विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व] अशीतितमोऽध्यायः १९५
भीतर निवास करनेवाले देवता आप बुद्धिमान् गदाधरको नमस्कार है॥ ५९॥
ओं नमो नारायणाय विष्णवे प्रभविष्णवे।
मम भूयान्मनःशुद्धिः कीर्तनात् तव केशव॥ ६०॥
'प्रभावशाली, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दघन नारायणदेवको नमस्कार है। केशव ! आपके कीर्तनसे मेरे मनकी शुद्धि हो जाय॥ ६०॥
जन्मेदमीदृशं घोरं मा भून्मम दुरासदम्।
देवदूतो भविष्यामि स्मरणात् तव गोपते॥ ६१॥
'इन्द्रियोंके नियन्ता नारायण ! अब पुनः मुझे ऐसा दुःखप्रद भयङ्कर जन्म न प्राप्त हो। मैं आपके स्मरणसे देवदूत हो जाऊँ॥ ६१॥
तव चक्रप्रहारेण कायो नश्यतु मामकः।
मम भूयो भवो मा भूदेषा मे प्रार्थना विभो॥ ६२॥
'प्रभो ! आपके चक्रके प्रहारसे मेरा यह शरीर नष्ट हो जाय और फिर मुझे यह संसारबन्धन प्राप्त न हो, यही मेरी प्रार्थना है॥ ६२॥
अर्थिनां कल्पवृक्षोऽसि दाता सर्वस्य सर्वदा।
यत्र यत्र भवेज्जन्म तत्र तत्र भवान् हृदि॥ ६३॥
वर्त्ततां मम देवेश प्रार्थनैषा ममापरा।
'आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। सदा सबके दाता हैं। देवेश्वर ! जहाँ-जहाँ मेरा जन्म हो, वहाँ-वहाँ आप मेरे हृदयमें विराजमान रहें। यह मेरी दूसरी प्रार्थना है॥ ६३½॥
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं भवत्वेवं सदा मम॥ ६४॥
निर्विघ्ना प्रार्थना देव नमस्तेऽस्तु सदा मम।
'देव ! आपको नमस्कार है ! देव ! आपको नमस्कार है ! इस प्रकार मेरी प्रार्थना सदा निर्विघ्न चलती रहे। देव ! आपको सदा ही मेरा नमस्कार है॥ ६४½॥
यदा मे मरणं भूयात्तदा मा भूत् स्मृतिभ्रमः॥ ६५॥
दिने दिने क्षणं चित्तं त्वयि संस्थं भवत्विति।
एवं प्रेरय मां देव मा भूत् ते चित्तमीदृशम्॥ ६६॥
नृशंसोऽयं पिशाचोऽयं दयास्मिन् का भवेदिति।
'जब मेरा मरणकाल उपस्थित हो, उस समय मेरी स्मरणशक्तिमें भ्रम न उत्पन्न हो (मैं उस समय भी आपका ही स्मरण करता रहूँ)। देव ! प्रतिदिन और प्रतिक्षण मेरा चित्त आपमें ही स्थिर रहे। आप मुझे ऐसी ही प्रेरणा देते रहें। आपके चित्तमें कभी ऐसा भाव न आये कि 'यह क्रूर है, पिशाच है। इसपर क्या दया हो सकती है?'॥ ६५-६६½॥
एवं चिन्तय मां देव भृत्यो महामिति प्रभो॥ ६७॥
परपीडा न मत्तोऽस्तु नमस्ते भगवन् प्रभो।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु मा भूवन् साम्प्रतं हि मे॥ ६८॥
'प्रभो ! देव ! आप तो ऐसा ही विचार करें कि 'यह बेचारा मेरा सेवक है।' भगवन् ! प्रभो ! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरेद्वारा दूसरोंको पीड़ा न पहुँचे तथा अब मेरी इन्द्रियाँ विषयोंमें न फँसें॥ ६७-६८॥
अन्तकाले ममाप्येवं प्रसादात् तव केशव।
पृथिवी यातु मे घ्राणं रसनां यातु मे पयः॥ ६९॥
सूर्यश्च यातु मे चक्षुः स्पर्शं यातु च मारुतः।
श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनः प्राणं च गच्छतु॥ ७०॥
'केशव ! अन्तकालमें आपकी कृपासे मेरी भी ऐसी स्थिति हो- पृथिवी मेरी घ्राणेन्द्रियको ग्रहण करे, जल मेरी रसनेन्द्रियको अपना ले, सूर्य मेरी नेत्रेन्द्रियको तथा वायु मेरी त्वचा अपनेमें संयुक्त कर लें। इसी तरह आकाश भी मेरी श्रवणेन्द्रियको अपनेमें मिला ले तथा प्राण (चन्द्रमा) मेरे मनसे संयुक्त हों॥ ६९-७०॥
जलं मां रक्षतां नित्यं पृथिवी रक्षतां हरे।
सूर्यो मां रक्षतां विष्णो नमस्ते सूर्यतेजसे॥ ७१॥
'हरे ! जल सदा मेरी रक्षा करे। पृथिवी भी रक्षा करे। विष्णो ! सूर्यदेव मेरी रक्षा करें। आप सूर्यके समान तेजस्वी हैं, आपको नमस्कार है॥ ७१॥
वायुर्मा रक्षतां दुःखादाकाशं च जनार्दन।
न मनः सर्वगं देव रक्षतां विषयान्तरे॥ ७२॥
'जनार्दन ! वायु और आकाश दुःखसे मेरी रक्षा करें। देव ! सर्वस्वरूप परमात्माके चिन्तनमें लगा हुआ मेरा मन विषय और भेद-बुद्धिकी रक्षा न करे (अर्थात् वह न तो विषयपरायण हो, न भेद-बुद्धिको ही अपनाये)॥ ७२॥
मनो विपर्यये घोरे पुरुषाञ् हन्ति नित्यशः।
पापेषु योजयेत् पुंसः परपीडात्मकेषु च॥ ७३॥
'इसके विपरीत यदि मन घोर विपर्यय (विषय-सेवन आदि) में फँस जाय तो वह पुरुषोंका नाश कर डालता है। दूसरोंके पीड़नरूप पापोंमें फँसा देता है॥ ७३॥
मनस्तद् रक्षतां देव भूयो भूयो जनार्दन।
मा भून्मनसि कालुष्यं मनो मे निर्मलं भवेत्॥ ७४॥
'देव जनार्दन ! आप मेरे उस मनकी बारंबार रक्षा करें, मेरे मनमें मलिनता न रहे, मेरा मन निर्मल हो जाय॥ ७४॥
कलुषं तस्य यच्चित्तं नरके पातयत्यमुम्।
बाह्यानि निर्मलान्येवमिन्द्रियाणि भवन्त्युत॥ ७५॥
न तानि कार्यवन्तीह मनश्चेत् कलुषं भवेत्।
'क्योंकि जीवका जो मलिन चित्त है, वह उसे नरकमें गिराता है। मनके शुद्ध होनेसे बाह्य इन्द्रियाँ भी निर्मल हो जाती हैं और यदि मन मलिन हो तो वे इन्द्रियाँ भी मलिन होनेके कारण इस जगत्में कोई सत्कार्य नहीं कर सकतीं॥ ७५½॥
नाङ्गानां मुष्टिनामेध्यं गृहीत्वा यो व्यवस्थितः॥ ७६॥
बहिः प्रक्षालनं कुर्वन् किं भवेत् तस्य केशव।