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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] | द्व्यशीतितमोऽध्यायः | ९९९

दंष्ट्राकरालः सुमहान् हत्वा यो दानवान् रणे।
निःशोकमखिलं लोकं चकारासौ जनार्दनः ॥ ८ ॥
'इन्हीं जनार्दनने विकराल दाढ़वाले महान् नृसिंह रूप होकर रणभूमिमें दानवोंको मारा और समस्त संसारको शोकरहित कर दिया ॥ ८ ॥

आदौ दधारैकभुजेन मन्दरं
निर्जित्य सर्वानसुरान् महार्णवे।
ददौ च शक्राय सुधामयं महान्
स एष साक्षादिह मामवस्थितः ॥ ९ ॥
'जिन्होंने आदिकालमें एक ही हाथसे मन्दराचलको धारण किया और महासागरके तटपर समस्त असुरोंको परास्त करके इन्द्रको अमृत प्रदान किया, वे ही ये साक्षात् महाविष्णु यहाँ मेरे निकट विराजमान हैं ॥ ९ ॥

यः शेते जलधौ नागे देव्या लक्ष्म्या सुखावहे।
हत्वा तौ दानवौ घोरौ मधुकैटभसंज्ञितौ ॥ १० ॥
'जो प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें मधु और कैटभ नामक दो भयंकर दानवोंका वध करके शेषनागकी सुखदायिनी शय्यापर लक्ष्मीदेवीके साथ शयन करते हैं (वे भगवान् विष्णु ये ही हैं) ॥ १० ॥

यमाहुराद्यं विबुधा जगत्पतिं
सर्वस्य धातारमजं जनित्रम्।
अणोरणीयांसमतिप्रमाणं
स्थूलात् स्थविष्ठं हरिमेव विष्णुम् ॥ ११ ॥
'देवता जिन्हें सबका आदि, जगदीश्वर, सबका धारण-पोषण करनेवाले, अजन्मा, जन्मदाता, अणुसे भी अत्यन्त अणु, परम महान्, स्थूलसे भी स्थूलतम, हरि एवं विष्णु कहते हैं (वे ये ही हैं) ॥ ११ ॥

यत्र स्थितमिदं सर्वं प्राप्ते लोकस्य नाशने।
आदौ यस्मात् समुत्पन्नं सोऽयं विष्णुरिति स्थितः ॥ १२ ॥
'लोकका संहार प्राप्त होनेपर यह सारा विश्व जिनमें ही स्थित होता है तथा सृष्टिके प्रारम्भमें जिनसे इसकी उत्पत्ति हुई है, वे ही ये भगवान् विष्णु यहाँ विराजमान हैं ॥ १२ ॥

यस्येच्छया सर्वमिदं प्रवृत्तं
प्रवर्तते चापि जनार्दनस्य।
अयं स विष्णुः पुरुषोत्तमः शिवः
प्रवर्तते मामिह यादवेश्वरः ॥ १३ ॥
'जिन जनार्दनकी इच्छासे यह सारा जगत् अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त हुआ है और हो रहा है, वे शिवस्वरूप पुरुषोत्तम विष्णु ये यादवेश्वर श्रीकृष्ण ही हैं, जो यहाँ मेरे पास आये हैं ॥ १३ ॥

भृगोर्वंशे समुत्पन्नो जामदग्न्य इति श्रुतः।
शिष्यत्वं समवाप्यैव मृगव्याधस्य यः स्थितः ॥ १४ ॥
जघान वीर्याद् बलिनं महारण्ये
कुठारशस्त्रेण गिरीशशिष्यः।
सहस्रबाहुं कृतवीर्यसम्भवं
हयैर्गजैश्चैव रथैश्च निर्गतम् ॥ १५ ॥
कुरुक्षेत्रं समासाद्य यश्चकार पितृक्रियाम्।
निःक्षत्रियमिमं लोकं कृतवानेकविंशतिः ॥ १६ ॥
'जो भृगुकुलमें उत्पन्न हो 'जामदग्न्य' के नामसे विख्यात हुए तथा मृगव्याध नामक रुद्रदेवताका शिष्यत्व ग्रहण करके स्थित हैं। महादेवजीके शिष्यभूत जिन परशुरामजीने महासमरमें कुठारनामक शस्त्रद्वारा बलवान् कृतवीर्यकुमार, सहस्रबाहु अर्जुनको जो हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनाएँ साथ लेकर चढ़ आया था, बलपूर्वक मार डाला। तत्पश्चात् कुरुक्षेत्रमें आकर जिन्होंने पितरोंका श्राद्धकर्म सम्पन्न किया और इक्कीस बार इस जगत्‌को क्षत्रियोंसे सूना कर दिया (वे ये ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं) ॥ १४-१६ ॥

रघोरथ कुले जातो रामो नाम जनार्दनः।
सीतया च श्रिया युक्तो लक्ष्मणानुचरः कृती ॥ १७ ॥
कृत्वा च सेतुं जलधौ जनार्दनो
हत्वा च रक्षःपतिमाशुगैः शरैः।
दत्त्वा च राज्यं स विभीषणाय
दशाश्वमेधैरयजच्च योऽसौ ॥ १८ ॥
'तदनन्तर जनार्दनदेव रघुकुलमें उत्पन्न हो 'राम' नामसे विख्यात हुए। 'सीता' नामवाली लक्ष्मी देवीके साथ इनका सम्बन्ध स्थापित हुआ। इनके छोटे भाई लक्ष्मण सदा इनके ही अनुगामी बने रहे। ये बड़े पुण्यात्मा एवं विद्वान् थे। इन रामरूपधारी जनार्दनने समुद्रमे सेतु बाँधकर अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा राक्षसराज रावणका वध किया और विभीषणको राज्य देकर दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया (वे ही ये रामस्वरूप विष्णु यहाँ उपस्थित हैं) ॥

वसुदेवकुले जातो वासुदेवेति शब्दितः।
गोकुले क्रीडते योऽसौ संकर्षणसहायवान् ॥ १९ ॥
'तदनन्तर वे श्रीहरि वसुदेवकुलमें उत्पन्न हो वासुदेव नामसे विख्यात हुए और गोकुलमें भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करने लगे। उस समय उनके बड़े भाई बलराम उनके सहायक थे ॥ १९ ॥

उत्तानशायी शिशुरूपधारी
पीत्वा स्तनं पूतनिकाप्रदत्तम्।
व्यसुं चकाराशु जनार्दनस्तदा
दनोः सुतां तामवसन् सुखं हरिः ॥ २० ॥
'जब वे शिशुरूप धारण करके खाटपर उत्तान सोये हुए थे, उस समय उन जनार्दनने पूतनाके दिये हुए स्तनको पीकर उस दानवीको तत्काल प्राणहीन कर दिया। फिर वे श्रीहरि वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ २० ॥

पयःपानं तथा कुर्वन् भक्षयन् दधिपिण्डकम्।
दाम्ना बद्धोदरो विष्णुर्मात्रा रुषितया दृढम् ॥ २१ ॥

१०००श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

'जब कुछ बड़े हुए, तब दूध पीते हुए छिपकर दही और माखनके लोंदे खा जाते थे। तब एक दिन रोषमें भरी हुई मैया यशोदाने उन भगवान् विष्णुकी कमरमें दृढ़ता-पूर्वक रस्सी बाँध दी ॥ २१ ॥

ततश्च दाम्ना सुदृढेन बद्धो
जघान योऽसौ यमलार्जुनौ च ।
क्रीडन् हरिर्गोकुलवासवासी
गोपीभिरास्वाद्य मुखं स्तनं च ॥ २२ ॥

'उस सुदृढ़ बन्धनसे बँधे हुए उन दामोदरने जुड़वे अर्जुन नामक वृक्षोंको तोड़ डाला। गोकुलवासमें रहते हुए बाल-रूपधारी श्रीहरि गोपियोंके साथ खेलते हुए कभी उनका स्तन पीते और कभी मुखका आस्वादन कर लेते थे ॥ २२ ॥

वृन्दावने वसन् विष्णुर्गोपैर्गोकुलवासिभिः ।
तत्र हत्वा हयं राजन् विरराजांशुमानिव ॥ २३ ॥

'वृन्दावनमें गोकुलवासी गोपोंके साथ रहते हुए श्रीहरि वहाँ अश्वरूपधारी केशीका वध करके सूर्यके समान शोभा पाने लगे ॥ २३ ॥

यः क्रीडते नागफणौ जनार्दनो
निषेव्यमाणः सह गोपदारकैः ।
महाह्रदे नागपतिं जगत्पति-
र्ममर्द्द वीर्यातिशयं प्रदर्शयन् ॥ २४ ॥

'जो जगदीश्वर जनार्दन गोपबालकोंसे सेवित हो नागके फनोंपर क्रीडा करते थे तथा जिन्होंने अपने अतिशय पराक्रमका परिचय देते हुए यमुनाके महान् ह्रदमें नागराज कालियको रौंद डाला था (वे ही ये भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उपस्थित हैं) ॥ २४ ॥

यो धेनुकं तालवने तत्फलैः सममच्छिनत् ।
हत्वा दानवमुग्रं तं गोपान् विस्मापयत्यसौ ॥ २५ ॥

'जिन्होंने तालवनमें तालफलोंके साथ ही भयंकर दानव धेनुकासुरका उच्छेद कर डाला और उसका वध करके गोपोंको आश्चर्यमें डाल दिया (वे ही ये विष्णु यहाँ उपस्थित हैं) ॥ २५ ॥

दधार यो गोधरमुग्रपौरुषान्
महामतिर्मेघसमागमे सति ।
विडम्बयञ्छक्रबलं प्रमोदयन्
गोपांश्च गोपीश्च स गोकुलं हरिः ॥ २६ ॥

'जिन परम बुद्धिमान् श्रीहरिने संवर्तक मेघोंके घिर आनेपर अपने उग्र पुरुषार्थसे गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया और इन्द्रके बलकी विडम्बना करते हुए गोपों, गोपियों और गोकुलको आनन्दमग्न कर दिया (वे ये ही हैं) ॥

गोपीनां स्तनमध्ये तु क्रीडते काममीश्वरः।
योऽसौ पिवंस्तदधरं मायामानुषदेहवान् ॥ २७ ॥

'मायासे मनुष्यरूप धारण करनेवाले जो परमेश्वर श्रीहरि गोपियोंके वक्षःस्थलपर उनके अधरामृतका पान करते हुए इच्छानुसार क्रीडा करते थे (वे ये ही हैं।) ॥ २७ ॥

गोपीभिरास्वाद्य मुखं विविक्ते-
शेते स्म रात्रौ सुखमेव केशवः ।
स्तनान्तरेष्वेव तदा च तासां-
कामीव कान्ताधरपल्लवं पिबन् ॥ २८ ॥

'जो केशव रात्रिके समय वृन्दावनके एकान्त प्रदेशमें गोपियोंके साथ उनके मुखारविन्दका आस्वादन करते हुए सुखपूर्वक सोते थे और कामी पुरुषके समान कान्ता (प्रेयसी) के अधर-पल्लव-रसका पान करते हुए उन गोपाङ्गनाओंके वक्षःस्थलोंपर ही शयन करते थे (वे प्रभु ये ही हैं) ॥ २८ ॥

अक्रूरेण समाहूतस्तेन गच्छन् हि यामुने ।
जले यो ह्यर्चितस्तेन नागलोके स एव हि ॥ २९ ॥

'कंसके बुलानेपर अक्रूरजीके साथ जाते हुए जिन श्रीहरिका यमुनाजीके जलमें प्रकट हुए नागलोकमें पूजन किया गया था और अक्रूरने यह बात प्रत्यक्ष देखी थी, वे ही ये भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे हैं ॥ २९॥

ततश्च गच्छन् बलवान्जनार्दनो
हत्वा तमुग्रं रजकं बलात् पथि ।
हृत्वा च वस्त्राणि यथेष्टमीश्वरो
ययौ सरामो मथुरां पुरीं हरिः ॥ ३० ॥

'तत्पश्चात् मथुराके मार्गपर चलते हुए बलरामसहित सर्वसमर्थ बलवान् जनार्दन श्रीहरिने उस उग्र स्वभाववाले धोबीको बलपूर्वक मारकर उसके हाथसे वस्त्र छीन लिये और उन्हें धारण करके मथुरापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३० ॥

लब्ध्वा च दामानि बहूनि कामदो
दत्त्वा वरं माल्यकृते महन्तम् ।
लब्ध्वानुलेपं सुरभिं च यादवः
कुब्जां चकाराशु महाङ्गरूपाम् ॥ ३१ ॥

'आगे जाकर उन्हें बहुत-से फूलोंके हार प्राप्त हुए, तब इच्छानुसार वर देनेवाले उन यदुनाथने मालीको महान् वर प्रदान किया। फिर कुब्जासे सुगन्धित अनुलेप पाकर उन्होंने शीघ्र ही उसे परम सुन्दर रूपवती बना दिया ॥ ३१॥

योऽसौ चापं समादाय मध्ये छित्त्वा महद् धनुः।
सिंहनादं महाँश्चक्रे कल्पान्ते जलदो यथा ॥ ३२ ॥

'जिन्होंने कंसका विशाल धनुष हाथमें लेकर उसे बीचसे ही तोड़ डाला और प्रलयकालके महान् मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे सिंहनाद किया (वे ये ही हैं) ॥ ३२ ॥

हत्वा गजं घोरमुदग्ररूपं
विषाणमादाय ततोऽनु केशवः ।
ननर्त रङ्गे बहुरूपमीश्वरः
कंसस्य दत्त्वा भयमुग्रवीर्यः ॥ ३३ ॥

भविष्यपर्व ]त्र्यशीतितमोऽध्यायः१००१

'तत्पश्चात् कुवलयापीड नामक प्रचण्ड रूपवाले भयंकर हाथीको मारकर उसके दाँत हाथमें लिये उग्र पराक्रमी भगवान् केशव कंसको भय देते हुए रङ्गशालामें नाना प्रकारसे नृत्य करने लगे ॥ ३३ ॥

योऽसौ हत्वा महामल्लं चाणूरं निहतद्विषम् ।
यादवेभ्यो ददौ प्रीतिं कंसस्यैव तु पश्यतः ॥ ३४ ॥

'जिन्होंने शत्रुहन्ता चाणूर नामक महामल्लको कंसके सामने ही मारकर यादवोंको आनन्द प्रदान किया (वे ही ये श्रीहरि यहाँ उपस्थित हैं) ॥ ३४ ॥

जघान कंसं रिपुपक्षघातिनं
पितृद्विषं यादवनामधेयम् ।
संस्थाप्य राज्ये हरिरुग्रसेनं
सान्दीपनं काश्यमुपागतो यः ॥ ३५ ॥

'इसके बाद उन श्रीहरिने अपने पिताके साथ द्वेष रखनेवाले, शत्रुपक्षघाती, यादवनामधारी कंसको मार डाला और उसके राज्यपर उग्रसेनको स्थापित करके वे विद्याध्ययनके लिये उन सान्दीपनि मुनिके समीप गये, जिनका जन्म काश-गोत्र अथवा काशि-जनपदमें हुआ था (परंतु जो अवन्ती-पुरीमें रहते थे) ॥ ३५ ॥

विद्यामवाप्य सकलां दत्त्वा पुत्रं महामुनेः ।
साग्रजोऽथ जगामाशु मधुरां यादवीं पुरीम् ॥ ३६ ॥

'उनसे सम्पूर्ण विद्या पाकर उन महामुनिको उनका मरा हुआ पुत्र वापस दे वे बड़े भाई बलरामसहित शीघ्र ही यादवोंकी राजधानी मथुरापुरीको लौट गये ॥ ३६ ॥

हत्वा निशुम्भं नरकं महामतिः
कृत्वा स घोरं कदनं जनार्दनः ।
ररक्ष विप्रान् मुनिवीरसंघान्
देवांश्च सर्वाञ्जगतो जगत्पतिः ॥ ३७ ॥

'परम बुद्धिमान् जगत्पति जनार्दनने निशुम्भ और नरकासुरका वध करके राक्षसोंका घोर संहार मचाकर ब्राह्मणों, मुनिसमूहों, वीरसमुदायों, समस्त देवताओं तथा जगत्की रक्षा की ॥ ३७ ॥

स एष भगवान् विष्णुद्य दृष्टो जनार्दनः ।
कृतकृत्योऽस्मि संजातः सायुज्यं प्राप्तवानहम् ॥ ३८ ॥

'वे ही ये भगवान् विष्णु जनार्दन आज मुझे दिखायी दिये हैं। इनके दर्शनसे मैं कृतकृत्य हो गया। मुझे सायुज्य मोक्ष मिल गया ॥ ३८ ॥

येन दृष्टो हरिः साक्षात् तस्य मुक्तिः करे स्थिता ।
सोऽयमेष हरिः साक्षात् प्रत्यक्षमिह वर्तते ॥ ३९ ॥

'जिसने साक्षात् श्रीहरिका दर्शन कर लिया मुक्ति उसके हाथमें आ जाती है। यहाँ ये साक्षात् श्रीहरि प्रत्यक्ष विद्यमान हैं ॥ ३९ ॥

नूनं जन्मान्तरे पूर्वं धर्मः संचित एव मे ।
यस्य पाकः समुत्पन्नो येनासौ दृश्यते मया ॥ ४० ॥

'निश्चय ही पहले अन्य जन्मोंमें मेरे द्वारा धर्मका संचय भी हुआ ही है। जिसके फलका उदय हुआ है। जिससे मुझे इनका दर्शन प्राप्त हो रहा है ॥ ४० ॥

सर्वथा पुण्यवानस्मि नष्टसंसारबन्धनः ।
किमस्मै दीयते वस्तु किं नु वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।
करिष्ये किमहं विष्णो वदस्वाद्य यथेप्सितम् ॥ ४१ ॥

'मैं सर्वथा पुण्यात्मा हूँ, मेरे संसार-बन्धनका नाश हो गया। मैं इन्हें कौन-सी वस्तु उपहारके रूपमें दूँ तथा इस समय इनसे क्या कहूँ ? विष्णो ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? आपकी जैसी इच्छा हो, उसे आज प्रकट कीजिये' ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा विस्तरं नादं ननर्द बहुशस्तदा ।
जहास विकृतं भूयो ननर्त पिशिताशनः ॥ ४२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर वह पिशाच बारंबार जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। उसने विकट अट्टहास किया, फिर वह नृत्य करने लगा ॥ ४२ ॥

नमो नमो हरे कृष्ण यादवेश्वर केशव ।
प्रत्यक्षं च हरेस्तत्र ननर्त विविधं नृप ॥ ४३ ॥

नरेश्वर ! वहीं भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही वह 'यादवेश्वर ! केशव ! कृष्ण ! हरे ! आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !!' ऐसा कहकर नाना प्रकारसे नृत्य करने लगा ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां घण्टाकर्णस्तुतौ द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें घण्टाकर्णद्वारा भगवान्की स्तुतिविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥


त्र्यशीतितमोऽध्यायः

घण्टाकर्णद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको उपहारसमर्पण, भगवान्का उसे वर देना और एक मरे हुए ब्राह्मणको जीवित करना

वैशम्पायन उवाच

विहस्य विकृतं भूयः प्रनृत्य च यथाबलम् ।
ब्राह्मणस्य हतस्याथ शवमादाय सत्वरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुनः विकट

१००२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

अट्टहास और यथाशक्ति नृत्य करके वह पिशाच तुरंत ही एक मारे गये ब्राह्मणका शव लेकर आया ॥ १ ॥

द्विधाकृत्य महाघोरं पिशितं केशशाड्वलम् । ततः खण्डं समादाय अद्भििरभ्युक्ष्य यत्नतः ॥ २ ॥ विधाय पात्रे सुशुभे नमस्कृत्य जनार्दनम् । इदं प्रोवाच देवेशं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥ ३ ॥

केशोंसे युक्त उस महाघोर मांसके दो टुकड़े करके एक टुकड़ेको लेकर उसने यत्नपूर्वक जलसे धोया, तत्पश्चात् उसे एक सुन्दर पात्रमें रखकर देवेश्वर जनार्दनको नमस्कार करके वह हाथ जोड़ प्रणतभावसे खड़ा हो गया और इस प्रकार बोला—॥ २-३ ॥

गृहाण मे जगन्नाथ भक्ष्यं योग्यं तव प्रभो । भवादृशैर्जगन्नाथ ग्राह्यं सर्वात्मना हरे ॥ ४ ॥

'जगन्नाथ ! प्रभो ! यह भक्ष्य आपके योग्य है । इसे ग्रहण कीजिये । जगदीश्वर ! हरे ! आप-जैसे प्रभुओंको भक्त-की यह भेंट सम्पूर्ण हृदयसे स्वीकार करनी चाहिये ॥ ४ ॥

भक्तिनम्रा वयं विष्णो नात्र कार्या विचारणा । दत्तं यद् भक्तिनम्रेण ग्राह्यं तत् स्वामिना हरे ॥ ५ ॥

'विष्णो ! हम भक्तिभावसे आपके प्रति विनम्र हैं, इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये । हरे ! भक्तिभावसे विनीत होकर सेवकने जो वस्तु अर्पित की है, उसे स्वामीको अवश्य ग्रहण करना चाहिये ॥ ५ ॥

नवं सुसंस्कृतं भक्ष्यं ब्राह्मण्यं शवमुत्तमम् । अस्माकं पिशिताशानां शास्त्रे नियतमेव हि ॥ ६ ॥

'यह तुरंतका मारा हुआ, संस्कारसम्पन्न, भक्षण करने योग्य, ब्राह्मणका उत्तम शव है । शास्त्रमें हम पिशाचोंके लिये इसके भोजनका विधान है ही ॥ ६ ॥

तस्माद् गृहाण भगवन् यदि दोषो न विद्यते । इत्युक्त्वा विकृतं भूयो विहस्य स तु कामतः ॥ ७ ॥ दातुमैच्छत् तदा खण्डमस्पृश्यं तु शवस्य ह ।

'अतः भगवन् ! यदि कोई दोष न हो तो आप इसे ग्रहण करें ।' ऐसा कहकर पुनः विकट अट्टहास करके उसने इच्छानुसार वह शवका न छूने योग्य टुकड़ा उस समय भगवान्‌को देनेकी इच्छा की ॥ ७॥

ततः प्रीतोऽभवत् तस्मै मनसापूजयच्च तम्॥ ८ ॥ अहोऽस्य स्नेहकारुण्यं मयि सर्वत्र वर्तते । इति संचिन्त्य मनसा प्रोवाच यदुपुङ्गवः ॥ ९ ॥

इससे भगवान् श्रीकृष्ण उसपर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'अहो ! इसके मनमें मेरे प्रति सर्वत्र स्नेह और करुणा विद्यमान है ।' मनमें ऐसा सोचकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने उससे कहा-॥

अलमेतेन सर्वत्र पिशाच पिशिताशन । अस्पृश्यं मादृशैरेतद् ब्राह्मण्यं शवमुत्तमम् ॥ १० ॥

'कच्चा मांस खानेवाले पिशाच ! सर्वत्र इस मांसका ही उपयोग या समर्पण व्यर्थ है । जिसे तुम ब्राह्मणका उत्तम शव बता रहे हो, यह मुझ-जैसे लोगोंके लिये छूने योग्य भी नहीं है ॥ १० ॥

ब्राह्मणः सर्वथा पूज्यो जन्तुभिर्धर्मकाङ्क्षिभिः । पिशाचा घोरकर्माणो यतन्ते ब्रह्महिंसने ॥ ११ ॥

'धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले जीवोंके लिये ब्राह्मण सर्वथा पूजनीय है । घोर कर्म करनेवाले पिशाच ही ब्राह्मणकी हिंसाके लिये प्रयत्न करते हैं ॥ ११ ॥

न हन्तव्याः सदा विप्रास्तद्धिंसा नरकावहा । तस्मादस्पृश्यमस्माभिर्नात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥

'ब्राह्मणोंकी हिंसा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह नरकमें ले जानेवाली है, अतः यह शव हमारे लिये सर्वथा अस्पृश्य है । इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥

भक्त्या प्रीतोऽस्मि भद्रं ते मनो निर्मलमेतया । मनःशुद्ध्यै कृतो यत्नस्ततःप्रीतोऽस्मि मांसप ॥ १३ ॥

'मांस खानेवाले पिशाच ! तुम्हारा भला हो । मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ; क्योंकि इससे मन निर्मल हो जाता है । तुमने मनःशुद्धिके लिये यत्न किया है । इसलिये मैं तुम-पर प्रसन्न हूँ ॥ १३ ॥

असत्संकीर्तनाच्छश्वच्छुद्धं हि करणं तव । अतीव मनसा प्रीत इत्युक्त्वा भगवान् हरिः ॥ १४ ॥ पस्पर्शाङ्गं तदा विष्णुः पिशाचस्याथ सर्वतः । करेण मृदुना देवः पापान्निर्मोचयन्हरिः ॥ १५ ॥

'मेरे नामोंका निरन्तर कीर्तन करनेसे तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हो गया । इसलिये मैं मनसे तुम्हारे ऊपर अधिक प्रसन्न हूँ ।' ऐसा कहकर भगवान् विष्णु हरिने उस समय अपने कोमल हाथसे उस पिशाचके सारे अङ्गोंका स्पर्श किया । ऐसा करके उन नारायणदेवने उसे पापसे मुक्त कर दिया ।१४-१५।

ततस्तस्याभवद् रूपं कामरूपसमप्रभम् । दीर्घकुञ्चितकेशाढ्यो दीर्घबाहुः सुलोचनः ॥ १६ ॥

उनके स्पर्श करते ही उस पिशाचका रूप कामदेवके समान कान्तिमान् हो गया । उसके सिरपर लंबे-लंबे घुँघराले केश शोभा देने लगे । भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र सुन्दर हो गये ॥ १६ ॥

समाङ्गुलिः समनखः समवक्त्रः समुन्नसः । पद्माक्षः पद्मवर्णाभः पद्मकेशरभूषणः ॥ १७ ॥

भविष्यपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः [ १००३


अँगुलियाँ समान और सुन्दर हो गयीं। नख भी समान-रूपसे सुन्दर दिखायी देने लगे। उसके समान और सुडौल मुखमें केवल नासिका ऊँची थी। आँखें प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर दिखायी देती थीं। अङ्गकान्ति नील-कमलके समान श्याम थी। वह कमलकेसररूपी आभूषणोंसे विभूषित था ॥

केयूरी चाङ्गदी चैव कौशेयवसनस्तदा।
ज्ञानवान्सत्त्वसम्पन्नः साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ १८ ॥
उसकी भुजाओंमें केयूर और अङ्गद नामक आभूषण शोभा दे रहे थे। शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित था। वह ज्ञानवान् और सत्त्वसम्पन्न होकर साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान शोभा पाता था ॥ १८ ॥

गन्धर्व इव गायंस्तु सिद्धः सिद्ध इव स्वयम् ।
साक्षात् स्पृष्टं तदा विष्णोः करेण मृदुपूर्वकम् ॥ १९ ॥
न नूनं तादृशं रूपमासीत् कालान्तरेष्वपि।
अद्यापि नैव मुनयो लभन्ते तादृशं वपुः ॥ २० ॥
वह गन्धर्वके समान गायक तथा साक्षात् सिद्धके समान सिद्धियोंसे सम्पन्न था। उस समय साक्षात् भगवान् विष्णुके हाथका कोमल स्पर्श पाकर उस पिशाचका रूप जैसा अलौकिक हो गया था, वैसा रूप कालान्तरमें भी किसीका नहीं था और आज भी मुनियोंको भी वैसा शरीर नहीं प्राप्त होता है ॥

कृत्वा सुबहुशो घोरं तपः परमदारुणम् ।
यच्च लब्धं तदा तेन पिशाचेन नृपोत्तम ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस पिशाचने बारंबार घोर एवं परम दारुण तप करके उस समय जो दिव्य रूप प्राप्त किया, वह अद्भुत था ॥ २१ ॥

को नु नाम जगन्नाथमाश्रितः सीदते नृप ।
स हि सर्वत्र कल्याणो यो हि नित्यं जनार्दनम् ॥ २२ ॥
ध्यायन् पठञ्जपन् वापि तस्य किं नास्ति भूपते ।
नरेश्वर ! जगदीश्वर भगवान् जनार्दनका आश्रय लेकर कौन मनुष्य कष्ट पा सकता है। उसका सर्वत्र कल्याण ही होता है। भूपाल ! जो प्रतिदिन उन भगवान् विष्णुका ध्यान, स्तोत्रपाठ अथवा मन्त्रजप करता है, उसे कौन-सी वस्तु सुलभ नहीं है ॥ २२३ ॥

ततः प्रोवाच भगवान् स्थितं काममिवापरम् ॥ २३ ॥
अक्षयः स्वर्गवासस्ते यावदिन्द्रो वसिष्यति ।
तावत् स्वर्गी भवानस्तु शासनान्मम नान्यतः ॥ २४ ॥
तब दूसरे कामदेवके समान खड़े हुए घण्टाकर्णसे भगवान्‌ने इस प्रकार कहा—'जबतक इन्द्र रहेंगे, तबतक स्वर्गलोकमे तुम्हारा अक्षय निवास बना रहेगा। तबतक तुम मेरे शासनसे स्वर्गमें ही रहो, अन्यत्र नहीं ॥ २३-२४ ॥

नष्टे शक्रे ततः स्वर्गात् सायुज्यं मम गच्छतु ।
योऽयं भ्राता तव स्वर्गी यावदिन्द्रो भवेत् तदा ॥ २५ ॥
'इस इन्द्रके बदल जानेपर तुम स्वर्गसे ऊपर उठकर मेरा सायुज्य प्राप्त कर लोगे। यह जो तुम्हारा भाई है, यह भी जबतक इन्द्र रहेंगे, तबतक स्वर्गीय सुखका उपभोग करेगा ॥ २५ ॥

वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते।
दातास्मि सर्वं सर्वत्र नात्र कार्या विचारणा ॥ २६ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो ! तुम्हारे मनमें जो कामना हो उसके अनुसार कोई वर माँगो। मैं सर्वत्र सब कुछ दे सकता हूँ, इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये' ॥

घण्टाकर्ण उवाच
यश्चेमं संगमं देव संस्मरेन्नियतात्मवान् ।
भक्तिस्तस्याचला देव त्वयि भूयाज्जनार्दन ॥ २७ ॥
घण्टाकर्ण बोला—देव ! जनार्दन ! जो अपने मनको संयममें रखकर हम दोनोंके इस समागमके प्रसङ्गका स्मरण करे, उसकी आपके प्रति अविचल भक्ति हो ॥ २७ ॥

मनःशुद्धिर्भवेत् तस्य मा भूत् कालुष्यता हरे ।
कालुष्यं मनसस्तस्य मा भूदेष वरो मम ॥ २८ ॥
हरे ! उसके मनकी शुद्धि हो जाय, उसमें मलिनता न रह जाय। उस पुरुषके मनका सारा कालुष्य मिट जाय, यह मेरा वर है ॥ २८ ॥

एवमस्त्विति देवेशः स्वर्गं गच्छेति केशवः ।
इन्द्रातिथिर्भवानस्तु त्वां प्रतीक्ष्य हरिः स्थितः ॥ २९ ॥
यह सुनकर देवेश्वर केशवने कहा—'ऐसा ही होगा, अब तुम स्वर्गको जाओ, इन्द्रके अतिथि बनो, इन्द्रदेव तुम्हारी प्रतीक्षामें खड़े हैं' ॥ २९ ॥

इत्युक्त्वा भगवान् कृष्ण उत्थाप्य ब्राह्मणं तदा ।
तेन स्तुतो जगन्नाथः पूजयित्वा च तं द्विजम् ॥ ३० ॥
ततो विसृज्य गोविन्दस्तस्माद् देशादुपागमत् ।
यत्र ते मुनयः सिद्धा अग्निहोत्रसमन्विताः ॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उस मरे हुए ब्राह्मणको जिलाकर उठा दिया, तब उस ब्राह्मणने उनका स्तवन किया, फिर वे जगदीश्वर गोविन्द उस ब्राह्मणका आदर-सत्कार करके उसे विदा दे, उस स्थानसे वहीं लौट गये, जहाँ वे सिद्ध मुनिगण अग्निहोत्रमें लगे हुए थे ॥ ३०-३१॥

स च स्वर्गी गतः स्वर्गमाज्ञया केशवस्य ह।
तस्मात् पठ सदा राजन् मनःशुद्धिं यदीच्छसि ।
मनश्च शुद्धं भवति पठतस्ते जगत्पते ॥ ३२ ॥
वह स्वर्गलोकका अधिकारी घण्टाकर्ण भगवान् श्रीकृष्ण-

१०७४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

की आज्ञासे स्वर्गलोकको चला गया । अतः राजन् ! यदि तुम अपने मनकी शुद्धि चाहते हो तो सदा इस प्रसङ्गका पाठ करो । जगत्पते ! इसका पाठ करनेसे तुम्हारा मन निश्चय ही शुद्ध हो जायगा ॥ ३२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि घण्टाकर्णमुक्तिप्रदाने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें घण्टाकर्णको मुक्तिप्रदानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥


चतुरशीतितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका कैलासपर पहुँचकर वहाँ बारह वर्षोंके लिये कठोर तपस्यामें संलग्न होना

वैशम्पायन उवाच

ततः स भगवान् विष्णुर्मुनिभ्यस्तत्त्वमादितः ।
कथयामास यद् वृत्तं पिशाचस्य महात्मनः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने मुनियोंसे महात्मा पिशाचका जो वृत्तान्त था, उसको आरम्भसे ही ठीक-ठीक कह सुनाया ॥ १ ॥

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे विस्मयं परमं गताः ।
अहोऽस्य कर्मणः पाकस्तव संदर्शनादिति ॥ २ ॥

वह सुनकर सभी मुनियोंको बड़ा विस्मय हुआ । वे बोले—'प्रभो ! आपके दर्शनसे इस पिशाचके कर्मका अद्भुत फल प्रकट हुआ' ॥ २ ॥

अर्चितो मुनिभिः सर्वैः प्रीतः प्रीतिमनां प्रियः ।
ततः प्रभाते विमले सूर्ये चाभ्युदिते सति ॥ ३ ॥
आरुह्य गरुडं विष्णुर्ययौ कैलासमुत्तमम् ।
भवद्भिस्तत्र गन्तव्यमित्युक्त्वा मुनिसत्तमान् ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् प्रीतिमानोंके प्रियतम श्रीहरिकी उन समस्त मुनियोंने अर्चना की, इससे वे बड़े प्रसन्न हुए । फिर निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर वे भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो उत्तम कैलास पर्वतको चले गये । जाते समय वे उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कह गये कि आपलोग भी वहाँ पधारियेगा ॥ ३-४ ॥

यत्र विश्वेश्वराः सिद्धास्तपस्यन्ति यतव्रताः ।
यत्र वैश्रवणः साक्षादुपास्ते शंकरं सदा ॥ ५ ॥

जहाँ इस विश्वपर शासन करनेवाले सिद्ध पुरुष व्रतका पालन करते हुए तपस्या करते हैं, जहाँ साक्षात् कुबेर सदा भगवान् शङ्करकी उपासना करते हैं ॥ ५ ॥

यत्र तन्मानसं नाम सरो हंसालयं महत् ।
यत्र भृङ्गीरिटिर्देवमुपास्ते शंकरं शिवम् ॥ ६ ॥
गाणपत्यमवाप्याथ हरपार्श्वचरः सदा ।

जहाँ वह हंसोंका निवासस्थान मानस नामक महान् सरोवर है । जहाँ भृङ्गीरिटि नामक शिवपार्षद अपने आराध्य-देव कल्याणस्वरूप भगवान् शङ्करकी उपासना करते हैं और गणपतिपद प्राप्त करके सदा महादेवजीके पास ही रहते हैं ॥

यत्र सिंहा वराहाश्च द्विपद्वीपिमृगैः सह ॥ ७ ॥
क्रीडन्ति वन्यरतयः परस्परहिते रताः ।
यत्र नद्यः समुत्पन्ना गङ्गाद्याः सागरंगमाः ॥ ८ ॥

जहाँ सिंह, सूअर, हाथी, बाघ और मृग सदा साथ-साथ खेलते और एक दूसरेके हितमें तत्पर रहकर जंगलकी पैदावारपर ही संतोष करते हैं, जहाँ गङ्गा आदि समुद्र-गामिनी नदियाँ प्रकट हुई हैं ॥ ७-८ ॥

यत्र विश्वेश्वरः शम्भुरच्छिनद् ब्रह्मणः शिरः ।
यत्रोत्पन्ना महावेत्रा भूतानां दण्डतां ययुः ॥ ९ ॥

जहाँ विश्वनाथ भगवान् शङ्करने ब्रह्माजीके सिरका उच्छेद किया था, जहाँ उत्पन्न हुए बड़े-बड़े बेंत प्राणियोंके लिये दण्डका काम देते हैं ॥ ९ ॥

उमया यत्र सहितः शंकरो नीललोहितः ।
ऋषिभिः प्रार्थितः पूर्वं ददौ यत्र गिरिः सुताम् ॥ १० ॥
शंकराय जगद्धात्रे शिवाय जगतीपते ।

जहाँ उमासहित नीललोहित भगवान् शङ्कर निवास करते हैं । पृथ्वीनाथ ! जहाँ पूर्वकालमें ऋषियोंके प्रार्थना करनेपर गिरिराज हिमवान्ने कल्याणकारी जगद्धाता भगवान् शिवको अपनी पुत्री प्रदान की थी ॥ १०१/२ ॥

यत्र लेभे हरिश्चक्रमुपास्य बहुभिर्दिनैः ॥ ११ ॥
पुष्करैः शतपत्रैश्च नेत्रेण च जगत्पतिम् ।

जहाँ श्रीहरिने बहुत दिनोंतक कमलों, शतदलों तथा अपने नेत्रद्वारा भी जगदीश्वर शिवकी आराधना करके उनसे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था ॥ १११/२ ॥

गुहां यत्र समाश्रित्य क्रीडन्ते सिद्धकिन्नराः ॥ १२ ॥
प्रियाभिः सह मोदन्ते पिबन्ते मधु चोत्तमम् ।

जहाँ सिद्ध और किन्नरगण गुफाका आश्रय लेकर अपनी प्रियतमाओंके साथ क्रीडा करते, आनन्दित होते और उत्तम मधु पीते थे ॥ १२१/२ ॥

यमुद्यत्य भुजैः सर्वैः पौलस्त्यो विरराम ह ॥ १३ ॥
तमारुह्य महाशैलं देवकीनन्दनो हरिः ।
मानसस्योत्तरं तीरं जगाम यदुनन्दनः ॥ १४ ॥

जिस पर्वतको अपनी सारी भुजाओंसे उठाकर रावण

भविष्यपर्व ] . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . चतुरशीतितमोऽध्यायः . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . [ १००५


दिग्विजयसे विरत हो गया था, उस महाशैल कैलासपर आरूढ़ हो यदुकुलको आनन्दित करनेवाले देवकीनन्दन श्रीहरि मानससरोवरके उत्तर तटपर गये ॥ १३-१४॥

तपश्चर्तुं किल हरिर्विष्णुः सर्वेश्वरः शिवः।
जटी चीरी जगन्नाथो मानुषं वपुरास्थितः ॥ १५ ॥
तपसे धृतचित्तस्तु शुचौ भूमावुपाविशत् ।

वे सर्वेश्वर शिवस्वरूप विष्णु—हरि वहाँ तपस्या करनेके लिये गये थे। मानव-शरीरधारी जगन्नाथ श्रीकृष्ण सिरपर जटा और शरीरमें चीरवस्त्र धारण किये तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके पवित्र भूमिपर बैठे ॥ १५ ॥

अवरुह्य ततो यानाद् गरुडाद्वेदसम्मितात् ॥ १६ ॥
द्वादशाब्दं तपश्चर्तुं मनो दधे ततो हरिः।

इस प्रकार वेदस्वरूप गरुड़ नामक वाहनसे उतरकर श्रीहरिने वहाँ बारह वर्षोंतक तपस्या करनेका विचार किया ॥ १६ ॥

फाल्गुनेन तु मासेन समारेभे जगत्पतिः ॥ १७ ॥
शाकभक्ष्यः कृतजपो वेदाध्ययनतत्परः।

जगदीश्वर श्रीकृष्णने वहाँ फाल्गुन माससे तपस्या आरम्भ की। वे शाक खाकर रहते, जप करते तथा वेदाध्ययनमें तत्पर रहते थे ॥ १७ ॥

किमुद्दिश्य जगन्नाथस्तपश्चरति मानवः ॥ १८ ॥
तं न विद्मो यथाकामं दुर्ज्ञेयेश्वरचिन्तना ।

राजन्! मानवरूपधारी जगदीश्वर श्रीहरि किस उद्देश्यसे इच्छानुसार तप करते थे, इसे हम नहीं जानते (सर्वसमर्थ ईश्वरके लिये पुत्रके उद्देश्यसे भी तपस्याकी कोई सङ्गति नहीं है)। वास्तवमें ईश्वरका संकल्प प्राणिमात्रके लिये दुर्ज्ञेय है—वे क्या सोचकर कौन-सा कार्य करते हैं, यह जानना सभीके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ १८ ॥

तपस्यति तदा विष्णौ पर्वते भूतसेविते ॥ १९ ॥
गरुडः कश्यपसुत इन्धनानि समाचिनोत् ।
होमार्थं वासुदेवस्य चरतस्तप उत्तमम् ॥ २० ॥

भूतोंसे सेवित कैलास पर्वतपर उन दिनों श्रीकृष्णके तपस्या करते समय कश्यपकुमार गरुड़जी उत्तम तपमें लगे हुए उन वासुदेवके हवन-कर्मकी सिद्धिके लिये समिधाएँ जुटाया करते थे ॥ १९-२० ॥

चक्रराजोऽथ पुष्पाणि संचिनोति तदा हरेः।
दिक्षु सर्वासु सर्वत्र ररक्ष जलजस्तदा ॥ २१ ॥
खङ्ग आहृत्य यत्नेन कुशान् सुबहुशस्तदा ।
गदा कौमोदकी चैव परिचर्यां चकार ह ॥ २२ ॥

चक्रराज सुदर्शन श्रीहरिके लिये फूल चुनता था। पाञ्चजन्य शङ्ख सम्पूर्ण दिशाओंमें सर्वत्र उनकी रक्षा करता था। नन्दक खङ्ग बड़े यत्नसे बहुसंख्यक कुश लाया करता था। कौमोदकी नामक गदा भी उनकी आवश्यक परिचर्या किया करती थी ॥ २१-२२ ॥

धनुःप्रवरमत्युग्रं शाङ्कं दानवभीषणम् ।
स्थितं हि पुरतस्तस्य यथेष्टं भृत्यवत् स्वयम् ॥ २३ ॥

धनुषोंमें श्रेष्ठ अत्यन्त उग्र शार्ङ्ग नामक धनुष, जो दानवोंको भयभीत करनेवाला था, सदा भगवान्‌के सामने भृत्यके समान इच्छानुसार स्वयं खड़ा रहता था ॥ २३ ॥

जुहोति भगवान् विष्णुरेधोभिर्बहुभिः सदा ।
आज्यादिभिस्तदा हव्यैरग्निं सम्पूज्य माधवः ॥ २४ ॥
सप्तार्चिषः समाप्तिं च समस्तव्यस्ततः कृती ।

भगवान् श्रीकृष्ण सदा बहुत-सी समिधाओंद्वारा आहुति देते थे। उस समय कर्मकुशल माधवने घृत आदि हवनीय पदार्थोंद्वारा अग्निका पूजन करके संक्षेप और विस्तारके साथ अग्निहोत्र कर्मको पूर्ण किया ॥ २४ ॥

एकस्मिन्नेकदा मासे भुञ्जानो नियतात्मवान् ॥ २५ ॥
द्वितीये त्वथ पर्याये भुञ्जन्नेकेन केशवः ।
एकस्मिन् वत्सरे भुञ्जंस्तथैवैकेन केनचित् ॥ २६ ॥

पहले वे एक महीनेमें एक बार खाकर मनको संयम-नियममें रखते हुए तप करने लगे। फिर वे केशव प्रत्येक दूसरे महीनेपर एक बार अन्न ग्रहण करने लगे। इस तरह समय बढ़ाते हुए वे एक वर्षमें एक बार किसी एक ही अन्नका आहार करने लगे ॥ २५-२६ ॥

समाप्य तत् तपः सर्वमेवमेव जगत्पतिः ।
द्वादशाब्दे तथा पूर्णे ऊनमासे जगत्पतिः ॥ २७ ॥
जुह्वन्नग्निं समास्थाय पठन् मन्त्रं जनार्दनः ।
आरण्यकं पठन् विष्णुः साक्षात् सर्वेश्वरो हरिः ।
आस्ते ध्यानपरस्तत्र पठन् प्रणवमुत्तमम् ॥ २८ ॥

इसी नियमसे वह सारी तपस्या पूर्ण करके जब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेमें केवल एक मासकी कमी रह गयी, तब वे जगदीश्वर जनार्दन सर्वव्यापी साक्षात् सर्वेश्वर श्रीहरि अग्निकी स्थापना करके मन्त्रपाठपूर्वक हवन करने लगे। आरण्यकका पाठ और उत्तम प्रणवका जप करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें मग्न हो गये ॥ २७-२८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां कृष्णतपोवर्णने चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकी तपस्याका वर्णनविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥

१००६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णके समीप इन्द्र आदि देवताओं तथा उमासहित भगवान् शिवका आगमन

वैशम्पायन उवाच

तत इन्द्रः स्वयं तत्र आरुह्य गजमुत्तमम्।
द्रष्टुं सर्वेश्वरं विष्णुं तपस्यन्तं समाययौ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर साक्षात् इन्द्र अपने उत्तम हाथी ऐरावतपर आरूढ़ हो तपस्यामें लगे हुए सर्वेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये ॥ १ ॥

ततो यमस्तु भगवानारुह्य महिषं वरम्।
किंकरैश्च स्वयं साक्षादाययौ नगमुत्तमम् ॥ २ ॥

इसके बाद साक्षात् भगवान् यम श्रेष्ठ महिषपर आरूढ़ हो अपने किङ्करोंके साथ उस उत्तम पर्वतपर आये ॥ २ ॥

प्रचेता हंसमारुह्य वारुणैश्च समन्वितः।
श्वेतच्छत्रसमायुक्तः श्वेतव्यजनवीजितः ॥ ३ ॥

श्वेत छत्रसे युक्त वरुण हंसपर आरूढ़ हो अपने सेवकोंके साथ वहाँ पधारे। उनके सेवक श्वेत चँवरसे उनके लिये हवा कर रहे थे ॥ ३ ॥

ययौ कैलासशिखरं द्रष्टुं केशवमञ्जसा।
अन्ये चापि तथा देवा आदित्या वसवस्तथा ॥ ४ ॥
रुद्राश्चैव तथा राजन् द्रष्टुं केशवमाययुः।

वे वरुण भी तपस्वी केशवका दर्शन करनेके लिये कैलास-शिखरपर गये थे। राजन् ! इसी प्रकार दूसरे देवता आदित्य, वसु और रुद्र आदि भी केशवका दर्शन करनेके लिये वहाँ पधारे थे ॥ ४½ ॥

सिद्धाश्च मुनयश्चैव गन्धर्वा यक्षकिन्नराः ॥ ५ ॥
सर्वाश्चाप्सरसो राजन् नृत्यगीतविशारदाः।

राजन् ! सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा नृत्य और गीतमें निपुण समस्त अप्सराएँ भी वहाँ आयीं ॥ ५½ ॥

ततो देवगणः सर्वः कैलासं समपद्यत ॥ ६ ॥
पर्वतो नारदश्चैव तथान्ये मुनिसत्तमाः।
विस्मयस्थितलोलाक्षाः सर्वदेवगणास्तथा ॥ ७ ॥
आश्चर्यं खलु पश्यध्वं न भूतं न भविष्यति।
योगिध्येयः स्वयं कृष्णो यत् तप्यति गुरुः स्वयम्।
को न्वत्र समयो भूयादिति ते मेनिरे गणाः ॥ ८ ॥

इस प्रकार सब देवता कैलास पर्वतपर आये । पर्वत, नारद तथा अन्य श्रेष्ठ मुनि एवं समस्त देवता आश्चर्यसे चकित-नेत्र होकर परस्पर कहने लगे—'यह आश्चर्यकी बात देखो ! ऐसा न तो हुआ है और न होगा । जो योगियोंके ध्येय हैं, वे साक्षात् जगद्गुरु श्रीकृष्ण स्वयं ही तप कर रहे हैं। इस तपस्याका क्या उद्देश्य हो सकता है, इसपर वे सभी समुदायोंके लोग विचार करने लगे ॥ ६-८ ॥

ततः समाप्ते सकले जगत्पते-
र्व्रते समूले सकलेश्वरः शिवः।
द्रष्टुं हरिं लोकहितैषिणं प्रभुं
ययौ भवान्या सह भूतसंघैः ॥ ९ ॥

तदनन्तर जब जगत्पति श्रीकृष्णका वह सारा व्रत मूलसहित परिपूर्ण हो गया, तब सकलेश्वर शिव पार्वती तथा भूतगणोंके साथ उन लोकहितैषी प्रभु श्रीहरिसे मिलनेके लिये गये ॥ ९ ॥

सार्धं कुवेरेण सगृह्यकेन
सख्या प्रियेण प्रभुरीश्वरः शिवः।
स्वयं जटी भूतपिशाचसंवृतः
शरी च खड्गी शशिखण्डशेखरः ॥ १० ॥

उनके साथ गुह्यकोंसहित प्रिय सखा कुबेर भी थे। सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान् शिव स्वयं सिरपर जटा धारण किये भूतों और पिशाचोंसे घिरे हुए थे, धनुष, बाण और खड्गसे युक्त थे। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र शोभा दे रहा था ॥ १० ॥

करेण विभ्रत्सहदर्भकुण्डिकां
करेण साक्षादपरेण दीपिकाम्।
अन्येन विभ्रन्महतीं स डिण्डिमां
शूलं च विभ्रन्नपरेण बाहुना ॥ ११ ॥
गुणान् स रुद्राक्षकृतान् समुद्वह-
ञ्जटाभिरापिङ्गलताम्रमूर्तिः ।
विराजमानः प्रभुरिन्दुशेखरो
वृषेण युक्तः स सितेन शंकरः ॥ १२ ॥

एक हाथमें कुशसहित कमण्डलु धारण किये, दूसरे हाथमें जलती मशाल लिये, तीसरे हाथमें विशाल डमरू धारण किये और चौथे हाथमें त्रिशूल लिये, गलेमें रुद्राक्षकी मालाएँ धारण किये, कुछ-कुछ पिङ्गल एवं ताम्रवर्णके शरीरवाले, जटाओंसे सुशोभित कल्याणकारी भगवान् चन्द्रशेखर श्वेत वृषभसे संयुक्त हो बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ११-१२ ॥

उमास्तनद्वन्द्वसमर्पितानन-
स्तया समाश्लिष्य निपीडिताधरः।
गङ्गाम्बुविक्षालितचन्द्रशेखर-
स्तां चापि वीक्षन् बहुशस्तदा शिवः॥ १३ ॥

उनके मुख-मण्डलकी दृष्टि देवी उमाके उरोजोंपर लगी हुई थी। भगवती उमा भी महादेवजीका आलिङ्गन करके उनका अधर-चुम्बन कर लेती थीं। भगवान् शिवका चन्द्रार्ध-

भविष्यपर्व ] षडशीतितमोऽध्यायः [ १००७

शोभित मस्तक गङ्गाजीके जलसे प्रक्षालित होता था और वे भगवान् शङ्कर उस समय बारंबार देवी उमाकी ओर देखते रहते थे ॥ १३ ॥

भस्माङ्गरगैरनुलेपिताननो महोरगैरुद्वद्धजटः सनातनः । शिरःकपालैः परिशोभितस्तदा द्रष्टुं हरिं केशवमभ्ययाच्छिवः ॥ १४ ॥

उनके मुखपर भस्मस्वरूप अङ्गराग लगा हुआ था। बड़े-बड़े सर्पोंसे उनकी जटाएँ बँधी हुई थीं । नरमुण्डोंकी मालासे सुशोभित वे सनातन शिव उस समय भगवान् केशवको देखनेके लिये उनके पास गये ॥ १४ ॥

यमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तं पुरातनं सांख्यनिबद्धदृष्टयः । यस्यापि देवस्य गुणान् समग्रां- स्तत्त्वांश्चतुर्विंशतिमाहुरेके ॥ १५ ॥

जिन्हें सांख्यदर्शी विद्वान् श्रेष्ठ, महान् एवं पुरातन पुरुष कहते हैं, जिन महादेवजीके समस्त गुणोंको ही एक श्रेणीके विद्वान् चौबीस तत्त्व कहते हैं ॥ १५ ॥

यमाहुरेकं पुरुषं पुरातनं कणादनामानमजं महेश्वरम् । दक्षस्य यज्ञं विनिहत्य यो वै विनाशय देवानसुरान् सनातनः ॥ १६ ॥

जिन्हें एकमात्र पुरातन पुरुष, कणाद नामसे प्रसिद्ध, अजन्मा महेश्वर कहा गया है; जिन सनातन महादेवने दक्षयज्ञका विध्वंस करके देवता और असुरोंको भी मार भगाया था ॥ १६ ॥

यं विदुर्भूततत्त्वज्ञं भूतेशं भूतभावनम् । वामदेवं विरूपाक्षमाहुस्तत्त्वविदो जनाः ॥ १७ ॥ महादेवं सहस्राक्षं कालमूर्तिं चतुर्भुजम् । रुद्रं रोदननामानमाहुर्विश्वेश्वरं शिवम् ॥ १८ ॥ अप्रमेयमनाधारमाहुर्महेश्वरा जनाः । नग्नं नग्नपरीतं तु नागिनं त्वग्निवर्चसम् ॥ १९ ॥ आहुर्विश्वेश्वरं शान्तं शिवमर्दि सनातनम् । तस्य मूर्तिरिमाः सर्वा धराद्याः सकला नृप ॥ २० ॥

जिन्हें तत्त्ववेत्ता पुरुष सम्पूर्ण भूतोंका तत्त्वज्ञ जानते हैं और जिन्हें भूतनाथ, भूतभावन, वामदेव तथा विरूपाक्ष कहते हैं। महादेव, सहस्राक्ष, कालमूर्ति, चतुर्भुज, रुद्र, रोदननामधारी और विश्वेश्वर शिव कहकर पुकारते हैं । जिन्हें शिवमक्त पुरुष अप्रमेय, आधाररहित, नग्न, नग्न पार्षदोंसे घिरा हुआ, नागयुक्त, अग्नितुल्य तेजस्वी, विश्वेश्वर, शान्तस्वरूप, आदि एवं सनातन शिव कहते हैं । राजन् ! ये पृथ्वी आदि सारे तत्त्व उन्हींकी मूर्ति हैं ॥ १७–२० ॥

भूमिरापोऽनलो वायुः खं सूर्यश्च तथा शशी । अग्निश्च यजमानश्च प्रकृतिश्चैवमष्टधा ॥ २१ ॥

पृथ्वीरहित जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, यजमान और प्रकृति—ये महादेवजीके आठ विग्रह हैं ॥

महादेवो महायोगी गिरीशो नीललोहितः । आदिकर्ता महाभर्ता शूलपाणिरुमापतिः । द्रष्टुं विश्वेश्वरं विष्णुं भूतसंघैः समाययौ ॥ २२ ॥

वे महादेव, महायोगी, गिरीश, नील-लोहित, आदिकर्ता, महाभर्ता, शूलपाणि एवं उमावल्लभ शिव जगदीश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये भूत-समूहोंके साथ वहाँ आये ॥ २२ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवागमनकथने पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवजीके आगमनका कथनविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥


षडशीतितमोऽध्यायः

पिशाचों, मुनियों और अप्सराओंके साथ उमासहित भगवान् शङ्करका श्रीकृष्णके समीप गमन

वैशम्पायन उवाच

तस्याग्रे समपद्यन्त भूतसंघाः सहस्रशः ।
घण्टाकर्णो विरूपाक्षः कुण्डधारः कुमुद्रहः ॥ १ ॥
दीर्घरोमा दीर्घभुजो दीर्घबाहुर्निरञ्जनः ।
ऊरुनेत्रः शतमुखः शतग्रीवः शतोदरः ॥ २ ॥
कुण्डोदरो महाग्रीवः स्थूलजिह्वो द्विबाहुकः ।
पार्श्ववक्त्रः सिंहमुख उन्नतांसो महाहनुः ॥ ३ ॥
त्रिबाहुः पञ्चबाहुश्च व्याघ्रवक्त्रः सिताननः ।
एते चान्ये च बहवो दीर्घास्या दीर्घलोचनाः ॥ ४ ॥
नृत्यन्तः प्रहसन्तश्च स्फोटयन्तः परस्परम् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय भगवान् शङ्करके आगे सहस्रों भूतसमूह चल रहे थे— घण्टाकर्ण, विरूपाक्ष, कुण्डधार, कुमुद्रह, दीर्घरोमा, दीर्घभुज, दीर्घबाहु, निरञ्जन, ऊरुनेत्र, शतमुख, शतग्रीव, शतोदर,

१०९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कुण्डोदर, महाग्रीव, स्थूलजिह्व, द्विबाहु, पार्श्ववक्त्र, सिंहमुख, उन्नतांस, महाहनु, त्रिबाहु, पञ्चबाहु, व्याघ्रवक्त्र और सितानन—ये तथा दूसरे भी बहुत-से बड़े-बड़े मुख और विशाल नेत्रवाले भूत नाचते, हँसते और परस्पर ताल ठोंकते थे ॥ १—४ १/२ ॥

तथान्ये घोररूपाश्च तथान्ये विकृताननाः ॥ ५ ॥
प्रेतभक्षाः प्रेतवाहा मांसशोणितभोजनाः ।

इनके अतिरिक्त भी बहुत-से घोर रूप और विकृत मुखवाले भूत थे, जो मुर्दे खाते, मुर्दोंको ढोकर ले जाते और मांस तथा रक्तका आहार करते थे ॥ ५ १/२ ॥

शवानि सुवहन्त्याशु भक्षयन्तस्ततस्ततः ॥ ६ ॥
पिबन्तो रुधिरं घोरं खण्डयन्तः शवान् बहून् ।

वे बहुत-से शव शीघ्रतापूर्वक इधर-उधरसे लाकर खाते थे, भयंकर रक्त पीते थे और बहुत-से शवोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ६ १/२ ॥

कराला वितता दीर्घा धमनीस्नायुसंतताः ॥ ७ ॥
नानाविधाः सुवीराश्च शूलाग्रप्रोतमानुषाः ।
शिरोमालावृताः केचिदान्त्रपाशावपाशिताः ॥ ८ ॥

वे सब-के-सब विस्तृत, विशाल और विकराल थे । उनके शरीरमें व्याप्त हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं । वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले भूत बड़े वीर थे । उन्होंने अपने शूलोंके अग्रभागमें कितने ही मनुष्योंकी लाशें पिरो रखी थीं । कितने ही भूत नरमुण्डोंकी मालाओंसे अलंकृत थे । कितनोंने अपने-आपको आँतड़ियोंके पाशोंसे बाँध रखा था ॥ ७-८ ॥

डिण्डिमैरट्टहासैश्च नादयन्तो वसुन्धराम् ।
कपालिनो भैरवाश्च जटिला मुण्डिनस्तथा ॥ ९ ॥
एवं बहुविधा घोराः पिशाचा विकृताननाः ।
तथान्ये मुनिवीराश्च ध्यायन्तः परमेश्वरम् ॥ १० ॥
पठन्तो वेदवाक्यानि साङ्गानि विविधानि च ।

कोई नगाड़े बजाते और कोई अट्टहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे । कपाली, भैरव, जटिल और मुण्डी—ये भाँति-भाँतिके विकृत मुखवाले चार प्रकारके घोर पिशाच तथा अन्य मुनिवीर वहाँ परमेश्वरका ध्यान और अङ्गोंसहित वेदोंके विविध वाक्योंका पाठ करते थे ॥ ९-१० १/२ ॥

कुण्डिकास्थकराः केचित् केचित् कुशविचारिणः ॥ ११ ॥
कौपीनवसनाः केचित् केचित् कार्पाससंवृताः ।

कोई कमण्डलुमें हाथ डाले हुए थे, कोई कुश लेकर विचर रहे थे, कितने ही वस्त्रकी जगह कौपीनमात्र धारण करते थे और कितनोंने सूती वस्त्रोंसे अपने अङ्गोंको ढक रखा था ॥ ११ १/२ ॥

स्तुवन्तः शंकरं भक्त्या स्तोत्रैर्माहेश्वरैस्तथा ॥ १२ ॥
एकत्र ते मुनिगणा अपरत्र गणास्तथा ।
अन्यत्र सिद्धगन्धर्वाः प्रियाभिः सह संगताः ॥ १३ ॥

वे सब-के-सब भक्तिभावसे शिवसम्बन्धी स्तोत्रोंद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे । एक ओर तो मुनिगण थे और दूसरी ओर प्रमथगण । इसी तरह एक ओर सिद्ध और गन्धर्व अपनी प्रियतमाओंके साथ वहाँ आये थे ॥ १२-१३ ॥

नृत्यन्ति नृत्यकुशला गायन्ति स्म च कन्यकाः ।
विद्याधरास्तथान्यत्र स्तुवन्तः शंकरं शिवम् ॥ १४ ॥

नृत्यकुशल गन्धर्वकन्याएँ नाचती और गाती थीं । अन्यत्र विद्याधरगण कल्याणकारी भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे ॥ १४ ॥

ननृतुस्तस्य पुरतो गच्छन्तोऽप्सरसां गणाः ।
एवमेतैर्महाघोरैः पिशाचैर्भूतकिन्नरैः ॥ १५ ॥
मुनिभिश्चैव प्रमथैः समं शर्वः समाययौ ।
यत्र विश्वेश्वरो विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १६ ॥
यत्र ते लोकपालाश्च तिष्ठन्ति स्म दिदृक्षया ।
उमया लोकभाविन्या गङ्गया चन्द्रशेखरः ॥ १७ ॥

उनके आगे-आगे चलती हुई अप्सराएँ नृत्य करती थीं । इस प्रकार इन महाभयंकर पिशाचों, भूतों, किन्नरों, मुनियों और प्रमथगणोंके साथ भगवान् शिव उस स्थानपर आये, जहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण अत्यन्त कठोर तपस्या करते थे और जहाँ उनके दर्शनकी इच्छासे लोकपालगण खड़े थे । लोकभाविनि उमा और गङ्गाके साथ भगवान् चन्द्रशेखर वहाँ गये ॥ १५-१७ ॥

स सर्वलोकप्रभवो भवो विभु-
र्जटी च साक्षात् प्रणवात्मकः कृती ।
द्रष्टुं हरिं विष्णुमुदारविक्रमो
ययौ यथेष्टं पिशिताशनैर्वृतः ॥ १८ ॥

सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी भगवान् भव साक्षात् प्रणवस्वरूप हैं । वे जटाधारी और कृतकृत्य हैं । उनका पराक्रम महान् है । वे पिशाचोंसे घिरकर यथेष्ट भावसे श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये गये ॥ १८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां महादेवागमने षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें महादेवजीका आगमनविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

शंकरजीसे देवताओंकी प्रार्थना

भविष्यपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः [ १००९


सप्ताशीतितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णद्वारा महादेवजीकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

एवं बहुविधैर्भूतैः पिशाचैरुरागैः सह।
आगत्य भगवान् रुद्रः शंकरो वृषवाहनः ॥ १ ॥
ददर्श विष्णुं देवेशं तपन्तं तप उत्तमम्।
जुह्वानमग्निं विधिवद् द्रव्यैर्मेध्यैर्जगत्पतिम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस तरह नाना प्रकारके भूतों, पिशाचों और सर्पोंके साथ आकर सबका कल्याण करनेवाले वृषभवाहन भगवान् रुद्रने उत्तम तपस्या करते हुए देवेश्वर विष्णु (कृष्ण) को देखा। वे जगदीश्वर श्रीकृष्ण भाँति-भाँतिके पवित्र द्रव्योंद्वारा विधिपूर्वक अग्निमें आहुति देते थे ॥ १-२ ॥

गरुडाहृतकाष्ठं तु जटिलं चीरवाससम्।
चक्रेणानीतकुसुमं खड्गानीतकुशं तथा ॥ ३ ॥
गदाकृतसमाचारं देवदेवं जनार्दनम्।
इन्द्राद्यैर्देवसंघैश्च वृतं मुनिगणैः सह ॥ ४ ॥

वे सिरपर जटा और अङ्गोंमें चीर वस्त्र धारण किये बैठे थे। गरुड़जी उनके लिये समिधा ला देते थे, चक्र फूल चुन लाता था, खड्ग कुशा लाया करता था तथा गदा भी उन देवाधिदेव जनार्दनकी आवश्यक परिचर्या करती थी। वे इन्द्र आदि देवसमूहों तथा मुनिगणोंसे घिरे हुए थे ॥ ३-४ ॥

अचिन्त्यं सर्वभूतानां ध्यायन्तं किमपि प्रभुम्।
अवरुह्य वृषाच्छर्वो भगवान् भूतभावनः ॥ ५ ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा ललाटाक्ष उमापतिः।

समस्त प्राणियोंके लिये अचिन्त्य वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी अनिर्वचनीय ध्येय वस्तुका चिन्तन कर रहे थे। उन्हें देखते ही ललाटनेत्रधारी, प्रसन्नचित्त, उमावल्लभ, भूतभावन भगवान् शर्व अपने वाहन वृषभसे उतर पड़े। उस समय वे बड़े प्रसन्न थे ॥ ५ ॥

ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसा गुह्यकास्तथा ॥ ६ ॥
मुनयो विप्रवर्याश्च जयशब्दं प्रचक्रिरे।
जय देव जगन्नाथ जय रुद्र जनार्दन ॥ ७ ॥

तदनन्तर भूत, पिशाच, राक्षस, गुह्यक तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ मुनिगण वहाँ जय-जयकार करने लगे—'देव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। रुद्रस्वरूप जनार्दन ! आपकी जय हो ॥ ६-७ ॥

जय विष्णो हृषीकेश नारायण परायण।
जय रुद्र पुराणात्मन्नजय देव हरेश्वर ॥ ८ ॥

'इन्द्रियोंके प्रेरक, सर्वव्यापी, नारायण ! आपकी जय हो। सबको आश्रय देनेवाले रुद्रदेव ! आपकी जय हो ! पुराणात्मन् ! देव ! हरेश्वर ! आपकी जय हो ॥ ८ ॥

आदिदेव जगन्नाथ जय शंकर भावन।
जय कौस्तुभदीप्ताङ्ग जय भस्मविराजित ॥ ९ ॥

'आदिदेव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। शङ्कर ! सबके पालक एवं उत्पादक देव ! आपकी जय हो। कौस्तुभमणिसे उद्भासित अङ्गवाले नारायण ! आपकी जय हो। भस्ममय अङ्गरागसे विराजमान शिव ! आपकी जय हो ॥ ९ ॥

जय चक्रगदापाणे जय शूलित्रिलोचन।
जय मौक्तिकदीप्ताङ्ग जय नागविभूषण ॥ १० ॥

'हाथोंमें चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायण ! आपकी जय हो। शूलधारी त्रिलोचन ! आपकी जय हो। मोतियोंकी मालासे उद्भासित अङ्गवाले श्रीकृष्ण ! आपकी जय हो। नागहारसे विभूषित महादेव ! आपकी जय हो' ॥

इति ते मुनयः सर्वे प्रणामं चक्रिरे हरिम्।
तत उत्थाय भगवान् दृष्ट्वा देवमवस्थितम् ॥ ११ ॥
वृषध्वजं विरूपाक्षं शंकरं नीललोहितम्।
ततो हृष्टमना विष्णुस्तुष्टाव हरमीश्वरम् ॥ १२ ॥

इस प्रकार स्तुति करके उन समस्त मुनियोंने वहाँ श्रीहरिको प्रणाम किया। उस समय वृषभध्वज, विरूपाक्ष, एवं नीललोहित रूपवाले पापहारी, ईश्वर, शङ्करदेवको वहाँ उपस्थित देख श्रीकृष्णका चित्त हर्षसे खिल उठा और उन्होंने महादेवजीकी स्तुति आरम्भ की ॥ ११-१२ ॥

श्रीभगवानुवाच

नमस्ते शितिकण्ठाय नीलग्रीवाय वेधसे।
नमस्ते शोचिषे अस्तु नमस्ते उपवासिने ॥ १३ ॥

श्रीभगवान् बोले—जिनके कण्ठमें हालाहल विष है, अतएव जो नीलग्रीव (नीलकण्ठ) कहे गये हैं। वेधा (जगत्के स्रष्टा), दीप्तिमान् तथा उपवास-व्रतमें तत्पर उन महादेवजीको नमस्कार है ॥ १३ ॥

नमस्ते मीडुषे अस्तु नमस्ते गदिने हर।
नमस्ते विश्वतनवे वृषाय वृषरूपिणे ॥ १४ ॥

हर ! आप सेचन करनेमें समर्थ हैं, आपको नमस्कार है। आप गदाधारी हैं, आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है, आपको नमस्कार है। आप वृषभरूपधारीधर्म हैं, आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥

अमूर्ताय च देवाय नमस्तेऽस्तु पिनाकिने।
नमः कुञ्जाय कूपाय शिवाय शिवरूपिणे ॥ १५ ॥

१०१०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आप अमूर्त देवता तथा पिनाकधारी हैं; आपको नमस्कार है। आप कुञ्ज, कूपमें निवास करनेवाले और कल्याणस्वरूप शिव हैं, आपको नमस्कार है ॥ १५ ॥

नमस्तुष्टाय तुण्डाय नमस्तुट्टिटुटाय च ।
नमः शिवाय शान्ताय गिरिशाय च ते नमः॥ १६ ॥

आप संतुष्ट रहनेवाले, मुखस्वरूप तथा दुष्टोंकी हिंसा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप पर्वतपर शयन करनेवाले शान्तस्वरूप शिव हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ १६ ॥

नमो हराय हिप्राय नमो हरिहराय च ।
नमोऽघोराय घोराय घोराघोरप्रियाय च ॥ १७ ॥

आप हर, हिप्र ( रेचक एवं पूकरूप ) तथा हरिहर-स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप अघोर, घोर तथा घोराघोरप्रिय हैं, आपको नमस्कार है ॥ १७ ॥

नमोऽघण्टाय घण्टाय नमो घटिघटाय च ।
नमः शिवाय शान्ताय गिरिशाय च ते नमः ॥ १८ ॥

आप घण्टारहित, घण्टायुक्त तथा घटिघट ( घड़ेके भी घड़ा ) हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आप पर्वतपर शयन करनेवाले शान्तस्वरूप शिव हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ १८ ॥

नमो विरूपरूपाय पुराय पुरहारिणे ।
नम आद्याय बीजाय शुचयेऽष्टस्वरूपिणे ॥ १९ ॥

आप विरूप रूप धारण करनेवाले हैं, क्षेत्रस्वरूप तथा असुरोंके तीनों पुरोंका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप सबके आदि-बीज, परम पवित्र तथा अष्टमूर्तिधारी हैं, आपको नमस्कार है ॥ १९ ॥

नमः पिनाकहस्ताय नमः शूलासिधारिणे ।
नमः खट्वाङ्गहस्ताय नमस्ते कृत्तिवाससे ॥ २० ॥

आपके हाथमें पिनाक शोभा पाता है, आपको नमस्कार है। आप शूल और खङ्ग धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप अपने हाथमें खट्वाङ्ग धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप गजासुरके चर्मको वस्त्रके रूपमे ओढ़ते हैं, आपको नमस्कार है ॥ २० ॥

नमस्ते देवदेवाय नम आकाशमूर्तये ।
हराय हरिरूपाय नमस्ते तिग्मतेजसे ॥ २१ ॥

देवताओंके भी देवता आपको नमस्कार है। आकाश-स्वरूप आपको नमस्कार है। हरिरूपधारी आप भगवान् हरको नमस्कार है। प्रचण्ड तेजवाले सूर्यतुल्य आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥

भक्तप्रियाय भक्ताय भक्तानां वरदायिने ।
नमोऽभ्रमूर्तये देव जगन्मूर्तिधराय च ॥ २२ ॥

आप भक्तोंके प्रिय, स्वयं भी श्रीहरिके भक्त तथा भक्तोंको वर देनेवाले हैं। देव ! आप मेघस्वरूप हैं तथा विश्वरूप धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥

नमश्चन्द्राय देवाय सूर्याय च नमो नमः।
नमः प्रधानदेवाय भूतानां पतये नमः ॥ २३ ॥

आप चन्द्रदेवको नमस्कार है। आप सूर्यदेवको भी बारंबार नमस्कार है। आप प्रधान देवता तथा सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ २३ ॥

करालाय च मुण्डाय विकृताय कपर्दिने ।
अजाय च नमस्तुभ्यं भूतभावनभावन ॥ २४ ॥

आप विकराल रूपधारी, मूँड़ मुँड़ाये हुए संन्यासी, विकृतस्वरूप तथा जटा-जूटधारी हैं। भूतभावनभावन ! आप अजन्मा हैं, आपको नमस्कार है ॥ २४ ॥

नमोऽस्तु हरिकेशाय पिङ्गलाय नमो नमः।
नमस्तेऽभीपुहस्ताय भीरुभीरुहराय च ॥ २५ ॥

सूर्यकी किरणें आपके केश हैं, आपको नमस्कार है। आपकी अङ्गकान्ति पिङ्गलवर्णकी है, आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही मुझ श्रीकृष्णके रूपमें पार्थके सारथि बनकर हाथमें चाबुक लिये रहते हैं। आप भीरु-से-भीरु ( अत्यन्त भयभीत ) तथा हर ( महान् संहारकारी ) हैं, आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥

हराय भीतिरूपाय घोराणां भीतिदायिने ।
नमो दक्षमखघ्नाय भग्ननेत्रापहारिणे ॥ २६ ॥

आप भीतिस्वरूप हर तथा भयंकर दैत्योंको भय देनेवाले हैं, दक्षके यज्ञका विध्वंस तथा भग देवताके नेत्रका अपहरण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ २६ ॥

उमापते नमस्तुभ्यं कैलासनिलयाय च।
आदिदेवाय देवाय भवाय भवरूपिणे ॥ २७ ॥

उमापते ! आप कैलासवासी, आदि देवता, देवमय, जगत्स्वरूप तथा भवनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है ॥

नमः कपालहस्ताय नमोऽजमथनाय च ।
त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं त्र्यक्षाय च शिवाय च॥ २८ ॥

आप हाथमें कपाल धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आपने ब्रह्माजीके सिरको मथ डाला है, आपको नमस्कार है। आप त्रिनेत्रधारी होनेके कारण त्र्यम्बक और त्र्यक्ष कहलाते हैं, आप भगवान् शिवको नमस्कार है ॥

वरदाय वरेण्याय नमस्ते चन्द्रशेखर ।
नम इध्माय हविषे ध्रुवाय च कुशाय च ॥ २९ ॥

चन्द्रशेखर ! आप वरदायक एवं वरणीय देवताको नमस्कार है, आप ही समिधा, हविष्य, ध्रुव एवं कुशरूप हैं, आपको नमस्कार है ॥ २९ ॥

भविष्यपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [ १०११


नमस्ते शक्तियुक्ताय नागपाशप्रियाय च।
विरूपाय सुरूपाय भद्रपानप्रियाय च॥ ३०॥
आप शक्तिसे संयुक्त, नागपाशको पसंद करनेवाले, विरूप एवं सुन्दर रूप धारण करनेवाले तथा मद्यपान (मङ्गलकारी पेय रस) के प्रेमी हैं, आपको नमस्कार है॥ ३०॥

श्मशानरतये नित्यं जयशब्दप्रियाय च।
खरप्रियाय खर्वाय खराय खररूपिणे॥ ३१॥
आप श्मशानभूमिमें प्रसन्नताका अनुभव करते हैं, जय-जयकारका शब्द आपको सदा ही प्रिय है, खर नामक राक्षस आपकी प्रीतिका पात्र था, आपका स्वरूप खर्व (नाटा) है, आप खर (तीव्र या कर्कश स्वभाववाले) हैं, खर (गर्दभ या राक्षस) आपका ही रूप है, आपको नमस्कार है॥ ३१॥

भद्रप्रियाय भद्राय भद्ररूपधराय च।
विरूपाय सुरूपाय महाघोराय ते नमः॥ ३२॥
आपको माङ्गलिक वस्तु प्रिय है, आप मङ्गलमय हैं, मङ्गलरूपधारी हैं, विरूप, सुन्दर रूपवाले तथा महाभयंकर हैं, आपको नमस्कार है॥ ३२॥

घण्टाय घण्टभूषाय घण्टभूषणभूषिणे।
तीव्राय तीव्ररूपाय तीव्ररूपप्रियाय च॥ ३३॥
आप घण्टारूप हैं, घण्टासे विभूषित हैं और घण्टायुक्त भूषण धारण करते हैं। आप तीव्र हैं, तीव्र रूपधारी हैं तथा तीव्र रूपवाले पदार्थ आपको विशेष प्रिय हैं, आपको नमस्कार है॥ ३३॥

नग्नाय नग्नरूपाय नग्नरूपप्रियाय च।
भूतावास नमस्तुभ्यं सर्वावास नमो नमः॥ ३४॥
आप नग्न हैं, नग्नरूपधारी हैं तथा नग्नरूपवाले आपको विशेष प्रिय हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंके आवासस्थान हैं, आपको नमस्कार है। सबके आश्रयभूत महेश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ३४॥

नमः सर्वात्मने तुभ्यं नमस्ते भूतिदायक।
नमस्ते वामदेवाय महादेवाय ते नमः॥ ३५॥
आप सर्वात्माको नमस्कार है। ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले रुद्रदेव! आपको नमस्कार है। आप वामदेव हैं, आपको नमस्कार है। आप महादेव हैं, आपको नमस्कार है॥ ३५॥

का नु वाक्स्तुतिरूपा ते को नु स्तोतुं प्रशक्नुयात्।
कस्य वा स्फुरते जिह्वा स्तुतौ स्तुतिमतां वर॥ ३६॥
भला कौन ऐसी वाणी है, जो आपकी स्तुतिके अनुरूप होगी (आपकी महिमा वाणीकी पहुँचसे बाहर है)? कौन पुरुष आपकी स्तुति कर सकता है? स्तुतिमानों (स्तवनीय महापुरुषों) में श्रेष्ठ महेश्वर! किसकी जिह्वा आपकी स्तुतिके लिये सचेष्ट हो सकती है?॥ ३६॥

क्षमस्व भगवन् देव भक्तोऽहं त्राहि मां हर।
सर्वात्मन् सर्वभूतेश त्राहि मां सततं हर॥ ३७॥
रक्ष देव जगन्नाथ लोकान् सर्वात्मना हर।
त्राहि भक्तान् सदा देव भक्तप्रिय सदा हर॥ ३८॥
भगवन्! महादेव! मेरा अपराध क्षमा कीजिये। हर! मैं आपका भक्त हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। सर्वात्मन्! सर्वभूतेश्वर हर! आप निरन्तर मेरा संरक्षण करें। देव! जगन्नाथ! हर! आप सम्पूर्ण लोकोंका सब प्रकारसे संरक्षण करें। देव! सदा अपने भक्तोंसे प्रेम करनेवाले हर! भक्तजनोंकी सदा रक्षा कीजिये॥ ३७-३८॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां विष्णुकृतेश्वरस्तुतौ सप्ताशीतितमोऽध्यायः॥ ८७॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकृत महादेवस्तुतिविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८७॥


अष्टाशीतितमोऽध्यायः

भगवान् शिवद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच
ततो वृषध्वजो देवः शूली साक्षादुमापतिः।
करं करेण संस्पृश्य विष्णोश्चक्रधरस्य ह॥ १॥
प्रोवाच भगवान् रुद्रः केशवं गरुडध्वजम्।
शृण्वतां सर्वदेवानां मुनीनां भावितात्मनाम्॥ २॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले देवता, त्रिशूलधारी साक्षात् उमावल्लभ भगवान् रुद्र चक्रधारी श्रीकृष्णका हाथ अपने हाथमें लेकर समस्त देवताओं तथा पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके सुनते हुए गरुड़ध्वज केशवसे इस प्रकार बोले—॥ १-२॥

किमिदं देवदेवेश चक्रपाणे जनार्दन।
तपश्चर्या किमर्थं ते प्रार्थना तव का विभो॥ ३॥
‘देवदेवेश्वर! चक्रपाणे! जनार्दन! आप यह क्या कर रहे हैं? आपकी यह तपश्चर्या किसलिये हो रही है? प्रभो! आपकी प्रार्थना क्या है?॥ ३॥

स्वयं विष्णुर्भवान् नित्यस्तपस्त्वं तपसां हरे।
पुत्रार्थे यदि ते देव तपश्चर्या जनार्दन॥ ४॥

१०१२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

पुत्रो दत्तो मया देव पूर्वमेव जगत्पते। शृणु तत्रापि भगवन् कारणं कारणात्मक ॥ ५ ॥ 'हरे ! आप स्वयं नित्य-स्वरूप भगवान् विष्णु हैं, तपस्याओंकी भी तपस्या हैं। देव ! जनार्दन ! जगत्पते ! यदि आपकी यह तपस्या पुत्रके लिये हो रही है तो मैंने पहलेसे ही आपको पुत्र दे रखा है। देव ! भगवन् ! कारणात्मक नारायण ! इसमें जो कारण है, उसे आप सुनिये ॥ ४-५ ॥

तपश्चर्तुं प्रवृत्तोऽहं कुतश्चित् कारणाद्धरे । वर्षायुतं महाघोरं पुरा कृतयुगे तदा ॥ ६ ॥ 'हरे ! प्राचीन कालके कृतयुगकी बात है कि मैं उन दिनों किसी कारणवश दस हजार वर्षोंके लिये महाघोर तपस्यामें संलग्न हुआ था ॥ ६ ॥

भवानी तत्र मे देव परिचर्तुं तदाभवत् । पित्रा नियुक्ता देवेश उमैषा वरवर्णिनी ॥ ७ ॥ 'देव ! देवेश्वर ! उस समय वहाँ यह मेरी धर्मपत्नी परम सुन्दरी उमा अपने पिताकी आज्ञासे मेरी सेवा करती थी ॥

भीत इन्द्रस्तदा देव मारं मां प्रैषयत्तदा । मधुना सह संयुक्तो मारो मामागतस्तदा ॥ ८ ॥ 'देव ! मेरी उस तपस्यासे इन्द्रको भय हुआ, अतः उस समय उन्होंने कामदेवको मेरे पास भेजा। तब कामदेव अपने सखा वसन्तको साथ लेकर मेरे समीप आया ॥ ८ ॥

लक्ष्यं मामकरोत् तत्र बाणस्य प्रेषितस्य ह। एष मां सेवते तत्र दानात्पुष्पादिनां हरे ॥ ९ ॥ 'हरे ! वहाँ पहुँचते ही कामदेवने मुझे अपने चलाये हुए बाणका निशाना बनाया। यह पार्वती वहाँ फूल आदि जुटाने-के द्वारा मेरी सेवा करती थी ॥ ९ ॥

ततः क्रुद्धोऽहमभवं दृष्ट्वा मारं तथाविधम् । क्रुद्धवतो मम देवेश नेत्रादग्निः पपात ह ॥ १० ॥ 'देवेश्वर ! कामदेवको अपने ऊपर बाण चलाते देख मैं उसके ऊपर कुपित हो उठा। क्रोध करनेपर मेरे ललाटस्थ नेत्रसे सहसा अग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १० ॥

सोऽयमग्निस्तदा मारं भस्मसात् कृतवान् हरे । अचिन्तयं तदा विष्णो शक्रस्यैतच्चिकीर्षितम् ॥ ११ ॥ 'सर्वव्यापी हरे ! उस अग्निने उस समय कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया, तब मेरे ध्यानमें यह बात आयी कि यह सारी करतूत इन्द्रकी थी ॥ ११ ॥

ततः प्रभृति देवेश दया तं प्रति वर्तते। ब्रह्मणा च नियुक्तोऽस्मि प्रीतस्तत्र जनार्दन ॥ १२ ॥ 'देवेश्वर ! जनार्दन ! तभीसे कामदेवके प्रति मुझे बड़ी दया आती है। मैं मन-ही-मन उसपर प्रसन्न हूँ। ब्रह्माजीने भी मुझे प्रेरित किया है कि मैं उसके लिये नूतन शरीर-धारणका अवसर दूँ ॥ १२ ॥

नियुक्तः पुत्ररूपेण स ते देव जगत्पते। ज्येष्ठस्त्वं सुतो देव प्रद्युम्नेत्यभिविश्रुतः ॥ १३ ॥ स्मरं तं विद्धि देवेश नात्र कार्या विचारणा । 'देव ! जगत्पते ! अतः मैंने कामदेवको आपके पुत्र-रूपसे नियुक्त किया है। देव ! वह प्रद्युम्न नामसे विख्यात आपका ज्येष्ठ पुत्र होगा। देवेश्वर ! आप उसे कामदेव ही समझें, इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है' ॥ १३३॥

इत्युक्त्वा पुनराहेदं याथात्म्यं दर्शयन्निव ॥ १४ ॥ मुनीनां श्रोतुकामाનાં याथात्म्यं तत्र सत्तमः। अञ्जलिं सम्पुटं कृत्वा विष्णुमुद्दिश्य शंकरः ॥ १५ ॥ उमया सार्धमीशानो याथात्म्यं वक्तुमर्हत। ऐसा कहकर श्रीहरिके यथार्थ स्वरूपको सुननेकी इच्छा-वाले मुनियोंके समक्ष उनके यथावत् स्वरूपका परिचय देते हुए-से सत्पुरुषशिरोमणि सर्वेश्वर भगवान् शङ्कर उमादेवीके साथ श्रीकृष्णके लिये हाथ जोड़कर फिर इस प्रकार बोलने-उनकी यथार्थताका प्रतिपादन करनेको उद्यत हुए ॥

हरे कुर्वन्ति तत्रैवमञ्जलिं कुरुसत्तम ॥ १६ ॥ मुनयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह किन्नराः। अञ्जलिं चक्रिरे विष्णौ देवदेवेश्वरे हरौ ॥ १७ ॥ कुरुश्रेष्ठ ! वहाँ महादेवजीके इस प्रकार हाथ जोड़नेपर दूसरे-दूसरे मुनि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा किन्नरोंने भी उन सर्वव्यापी देवदेवेश्वर श्रीहरिके समीप हाथ जोड़ लिये ॥

महेश्वर उवाच

यत्तत् कारणमाहुस्तत् सांख्याः प्रकृतिसंज्ञकम्! ततो महान् समुत्पन्नः प्रकृतिर्यस्य कारणम् ॥ १८ ॥ महेश्वर बोले—सांख्यशास्त्रके विद्वान् जिस प्रकृति-संज्ञक कारणतत्त्वका वर्णन करते हैं, उससे 'महान्' (मह-त्तत्त्व या समष्टि बुद्धि) उत्पन्न हुआ, जिसका उपादान कारण प्रकृति है ॥ १८ ॥

त्रिधा भूतं जगद्योनिं प्रधानं कारणात्मकम् । सत्त्वं रजस्तमो विष्णो जगदण्डं जनार्दन ॥ १९ ॥ तस्य कारणमाहुस्त्वां सांख्यप्रकृतिसंज्ञकम् । तद्रूपेण भवान् विष्णो परिणम्याधितिष्ठति ॥ २० ॥ सर्वव्यापी जनार्दन ! कारणस्वरूप जो प्रधान (प्रकृति) है, वही इस जगत्की योनि है। उसके तीन भेद हैं—सत्त्व, रज और तम। इस त्रिगुणमयी प्रकृतिसे ही यह विश्व ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। इसका कारणभूत जो सांख्य-प्रकृति है, उसे विद्वान् पुरुष आपका ही स्वरूप बताते हैं । विष्णो !

भविष्यपर्व.] अष्टाशीतितमोऽध्यायः १०१३


उसके रूपमें आप ही परिणामको प्राप्त होकर उसके अधिष्ठाता बने रहते हैं ॥ १९-२० ॥

तस्मात्तु महतो घोरादहंकारो महानभूत् ।
स त्वमादौ जगन्नाथ परिणामस्तथा हि सः ॥ २१ ॥

उस घोर महान् (महत्तत्त्व) से महान् (समष्टिभूत) अहङ्कार प्रकट हुआ। जगन्नाथ! आदिकालमें प्रकट हुआ वह महत्तत्त्वका वैसा (अहंकारात्मक) परिणाम आप ही हैं ॥

अहंकारात् प्रभो देव कारणानि महान्ति च ।
तन्मात्राणि तथा पञ्च भूतानि प्रभवन्त्युत ॥ २२ ॥

प्रभो! देव! अहङ्कारसे 'तन्मात्र' नामक महान् कारण उत्पन्न हुए, जिनसे पञ्च महाभूतोंका प्राकट्य हुआ है ॥ २२ ॥

तानि त्वामाहुरीशानं भूतानीह जगत्पते ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ २३ ॥

जगत्पते! इस जगत्में जो वे पाँचों महाभूत हैं, उन्हें भी आप सर्वेश्वरका ही स्वरूप बताते हैं। उनके नाम ये हैं- पृथिवी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ भूत अग्नि ॥ २३ ॥

चक्षुर्घाणं तथा स्पर्शो रसनं श्रोत्रमेव च ।
मनः षष्ठं तथा देव प्रेरकं तत्र तत्र ह ॥ २४ ॥

देव! नेत्र, नासिका, त्वचा, रसना और कान—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन्हींके साथ छठा मन है, जो उन इन्द्रियोंको विभिन्न विषयोंमें जानेके लिये प्रेरित करता है ॥ २४ ॥

कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि वागादीनि जनार्दन ।
त्वमेव तानि सर्वाणि करोषि नियतात्मवान् ॥ २५ ॥
स्वेषु स्वेषु जगन्नाथ विषयेषु तथा हरे ।
निवेशयसि देवेश योग्यामिन्द्रियपद्धतिम् ॥ २६ ॥

जनार्दन! वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ और हैं। जगन्नाथ! हरे! अपने मनको संयममें रखनेवाले आप परमात्मा ही उन सब इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंमें नियुक्त करते हैं। देवेश्वर! आप ही योग्य इन्द्रिय-मार्गकी स्थापना करते हैं ॥ २५-२६ ॥

यदा त्वं रजसा युक्तस्तदा भूतानि सृष्टवान् ।
यदा च सत्त्वयुक्तोऽसि तदा पाता जगत्त्रयम् ॥ २७ ॥
यदा त्वं तमसाऽऽकृष्टस्तदा संहरसे जगत् ।

जब आप रजोगुणसे संयुक्त हुए, तब आपने समस्त प्राणियोंकी सृष्टि की। जब आप सत्त्वगुणसे युक्त होते हैं, तब तीनों लोकोंका पालन करते हैं और जब तमोगुणसे आकृष्ट होते हैं, तब जगत्का संहार करते हैं ॥ २७½ ॥

त्रिभिरेव गुणैर्युक्तः सृष्टिरक्षाविनाशने ॥ २८ ॥
धत्तसे त्रिविधां भूतिमादाय नियतात्मवान् ।

इस प्रकार आप नियतात्मा परमेश्वर तीनों ही गुणोंसे युक्त होकर अपनी त्रिविध ऐश्वर्य (शक्ति) को साथ रखते हुए सृष्टि, रक्षा और संहारके कार्यमें सदा संलग्न रहते हैं ॥

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नियोजयसि माधव ॥ २९ ॥
प्राणिनामुपभोगार्थमन्तः स्थित्वा जगद्गुरो ।
तस्मात् सर्वत्र भूतेषु वर्तते सर्वभोगवान् ॥ ३० ॥

माधव! जगद्गुरो! आप प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित होकर उनके उपभोगके लिये इन्द्रियोंको विषयोंमें लगाते हैं। इसलिये सम्पूर्ण भूतोंमें आप ही समस्त भोगोंसे सम्पन्न हैं ॥

ब्रह्मा त्वं सृष्टिकाले तु स्थितौ विष्णुरसि प्रभो ।
संहारे रुद्रनामासि त्रिधामा त्वमसि प्रभो ॥ ३१ ॥

प्रभो! सृष्टिकालमें आप ही ब्रह्मा हैं, पालनकालमें विष्णु कहलाते हैं तथा संहारकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं। भगवन्! इस प्रकार आप तीन धामवाले हैं ॥ ३१ ॥

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
एताः प्रकृतयो देव भिन्नाः सर्वत्र ते हरे ॥ ३२ ॥

हरे! देव! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि (और अहङ्कार)—ये सर्वत्र उपलब्ध होनेवाली आठ भिन्न-भिन्न प्रकृतियाँ आपकी ही हैं ॥ ३२ ॥

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
सहस्रधारः साहस्त्री सहस्रात्मा दिवस्पतिः ॥ ३३ ॥

आप सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित विराट् पुरुष हैं। आपके सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं, धारण करनेवाली भुजाएँ भी सहस्रों हैं। आपकी सभी वस्तुएँ सहस्रोंकी संख्यामें सुशोभित होती हैं। आपके सहस्रों रूप हैं और आप ही स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्र हैं ॥ ३३ ॥

भूमिं सर्वामिमां प्राप्य सप्तद्वीपां ससागराम् ।
अणुः सर्वत्रगो भूत्वा अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ॥ ३४ ॥

सातों द्वीपों और समुद्रोंसे युक्त इस सारी पृथ्वीको व्याप्त करके आप सूक्ष्म एवं सर्वव्यापी होकर इस ब्रह्माण्डसे दस अङ्गुल ऊपर उठे हुए हैं ॥ ३४ ॥

त्वमेवेदं जगत् सर्वं यद् भूतं यद् भविष्यति ।
त्वत्तो विराट् प्रादुर्भूतः सम्राट् चैव जनार्दन ॥ ३५ ॥

जो हुआ है और जो होनेवाला है, वह यह सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं। जनार्दन! आपसे ही विराट् और सम्राट् (विराटके अधिष्ठाता पुरुष) की उत्पत्ति हुई है ॥ ३५ ॥

तव वक्त्राज्जगन्नाथ ब्राह्मणो लोकरक्षकः ।
प्रादुरासीत् पुराणात्मन् षट्कर्मनिरतः सदा ॥ ३६ ॥

पुराणात्मन्! जगन्नाथ! आपके मुखसे यजन-याजन आदि छः कर्मोंमें सदा तत्पर रहनेवाला लोकरक्षक ब्राह्मण प्रकट हुआ है ॥ ३६ ॥

१०१४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

राजन्यस्तु तथा बाह्वोरासीत् संरक्षणे रतः ।
ऊर्वोर्वैश्यस्तथा विष्णो पादाच्छूद्र उदाहृतः ॥ ३७ ॥
विष्णो ! आपकी भुजाओंसे रक्षामकर्ममें रत रहनेवाले क्षत्रियकी, दोनों जाँघोंसे वैश्यकी तथा पैरोंसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई बतायी गयी है ॥ ३७ ॥

एवं वर्णा जगन्नाथ तव देहाज्जनार्दन ।
मनसस्तव देवेश चन्द्रमाः समपद्यत ॥ ३८ ॥
सुखकृत् सर्वभूतानां शीतांशुग्मितप्रभः ।
जगदीश्वर ! जनार्दन ! इस प्रकार चारों वर्ण आपके शरीरसे प्रकट हुए हैं। देवेश्वर ! आपके मनसे समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले अमित कान्तिमान् शीतरश्मि चन्द्रमाकी उत्पत्ति हुई है ॥ ३८½ ॥

अक्ष्णोः सूर्यः समुत्पन्नः सर्वप्राणिविलोचनः॥ ३९ ॥
यस्य भासा जगत् सर्वं भासते भानुमानसौ ।
मुखादिन्द्रश्च अग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत ॥ ४० ॥
आपके नेत्रोंसे समस्त प्राणियोंके नेत्रस्वरूप वे भानुमान् (अंशुमाली) सूर्य उत्पन्न हुए हैं, जिनकी प्रभासे सारा जगत् प्रकाशित होता है। आपके मुखसे इन्द्र और अग्नि तथा प्राणसे वायुदेवका प्राकट्य हुआ है ॥ ३९-४० ॥

नाभेरभूदन्तरिक्षं तव देव जनार्दन ।
द्यौरासीत् तु महाघोरा शिरसस्तव गोपते ॥ ४१ ॥
देव ! जनार्दन ! आपकी नाभिसे अन्तरिक्ष प्रकट हुआ। गोपते ! आपके मस्तकसे महाघोर द्युलोकका आविर्भाव हुआ है ॥ ४१ ॥

पद्भ्यां भूमिः समुत्पन्ना दिशः श्रोत्राज्जगत्पते ।
एवं सृष्ट्वा जगत् सर्वं व्याप्य सर्वं व्यवस्थितः ॥ ४२ ॥
जगत्पते ! आपके पैरोंसे पृथ्वी और कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करके आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ ४२ ॥

व्याप्य सर्वानिमाँल्लोकान् स्थितः सर्वत्र केशव ।
ततश्च विष्णुरनामासि धातोर्व्याप्तेश्च दर्शनात् ॥ ४३ ॥
केशव ! इन सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त होकर आप सर्वत्र विराजमान हैं। इसलिये ‘विष्’ धातुके व्याप्तिरूप अर्थका दर्शन होनेसे आप ‘विष्णु’ नाम धारण करते हैं ॥ ४३ ॥

नारा आपः समाख्यातास्तासामयनमादितः ।
यतस्त्वं भूतभव्येश तन्नारायणशब्दितः ॥ ४४ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी विष्णुदेव ! जलको नार कहते हैं, उस नारके आप आदिकालसे ही अयन (आश्रय) हैं, इसलिये ‘नारायण’ कहलाते हैं ॥ ४४ ॥

हरसि प्राणिनो देव ततो हरिरिति स्मृतः ।
शंकरोऽसि सदा देव ततः शंकरतां गतः ॥ ४५ ॥
देव ! आप प्राणियों (के पाप-ताप) का हरण करते हैं, इसलिये ‘हरि’ कहे गये हैं। देव ! आप सदा सबका ‘शम्’ (कल्याण) करते हैं, इसलिये ‘शङ्कर’ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं ॥ ४५ ॥

बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तस्माद् ब्रह्मेति शब्दितः ।
मधुरिन्द्रियनामेति ततो मधुनिषूदनः ॥ ४६ ॥
बृहत् तथा वर्धनशील होनेके कारण आपको ‘ब्रह्म’ कहते हैं। मधु नाम है इन्द्रियोंका, उनका दमन करनेके कारण आप ‘मधुसूदन’ कहलाते हैं ॥ ४६ ॥

हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तेषामीशो यतो भवान् ।
हृषीकेशस्ततो विष्णो ख्यातो देवेषु केशव ॥ ४७ ॥
केशव ! विष्णो ! हृषीक कहते हैं इन्द्रियोंको । आप उनके ईश (स्वामी अथवा प्रेरक) हैं, इसलिये देवताओंमें ‘हृषीकेश’ नामसे विख्यात हैं ॥ ४७ ॥

क इति ब्रह्मणो नाम ईशोऽहं सर्वदेहिनाम् ।
आवां तवाङ्गसम्भूतौ तस्मात् केशवनामवान् ॥ ४८ ॥
‘क’—यह ब्रह्माजीका नाम है और मैं समस्त देहधारियोंका ‘ईश’ हूँ। हम दोनों आपके शरीरसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये आप ‘केशव’ नाम धारण करते हैं ॥ ४८ ॥

मा विद्या च हरे प्रोक्ता तस्या ईशो यतो भवान् ।
तस्मान्माधवनामासि धवः स्वामीति शब्दितः ॥ ४९ ॥
हरे ! ‘मा’ कहते हैं विद्याको । आप उसके ‘धव’ (ईश्वर या स्वामी) हैं, इसलिये ‘माधव’ नामसे प्रसिद्ध हैं। धव-शब्द स्वामीका वाचक है ॥ ४९ ॥

गौरेषा तु यतो वाणी तां च वेत्थ यतो भवान् ।
गोविन्दस्तु ततो देव मुनिभिः कथ्यते भवान् ॥ ५० ॥
देव ! यह वाणी ‘गो’ नामसे प्रसिद्ध है। उसे आप जानते हैं, इसलिये मुनलोग आपको ‘गोविन्द’ कहते हैं ॥ ५० ॥

त्रिरित्येव त्रयो वेदाः कीर्तिता मुनिसत्तमैः ।
क्रमते तांस्तथा सर्वोस्त्रिविक्रम इति श्रुतः ॥ ५१ ॥
श्रेष्ठ मुनियोंने तीनों वेदोंको ‘त्रि’ नाम दिया है, आप उन तीनोंको क्रान्त (व्याप्त) करके स्थित हैं; इसलिये ‘त्रिविक्रम’ नामसे विख्यात हैं ॥ ५१ ॥

अणुर्वामननामासि यतस्त्वं वामनाख्यया ।
मननान्मुनिरेवासि यमनाद् यतिरुच्यसे ॥ ५२ ॥
आप सूक्ष्म या लघु होनेसे ‘वामन’ नाम धारण करते हैं। आपके वामन नामसे प्रसिद्ध होनेका यही हेतु है। आप मनन करनेसे ‘मुनि’ हैं और यमका पालन करनेसे ‘यति’ कहलाते हैं ॥

तपश्चरसि यस्मात् त्वं तपस्वीति च शब्दितः ।
वसन्ति त्वयि भूतानि भूतावासस्ततो हरे ॥ ५३ ॥

भविष्यपर्व.] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [१०१५


अतः आप तपस्या करते हैं, इसलिये 'तपस्वी' नामसे प्रसिद्ध हैं। हरे ! सम्पूर्ण भूत आपमें निवास करते हैं, इस-लिये आप 'भूतावास' कहलाते हैं ॥ ५३ ॥

ईशस्त्वं सर्वभूतानामीश्वरोऽसि ततो हरे ।
प्रणवः सर्ववेदानां गायत्री छन्दसां प्रभो ॥ ५४ ॥
हरे ! आप सम्पूर्ण भूतोंके ईश हैं, इसीलिये 'ईश्वर' कहे गये हैं। प्रभो ! आप समस्त वेदोंमें प्रणव और सम्पूर्ण छन्दों-में 'गायत्री' हैं ॥ ५४ ॥

अक्षराणामकारस्त्वं स्फोटस्त्वं वर्णसंश्रयः ।
रुद्राणामहमेवास्मि वसूनां पावको भवान् ॥ ५५ ॥
आप अक्षरोंमें अकार हैं। वर्णोंके आश्रित रहनेवाले स्फोट^१ हैं। रुद्रोंमें मैं अर्थात् शङ्कर हूँ और वसुओंमें आप पावक हैं ॥ ५५ ॥

अश्वत्थो वृक्षजातीनां ब्रह्मा लोकगुरुर्भवान् ।
मेरुस्त्वं पर्वतेन्द्राणां देवर्षीणां च नारदः ॥ ५६ ॥
आप वृक्ष-जातियोंमें अश्वत्थ हैं। समस्त लोकोंके गुरु ब्रह्मा हैं। श्रेष्ठ पर्वतोंमें मेरु और देवर्षियोंमें नारद हैं ॥ ५६ ॥

दानवानां भवान् दैत्यः प्रह्लादो भक्तवत्सलः ।
सर्पाणामेव सर्वेषां भवान् वासुकिसंज्ञितः ॥ ५७ ॥
आप दानवोंमें दैत्यनन्दन भक्तवत्सल प्रह्लाद हैं। समस्त सर्पोंमें आप ही वासुकि हैं ॥ ५७ ॥

गुह्यकानां च सर्वेषां भवान् धनद एव च ।
वरुणो यादसां राज। गङ्गा त्रिपथगाग् भवान् ॥ ५८ ॥
आप समस्त गुह्यकोंमें धनदाता कुबेर हैं। जल-जन्तुओंके राजा वरुण और त्रिपथगामिनी गङ्गा भी आप ही हैं ॥ ५८ ॥

आदिस्त्वं सर्वभूतानां मध्यमन्तस्तथा भवान् ।
त्वत्तः सम्भवद्विश्वं त्वयि सर्वं प्रलीयते ॥ ५९ ॥
आप समस्त भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। आपसे इस विश्वका प्रादुर्भाव हुआ है और अन्तमें सारा जगत् आप-में ही लीन हो जाता है ॥ ५९ ॥

अहं त्वं सर्वगो देव त्वमेवाहं जनार्दन ।
आवयोरन्तरं नास्ति शब्दैरर्थैर्जगत्पते ॥ ६० ॥
जनार्दन ! देव ! मैं ही आप सर्वव्यापी देवता हैं और आप ही मैं हूँ। जगत्पते ! शब्द और अर्थसे भी हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ६० ॥

नामानि तव गोविन्द यानि लोके महान्ति च ।
तान्येव मम नामानि नात्र कार्या विचारणा ॥ ६१ ॥
गोविन्द ! लोकमें जो आपके महान् नाम हैं, वे ही मेरे भी नाम हैं। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥

त्वदुपासा जगन्नाथ सैवास्ति मम गोपते ।
यश्च त्वां द्वेष्टि देवेश स मां द्वेष्टि न संशयः ॥ ६२ ॥
जगन्नाथ ! गोपते ! आपकी जो उपासना है, वही मेरी भी है। देवेश्वर ! जो आपसे द्वेष रखता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है, इसमें संशय नहीं ॥ ६२ ॥

त्वद्विस्तारो यतो देव अहं भूतपतिस्ततः ।
न तदस्ति विना देव यत् ते विरहितं हरे ॥ ६३ ॥
देव ! आपका ही विस्तार मैं हूँ, अतः आपकीही भाँति मैं भी सम्पूर्ण भूतोंका अधिपति कहलाता हूँ। देव ! हरे ! ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो आपके बिना या आपसे रहित हो ॥ ६३ ॥

यदासीद् वर्तते यच्च यच्च भावि जगत्पते ।
सर्वं त्वमेव देवेश विना किञ्चित्त्वया न हि ॥ ६४ ॥
जगत्पते ! देवेश्वर ! जो कुछ था, जो है और जो भविष्य-में होनेवाला है, वह सब आप ही हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो आपसे रहित हो ॥ ६४ ॥

स्तुवन्ति देवाः सततं भवन्तं स्वैर्गुणैः प्रभो ।
ऋक्च त्वं यजुरेवासि सामासि सततं प्रभो ॥ ६५ ॥
प्रभो ! देवता सदा आपके निजी गुणोंका बखान करके आपकी स्तुति करते हैं। भगवन् ! आप ही नित्य-निरन्तर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं ॥ ६५ ॥

किमुच्यते मया देव सर्वं त्वं भूतभावन ।
नमः सर्वात्मना देव विष्णो माधव केशव ॥ ६६ ॥
भूतभावन देव ! मैं अधिक क्या कहूँ ! आप ही सब कुछ हैं। देव ! विष्णो ! माधव ! केशव ! आपको सब प्रकारसे नमस्कार है ॥ ६६ ॥

नमस्करोमि सर्वात्मन् नमस्तेऽस्तु सदा हरे ।
नमः पुष्करनाभाय वन्दे त्वामहमीश्वर ॥ ६७ ॥
सर्वात्मन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हरे ! आपको सदा ही नमस्कार है। आप पद्मनाभ हैं, आपको नमस्कार है। ईश्वर ! मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥ ६७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवकृतविष्णुस्तुतौ अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवकृत विष्णुकी स्तुतिविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥


१. सर्वदर्शनसंग्रहके अनुसार नित्य शब्द, जिससे वर्णात्मक शब्दोंके अर्थका ज्ञान होता है, जैसे कमल शब्दमें क, म और ल-ये तीन वर्ण हैं और इन तीनोंके अलग-अलग उच्चारणसे कुछ भी अभिप्राय नहीं निकलता, परंतु तीनों वर्णोंका साथ-साथ उच्चारण करनेपर जो स्फोट होता है, उसीसे कमल शब्दका अभिप्राय जाना जाता है। कुछ लोग इसी स्फोट (नित्य शब्द) को संसारका कारण मानते हैं।

१०१६श्रीमहाभारते खिलभागे[हरिवंशे

एकोननवतितमोऽध्यायः

भगवान् शङ्करका ऋषियोंको श्रीकृष्णतत्त्वका उपदेश देना

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा देवदेवेशं मुनीनाह पुनः शिवः।
एवं जानीत हे विप्रा ये भक्ता द्रष्टुमागताः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! देवदेवेश्वर श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर भगवान् शिवने पुनः मुनियोंसे कहा—'ब्राह्मणो ! जो भक्तजन यहाँ श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये आये हैं, वे सब यह जान लें ॥ १ ॥

एतदेव परं वस्तु नैतस्मात् परमस्ति वः।
एतदेव विजानीध्वमेतद् वः परमं तपः ॥ २ ॥

'ये श्रीकृष्ण ही परम वस्तु हैं, तुमलोगोंके लिये इनसे बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। ये ही तुम्हारी तपस्याके सर्वोत्तम फल हैं, इस बातको तुमलोग अच्छी तरह जान लो ॥ २ ॥

एतदेव सदा विप्रा ध्येयं सततमानसैः।
एतद् वः परमं श्रेय एतद् वः परमं धनम् ॥ ३ ॥

'विप्रगण ! सदा एकाग्रचित्त होकर नित्य-निरन्तर इन्हीं श्रीकृष्णका ध्यान करना चाहिये। ये ही तुम्हारे परम कल्याण हैं और ये ही तुम्हारे परम धन हैं ॥ ३ ॥

एतद् वो जन्मनः कृत्यमेतद् वस्तपसः फलम्।
एष वः पुण्यनिलय एष धर्मः सनातनः ॥ ४ ॥

'ये ही तुम्हारे जन्म और जीवनकी सफलता हैं। ये ही तुम्हारी तपस्याके फल हैं। ये ही तुम्हारे पुण्योंके भण्डार हैं और ये ही सनातन धर्म हैं ॥ ४ ॥

एष वो मोक्षदाता च एष मार्ग उदाहृतः।
एष पुण्यप्रदः साक्षादेतद् वः कर्मणां फलम् ॥ ५ ॥

'ये ही तुम्हे मोक्ष देनेवाले हैं और ये ही गन्तव्य मार्ग बताये गये हैं। ये ही साक्षात् पुण्यदायक और ये ही तुम्हारे सत्कर्मोंके फल हैं ॥ ५ ॥

एतदेव प्रशंसन्ति विद्वांसो ब्रह्मवादिनः।
एष त्रयीगतिर्विप्राः प्रार्थ्यो ब्रह्मविदां सदा ॥ ६ ॥

'ब्रह्मवादी विद्वान् सदा इनकी ही प्रशंसा करते हैं। ये ही तीनों वेदोंकी गति (आश्रय) हैं। ब्राह्मणो ! ब्रह्मवेत्ता पुरुष सदा इन्हींकी प्राप्तिके लिये प्रार्थना करते हैं ॥ ६ ॥

एतदेव प्रशंसन्ति सांख्ययोगसमाश्रिताः।
एष ब्रह्मविदां मार्गः कथितो वेदवादिभिः ॥ ७ ॥

'सांख्य और योगका आश्रय लेनेवाले विद्वान् इन्हींके गुण गाते हैं। वेदवादी विद्वानोंने इन्हींको ब्रह्मवेत्ताओंका मार्ग बताया है ॥ ७ ॥

एवमेव विजानीत नात्र कार्या विचारणा।
हरिरेकः सदा ध्येयो भवद्भिः सत्त्वमास्थितैः ॥ ८ ॥

'विप्रवरो ! तुम सदा ऐसा ही जानो। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले तुम-जैसे भक्तोंको सदा एकमात्र श्रीहरिका ही चिन्तन करना चाहिये ॥ ८ ॥

नान्यो जगति देवोऽस्ति विष्णोर्नारायणात् परः।
ओमित्येवं सदा विप्राः पठत ध्यात केशवम् ॥ ९ ॥

'संसारमें सर्वव्यापी नारायणसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। ब्राह्मणो ! तुम सदा ओम्‌का जप और भगवान् केशवका ध्यान किया करो ॥ ९ ॥

ततो निःश्रेयसप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।
एवं ध्यातो हरिः साक्षात् प्रसन्नो वो भविष्यति ॥ १० ॥

'ऐसा करनेसे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी। इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार ध्यान करनेपर साक्षात् श्रीहरि तुमलोगोंपर प्रसन्न होंगे ॥ १० ॥

भवनाशमयं देवः करिष्यति दृढं हरिः।
सदा ध्यायत हरिं विप्रा यदीच्छा प्राप्तुमच्युतम् ॥ ११ ॥

'ये भगवान् विष्णु तुम्हारे संसार-बन्धनका दृढ़तापूर्वक नाश कर डालेंगे। ब्राह्मणो ! यदि भगवान् अच्युतको प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो सदा ही उन श्रीहरिका ध्यान करो ॥ ११ ॥

एष संसारविभवं विनाशयति वो गुरुः।
स्मरध्वं सततं विष्णुं पठध्वं त्रिशरीरिणम् ॥ १२ ॥

'ये ही तुम्हारे गुरु हैं। ये संसार-बन्धनका विस्तार करनेवाली मूल-अविद्याका नाश कर डालेंगे, अतः तुमलोग ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप त्रिविध शरीर धारण करनेवाले श्रीहरिका सदा स्मरण एवं कीर्तन किया करो ॥ १२ ॥

मनःसंयमनं विप्राः कुरुध्वं यत्नतः सदा।
शुद्धेऽन्तःकरणे विष्णुः प्रसीदति तपोधनाः ॥ १३ ॥

'ब्राह्मणो ! तुमलोग सदा यत्नपूर्वक मनका संयम करो। तपोधनो ! संयमसे अन्तःकरण शुद्ध हो जानेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ॥ १३ ॥

ध्यात्वा मां सर्वयत्नेन ततो जानीत केशवम्।
उपास्योऽहं सदा विप्रा उपास्येऽस्मिन् हरौ स्मृतः ॥ १४ ॥

'ब्राह्मणो ! तुम सम्पूर्ण यत्नसे मेरा चिन्तन करके फिर केशवका ज्ञान प्राप्त करो। इन उपास्यदेव श्रीहरिमें सदा मैं ही उपास्य माना गया हूँ ॥ १४ ॥

भविष्यपर्व ] नवतितमोऽध्यायः [ १०१७

उपायोऽयं मया प्रोक्तो नात्र संदेह इत्यपि ।
अयं मायी सदा विप्रा यतध्वमघनाशने ॥ १५ ॥
'विप्रगण ! यह मैंने भगवान्की प्राप्तिका उपाय बताया, इसमें संदेह नहीं है। ये भगवान् मायाके अधिपति हैं, तुम सब लोग इन पापहारी हरिकी प्राप्तिके लिये सदा प्रयत्न करते रहो ॥ १५ ॥

यथा वो बुद्धिरखिला शुद्धा भवति यत्नतः ।
तथा कुरुत विप्रेन्द्रा यथा देवः प्रसीदति ॥ १६ ॥
'विप्रवरो ! जिस प्रकारसे यत्न करनेपर तुम्हारी सारी बुद्धि शुद्ध हो जाय और जिससे भगवान् प्रसन्न हो जायें, वैसा करो' ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तास्ततः सर्वे मुनयः पुण्यशीलिनः ।
यथावदुपगृह्णाना निरसन् संशयं नृप ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! भगवान् शङ्करके ऐसा कहनेपर उन समस्त पुण्यशील मुनियोंने यथावत् रूपसे उनके उपदेशको ग्रहण किया और अपने मनसे संशयको निकाल दिया ॥ १७ ॥

एवमेवेति तं विप्राः प्राहुः प्राञ्जलयो हरम् ।
छिन्नो नः संशयः सर्वो गृहीतोऽर्थः स तादृशः ॥ १८ ॥
उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर महादेवजीसे कहा—'भगवन् ! आपने जैसा कहा है, ऐसी ही बात है। हमारा सारा संशय नष्ट हो गया और हमने वैसा ही सिद्धान्त स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥

एतदर्थं समायाता वयमद्य तवालयम् ।
संगमाद् युवयोः सर्वो नष्टो मोहो महानिह ॥ १९ ॥
'प्रभो ! हम इसीलिये आज आपके निवासस्थानपर आये थे। आप दोनोंके समागमसे यहाँ हमारा सारा महान् मोह नष्ट हो गया ॥ १९ ॥

यथा वदसि देवेश तथा नः श्रेयसे परम् ।
यथाऽऽह भगवान् रुद्रो यतामः सततं हरौ ।
इति ते मुनयः प्रीताः प्रणेमुः केशवं हरिम् ॥ २० ॥
'देवेश्वर ! आप जैसा कहते हैं, वैसा करनेसे ही हमारा परम कल्याण होगा। आप भगवान् रुद्रने जैसा कहा है, उसके अनुसार हम सदा श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये यत्न करते रहेंगे। ऐसा कहकर उन प्रसन्न हुए मुनियोंने श्रीकृष्णव हरिको प्रणाम किया ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां ऋष्युपदेशे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें भगवान् शिवका ऋषियोंको उपदेशविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥


नवतितमोऽध्यायः

भगवान् शंकरद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका कैलाससे बदरिकाश्रममें लौटना

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् रुद्रः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
स्तुत्या प्रचक्रमे स्तोतुं विष्णुं विश्वेश्वरं हरिम् ।
अर्थाभिस्तु तदा वाग्भिर्मुनीनां शृण्वतां तथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् रुद्र सबको विस्मयमें डालते हुए-से सर्वव्यापी जगदीश्वर श्रीहरिकी स्तोत्रद्वारा स्तुति करनेको उद्यत हुए। उन्होंने उस समय मुनियोंके सुनते हुए अर्थयुक्त वाणीद्वारा इस प्रकार स्तुति आरम्भ की ॥ १ ॥

महेश्वर उवाच
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ।
यस्य भासा जगत् सर्वं भासते नित्यमच्युत ॥ २ ॥
नमो भगवते देव नित्यं सूर्यात्मने नमः ।
महेश्वर बोले—आप परम बुद्धिमान् भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। अच्युत देव ! जिनके प्रकाशसे ही यह सारा जगत् सदा प्रकाशित होता है, उन सूर्यरूप आप भगवान्को नित्य बारंबार नमस्कार है ॥ २ ॥

यः शीतयति शीतांगुर्लोकान् सर्वानिमान् विभुः ॥ ३ ॥
नमस्ते विष्णवे देव नित्यं सोमात्मने नमः ।
देव ! जो शीतरश्मि भगवान् चन्द्रमा इन सम्पूर्ण लोकोंको शीतलता प्रदान करते हैं, उन सोमरूप आप श्रीहरिको नित्य नमस्कार है ! नमस्कार है ॥ ३ ॥

यः प्रजाः प्रीणयत्येको विश्वात्मा भूतभावनः ॥ ४ ॥
नमः सर्वात्मने देव नमो वागात्मने हरे ।
देव ! हरे ! जो एकमात्र विश्वात्मा भूतभावन भगवान् समस्त प्रजाको तृप्ति प्रदान करते हैं, उन सर्वरूप और वाणीस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ४ ॥

यो दधार करेणासौ कुशचीरादि यत् सदा ॥ ५ ॥
दधार वेदान् सर्वांश्च तुभ्यं ब्रह्मात्मने नमः ।
जो सदा अपने हाथसे कुश, चीर आदि धारण करते हैं