विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1028, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः [ १००३
अँगुलियाँ समान और सुन्दर हो गयीं। नख भी समान-रूपसे सुन्दर दिखायी देने लगे। उसके समान और सुडौल मुखमें केवल नासिका ऊँची थी। आँखें प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर दिखायी देती थीं। अङ्गकान्ति नील-कमलके समान श्याम थी। वह कमलकेसररूपी आभूषणोंसे विभूषित था ॥
केयूरी चाङ्गदी चैव कौशेयवसनस्तदा।
ज्ञानवान्सत्त्वसम्पन्नः साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ १८ ॥
उसकी भुजाओंमें केयूर और अङ्गद नामक आभूषण शोभा दे रहे थे। शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित था। वह ज्ञानवान् और सत्त्वसम्पन्न होकर साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान शोभा पाता था ॥ १८ ॥
गन्धर्व इव गायंस्तु सिद्धः सिद्ध इव स्वयम् ।
साक्षात् स्पृष्टं तदा विष्णोः करेण मृदुपूर्वकम् ॥ १९ ॥
न नूनं तादृशं रूपमासीत् कालान्तरेष्वपि।
अद्यापि नैव मुनयो लभन्ते तादृशं वपुः ॥ २० ॥
वह गन्धर्वके समान गायक तथा साक्षात् सिद्धके समान सिद्धियोंसे सम्पन्न था। उस समय साक्षात् भगवान् विष्णुके हाथका कोमल स्पर्श पाकर उस पिशाचका रूप जैसा अलौकिक हो गया था, वैसा रूप कालान्तरमें भी किसीका नहीं था और आज भी मुनियोंको भी वैसा शरीर नहीं प्राप्त होता है ॥
कृत्वा सुबहुशो घोरं तपः परमदारुणम् ।
यच्च लब्धं तदा तेन पिशाचेन नृपोत्तम ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस पिशाचने बारंबार घोर एवं परम दारुण तप करके उस समय जो दिव्य रूप प्राप्त किया, वह अद्भुत था ॥ २१ ॥
को नु नाम जगन्नाथमाश्रितः सीदते नृप ।
स हि सर्वत्र कल्याणो यो हि नित्यं जनार्दनम् ॥ २२ ॥
ध्यायन् पठञ्जपन् वापि तस्य किं नास्ति भूपते ।
नरेश्वर ! जगदीश्वर भगवान् जनार्दनका आश्रय लेकर कौन मनुष्य कष्ट पा सकता है। उसका सर्वत्र कल्याण ही होता है। भूपाल ! जो प्रतिदिन उन भगवान् विष्णुका ध्यान, स्तोत्रपाठ अथवा मन्त्रजप करता है, उसे कौन-सी वस्तु सुलभ नहीं है ॥ २२३ ॥
ततः प्रोवाच भगवान् स्थितं काममिवापरम् ॥ २३ ॥
अक्षयः स्वर्गवासस्ते यावदिन्द्रो वसिष्यति ।
तावत् स्वर्गी भवानस्तु शासनान्मम नान्यतः ॥ २४ ॥
तब दूसरे कामदेवके समान खड़े हुए घण्टाकर्णसे भगवान्ने इस प्रकार कहा—'जबतक इन्द्र रहेंगे, तबतक स्वर्गलोकमे तुम्हारा अक्षय निवास बना रहेगा। तबतक तुम मेरे शासनसे स्वर्गमें ही रहो, अन्यत्र नहीं ॥ २३-२४ ॥
नष्टे शक्रे ततः स्वर्गात् सायुज्यं मम गच्छतु ।
योऽयं भ्राता तव स्वर्गी यावदिन्द्रो भवेत् तदा ॥ २५ ॥
'इस इन्द्रके बदल जानेपर तुम स्वर्गसे ऊपर उठकर मेरा सायुज्य प्राप्त कर लोगे। यह जो तुम्हारा भाई है, यह भी जबतक इन्द्र रहेंगे, तबतक स्वर्गीय सुखका उपभोग करेगा ॥ २५ ॥
वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते।
दातास्मि सर्वं सर्वत्र नात्र कार्या विचारणा ॥ २६ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो ! तुम्हारे मनमें जो कामना हो उसके अनुसार कोई वर माँगो। मैं सर्वत्र सब कुछ दे सकता हूँ, इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये' ॥
घण्टाकर्ण उवाच
यश्चेमं संगमं देव संस्मरेन्नियतात्मवान् ।
भक्तिस्तस्याचला देव त्वयि भूयाज्जनार्दन ॥ २७ ॥
घण्टाकर्ण बोला—देव ! जनार्दन ! जो अपने मनको संयममें रखकर हम दोनोंके इस समागमके प्रसङ्गका स्मरण करे, उसकी आपके प्रति अविचल भक्ति हो ॥ २७ ॥
मनःशुद्धिर्भवेत् तस्य मा भूत् कालुष्यता हरे ।
कालुष्यं मनसस्तस्य मा भूदेष वरो मम ॥ २८ ॥
हरे ! उसके मनकी शुद्धि हो जाय, उसमें मलिनता न रह जाय। उस पुरुषके मनका सारा कालुष्य मिट जाय, यह मेरा वर है ॥ २८ ॥
एवमस्त्विति देवेशः स्वर्गं गच्छेति केशवः ।
इन्द्रातिथिर्भवानस्तु त्वां प्रतीक्ष्य हरिः स्थितः ॥ २९ ॥
यह सुनकर देवेश्वर केशवने कहा—'ऐसा ही होगा, अब तुम स्वर्गको जाओ, इन्द्रके अतिथि बनो, इन्द्रदेव तुम्हारी प्रतीक्षामें खड़े हैं' ॥ २९ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् कृष्ण उत्थाप्य ब्राह्मणं तदा ।
तेन स्तुतो जगन्नाथः पूजयित्वा च तं द्विजम् ॥ ३० ॥
ततो विसृज्य गोविन्दस्तस्माद् देशादुपागमत् ।
यत्र ते मुनयः सिद्धा अग्निहोत्रसमन्विताः ॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उस मरे हुए ब्राह्मणको जिलाकर उठा दिया, तब उस ब्राह्मणने उनका स्तवन किया, फिर वे जगदीश्वर गोविन्द उस ब्राह्मणका आदर-सत्कार करके उसे विदा दे, उस स्थानसे वहीं लौट गये, जहाँ वे सिद्ध मुनिगण अग्निहोत्रमें लगे हुए थे ॥ ३०-३१॥
स च स्वर्गी गतः स्वर्गमाज्ञया केशवस्य ह।
तस्मात् पठ सदा राजन् मनःशुद्धिं यदीच्छसि ।
मनश्च शुद्धं भवति पठतस्ते जगत्पते ॥ ३२ ॥
वह स्वर्गलोकका अधिकारी घण्टाकर्ण भगवान् श्रीकृष्ण-