विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1024, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] | द्व्यशीतितमोऽध्यायः | ९९९
दंष्ट्राकरालः सुमहान् हत्वा यो दानवान् रणे।
निःशोकमखिलं लोकं चकारासौ जनार्दनः ॥ ८ ॥
'इन्हीं जनार्दनने विकराल दाढ़वाले महान् नृसिंह रूप होकर रणभूमिमें दानवोंको मारा और समस्त संसारको शोकरहित कर दिया ॥ ८ ॥
आदौ दधारैकभुजेन मन्दरं
निर्जित्य सर्वानसुरान् महार्णवे।
ददौ च शक्राय सुधामयं महान्
स एष साक्षादिह मामवस्थितः ॥ ९ ॥
'जिन्होंने आदिकालमें एक ही हाथसे मन्दराचलको धारण किया और महासागरके तटपर समस्त असुरोंको परास्त करके इन्द्रको अमृत प्रदान किया, वे ही ये साक्षात् महाविष्णु यहाँ मेरे निकट विराजमान हैं ॥ ९ ॥
यः शेते जलधौ नागे देव्या लक्ष्म्या सुखावहे।
हत्वा तौ दानवौ घोरौ मधुकैटभसंज्ञितौ ॥ १० ॥
'जो प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें मधु और कैटभ नामक दो भयंकर दानवोंका वध करके शेषनागकी सुखदायिनी शय्यापर लक्ष्मीदेवीके साथ शयन करते हैं (वे भगवान् विष्णु ये ही हैं) ॥ १० ॥
यमाहुराद्यं विबुधा जगत्पतिं
सर्वस्य धातारमजं जनित्रम्।
अणोरणीयांसमतिप्रमाणं
स्थूलात् स्थविष्ठं हरिमेव विष्णुम् ॥ ११ ॥
'देवता जिन्हें सबका आदि, जगदीश्वर, सबका धारण-पोषण करनेवाले, अजन्मा, जन्मदाता, अणुसे भी अत्यन्त अणु, परम महान्, स्थूलसे भी स्थूलतम, हरि एवं विष्णु कहते हैं (वे ये ही हैं) ॥ ११ ॥
यत्र स्थितमिदं सर्वं प्राप्ते लोकस्य नाशने।
आदौ यस्मात् समुत्पन्नं सोऽयं विष्णुरिति स्थितः ॥ १२ ॥
'लोकका संहार प्राप्त होनेपर यह सारा विश्व जिनमें ही स्थित होता है तथा सृष्टिके प्रारम्भमें जिनसे इसकी उत्पत्ति हुई है, वे ही ये भगवान् विष्णु यहाँ विराजमान हैं ॥ १२ ॥
यस्येच्छया सर्वमिदं प्रवृत्तं
प्रवर्तते चापि जनार्दनस्य।
अयं स विष्णुः पुरुषोत्तमः शिवः
प्रवर्तते मामिह यादवेश्वरः ॥ १३ ॥
'जिन जनार्दनकी इच्छासे यह सारा जगत् अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त हुआ है और हो रहा है, वे शिवस्वरूप पुरुषोत्तम विष्णु ये यादवेश्वर श्रीकृष्ण ही हैं, जो यहाँ मेरे पास आये हैं ॥ १३ ॥
भृगोर्वंशे समुत्पन्नो जामदग्न्य इति श्रुतः।
शिष्यत्वं समवाप्यैव मृगव्याधस्य यः स्थितः ॥ १४ ॥
जघान वीर्याद् बलिनं महारण्ये
कुठारशस्त्रेण गिरीशशिष्यः।
सहस्रबाहुं कृतवीर्यसम्भवं
हयैर्गजैश्चैव रथैश्च निर्गतम् ॥ १५ ॥
कुरुक्षेत्रं समासाद्य यश्चकार पितृक्रियाम्।
निःक्षत्रियमिमं लोकं कृतवानेकविंशतिः ॥ १६ ॥
'जो भृगुकुलमें उत्पन्न हो 'जामदग्न्य' के नामसे विख्यात हुए तथा मृगव्याध नामक रुद्रदेवताका शिष्यत्व ग्रहण करके स्थित हैं। महादेवजीके शिष्यभूत जिन परशुरामजीने महासमरमें कुठारनामक शस्त्रद्वारा बलवान् कृतवीर्यकुमार, सहस्रबाहु अर्जुनको जो हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनाएँ साथ लेकर चढ़ आया था, बलपूर्वक मार डाला। तत्पश्चात् कुरुक्षेत्रमें आकर जिन्होंने पितरोंका श्राद्धकर्म सम्पन्न किया और इक्कीस बार इस जगत्को क्षत्रियोंसे सूना कर दिया (वे ये ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं) ॥ १४-१६ ॥
रघोरथ कुले जातो रामो नाम जनार्दनः।
सीतया च श्रिया युक्तो लक्ष्मणानुचरः कृती ॥ १७ ॥
कृत्वा च सेतुं जलधौ जनार्दनो
हत्वा च रक्षःपतिमाशुगैः शरैः।
दत्त्वा च राज्यं स विभीषणाय
दशाश्वमेधैरयजच्च योऽसौ ॥ १८ ॥
'तदनन्तर जनार्दनदेव रघुकुलमें उत्पन्न हो 'राम' नामसे विख्यात हुए। 'सीता' नामवाली लक्ष्मी देवीके साथ इनका सम्बन्ध स्थापित हुआ। इनके छोटे भाई लक्ष्मण सदा इनके ही अनुगामी बने रहे। ये बड़े पुण्यात्मा एवं विद्वान् थे। इन रामरूपधारी जनार्दनने समुद्रमे सेतु बाँधकर अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा राक्षसराज रावणका वध किया और विभीषणको राज्य देकर दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया (वे ही ये रामस्वरूप विष्णु यहाँ उपस्थित हैं) ॥
वसुदेवकुले जातो वासुदेवेति शब्दितः।
गोकुले क्रीडते योऽसौ संकर्षणसहायवान् ॥ १९ ॥
'तदनन्तर वे श्रीहरि वसुदेवकुलमें उत्पन्न हो वासुदेव नामसे विख्यात हुए और गोकुलमें भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करने लगे। उस समय उनके बड़े भाई बलराम उनके सहायक थे ॥ १९ ॥
उत्तानशायी शिशुरूपधारी
पीत्वा स्तनं पूतनिकाप्रदत्तम्।
व्यसुं चकाराशु जनार्दनस्तदा
दनोः सुतां तामवसन् सुखं हरिः ॥ २० ॥
'जब वे शिशुरूप धारण करके खाटपर उत्तान सोये हुए थे, उस समय उन जनार्दनने पूतनाके दिये हुए स्तनको पीकर उस दानवीको तत्काल प्राणहीन कर दिया। फिर वे श्रीहरि वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ २० ॥
पयःपानं तथा कुर्वन् भक्षयन् दधिपिण्डकम्।
दाम्ना बद्धोदरो विष्णुर्मात्रा रुषितया दृढम् ॥ २१ ॥