विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1030, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . चतुरशीतितमोऽध्यायः . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . [ १००५
दिग्विजयसे विरत हो गया था, उस महाशैल कैलासपर आरूढ़ हो यदुकुलको आनन्दित करनेवाले देवकीनन्दन श्रीहरि मानससरोवरके उत्तर तटपर गये ॥ १३-१४॥
तपश्चर्तुं किल हरिर्विष्णुः सर्वेश्वरः शिवः।
जटी चीरी जगन्नाथो मानुषं वपुरास्थितः ॥ १५ ॥
तपसे धृतचित्तस्तु शुचौ भूमावुपाविशत् ।
वे सर्वेश्वर शिवस्वरूप विष्णु—हरि वहाँ तपस्या करनेके लिये गये थे। मानव-शरीरधारी जगन्नाथ श्रीकृष्ण सिरपर जटा और शरीरमें चीरवस्त्र धारण किये तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके पवित्र भूमिपर बैठे ॥ १५ ॥
अवरुह्य ततो यानाद् गरुडाद्वेदसम्मितात् ॥ १६ ॥
द्वादशाब्दं तपश्चर्तुं मनो दधे ततो हरिः।
इस प्रकार वेदस्वरूप गरुड़ नामक वाहनसे उतरकर श्रीहरिने वहाँ बारह वर्षोंतक तपस्या करनेका विचार किया ॥ १६ ॥
फाल्गुनेन तु मासेन समारेभे जगत्पतिः ॥ १७ ॥
शाकभक्ष्यः कृतजपो वेदाध्ययनतत्परः।
जगदीश्वर श्रीकृष्णने वहाँ फाल्गुन माससे तपस्या आरम्भ की। वे शाक खाकर रहते, जप करते तथा वेदाध्ययनमें तत्पर रहते थे ॥ १७ ॥
किमुद्दिश्य जगन्नाथस्तपश्चरति मानवः ॥ १८ ॥
तं न विद्मो यथाकामं दुर्ज्ञेयेश्वरचिन्तना ।
राजन्! मानवरूपधारी जगदीश्वर श्रीहरि किस उद्देश्यसे इच्छानुसार तप करते थे, इसे हम नहीं जानते (सर्वसमर्थ ईश्वरके लिये पुत्रके उद्देश्यसे भी तपस्याकी कोई सङ्गति नहीं है)। वास्तवमें ईश्वरका संकल्प प्राणिमात्रके लिये दुर्ज्ञेय है—वे क्या सोचकर कौन-सा कार्य करते हैं, यह जानना सभीके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ १८ ॥
तपस्यति तदा विष्णौ पर्वते भूतसेविते ॥ १९ ॥
गरुडः कश्यपसुत इन्धनानि समाचिनोत् ।
होमार्थं वासुदेवस्य चरतस्तप उत्तमम् ॥ २० ॥
भूतोंसे सेवित कैलास पर्वतपर उन दिनों श्रीकृष्णके तपस्या करते समय कश्यपकुमार गरुड़जी उत्तम तपमें लगे हुए उन वासुदेवके हवन-कर्मकी सिद्धिके लिये समिधाएँ जुटाया करते थे ॥ १९-२० ॥
चक्रराजोऽथ पुष्पाणि संचिनोति तदा हरेः।
दिक्षु सर्वासु सर्वत्र ररक्ष जलजस्तदा ॥ २१ ॥
खङ्ग आहृत्य यत्नेन कुशान् सुबहुशस्तदा ।
गदा कौमोदकी चैव परिचर्यां चकार ह ॥ २२ ॥
चक्रराज सुदर्शन श्रीहरिके लिये फूल चुनता था। पाञ्चजन्य शङ्ख सम्पूर्ण दिशाओंमें सर्वत्र उनकी रक्षा करता था। नन्दक खङ्ग बड़े यत्नसे बहुसंख्यक कुश लाया करता था। कौमोदकी नामक गदा भी उनकी आवश्यक परिचर्या किया करती थी ॥ २१-२२ ॥
धनुःप्रवरमत्युग्रं शाङ्कं दानवभीषणम् ।
स्थितं हि पुरतस्तस्य यथेष्टं भृत्यवत् स्वयम् ॥ २३ ॥
धनुषोंमें श्रेष्ठ अत्यन्त उग्र शार्ङ्ग नामक धनुष, जो दानवोंको भयभीत करनेवाला था, सदा भगवान्के सामने भृत्यके समान इच्छानुसार स्वयं खड़ा रहता था ॥ २३ ॥
जुहोति भगवान् विष्णुरेधोभिर्बहुभिः सदा ।
आज्यादिभिस्तदा हव्यैरग्निं सम्पूज्य माधवः ॥ २४ ॥
सप्तार्चिषः समाप्तिं च समस्तव्यस्ततः कृती ।
भगवान् श्रीकृष्ण सदा बहुत-सी समिधाओंद्वारा आहुति देते थे। उस समय कर्मकुशल माधवने घृत आदि हवनीय पदार्थोंद्वारा अग्निका पूजन करके संक्षेप और विस्तारके साथ अग्निहोत्र कर्मको पूर्ण किया ॥ २४ ॥
एकस्मिन्नेकदा मासे भुञ्जानो नियतात्मवान् ॥ २५ ॥
द्वितीये त्वथ पर्याये भुञ्जन्नेकेन केशवः ।
एकस्मिन् वत्सरे भुञ्जंस्तथैवैकेन केनचित् ॥ २६ ॥
पहले वे एक महीनेमें एक बार खाकर मनको संयम-नियममें रखते हुए तप करने लगे। फिर वे केशव प्रत्येक दूसरे महीनेपर एक बार अन्न ग्रहण करने लगे। इस तरह समय बढ़ाते हुए वे एक वर्षमें एक बार किसी एक ही अन्नका आहार करने लगे ॥ २५-२६ ॥
समाप्य तत् तपः सर्वमेवमेव जगत्पतिः ।
द्वादशाब्दे तथा पूर्णे ऊनमासे जगत्पतिः ॥ २७ ॥
जुह्वन्नग्निं समास्थाय पठन् मन्त्रं जनार्दनः ।
आरण्यकं पठन् विष्णुः साक्षात् सर्वेश्वरो हरिः ।
आस्ते ध्यानपरस्तत्र पठन् प्रणवमुत्तमम् ॥ २८ ॥
इसी नियमसे वह सारी तपस्या पूर्ण करके जब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेमें केवल एक मासकी कमी रह गयी, तब वे जगदीश्वर जनार्दन सर्वव्यापी साक्षात् सर्वेश्वर श्रीहरि अग्निकी स्थापना करके मन्त्रपाठपूर्वक हवन करने लगे। आरण्यकका पाठ और उत्तम प्रणवका जप करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें मग्न हो गये ॥ २७-२८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां कृष्णतपोवर्णने चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकी तपस्याका वर्णनविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥