विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1027, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१००२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
अट्टहास और यथाशक्ति नृत्य करके वह पिशाच तुरंत ही एक मारे गये ब्राह्मणका शव लेकर आया ॥ १ ॥
द्विधाकृत्य महाघोरं पिशितं केशशाड्वलम् । ततः खण्डं समादाय अद्भििरभ्युक्ष्य यत्नतः ॥ २ ॥ विधाय पात्रे सुशुभे नमस्कृत्य जनार्दनम् । इदं प्रोवाच देवेशं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥ ३ ॥
केशोंसे युक्त उस महाघोर मांसके दो टुकड़े करके एक टुकड़ेको लेकर उसने यत्नपूर्वक जलसे धोया, तत्पश्चात् उसे एक सुन्दर पात्रमें रखकर देवेश्वर जनार्दनको नमस्कार करके वह हाथ जोड़ प्रणतभावसे खड़ा हो गया और इस प्रकार बोला—॥ २-३ ॥
गृहाण मे जगन्नाथ भक्ष्यं योग्यं तव प्रभो । भवादृशैर्जगन्नाथ ग्राह्यं सर्वात्मना हरे ॥ ४ ॥
'जगन्नाथ ! प्रभो ! यह भक्ष्य आपके योग्य है । इसे ग्रहण कीजिये । जगदीश्वर ! हरे ! आप-जैसे प्रभुओंको भक्त-की यह भेंट सम्पूर्ण हृदयसे स्वीकार करनी चाहिये ॥ ४ ॥
भक्तिनम्रा वयं विष्णो नात्र कार्या विचारणा । दत्तं यद् भक्तिनम्रेण ग्राह्यं तत् स्वामिना हरे ॥ ५ ॥
'विष्णो ! हम भक्तिभावसे आपके प्रति विनम्र हैं, इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये । हरे ! भक्तिभावसे विनीत होकर सेवकने जो वस्तु अर्पित की है, उसे स्वामीको अवश्य ग्रहण करना चाहिये ॥ ५ ॥
नवं सुसंस्कृतं भक्ष्यं ब्राह्मण्यं शवमुत्तमम् । अस्माकं पिशिताशानां शास्त्रे नियतमेव हि ॥ ६ ॥
'यह तुरंतका मारा हुआ, संस्कारसम्पन्न, भक्षण करने योग्य, ब्राह्मणका उत्तम शव है । शास्त्रमें हम पिशाचोंके लिये इसके भोजनका विधान है ही ॥ ६ ॥
तस्माद् गृहाण भगवन् यदि दोषो न विद्यते । इत्युक्त्वा विकृतं भूयो विहस्य स तु कामतः ॥ ७ ॥ दातुमैच्छत् तदा खण्डमस्पृश्यं तु शवस्य ह ।
'अतः भगवन् ! यदि कोई दोष न हो तो आप इसे ग्रहण करें ।' ऐसा कहकर पुनः विकट अट्टहास करके उसने इच्छानुसार वह शवका न छूने योग्य टुकड़ा उस समय भगवान्को देनेकी इच्छा की ॥ ७॥
ततः प्रीतोऽभवत् तस्मै मनसापूजयच्च तम्॥ ८ ॥ अहोऽस्य स्नेहकारुण्यं मयि सर्वत्र वर्तते । इति संचिन्त्य मनसा प्रोवाच यदुपुङ्गवः ॥ ९ ॥
इससे भगवान् श्रीकृष्ण उसपर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'अहो ! इसके मनमें मेरे प्रति सर्वत्र स्नेह और करुणा विद्यमान है ।' मनमें ऐसा सोचकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने उससे कहा-॥
अलमेतेन सर्वत्र पिशाच पिशिताशन । अस्पृश्यं मादृशैरेतद् ब्राह्मण्यं शवमुत्तमम् ॥ १० ॥
'कच्चा मांस खानेवाले पिशाच ! सर्वत्र इस मांसका ही उपयोग या समर्पण व्यर्थ है । जिसे तुम ब्राह्मणका उत्तम शव बता रहे हो, यह मुझ-जैसे लोगोंके लिये छूने योग्य भी नहीं है ॥ १० ॥
ब्राह्मणः सर्वथा पूज्यो जन्तुभिर्धर्मकाङ्क्षिभिः । पिशाचा घोरकर्माणो यतन्ते ब्रह्महिंसने ॥ ११ ॥
'धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले जीवोंके लिये ब्राह्मण सर्वथा पूजनीय है । घोर कर्म करनेवाले पिशाच ही ब्राह्मणकी हिंसाके लिये प्रयत्न करते हैं ॥ ११ ॥
न हन्तव्याः सदा विप्रास्तद्धिंसा नरकावहा । तस्मादस्पृश्यमस्माभिर्नात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥
'ब्राह्मणोंकी हिंसा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह नरकमें ले जानेवाली है, अतः यह शव हमारे लिये सर्वथा अस्पृश्य है । इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥
भक्त्या प्रीतोऽस्मि भद्रं ते मनो निर्मलमेतया । मनःशुद्ध्यै कृतो यत्नस्ततःप्रीतोऽस्मि मांसप ॥ १३ ॥
'मांस खानेवाले पिशाच ! तुम्हारा भला हो । मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ; क्योंकि इससे मन निर्मल हो जाता है । तुमने मनःशुद्धिके लिये यत्न किया है । इसलिये मैं तुम-पर प्रसन्न हूँ ॥ १३ ॥
असत्संकीर्तनाच्छश्वच्छुद्धं हि करणं तव । अतीव मनसा प्रीत इत्युक्त्वा भगवान् हरिः ॥ १४ ॥ पस्पर्शाङ्गं तदा विष्णुः पिशाचस्याथ सर्वतः । करेण मृदुना देवः पापान्निर्मोचयन्हरिः ॥ १५ ॥
'मेरे नामोंका निरन्तर कीर्तन करनेसे तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हो गया । इसलिये मैं मनसे तुम्हारे ऊपर अधिक प्रसन्न हूँ ।' ऐसा कहकर भगवान् विष्णु हरिने उस समय अपने कोमल हाथसे उस पिशाचके सारे अङ्गोंका स्पर्श किया । ऐसा करके उन नारायणदेवने उसे पापसे मुक्त कर दिया ।१४-१५।
ततस्तस्याभवद् रूपं कामरूपसमप्रभम् । दीर्घकुञ्चितकेशाढ्यो दीर्घबाहुः सुलोचनः ॥ १६ ॥
उनके स्पर्श करते ही उस पिशाचका रूप कामदेवके समान कान्तिमान् हो गया । उसके सिरपर लंबे-लंबे घुँघराले केश शोभा देने लगे । भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र सुन्दर हो गये ॥ १६ ॥
समाङ्गुलिः समनखः समवक्त्रः समुन्नसः । पद्माक्षः पद्मवर्णाभः पद्मकेशरभूषणः ॥ १७ ॥