विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1019, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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जगतकी सृष्टिके प्रारम्भकालमें जिन भगवान्की नाभिसे सुवर्णके समान कान्तिमान् एक विशाल कमल प्रकट हुआ, जो अपने दलोंके साथ सुशोभित होता था । वह विस्तृत कमल ही लोकगुरु ब्रह्माजीका जन्मस्थान था ॥ ४६ ॥
दधार यो भूतपतिर्महान्महीं दंष्ट्राग्रसंस्थापितरूढमूलम् । नादं महामेघ इवादिकाले कुर्वन् वराहो मुनिगीतमूर्तिः ॥ ४७ ॥ हरिः पुराणः पुरुषोत्तमः प्रभुः कर्ता समस्तस्य समस्तसाक्षी । यज्ञात्मको यज्ञपतिर्जगत्पति- र्द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ४८ ॥
जिन महान् भूतनाथ विष्णुने आदिकालमें मुनियोंद्वारा प्रशंसित विग्रहवाले वराहरूप होकर महान् मेघके समान गर्जना करते हुए अपनी दाढ़के अग्रभागपर पृथ्वीके मूल भागको स्थापित करके उसे जलसे ऊपर उठाया था, जो पुराण-पुरुषोत्तम प्रभु श्रीहरि समस्त जगत्के कर्ता, साक्षी, यज्ञरूप एवं यज्ञके अधिपति हैं और समस्त जगत्का पालन करते हैं, उन्हीं परमेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ४७-४८ ॥
केचिद् बहुत्वेन वदन्ति देव- मेकात्मना केचिदिमं पुराणम् । वेदान्तसंस्थापितसत्त्वयुक्तं द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ४९ ॥
कोई आराधक उन विष्णुदेवका इन्द्र आदि अनेक देवताओंके रूपमें वर्णन करते हैं और कोई उपासक इन पुराण-पुरुषका एक रूपमें ही चिन्तन करते हैं । वेदान्त-शास्त्रमें प्रतिपादित विशुद्ध अद्वैत सत्तासे युक्त उन परमेश्वर-का दर्शन करनेके लिये हमलोग उद्यत हुए हैं ॥ ४९ ॥
अनेकमेके बहुधा वदन्ति श्रुतिस्मृतिन्यायविविष्टचित्ताः । आहुर्यमात्मानमजं पुराविदो द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ५० ॥
एक श्रेणीके विद्वान् श्रुति-स्मृति और न्यायमें अपने चित्तको लगाये रखकर जिन परमेश्वरका अनेक रूपोंमें अनेक प्रकारसे वर्णन करते हैं तथा पुराणवेत्ता पुरुष जिन्हें सबका आत्मा और अजन्मा बताते हैं, उन्हीं सर्वेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ५० ॥
यं प्राहुरीड्यं वरदं वरेण्य- मेकान्ततत्त्वं मुनयः पुरातनाः । यं सर्वगं देवमजं जनार्दनं द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ५१ ॥
जिन्हें प्राचीन मुनि स्तुति करनेके योग्य, वरदायक, वरेण्य और परमतत्त्वरूप बताते हैं । साथ ही जिन्हें सर्वव्यापी और अजन्मा कहते हैं, उन्हीं जनार्दनदेव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये हमलोग इस समय उद्यत हुए हैं ॥ ५१ ॥
यस्मिन् विश्वमिदं प्रोतमादिकाले जगत्पतौ । तं द्रष्टुमभिसंवृत्ताः किं नु वक्ष्याम साम्प्रतम् ॥ ५२ ॥
आदिकालमें जिन सूत्रस्वरूप जगदीश्वरमें यह सम्पूर्ण जगत् मनकेकी भाँति पिरोया गया था, उन्हीं भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं । अब इस समय और क्या कहें ? ॥ ५२ ॥
गच्छामो वयमन्यत्र गच्छ त्वं काममन्यतः । नियमोऽप्यस्ति नो मर्त्य यथेष्टं गच्छ साम्प्रतम् ॥ ५३ ॥ रात्रिमध्यमनुप्राप्तं नात्र कार्या विचारणा ।
मर्त्य ! अब हम अन्यत्र जाते हैं । तुम भी इच्छानुसार और कहीं जा सकते हो । हमारे नित्य नियमका भी समय आ गया है; क्योंकि आधी रात हो गयी, अतः इस समय तुम इच्छानुसार जहाँ चाहो, चले जाओ । इस विषयमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ५३३ ॥
इत्युक्त्वा घोररूपोऽसौ पिशाचो विकृताननः ॥ ५४ ॥ तस्मिन्नेव समे देशे पीत्वा च रुधिरं बहु । भक्षयित्वा यथाकामं मांसराशिं विचक्षणः ॥ ५५ ॥ अपः संस्पृश्य तत्रैव पार्श्वे संस्थाप्य साधनम् । अन्त्रपाशं महाघोरं संस्थाप्य विपुलं महत् ॥ ५६ ॥ आसनं कुशसंयुक्तं कृत्वा चाभ्युक्ष्य वारिणा । उत्सार्य श्वगणान् सर्वान् यत्नेन महता तदा ॥ ५७ ॥ सुखासनं समास्थाय समाधौ यतते श्वपः ।
ऐसा कहकर उस विकराल मुखवाले घोररूपधारी विचक्षण पिशाचने उसी समतल प्रदेशमें बहुत-सा रक्त पीकर इच्छानुसार मांसराशिका भक्षण किया । तत्पश्चात् जलका आचमन करके वहीं पार्श्वभागमें अपनी साधनसामग्री रख दी और अँतड़ियोंका महाभयंकर विशाल पाश भी वहीं बगलमें डाल दिया । इसके बाद कुशयुक्त आसन बिछाकर उसकी शुद्धिके लिये जल छिड़का और अपने सभी कुत्तोंको बड़े प्रयत्नसे दूर हटाया । तदनन्तर सुखासनपर बैठकर वह कुत्ता-पालक पिशाच समाधिके लिये यत्न करने लगा ॥ ५४-५७३ ॥
एकचित्तस्तदा भूत्वा नमस्कृत्य च केशवम् । इमं मन्त्रं पठन् घोरः पिशाचो भक्तवत्सलम् ॥ ५८ ॥
उस समय वह भयानक पिशाच एकचित्त हो भक्तवत्सल भगवान् केशवको नमस्कार करके इस मन्त्रमय स्तोत्रका पाठ करने लगा—॥ ५८ ॥
नमो भगवते तस्मै वासुदेवाय चक्रिणे । नमस्ते गदिने तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ॥ ५९ ॥
'उन चक्रधारी भगवान् वासुदेवको नमस्कार है, सबके