भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1018

भविष्यपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ९९३


अन्यच्च शृणु मे कार्यं यदि कौतूहलं तव ॥ ३३ ॥
पुरी द्वारवती नाम पश्चिमस्योदधेस्तटे ।
यदुवृष्णिसमाकीर्णा सागरोर्मिसमाकुलाम् ॥ ३४ ॥
अध्यास्ते स हरिविष्णुस्तां पुरीं पुरुषोत्तमः ।
यदि तुम्हें कौतूहल हो, तो मेरे दूसरे कार्यको भी सुनो। पश्चिम समुद्रके तटपर द्वारवती नामसे प्रसिद्ध एक पुरी है, जिसमें यदु एवं वृष्णिवंशके लोग रहते हैं। वह पुरी समुद्रकी लहरोंसे व्याप्त है। उसीमें इस समय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं ॥ ३३-३४½ ॥

द्रष्टुं लोकहितार्थाय वसन्तं द्वारकापुरे ॥ ३५ ॥
निर्गतः साम्प्रतं मर्त्य वयमेतैः सहानुगैः ।
विष्णुः सर्वेश्वरः साक्षाद्द्रष्टव्योऽस्माभिरद्य वै ॥ ३६ ॥
मर्त्य ! लोकहितके लिये द्वारकापुरीमे निवास करनेवाले उन भगवान्का दर्शन करनेके उद्देश्यसे हम इन अनुचरोंके साथ इस समय निकले हैं। आज हमें साक्षात् सर्वेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन करना है ॥ ३५-३६ ॥

लोकानां प्रभवः पाता कर्ता हर्ता जगत्पतिः ।
आदिः स हि समस्तस्य प्रभवः कारणं हरिः ॥ ३७ ॥
वे श्रीहरि ही सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारण, पालक, कर्ता, हर्ता, जगदीश्वर, सबके आदिपुरुष, उद्गमस्थान और बीज हैं ॥ ३७ ॥

कर्ता समस्तस्य हरिः पुरातनः
प्रभुः प्रभूणामपि यः सदात्मकः ।
तमादिदेवं वरदं वरेण्यं
द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ३८ ॥
जो श्रीहरि समस्त जगत्के कर्ता, पुराण-पुरुष, प्रभुओंके भी प्रभु और सत्वरूप हैं, उन आदिदेव, वरदायक एवं वरेण्य भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं ॥ ३८ ॥

यस्य प्रसादाज्जगदेवमासीत्
सप्राणिगन्धर्वमहोरगौघम् ।
देवं जगद्योनिमजं जनार्दनं
द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ३९ ॥
जिनके कृपा-प्रसादसे प्राणियों, गन्धर्वों और बड़े-बड़े नागोंके समुदायसे युक्त यह जगत् इस रूपमें प्रकट हुआ था, उन जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत अजन्मा देव जनार्दन हरिका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं ॥ ३९ ॥

यस्योदराद् विश्वमिदं प्रसूतं
लयं च तस्मिन् समुपैति कल्पे ।
तस्यैव साक्षाद् वशवर्ति विश्वं
द्रक्ष्याम देवं पुरुषोत्तमं हरिम् ॥ ४० ॥
कल्पके आरम्भमें जिनके उदरसे यह विश्व प्रकट होता है और कल्पके अन्तमें पुनः उसीमे लीन हो जाता है। स्थितिकालमें भी यह सारा विश्व जिन साक्षात् श्रीहरिके ही अधीन रहता है, उन पुरुषोत्तमदेव श्रीहरिका हम दर्शन करेंगे ॥

स्रष्टा च योऽसौ सकलस्य देवः
पाता च हर्ता च हरिः स एव ।
द्रक्ष्याम नित्यं भुवनेश्वरं हरिं
पुराणमार्यं प्रभविष्णुमव्ययम् ॥ ४१ ॥
जो विष्णुदेव इस सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं तथा जो श्रीहरि ही इसका पालन और संहार करनेवाले भी हैं, उन आदिपुरुष, पुरातन देवता, प्रभावशाली, अविनाशी, नित्यस्वरूप, भुवनेश्वर श्रीहरिका हम नित्य दर्शन करेंगे ॥ ४१ ॥

अजस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता
भुवश्च कर्ता हरिरेक एव ।
तं योगिनो योगविशुद्धबुद्धिं
लभेम तेनैव मतिः समाकुला ॥ ४२ ॥
वे एकमात्र श्रीहरि ही अजन्मा ब्रह्माजीके भी उत्पादक, जगत्के रक्षक और भूतलके निर्माता हैं। योगसे विशुद्ध बुद्धिवाले उन परमेश्वरको हमलोग ध्यानयोगकी साधना करके प्राप्त करेंगे। हमारी चित्तवृत्ति उन्हींसे व्याप्त है ॥ ४२ ॥

निगीर्य विश्वं सकलं जगत्पतिः
शेते शिशुत्वं समवाप्य साक्षात् ।
वटस्य पत्रे जगतां निवासः
पादौ च विक्षिप्य करौ विधुन्वन् ॥ ४३ ॥
जगत्के पालक और तीनों लोकोंके निवास-स्थान श्रीहरि प्रलयकालमें सम्पूर्ण विश्वको अपने भीतर निगलकर साक्षात् शिशुभावको प्राप्त हो अक्षयवटके पत्रपर दोनों पैर फेंकते और हाथ हिलाते हुए शयन करते हैं ॥ ४३ ॥

यस्योदरे देवमुनिः पुरातनो
ददर्श लोकानखिलान् स मायया ।
प्रविश्य विश्वं सकलं यथावद्
बहिर्यथाभूतमभूदिदं महत् ॥ ४४ ॥
जिनके उदरमें प्रवेश करके पुरातन देवर्षि मार्कण्डेय मुनिने उन्हींकी मायासे इन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया था। उस समय वहाँ यह सारा महान् विश्व यथावत् रूपसे उसी प्रकार स्थित था, जैसा कि पहले उनके उदरसे बाहर अनुभवमें आया था ॥ ४४ ॥

निगीर्य विश्वं जगदादिकाले
शेते महात्मा जलधेर्घलौघे ।
देव्या श्रिया चामरलोलहस्तया
निषेव्यमाणः पुरुषोत्तमस्तदा ॥ ४५ ॥
पूर्वकालमें इस सम्पूर्ण जगत्को अपने भीतर लीन करके वे महात्मा पुरुषोत्तम एकार्णवके जलप्रवाहमें शयन करते थे और देवी लक्ष्मी हाथसे चँवर डुलाती हुई उनकी सेवा कर रही थीं ॥ ४५ ॥

नाभेश्च यस्याविरभूत् सपद्मं
पद्मं महत्कार्त्तस्वरप्रभं प्रभोः ।
जन्मास्पदं लोकगुरोर्यदासी-
द्विस्तारि पद्मं जगदादिसृष्टौ ॥ ४६ ॥


म० ६० ३२'-