भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1016

भविष्यपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ९९१


अशीतितमोऽध्यायः

घण्टाकर्ण और भगवान् श्रीकृष्णका एक दूसरेको अपना परिचय देना तथा घण्टाकर्णद्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन एवं समाधि लाभ

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचौ मांसभक्षकौ ।
ददर्शार्थ महाघोरौ दीपिकाधारिणौ हरिः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर उन भगवान् श्रीकृष्णने उन दोनों महाभयंकर मांसभक्षी पिशाचोंकी ओर देखा, जो हाथमें मशाल लिये वहाँ आये हुए थे ॥

विलोकर्याचक्रतुस्तौ पिशाचौ देवकीसुतम् ।
स्थितं सुखासने विष्णुं दृष्ट्वा लोकेश्वरेश्वरम् ॥ २ ॥
तौ च गत्वा समुद्देशं पिशाचौ केशवस्य ह ।
ततस्तावूचतुर्विष्णुमन्तरीकृत्य केशवम् ॥ ३ ॥

उन दोनों पिशाचोंने भी सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए लोकेश्वरोंके भी ईश्वर देवकीनन्दन श्रीकृष्णको देखा । उन्हें देखकर वे दोनों पिशाच उनके/केशवके निकट गये और उन्हें अपने बीचमे करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ २-३ ॥

को भवान् कस्य वा मर्त्य कुतश्चागम्यते त्वया ।
किमर्थमिह सम्प्राप्तो वने घोरे मृगाकुले ॥ ४ ॥

'मानवप्रवर ! आप कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? कहाँसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है ? वन्यपशुओंसे भरे हुए इस घोर वनमें आप किस लिये आये हैं ? ॥ ४ ॥

निर्मनुष्ये द्वीपिवृते पिशाचगणसेविते ।
श्वापदैः सेव्यमाने च विपिने व्याघ्रसंकुले ॥ ५ ॥

'यह वन मनुष्योंसे रहित, चीतोंसे आवृत, पिशाचोंसे सेवित, हिंसक जन्तुओंका निवासस्थान तथा व्याघ्रोंसे भरा हुआ है ( इसमें आप क्यों आये ? ) ॥ ५ ॥

सुकुमारोऽनवद्याङ्गः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ।
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः पद्माभः श्रीपतिः स्वयम् ॥ ६ ॥

'आप बड़े सुकुमार प्रतीत होते हैं । आपका प्रत्येक अङ्ग अनिन्द्य सौन्दर्यसे सम्पन्न है । आप साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते हैं । आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके सदृश सुन्दर एवं विशाल हैं । आपकी अङ्गकान्ति श्याम है । आप नील कमलके समान प्रकाशित होते हैं और साक्षात् श्रीपति-से प्रतीत होते हैं ॥ ६ ॥

अस्मत्प्रीतिकरः साक्षात् प्राप्तो विष्णुरिवापरः ।
देवो वा यदि वा यक्षो गन्धर्वः किन्नरोऽपि वा ॥ ७ ॥
इन्द्रो वा धनदो वापि यमोऽथ वरुणोऽपि वा ।
एकाकी विपिने घोरे ध्यानार्पितमना इव ॥ ८ ॥

'मानो हमे प्रसन्नता प्रदान करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु दूसरा रूप धारण करके आपके रूपमे यहाँ पधारे हैं । आप देवता हैं या यक्ष, गन्धर्व हैं या किन्नर ? इन्द्र हैं या कुबेर ? अथवा यम हैं या वरुण ? जो इस भयंकर वनमें मनको ध्यानस्थ-सा करके अकेले बैठे हैं ॥ ७-८ ॥

ब्रूहि मर्त्य यथातत्त्वं ज्ञातुमिच्छामि मानद ।
एवं पृष्टः पिशाचाभ्यामाह विष्णुरुरुक्रमः ॥ ९ ॥
क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्याः प्रकृतिस्थिताः ।
यदुवंशे समुत्पन्नः क्षात्रं वृत्तममुष्ठितः ॥ १० ॥

'दूसरोंको मान देनेवाले मानव ! आप ठीक-ठीक बताइये, मैं यथार्थ रूपसे आपका परिचय जानना चाहता हूँ ।'

उन दोनों पिशाचोंके इस प्रकार पूछनेपर महान् डगवाले भगवान् विष्णु बोले—'मैं क्षत्रिय हूँ । प्राकृत मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते और जानते हैं । यदुकुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये क्षत्रियोचित कर्मका अनुष्ठान करता हूँ ॥ ९-१० ॥

लोकानामथ पातास्मि शास्ता दुष्टस्य सर्वदा ।
कैलासं गन्तुकामोऽस्मि द्रष्टुं देवमुमापतिम् ॥ ११ ॥

'मैं तीनों लोकोंका पालक तथा सदा ही दुष्टोंपर शासन करनेवाला हूँ । इस समय भगवान् उमापति देवका दर्शन करनेके लिये कैलासपर्वतपर जाना चाहता हूँ ॥ ११ ॥

इत्येवं मम वृत्तान्तः कथ्यतां कौ युवामिति ।
युवामिह समायातौ किमर्थं ब्राह्मणाश्रमम् ॥ १२ ॥

'यही मेरा वृत्तान्त है, अब अपना परिचय दो, तुम दोनों कौन हो ? यह तो ब्राह्मणका आश्रम है, यहाँ तुम किसलिये आये हो ? ॥ १२ ॥

एषा हि महती पुण्या नानाविप्रनिषेविता ।
बदरीयं समाख्याता न क्षुद्रैराश्रिता क्वचित् ॥ १३ ॥
तपस्विभिस्तपोयुक्तैर्जुष्टा सिद्धनिषेविता ।
श्वगणा नात्र दृश्यन्ते पिशाचा मांसभोजनाः ॥ १४ ॥

'यह महान् पुण्यमय स्थान है, इसे बदरी कहते हैं । बहुत-से ब्राह्मण यहाँ वास करते हैं, क्षुद्र स्वभाववाले दुष्टोंने कभी इस भूमिमे स्थान नहीं पाया है । सिद्ध पुरुषोने सदा इसका सेवन किया है, तपस्यामे लगे हुए तपस्वी यहाँ सब ओर निवास करते हैं । यहाँ आजकी तरह झुंड-के-झुंड कुत्ते कभी नहीं देखे गये और न कभी मांसभक्षी पिशाचोंका ही दर्शन हुआ ॥ १३-१४ ॥

न हन्तव्या मृगाश्चात्र मृगया नात्र वर्तते ।
न तु क्षुद्रैः प्रवेष्टव्या न कृतघ्नैर्न नास्तिकैः ॥ १५ ॥

'यहाँ मृगोंको नहीं मारना चाहिये, क्योंकि यहाँ कभी मृगया नहीं होती है । जो क्षुद्रस्वभाववाले कृतघ्न और नास्तिक मनुष्य हैं, उन्हें इस तीर्थमें कदापि प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥