भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1029

१०७४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

की आज्ञासे स्वर्गलोकको चला गया । अतः राजन् ! यदि तुम अपने मनकी शुद्धि चाहते हो तो सदा इस प्रसङ्गका पाठ करो । जगत्पते ! इसका पाठ करनेसे तुम्हारा मन निश्चय ही शुद्ध हो जायगा ॥ ३२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि घण्टाकर्णमुक्तिप्रदाने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें घण्टाकर्णको मुक्तिप्रदानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥


चतुरशीतितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका कैलासपर पहुँचकर वहाँ बारह वर्षोंके लिये कठोर तपस्यामें संलग्न होना

वैशम्पायन उवाच

ततः स भगवान् विष्णुर्मुनिभ्यस्तत्त्वमादितः ।
कथयामास यद् वृत्तं पिशाचस्य महात्मनः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने मुनियोंसे महात्मा पिशाचका जो वृत्तान्त था, उसको आरम्भसे ही ठीक-ठीक कह सुनाया ॥ १ ॥

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे विस्मयं परमं गताः ।
अहोऽस्य कर्मणः पाकस्तव संदर्शनादिति ॥ २ ॥

वह सुनकर सभी मुनियोंको बड़ा विस्मय हुआ । वे बोले—'प्रभो ! आपके दर्शनसे इस पिशाचके कर्मका अद्भुत फल प्रकट हुआ' ॥ २ ॥

अर्चितो मुनिभिः सर्वैः प्रीतः प्रीतिमनां प्रियः ।
ततः प्रभाते विमले सूर्ये चाभ्युदिते सति ॥ ३ ॥
आरुह्य गरुडं विष्णुर्ययौ कैलासमुत्तमम् ।
भवद्भिस्तत्र गन्तव्यमित्युक्त्वा मुनिसत्तमान् ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् प्रीतिमानोंके प्रियतम श्रीहरिकी उन समस्त मुनियोंने अर्चना की, इससे वे बड़े प्रसन्न हुए । फिर निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर वे भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो उत्तम कैलास पर्वतको चले गये । जाते समय वे उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कह गये कि आपलोग भी वहाँ पधारियेगा ॥ ३-४ ॥

यत्र विश्वेश्वराः सिद्धास्तपस्यन्ति यतव्रताः ।
यत्र वैश्रवणः साक्षादुपास्ते शंकरं सदा ॥ ५ ॥

जहाँ इस विश्वपर शासन करनेवाले सिद्ध पुरुष व्रतका पालन करते हुए तपस्या करते हैं, जहाँ साक्षात् कुबेर सदा भगवान् शङ्करकी उपासना करते हैं ॥ ५ ॥

यत्र तन्मानसं नाम सरो हंसालयं महत् ।
यत्र भृङ्गीरिटिर्देवमुपास्ते शंकरं शिवम् ॥ ६ ॥
गाणपत्यमवाप्याथ हरपार्श्वचरः सदा ।

जहाँ वह हंसोंका निवासस्थान मानस नामक महान् सरोवर है । जहाँ भृङ्गीरिटि नामक शिवपार्षद अपने आराध्य-देव कल्याणस्वरूप भगवान् शङ्करकी उपासना करते हैं और गणपतिपद प्राप्त करके सदा महादेवजीके पास ही रहते हैं ॥

यत्र सिंहा वराहाश्च द्विपद्वीपिमृगैः सह ॥ ७ ॥
क्रीडन्ति वन्यरतयः परस्परहिते रताः ।
यत्र नद्यः समुत्पन्ना गङ्गाद्याः सागरंगमाः ॥ ८ ॥

जहाँ सिंह, सूअर, हाथी, बाघ और मृग सदा साथ-साथ खेलते और एक दूसरेके हितमें तत्पर रहकर जंगलकी पैदावारपर ही संतोष करते हैं, जहाँ गङ्गा आदि समुद्र-गामिनी नदियाँ प्रकट हुई हैं ॥ ७-८ ॥

यत्र विश्वेश्वरः शम्भुरच्छिनद् ब्रह्मणः शिरः ।
यत्रोत्पन्ना महावेत्रा भूतानां दण्डतां ययुः ॥ ९ ॥

जहाँ विश्वनाथ भगवान् शङ्करने ब्रह्माजीके सिरका उच्छेद किया था, जहाँ उत्पन्न हुए बड़े-बड़े बेंत प्राणियोंके लिये दण्डका काम देते हैं ॥ ९ ॥

उमया यत्र सहितः शंकरो नीललोहितः ।
ऋषिभिः प्रार्थितः पूर्वं ददौ यत्र गिरिः सुताम् ॥ १० ॥
शंकराय जगद्धात्रे शिवाय जगतीपते ।

जहाँ उमासहित नीललोहित भगवान् शङ्कर निवास करते हैं । पृथ्वीनाथ ! जहाँ पूर्वकालमें ऋषियोंके प्रार्थना करनेपर गिरिराज हिमवान्ने कल्याणकारी जगद्धाता भगवान् शिवको अपनी पुत्री प्रदान की थी ॥ १०१/२ ॥

यत्र लेभे हरिश्चक्रमुपास्य बहुभिर्दिनैः ॥ ११ ॥
पुष्करैः शतपत्रैश्च नेत्रेण च जगत्पतिम् ।

जहाँ श्रीहरिने बहुत दिनोंतक कमलों, शतदलों तथा अपने नेत्रद्वारा भी जगदीश्वर शिवकी आराधना करके उनसे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था ॥ १११/२ ॥

गुहां यत्र समाश्रित्य क्रीडन्ते सिद्धकिन्नराः ॥ १२ ॥
प्रियाभिः सह मोदन्ते पिबन्ते मधु चोत्तमम् ।

जहाँ सिद्ध और किन्नरगण गुफाका आश्रय लेकर अपनी प्रियतमाओंके साथ क्रीडा करते, आनन्दित होते और उत्तम मधु पीते थे ॥ १२१/२ ॥

यमुद्यत्य भुजैः सर्वैः पौलस्त्यो विरराम ह ॥ १३ ॥
तमारुह्य महाशैलं देवकीनन्दनो हरिः ।
मानसस्योत्तरं तीरं जगाम यदुनन्दनः ॥ १४ ॥

जिस पर्वतको अपनी सारी भुजाओंसे उठाकर रावण