः ॥ ९ ॥
तदनन्तर जब जगत्पति श्रीकृष्णका वह सारा व्रत मूलसहित परिपूर्ण हो गया, तब सकलेश्वर शिव पार्वती तथा भूतगणोंके साथ उन लोकहितैषी प्रभु श्रीहरिसे मिलनेके लिये गये ॥ ९ ॥
सार्धं कुवेरेण सगृह्यकेन
सख्या प्रियेण प्रभुरीश्वरः शिवः।
स्वयं जटी भूतपिशाचसंवृतः
शरी च खड्गी शशिखण्डशेखरः ॥ १० ॥
उनके साथ गुह्यकोंसहित प्रिय सखा कुबेर भी थे। सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान् शिव स्वयं सिरपर जटा धारण किये भूतों और पिशाचोंसे घिरे हुए थे, धनुष, बाण और खड्गसे युक्त थे। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र शोभा दे रहा था ॥ १० ॥
करेण विभ्रत्सहदर्भकुण्डिकां
करेण साक्षादपरेण दीपिकाम्।
अन्येन विभ्रन्महतीं स डिण्डिमां
शूलं च विभ्रन्नपरेण बाहुना ॥ ११ ॥
गुणान् स रुद्राक्षकृतान् समुद्वह-
ञ्जटाभिरापिङ्गलताम्रमूर्तिः ।
विराजमानः प्रभुरिन्दुशेखरो
वृषेण युक्तः स सितेन शंकरः ॥ १२ ॥
एक हाथमें कुशसहित कमण्डलु धारण किये, दूसरे हाथमें जलती मशाल लिये, तीसरे हाथमें विशाल डमरू धारण किये और चौथे हाथमें त्रिशूल लिये, गलेमें रुद्राक्षकी मालाएँ धारण किये, कुछ-कुछ पिङ्गल एवं ताम्रवर्णके शरीरवाले, जटाओंसे सुशोभित कल्याणकारी भगवान् चन्द्रशेखर श्वेत वृषभसे संयुक्त हो बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ११-१२ ॥
उमास्तनद्वन्द्वसमर्पितानन-
स्तया समाश्लिष्य निपीडिताधरः।
गङ्गाम्बुविक्षालितचन्द्रशेखर-
स्तां चापि वीक्षन् बहुशस्तदा शिवः॥ १३ ॥
उनके मुख-मण्डलकी दृष्टि देवी उमाके उरोजोंपर लगी हुई थी। भगवती उमा भी महादेवजीका आलिङ्गन करके उनका अधर-चुम्बन कर लेती थीं। भगवान् शिवका चन्द्रार्ध-