भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1015
९९०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

समस्त प्राणी द्वेष रखते हैं तथा जो दूसरे जीवोंको केवल पीड़ा देनेवाली ही होती है ॥ १५ ॥

सर्वथा दुष्कृतं कर्म बहुभिर्जन्मसंचयैः ।
तथा हि तत्फलं घोरमद्यापि न निवर्तते ॥ १६ ॥
'निश्चय ही हमलोगों ने बहुत-से जन्मोंमें केवल पापकर्मों-का ही संचय किया है, तभी तो उसका घोर फल आजतक भी निवृत्त नहीं हुआ है ॥ १६ ॥

यतःस्म प्राणिनो हन्तुं श्वगणैः सह साम्प्रतम् ।
तथा हि प्राणिनो लोके बाल्यमादौ समास्थिताः ॥ १७ ॥
अज्ञानावृतचित्ताश्च कृत्याकृत्यं न जानते ।
तथा यौवनिनो भ्रान्ता विषयैर्बहुलीकृताः ॥ १८ ॥
यतन्ते श्रेयसे नैव ततो विषयसंस्थिताः ।
विषयाविष्टचित्ता हि मनुष्या न विजानते ॥ १९ ॥
'हम इस समय भी झुंड-के-झुंड कुत्ते साथ लिये प्राणियोंका वध करनेपर तुले हुए हैं। जगत्के प्राणी पहले बाल्यावस्थामें स्थित होते हैं, उस समय उनका चित्त अज्ञानसे आवृत्त होता है। इस कारण वे कर्तव्य और अकर्तव्यको नहीं जानते हैं। तदनन्तर जब वे युवावस्थामें प्रवेश करते हैं, उस समय विषयोंके आकर्षणसे उनकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है। साथ ही उनके पास विषयोंका संग्रह भी बढ़ जाता है। अतः विषयोंमें रचे-पचे रहकर वे कभी अपने कल्याणके लिये यत्न नहीं करते। जिनका चित्त विषयोंसे आविष्ट हो जाता है, वे मनुष्य यह नहीं समझ पाते कि कल्याणकारी कर्म क्या है ? ॥ १७-१९ ॥

तथा च वृद्धभावे तु व्याधिभिर्बहुभिर्वृताः ।
ज्वरादिभिर्महाघोरैर्नानादुःखविधायिभिः ॥ २० ॥
यतन्ते न हि वै श्रेयो विनष्टेन्द्रियगोचराः ।
'तत्पश्चात् जब वृद्धावस्था आती है, तब वे बहुत-सी व्याधियोंद्वारा घिर जाते हैं। नाना प्रकारके दुःख देनेवाले भयंकर ज्वर आदि रोग उन्हें धर दबाते हैं। फिर इधर-उधर भटकनेवाली इन्द्रियोंके वशीभूत होकर वे अपने कल्याणके लिये यत्न नहीं कर पाते ॥ २० १/२ ॥

ततो मृता गर्भवासे वसन्ति सततं नराः ॥ २१ ॥
विण्मूत्रकलिले घोरे दुःखैर्बहुभिरावृताः ।
'तदनन्तर मृत्यु हो जानेपर वे जीव गर्भवासमें आते हैं और विष्ठा एवं मूत्रकी कीचसे भरे हुए घोर गर्भाशयमें अनेक प्रकारके दुःखोंसे आक्रान्त होकर निरन्तर निवास करते हैं ॥ २१ १/२ ॥

च्यवन्ते तु ततो घोराद् गर्भात् संसारमण्डले ॥ २२ ॥
परस्परं विहिंसन्तः कुर्वन्तः कर्मसंचयम् ।
'इसके बाद वे उस घोर गर्भसे च्युत होकर पुनः संसार-चक्रमें पड़ जाते हैं। यहाँ भी वे एक दूसरेकी हिंसा करते हुए पापकर्मोंके ही संचयमें लगे रहते हैं ॥ २२ १/२ ॥

महत्येवं सदा घोरे संसारे दुःखसंकुले ॥ २३ ॥
पापानि बहुरूपाणि कुर्वतेऽज्ञानतस्तदा ।
'इस प्रकार दुःखोंसे भरे हुए महाघोर संसारमें वे अज्ञानवश सदा नाना प्रकारके पापकर्म ही किया करते हैं ॥ २३ १/२ ॥

संसारस्यैप महिमा विस्तृतः सर्वजन्तुषु ॥ २४ ॥
अच्छेद्यः शस्त्रसम्पातैरुपायैर्बहुभिः सदा ।
एतस्मान्न निवर्तन्ते मर्त्याः प्राकृतबुद्धयः ॥ २५ ॥
'संसारकी यह महत्ता (बन्धनकारी प्रभाव) सभी प्राणियोंमें विस्तारपूर्वक व्याप्त है। शस्त्रोंके प्रहारसे तथा और भी बहुत-से लौकिक उपायोंद्वारा इस संसारका उच्छेद नहीं किया जा सकता। ओछी बुद्धिवाले (देहात्मवादी) मनुष्य इस संसारसे विरक्त नहीं होते हैं ॥ २४-२५ ॥

इमं हत्वा मनुष्येन्द्रमिदमस्माद्धराम्यहम् ।
चोरयित्वा धनमिदं हरिष्याम्याददाम्यहम् ॥ २६ ॥
निर्भर्त्सयैनमिमं शान्तं हरिष्यामि धनं बली ।
इत्यादिव्याकुला मूर्खा यतन्ते प्राणिपीडनम् ॥ २७ ॥
'वे सोचते हैं कि—मैं इस नरेशका वध करके इससे यह धन हर लूँगा, इस धनको चुराकर घर ले जाऊँगा और उसे उपभोगमें लाऊँगा। यह शान्त और दुर्बल है और मैं बलवान् हूँ। मैं इसे डाँट-फटकारकर इसका धन हर लूँगा।' इन्हीं चिन्ताओंमें व्यग्र हुए मूर्ख मनुष्य दूसरे प्राणियोंको पीड़ा देनेका प्रयत्न करते रहते हैं ॥ २६-२७ ॥

अस्यैव दुःखमूलस्य संसारस्य सदा हरिः ।
भेषजं सर्वथा देवः शङ्खचक्रगदाधरः ।
आदिदेवः पुराणात्मा आत्मा ब्रह्मविदां सदा ॥ २८ ॥
'दुःखके मूल-कारण इस संसाररूपी रोगको सदाके लिये सब प्रकारसे मिटानेके निमित्त एकमात्र उत्तम ओषधि शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले, आदिदेव, पुराणपुरुष तथा ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा भगवान् श्रीहरि ही हैं ॥ २८ ॥

ते वयं सर्वयत्नेन द्रक्ष्यामः सर्वथा हरिम् ।
इत्थं पिशाचौ भाषन्तौ प्रादुरास्तां हरेः पुरः ॥ २९ ॥
'अतः हमलोग सर्वथा सम्पूर्ण प्रयत्न करके श्रीहरिका दर्शन करेंगे।' इस प्रकारकी बातें करते हुए वे दोनों पिशाच भगवान् श्रीकृष्णके सामने प्रकट हुए ॥ २९ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायामेकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राविषयक उन्नासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥