विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1025, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १००० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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'जब कुछ बड़े हुए, तब दूध पीते हुए छिपकर दही और माखनके लोंदे खा जाते थे। तब एक दिन रोषमें भरी हुई मैया यशोदाने उन भगवान् विष्णुकी कमरमें दृढ़ता-पूर्वक रस्सी बाँध दी ॥ २१ ॥
ततश्च दाम्ना सुदृढेन बद्धो
जघान योऽसौ यमलार्जुनौ च ।
क्रीडन् हरिर्गोकुलवासवासी
गोपीभिरास्वाद्य मुखं स्तनं च ॥ २२ ॥
'उस सुदृढ़ बन्धनसे बँधे हुए उन दामोदरने जुड़वे अर्जुन नामक वृक्षोंको तोड़ डाला। गोकुलवासमें रहते हुए बाल-रूपधारी श्रीहरि गोपियोंके साथ खेलते हुए कभी उनका स्तन पीते और कभी मुखका आस्वादन कर लेते थे ॥ २२ ॥
वृन्दावने वसन् विष्णुर्गोपैर्गोकुलवासिभिः ।
तत्र हत्वा हयं राजन् विरराजांशुमानिव ॥ २३ ॥
'वृन्दावनमें गोकुलवासी गोपोंके साथ रहते हुए श्रीहरि वहाँ अश्वरूपधारी केशीका वध करके सूर्यके समान शोभा पाने लगे ॥ २३ ॥
यः क्रीडते नागफणौ जनार्दनो
निषेव्यमाणः सह गोपदारकैः ।
महाह्रदे नागपतिं जगत्पति-
र्ममर्द्द वीर्यातिशयं प्रदर्शयन् ॥ २४ ॥
'जो जगदीश्वर जनार्दन गोपबालकोंसे सेवित हो नागके फनोंपर क्रीडा करते थे तथा जिन्होंने अपने अतिशय पराक्रमका परिचय देते हुए यमुनाके महान् ह्रदमें नागराज कालियको रौंद डाला था (वे ही ये भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उपस्थित हैं) ॥ २४ ॥
यो धेनुकं तालवने तत्फलैः सममच्छिनत् ।
हत्वा दानवमुग्रं तं गोपान् विस्मापयत्यसौ ॥ २५ ॥
'जिन्होंने तालवनमें तालफलोंके साथ ही भयंकर दानव धेनुकासुरका उच्छेद कर डाला और उसका वध करके गोपोंको आश्चर्यमें डाल दिया (वे ही ये विष्णु यहाँ उपस्थित हैं) ॥ २५ ॥
दधार यो गोधरमुग्रपौरुषान्
महामतिर्मेघसमागमे सति ।
विडम्बयञ्छक्रबलं प्रमोदयन्
गोपांश्च गोपीश्च स गोकुलं हरिः ॥ २६ ॥
'जिन परम बुद्धिमान् श्रीहरिने संवर्तक मेघोंके घिर आनेपर अपने उग्र पुरुषार्थसे गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया और इन्द्रके बलकी विडम्बना करते हुए गोपों, गोपियों और गोकुलको आनन्दमग्न कर दिया (वे ये ही हैं) ॥
गोपीनां स्तनमध्ये तु क्रीडते काममीश्वरः।
योऽसौ पिवंस्तदधरं मायामानुषदेहवान् ॥ २७ ॥
'मायासे मनुष्यरूप धारण करनेवाले जो परमेश्वर श्रीहरि गोपियोंके वक्षःस्थलपर उनके अधरामृतका पान करते हुए इच्छानुसार क्रीडा करते थे (वे ये ही हैं।) ॥ २७ ॥
गोपीभिरास्वाद्य मुखं विविक्ते-
शेते स्म रात्रौ सुखमेव केशवः ।
स्तनान्तरेष्वेव तदा च तासां-
कामीव कान्ताधरपल्लवं पिबन् ॥ २८ ॥
'जो केशव रात्रिके समय वृन्दावनके एकान्त प्रदेशमें गोपियोंके साथ उनके मुखारविन्दका आस्वादन करते हुए सुखपूर्वक सोते थे और कामी पुरुषके समान कान्ता (प्रेयसी) के अधर-पल्लव-रसका पान करते हुए उन गोपाङ्गनाओंके वक्षःस्थलोंपर ही शयन करते थे (वे प्रभु ये ही हैं) ॥ २८ ॥
अक्रूरेण समाहूतस्तेन गच्छन् हि यामुने ।
जले यो ह्यर्चितस्तेन नागलोके स एव हि ॥ २९ ॥
'कंसके बुलानेपर अक्रूरजीके साथ जाते हुए जिन श्रीहरिका यमुनाजीके जलमें प्रकट हुए नागलोकमें पूजन किया गया था और अक्रूरने यह बात प्रत्यक्ष देखी थी, वे ही ये भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे हैं ॥ २९॥
ततश्च गच्छन् बलवान्जनार्दनो
हत्वा तमुग्रं रजकं बलात् पथि ।
हृत्वा च वस्त्राणि यथेष्टमीश्वरो
ययौ सरामो मथुरां पुरीं हरिः ॥ ३० ॥
'तत्पश्चात् मथुराके मार्गपर चलते हुए बलरामसहित सर्वसमर्थ बलवान् जनार्दन श्रीहरिने उस उग्र स्वभाववाले धोबीको बलपूर्वक मारकर उसके हाथसे वस्त्र छीन लिये और उन्हें धारण करके मथुरापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३० ॥
लब्ध्वा च दामानि बहूनि कामदो
दत्त्वा वरं माल्यकृते महन्तम् ।
लब्ध्वानुलेपं सुरभिं च यादवः
कुब्जां चकाराशु महाङ्गरूपाम् ॥ ३१ ॥
'आगे जाकर उन्हें बहुत-से फूलोंके हार प्राप्त हुए, तब इच्छानुसार वर देनेवाले उन यदुनाथने मालीको महान् वर प्रदान किया। फिर कुब्जासे सुगन्धित अनुलेप पाकर उन्होंने शीघ्र ही उसे परम सुन्दर रूपवती बना दिया ॥ ३१॥
योऽसौ चापं समादाय मध्ये छित्त्वा महद् धनुः।
सिंहनादं महाँश्चक्रे कल्पान्ते जलदो यथा ॥ ३२ ॥
'जिन्होंने कंसका विशाल धनुष हाथमें लेकर उसे बीचसे ही तोड़ डाला और प्रलयकालके महान् मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे सिंहनाद किया (वे ये ही हैं) ॥ ३२ ॥
हत्वा गजं घोरमुदग्ररूपं
विषाणमादाय ततोऽनु केशवः ।
ननर्त रङ्गे बहुरूपमीश्वरः
कंसस्य दत्त्वा भयमुग्रवीर्यः ॥ ३३ ॥