विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1026, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | त्र्यशीतितमोऽध्यायः | १००१ |
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'तत्पश्चात् कुवलयापीड नामक प्रचण्ड रूपवाले भयंकर हाथीको मारकर उसके दाँत हाथमें लिये उग्र पराक्रमी भगवान् केशव कंसको भय देते हुए रङ्गशालामें नाना प्रकारसे नृत्य करने लगे ॥ ३३ ॥
योऽसौ हत्वा महामल्लं चाणूरं निहतद्विषम् ।
यादवेभ्यो ददौ प्रीतिं कंसस्यैव तु पश्यतः ॥ ३४ ॥
'जिन्होंने शत्रुहन्ता चाणूर नामक महामल्लको कंसके सामने ही मारकर यादवोंको आनन्द प्रदान किया (वे ही ये श्रीहरि यहाँ उपस्थित हैं) ॥ ३४ ॥
जघान कंसं रिपुपक्षघातिनं
पितृद्विषं यादवनामधेयम् ।
संस्थाप्य राज्ये हरिरुग्रसेनं
सान्दीपनं काश्यमुपागतो यः ॥ ३५ ॥
'इसके बाद उन श्रीहरिने अपने पिताके साथ द्वेष रखनेवाले, शत्रुपक्षघाती, यादवनामधारी कंसको मार डाला और उसके राज्यपर उग्रसेनको स्थापित करके वे विद्याध्ययनके लिये उन सान्दीपनि मुनिके समीप गये, जिनका जन्म काश-गोत्र अथवा काशि-जनपदमें हुआ था (परंतु जो अवन्ती-पुरीमें रहते थे) ॥ ३५ ॥
विद्यामवाप्य सकलां दत्त्वा पुत्रं महामुनेः ।
साग्रजोऽथ जगामाशु मधुरां यादवीं पुरीम् ॥ ३६ ॥
'उनसे सम्पूर्ण विद्या पाकर उन महामुनिको उनका मरा हुआ पुत्र वापस दे वे बड़े भाई बलरामसहित शीघ्र ही यादवोंकी राजधानी मथुरापुरीको लौट गये ॥ ३६ ॥
हत्वा निशुम्भं नरकं महामतिः
कृत्वा स घोरं कदनं जनार्दनः ।
ररक्ष विप्रान् मुनिवीरसंघान्
देवांश्च सर्वाञ्जगतो जगत्पतिः ॥ ३७ ॥
'परम बुद्धिमान् जगत्पति जनार्दनने निशुम्भ और नरकासुरका वध करके राक्षसोंका घोर संहार मचाकर ब्राह्मणों, मुनिसमूहों, वीरसमुदायों, समस्त देवताओं तथा जगत्की रक्षा की ॥ ३७ ॥
स एष भगवान् विष्णुद्य दृष्टो जनार्दनः ।
कृतकृत्योऽस्मि संजातः सायुज्यं प्राप्तवानहम् ॥ ३८ ॥
'वे ही ये भगवान् विष्णु जनार्दन आज मुझे दिखायी दिये हैं। इनके दर्शनसे मैं कृतकृत्य हो गया। मुझे सायुज्य मोक्ष मिल गया ॥ ३८ ॥
येन दृष्टो हरिः साक्षात् तस्य मुक्तिः करे स्थिता ।
सोऽयमेष हरिः साक्षात् प्रत्यक्षमिह वर्तते ॥ ३९ ॥
'जिसने साक्षात् श्रीहरिका दर्शन कर लिया मुक्ति उसके हाथमें आ जाती है। यहाँ ये साक्षात् श्रीहरि प्रत्यक्ष विद्यमान हैं ॥ ३९ ॥
नूनं जन्मान्तरे पूर्वं धर्मः संचित एव मे ।
यस्य पाकः समुत्पन्नो येनासौ दृश्यते मया ॥ ४० ॥
'निश्चय ही पहले अन्य जन्मोंमें मेरे द्वारा धर्मका संचय भी हुआ ही है। जिसके फलका उदय हुआ है। जिससे मुझे इनका दर्शन प्राप्त हो रहा है ॥ ४० ॥
सर्वथा पुण्यवानस्मि नष्टसंसारबन्धनः ।
किमस्मै दीयते वस्तु किं नु वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।
करिष्ये किमहं विष्णो वदस्वाद्य यथेप्सितम् ॥ ४१ ॥
'मैं सर्वथा पुण्यात्मा हूँ, मेरे संसार-बन्धनका नाश हो गया। मैं इन्हें कौन-सी वस्तु उपहारके रूपमें दूँ तथा इस समय इनसे क्या कहूँ ? विष्णो ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? आपकी जैसी इच्छा हो, उसे आज प्रकट कीजिये' ॥ ४१ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा विस्तरं नादं ननर्द बहुशस्तदा ।
जहास विकृतं भूयो ननर्त पिशिताशनः ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर वह पिशाच बारंबार जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। उसने विकट अट्टहास किया, फिर वह नृत्य करने लगा ॥ ४२ ॥
नमो नमो हरे कृष्ण यादवेश्वर केशव ।
प्रत्यक्षं च हरेस्तत्र ननर्त विविधं नृप ॥ ४३ ॥
नरेश्वर ! वहीं भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही वह 'यादवेश्वर ! केशव ! कृष्ण ! हरे ! आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !!' ऐसा कहकर नाना प्रकारसे नृत्य करने लगा ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां घण्टाकर्णस्तुतौ द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें घण्टाकर्णद्वारा भगवान्की स्तुतिविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
घण्टाकर्णद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको उपहारसमर्पण, भगवान्का उसे वर देना और एक मरे हुए ब्राह्मणको जीवित करना
वैशम्पायन उवाच
विहस्य विकृतं भूयः प्रनृत्य च यथाबलम् ।
ब्राह्मणस्य हतस्याथ शवमादाय सत्वरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुनः विकट