विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1017, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९९२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अहमस्य तु देशस्य रक्षिता नात्र संशयः।
व्यतिक्रमो यदि भवेत् तस्य शास्तास्मि यत्नतः ॥ १६ ॥
'मैं इस देशका रक्षक हूँ, इसमें संशय नहीं है। यदि किसीके द्वारा मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन हुआ तो मैं यत्नपूर्वक उसका शासन करूँगा ॥ १६ ॥
कौ भवन्तौ क्व नु युवां कस्येयं महती चमूः।
नातः परं प्रवेष्टव्यमृषयस्त्वत्र संस्थिताः ॥ १७ ॥
विघ्नस्तत्र प्रवर्तेत तपःसु च तपस्विनाम्।
'तुम दोनों कौन हो ? कहाँ रहते हो ? यह विशाल सेना किसकी है ? इससे आगे इस वनमें प्रवेश नहीं करना चाहिये, क्योंकि यहाँ ऋषि रहते हैं। उन तपस्वी ऋषियोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ सकता है ॥ १७१/२ ॥
इहैव स्थीयतां तावद् वक्तव्यं च ततः सुखम् ॥ १८ ॥
अन्यथाहं निषेद्धा स्यां बलाद्वाक्यैस्तथैव च।
'सब लोग यहीं ठहर जायें और सुखपूर्वक बातें करें, अन्यथा मैं वाणीद्वारा तथा बलद्वारा भी रोकूँगा' ॥ १८१/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टौ पिशाचौ तु वक्तुमेवोपचक्रतुः ॥ १९ ॥
तयोरेको महाघोरः पिशाचो दीर्घबाहुकः।
उवाच वचनं तत्र यथा हृदि समर्पितम् ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार पूछे जानेपर उन दोनों पिशाचोंने उनके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया। उन दोनोंमेंसे एक पिशाच बड़ा भयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके हृदयमें जैसी बात थी, उसीको वह वहाँ सुनाने लगा ॥ १९-२० ॥
पिशाच उवाच
श्रूयतामभिधास्यामि समाहितमना भव।
नमस्कृत्य जगन्नाथं हरिं कृष्णं जगत्पतिम् ॥ २१ ॥
आदिदेवमजं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम्।
वक्ष्यामि सकलं यद्वत् तथा शृणु यदीच्छसि ॥ २२ ॥
पिशाच बोला—अच्छा ! बताता हूँ, सुनिये और अपने चित्तको एकाग्र कर लीजिये। मैं पहले आदिदेव, अजन्मा, सर्वश्रेष्ठ, निष्पाप, पवित्र, पापहारी, जगदीश्वर, विश्वपालक, सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विष्णुको नमस्कार करके अपना सारा वृत्तान्त आपको ठीक-ठीक बताऊँगा, यदि आप सुनना चाहते हों तो सुनिये ॥ २१-२२ ॥
घण्टाकर्णोऽस्मि नाम्नाहं पिशाचो घोरदर्शनः।
मांसादो विकृतो घोरः साक्षान्मृत्युरिवापरः ॥ २३ ॥
मैं घण्टाकर्ण नामसे प्रसिद्ध पिशाच हूँ, मेरी दृष्टि बड़ी भयंकर है। मैं मांसभक्षी, विकृताङ्ग, घोर तथा साक्षात् दूसरे कालके समान प्राणियोंका हिंसक हूँ ॥ २३ ॥
धनदस्यानुगन्ताहं साक्षाद् रुद्रसखस्य च।
ममायमनुजः साक्षादन्तकस्यान्तको ह्ययम् ॥ २४ ॥
भगवान् शङ्करके सखा साक्षात् कुबेरका मैं अनुचर हूँ। यह मेरा सगा छोटा भाई है, जो कालका भी काल है ॥ २४ ॥
मृगयेयं सुमहती विष्णोः पूजार्थमुद्यता।
ममेयं वर्तते सेना श्वगणोऽपि ममैव तु ॥ २५ ॥
यह जो बड़ा भारी शिकार खेला जा रहा है, इसका उद्देश्य है भगवान् विष्णुकी पूजा। यह सेना मेरी है और यह कुत्तोंका झुंड भी मेरा ही है ॥ २५ ॥
आगतोऽहं महाशैलात् कैलासाद् भूतसेवितात्।
अहं पिशाचभावेन संविष्टः पापकर्मकृत् ॥ २६ ॥
मैं भूतोंसे सेवित महापर्वत कैलाससे यहाँ आया हूँ, पिशाच-वेषमें घिरा हुआ पापकर्मी हूँ ॥ २६ ॥
सततं दूषयन् विष्णुं घण्टामाबध्य कर्णयोः।
मम न प्रविशेन्नाम विष्णोरिति विचिन्तयन् ॥ २७ ॥
पहले मैं सदा विष्णुकी निन्दा करता था और कानोंमें घण्टा बाँधकर घूमता था कि कहीं मेरे इन कर्णकुहरोंमें विष्णुका नाम न प्रविष्ट हो जाय, मुझे सदा इसीकी चिन्ता बनी रहती थी ॥ २७ ॥
अहं कैलासनिलयमासाद्य वृषभध्वजम्।
आराध्य तं महादेवमस्तुवं सततं शिवम् ॥ २८ ॥
एक दिन कैलासवासी भगवान् शङ्करके पास पहुँचकर मैंने महादेव शिवकी आराधना की और तभीसे मैं निरन्तर उनके स्तवनमें लगा रहा ॥ २८ ॥
ततः प्रसन्नो मामाह वृणीष्वेति वरं हरः।
ततो मुक्तिर्मया तत्र प्रार्थिता देवसंनिधौ ॥ २९ ॥
इससे प्रसन्न हो भगवान् शङ्करने मुझसे कहा—'तुम कोई वर माँगो।' तब मैंने महादेवजीके समीप मुक्तिके लिये प्रार्थना की ॥ २९ ॥
मुक्तिं प्रार्थयमानं मां पुनराह त्रिलोचनः।
मुक्तिप्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः ॥ ३० ॥
मुक्तिके लिये प्रार्थना करते देख भगवान् त्रिलोचन फिर मुझसे बोले—'सबके लिये मुक्ति प्रदान करनेवाले तो केवल भगवान् विष्णु ही हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥
तस्माद् गत्वा च बदरीं तत्राराध्य जनार्दनम्।
मुक्तिं प्राप्नुहि गोविन्दान्नरनारायणाश्रमे ॥ ३१ ॥
'अतः तुम बदरीतीर्थमें जाकर वहाँ नर नारायणके आश्रममें श्रीजनार्दनकी आराधना करके उन्हीं गोविन्ददेवसे मोक्ष प्राप्त करो' ॥ ३१ ॥
इत्युक्तो देवदेवेन शूलिना शातवाहनम्।
तमेव परमं मन्वा गोविन्दं गरुडध्वजम् ॥ ३२ ॥
तस्मात् प्रार्थयमानः सन्मुक्तिं देशममुं गतः।
देवाधिदेव शूलधारी शिवके ऐसा कहनेपर मैंने गरुडध्वज गोविन्दके महत्त्वको समझा और उन्हींको सबसे श्रेष्ठ मानकर उनसे अपनी मुक्तिके लिये प्रार्थना करनेके उद्देश्यसे मैं इस देशमें आया हूँ ॥ ३२१/२ ॥