भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1023
९९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मेरे जन्मका प्रयोजन सिद्ध हो गया, इससे बढ़कर मेरे लिये अब और कौन-से कर्तव्य शेष हैं। मेरी अज्ञानमयी गांठें खुल गयीं और इन्द्रियाँ भी वशमें हो ही गयीं ॥ १७ ॥

प्रायेण जितमित्येव मनो मन्ये स्मृते हरौ ।
एषणाश्च निरस्ता मे प्रसन्नोऽहं तथाभवम् ॥ १८ ॥

श्रीहरिका स्मरण होनेपर मैं ऐसा मानता हूँ कि प्रायः मेरा मन जीत लिया गया। मेरी त्रिविध एषणाएँ (लोकैषणा, वित्तैषणा और पुत्रैषणा) दूर हो गयीं और मैं पूर्ण प्रसन्न हो गया ॥ १८ ॥

एतेभ्योऽपि पिशाचेभ्यो निर्मुक्तः साम्प्रतं तथा ।
योऽसौ ममानुजः साक्षात्स च भक्तस्तथा हरौ ॥ १९ ॥
कालेन चैव निर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ।

अब इन पिशाचोंसे भी सम्बन्ध छूट गया। वह जो मेरा सगा छोटा भाई है, वह भी भगवान् विष्णुका भक्त है, अतः समयानुसार मुक्त होकर वह भी विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेगा ॥ १९ १/२ ॥

इत्येवं चिन्तयित्वा स आन्त्रपाशं विभिद्य च ॥ २० ॥
क्रमेण प्राणानुन्मुच्य विलोक्य च दिशस्तथा ।
शरीरं सुगमं कृत्वा प्राविशत् स सुखेन ह ॥ २१ ॥

ऐसा सोचकर उसने आँतोंका पाश काट डाला और क्रमशः प्राणोंको उन्मुक्त करके सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखकर शरीरको सुगम करके उसके भीतर सुखपूर्वक प्रविष्ट हुआ ॥ २०-२१ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पिशाचस्य विष्णुसाक्षात्कारे एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसंगमें पिशाचको विष्णुका साक्षात्कारविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥


द्व्यशीतितमोऽध्यायः

घण्टाकर्णद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

पिशिताशो जगन्नाथं ददर्शाथ जगद्गुरुम् ।
समाधौ च यथा दृष्टं भूमौ चापि तथा हरिम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पिशाचने जगत्के स्वामी जगद्गुरु श्रीकृष्णका दर्शन किया। समाधि-अवस्थामें उसने श्रीहरिके रूपकी जैसी झाँकी की थी, उसी रूपमें उसने भूमिपर बैठे हुए श्रीकृष्णको देखा ॥ १ ॥

अयं विष्णुरयं विष्णुरित्येचे पिशिताशनः ।
समाधौ च यथा दृष्टः सोऽयमत्रापि दृश्यते ।
इत्युक्त्वा च पुनर्नृत्ते नृत्यन्निव हसन्निव ॥ २ ॥

उन्हें देखते ही वह मांसभक्षी पिशाच बोल उठा—'ये ही विष्णु हैं, ये ही विष्णु हैं; क्योंकि समाधिमें वे मुझे जिस रूपमें दिखायी दिये थे, उसी रूपमें यहाँ भी उनका दर्शन हो रहा है।' ऐसा कहकर वह पुनः नाचता और हँसता हुआ-सा कहने लगा—॥ २ ॥

अयं स चक्री शरशार्ङ्गधन्वा
गदी रथी सच्वजतूणपाणिः ।
सहस्रमूर्धा सकलाम्रेशो
जगत्प्रसूतिर्जगतां निवासः ॥ ३ ॥

'ये ही वे चक्रधारी, शार्ङ्ग-धनुष और बाण ग्रहण करनेवाले, गदाधर, रथारूढ तथा ध्वज एवं तरकस लिये रहनेवाले, सहस्र मस्तकवाले, सर्वदेवेश्वर, जगत्स्रष्टा तथा तीनों लोकोंके निवासस्थान श्रीहरि हैं ॥ ३ ॥

विष्णुर्जिष्णुर्जगन्नाथः पुराणः पुरुषोत्तमः ।
विश्वात्मा विश्वकर्ता यः सोऽयमेष सनातनः ॥ ४ ॥

'जिन्हें विष्णु, जिष्णु, जगन्नाथ, पुराणपुरुष, पुरुषोत्तम, विश्वात्मा और विश्वकर्ता कहा गया है, वे सनातन परमात्मा ये ही हैं ॥ ४ ॥

अस्यैव देवस्य हरेः स्तनान्तरे
विराजते कौस्तुभरत्नदीपः ।
यस्य प्रसादाज्जगदेतदादौ
विराजते चन्द्रमसेव रात्रिः ॥ ५ ॥

'इन्हीं श्रीनारायणदेवके वक्षःस्थलमें कौस्तुभमणिरूपी दीप उद्भासित होता है। जिसके प्रसादसे यह जगत् आदि-कालसे ही चन्द्रमासे रात्रिकी भाँति प्रकाशित हो रहा है ॥ ५ ॥

योऽसौ पृथ्वों दधाराशु दंष्ट्रया जलसंचयात् ।
योऽयमेव हरिः साक्षाद् वाराहं वपुराधितः ॥ ६ ॥

'जो वाराहरूपमें प्रकट हुए थे तथा जिन्होंने पृथ्वीको अपनी दाढ़द्वारा एकार्णवकी जलराशिसे तत्काल बाहर निकाला और जलके ऊपर स्थापित किया, वे साक्षात् श्रीहरि ये ही हैं ॥ ६ ॥

बद्ध्वा तथा दानवमुग्रपौरुषं
ददौ च शक्राय ततोऽनुराज्यम् ।
वलिं वलादेप हरिः स वामनः
स्तुतश्च भक्त्या मुनिभिः पुरातनैः ॥ ७ ॥

'उग्र पुरुषार्थवाले दानव बलिको बलपूर्वक बाँधकर इन्हीं वामनरूपधारी श्रीहरिने देवराज इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य अर्पित किया। उस समय प्राचीन महर्षियोंने भक्ति-भावसे इनकी स्तुति की थी ॥ ७ ॥