विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1022, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ९९७
भगवान् विष्णु ( श्रीकृष्ण ) ने उस समय उस पिशाचकी ओर देखा, जो अपने आत्मस्वरूप श्रीहरिका ही चिन्तन कर रहा था; वह शुद्ध बुद्धिसे सम्पन्न था ॥ १ ॥
आत्मन्यवस्थितं साक्षात् पठन्तं प्रणवं सकृत् ।
प्रार्थयन्तं स्वमात्मानमेकान्ते नियतं हरिः ॥ २ ॥
वह हृदयकमलमें स्थित हो साक्षात् प्रणवका प्रत्येक नाम या मन्त्रके साथ एक बार उच्चारण करता था और अपने आत्मस्वरूप विष्णुसे ही अभीष्ट मनोरथके लिये प्रार्थना करता था। इस प्रकार एकान्तमें नियमपूर्वक ध्यान लगाये घण्टाकर्णको श्रीहरिने देखा ॥ २ ॥
अचिन्तयज्जगन्नाथः कारणं पुण्यसंचये ।
ध्यात्वा तु सुचिरं विष्णुः कारणं पुण्यकर्मणः ॥ ३ ॥
उस समय उन जगदीश्वर श्रीहरिने सोचा कि इसके पुण्यसंचयमें क्या कारण है। उसके पुण्यकर्मके कारणके विषयमें चिरकालतक चिन्तन करके वे इस निश्चयपर पहुँचे ॥ ३ ॥
धनदस्योपदेशेन पठन् सुबहुशः क्षितौ ।
वासुदेवेति कृष्णेति माधवेति च मां सदा ॥ ४ ॥
यह कुबेरके उपदेशसे पृथ्वीपर अनेक वार वासुदेव, कृष्ण, माधव इत्यादि नाम ले-लेकर निरन्तर मेरा कीर्तन करता रहा है ॥ ४ ॥
जनार्दन हरे विष्णो भूतभावनभावन ।
नराकार जगन्नाथ नारायण परायण ॥ ५ ॥
इति मां नामभिर्नित्यं पठत्येष दिवानिशम् ।
स्वपञ्जाग्रंस्तथा तिष्ठन् भुञ्जन् गच्छंस्तथा वदन् ॥ ६ ॥
जनार्दन ! हरे ! विष्णो ! भूतभावनभावन ! नराकार ! जगन्नाथ ! नारायण ! परायण ! इत्यादि नामोंद्वारा नित्य दिन-रात मुझे ही पुकारता रहा है। सोते, जागते, खड़े होते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बोलते समय मेरे ही नामोंका कीर्तन करता आया है ॥ ५-६ ॥
भक्षयन् मांसपिटकं पिवञ्छोणितमेव वा ।
बाधमानश्च सुचिरं हत्वा चापि मृगान् बहून् ॥ ७ ॥
हनने भोजने चैव जाग्रत्स्वप्ने तथैव च ।
सर्वेष्वपि च कार्येषु कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ ८ ॥
एतस्य कर्मणः पाक एष घोरस्य कर्मणः ।
पिटारीकी पिटारी मांस खाते अथवा खून पीते समय भी यह मेरे नामोंकी रट लगाता रहा है। चिरकाल तक प्राणियोंको कष्ट देकर और बहुत-से मृगोंका वध करके भी उनके हनन और भोजनके समय, जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंमें तथा सभी कार्योंमें यह मुझ वासुदेवको ही कर्ता मानता आया है। इसके इस घोर कर्मके परिपाक ( विनाश ) का यह समय प्राप्त हुआ है ॥ ७-८ ½ ॥
निश्चित्यैवं जगन्नाथः प्रीतस्तस्य बभूव ह ॥ ९ ॥
अदर्शयत् स्वमात्मानमनन्यस्य जगत्पतिः ।
शुद्धेऽन्तःकरणे तस्य पिशाचस्यापि भूमिप ॥ १० ॥
ऐसा निश्चय करके वे जगन्नाथ उसपर बहुत प्रसन्न हुए। राजन् ! तदनन्तर जगदीश्वर श्रीहरिने उस अनन्य-भक्त पिशाचको भी उसके शुद्ध अन्तःकरणमें अपने स्वरूपका दर्शन कराया ॥ ९-१० ॥
स च घोरः पिशाचोऽपि ददर्शात्मनि केशवम् ।
पीतकौशेयवसनं पद्माक्षं श्यामलं हरिम् ॥ ११ ॥
उस भयङ्कर पिशाचने भी अपने अन्तःकरणमें रेशमी पीताम्बरधारी, कमलनयन, श्यामसुन्दर पापहारी केशवका दर्शन किया ॥ ११ ॥
शङ्खिनं चक्रिणं विष्णुं स्रग्विणं गदिनं विभुम् ।
किरीटिनं कौस्तुभिनं श्रीवत्साच्छादितोरसम् ॥ १२ ॥
वे भगवान् विष्णु हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा लिये हुए थे। उनके गलेमें वनमाला, मस्तकपर किरीट और वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उनका हृद्देश श्रीवत्सकी आभासे आच्छादित हो रहा था ॥ १२ ॥
नीलमेघनिभं कान्तं गरुडस्थं प्रभञ्जनम् ।
चतुर्भुजं शुभगिरं निश्चलं सर्वगं शिवम् ॥ १३ ॥
वे नीलवर्णके मेघकी भाँति कमनीय कान्ति धारण करते थे। गरुड़की पीठपर विराजमान थे और भवभय-भञ्जन करनेवाले थे। उनके चार भुजाएँ शोभा पाती थीं। उनकी वाणी मङ्गलमयी थी। वे सर्वव्यापी कल्याणस्वरूप प्रभु निश्चलभावसे खड़े थे ॥ १३ ॥
अनादिनिधनं नित्यं मायाविनममायिनम् ।
सत्ययुक्तं सदा शुद्धं बुद्धिगम्यं सदामलम् ॥ १४ ॥
उनका न कहीं आदि है न अन्त। वे नित्य मायावी ( मायापति ) हैं। उनपर किसीकी माया नहीं चलती है। वे सत्ययुक्त, सदा शुद्ध, बुद्धिगम्य तथा नित्य निर्मल हैं ॥ १४ ॥
मनस्येवं जगन्नाथं दृष्ट्वा विष्णुमनेकधा ।
अनुन्मील्यैव नयने कृतार्थोऽस्मीत्यमन्यत ॥ १५ ॥
इस प्रकार हृदयके भीतर प्रकट हुए जगदीश्वर विष्णुका बारंबार दर्शन करके आँख खोले बिना ही अपने आपको कृतार्थ मानने लगा ॥ १५ ॥
अथ दृष्टो हरिर्विष्णुः साक्षात् सर्वत्रगः शुभः ।
प्रसन्नो हि हरिर्मह्यं तेनाहं दृष्टवान् हरिम् ॥ १६ ॥
अहो ! अब सर्वव्यापी, शुभस्वरूप, साक्षात् भगवान् विष्णु हरिने मुझे दर्शन दिया है, निश्चय ही वे श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हैं; इसीसे मैं उनका दर्शन पा सका हूँ ॥ १६ ॥
सिद्धं मे जन्मनः कृत्यं किमतः कृत्यमस्ति मे ।
ग्रन्थयो मम निर्भिन्ना पश्यान्येवेन्द्रियाणि मे ॥ १७ ॥