भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1021
९९६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

व्यर्थो हि केवलं तस्य प्रग्रहो बाह्यगोचरः ॥ ७७ ॥ 'केशव ! जो मनुष्य अपने अपवित्र मनको मुट्ठीमें किये बिना केवल अङ्गोंका बाहरसे प्रक्षालन करता है, उसे क्या लाभ होगा ? उसका केवल बाहरसे शुद्धिके लिये आग्रह व्यर्थ ही है ॥ ७६-७७ ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन चित्तं रक्ष जनार्दन ।
बलवानिन्द्रियग्रामो वारयैनं जनार्दन ॥ ७८ ॥
'अतः जनार्दन ! सम्पूर्ण प्रयत्नद्वारा आप मेरे चित्तकी रक्षा कीजिये। जीवोंकी याचना पूर्ण करनेवाले देव ! इन्द्रियोंका समूह बड़ा बलवान् है, इसे रोकिये ॥ ७८ ॥

परीवादाज्जगन्नाथ वाचं रक्ष दुरुद्वहाम् ।
परद्रव्यानन्मनो रक्ष परदाराज्जनार्दन ।
सर्वत्र मे दया भूयात् प्रसादात् तव केशव ॥ ७९ ॥
'जगन्नाथ ! मेरी दुर्बह वाणीको आप परनिन्दासे बचाइये। जनार्दन ! मेरे मनको पराये धन और परायी स्त्रीसे दूर रखिये। केशव ! आपकी कृपासे मेरे मनमें सब प्राणियोंके प्रति दया हो ॥ ७९ ॥

त्वय्येव भक्तिरचला भूयाद् भूतेषु मे दया ।
बहुनात्र किमुक्तेन शृणुष्वेदं वचो मम ॥ ८० ॥
'प्रभो ! आपमें ही मेरी अविचल भक्ति हो और समस्त प्राणियोंके प्रति दया हो । इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ ? मेरी यह एक ही बात सुन लीजिये ॥ ८० ॥

सुखे दुःखे च रागे च भोजने गमने तथा ।
जाग्रत्स्वप्नेषु सर्वत्र त्वय्येव रमतां मनः ॥ ८१ ॥
मामकं देवदेवेश नमस्तेऽस्तु जनार्दन ।
'देवदेवेश्वर ! जनार्दन ! सुखमें, दुःखमें, राग और भोजनमें, चलने-फिरनेमें तथा जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें सर्वत्र आपमें ही मेरा मन रमण करे, आपको नमस्कार है' ॥ ८१ १/२ ॥

इति ब्रुवन् घोरतमो जात्या हीनो न चित्ततः ॥ ८२ ॥
पिशाचो भगवद्भक्तः समाधिं समपद्यत ।
इस तरह बोलता हुआ वह अत्यन्त भयङ्कर पिशाच, जो केवल जातिसे निम्नकोटिका था, हृदयसे नहीं, समाधिस्थ हो गया । वह महान् भगवद्भक्त था ॥ ८२ १/२ ॥

दृढं बद्ध्वाऽऽत्मनः कायमान्त्रपाशेन मांसपः ॥ ८३ ॥
निश्चलेनैव मनसा सुखमास्ते स संयतः ।
ध्यायन् हरिं जगद्योनिं विष्णुं पीताम्बरं शिवम् ॥ ८४ ॥
वह मांसभक्षी पिशाच अपने शरीरको अँतड़ियोंके सुदृढ़ पाशसे बाँधकर निश्चलचित्तके द्वारा सुखपूर्वक संयतभावसे बैठ गया और जगत्‌की उत्पत्तिका कारणभूत, पीताम्बरधारी, मङ्गलकारी, सर्वव्यापी श्रीहरिका ध्यान करने लगा ॥ ८३-८४ ॥

मुकुन्दमादिपुरुषमेकाकारमनामयम् ।
नित्यं शुद्धं ज्ञानगम्यं कारणं सर्वदेहिनाम् ॥ ८५ ॥
जो नित्य, शुद्ध, ज्ञानगम्य, समस्त देहधारियोंके कारणभूत, रोग-शोकसे रहित, एकाकार (अद्वितीय) और आदिपुरुष हैं, उन मुकुन्ददेवका चिन्तन करने लगा ॥ ८५ ॥

नासिकाग्रं समालोक्य पठन् ब्रह्म सनातनम् ।
निर्वातस्थो यथा दीपः प्रोच्चरन् प्रणतः सदा ॥ ८६ ॥
नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाये सनातन ब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए, वायुशून्य प्रदेशमें जलनेवाले दीपककी भाँति अविचलभावसे स्थित हो, वह निरन्तर प्रणाम एवं मन्त्रपाठ करने लगा ॥ ८६ ॥

प्रणवं वाचकं मत्वा वाच्यं ब्रह्मेति निश्चितः ।
एकाग्रं सततं कृत्वा चित्तं विष्णौ समर्पितम् ॥ ८७ ॥
विकल्परहितं चित्तं हृदि मध्ये न्यवेशयत् ।
प्रणवको वाचक मानकर और परब्रह्म परमात्माको उसका वाच्यार्थ निश्चित करके उसने अपने चित्तको निरन्तर एकाग्र रखते हुए उसे भगवान् विष्णुमें समर्पित कर दिया । उस विकल्परहित चित्तको हृदयकमलके भीतर दृढ़तापूर्वक स्थापित कर दिया ॥ ८७ १/२ ॥

पुण्डरीके शुभदले समावेश्य जगत्पतिम् ॥ ८८ ॥
आस्ते सुखं महायोगी पिशिताशस्तदा महान् ।
त्रिधामानं जपंस्तत्र स्मरन् विष्णुं सनातनम् ॥ ८९ ॥
शुभ दलोंसे युक्त उस हृदयकमलके आसनपर जगदीश्वर श्रीहरिको प्रतिष्ठित करके वह महायोगी, महान् मांसभक्षी पिशाच वहाँ सुखपूर्वक बैठा रहा तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन रूपोंमें विराजमान सनातन विष्णुका वहाँ स्मरण करता रहा ॥ ८८-८९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां घण्टाकर्णचित्तसमाधावशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें घण्टाकर्णके चित्तकी समाधिविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥


एकाशीतितमोऽध्यायः

पिशाचको समाधि-अवस्थामें भगवान् विष्णुका साक्षात्कार

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचं दृष्टवांस्तदा ।चिन्तयन्तं खमात्मानं शुद्धबुद्धिसमन्वितम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर उन