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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
९९०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

समस्त प्राणी द्वेष रखते हैं तथा जो दूसरे जीवोंको केवल पीड़ा देनेवाली ही होती है ॥ १५ ॥

सर्वथा दुष्कृतं कर्म बहुभिर्जन्मसंचयैः ।
तथा हि तत्फलं घोरमद्यापि न निवर्तते ॥ १६ ॥
'निश्चय ही हमलोगों ने बहुत-से जन्मोंमें केवल पापकर्मों-का ही संचय किया है, तभी तो उसका घोर फल आजतक भी निवृत्त नहीं हुआ है ॥ १६ ॥

यतःस्म प्राणिनो हन्तुं श्वगणैः सह साम्प्रतम् ।
तथा हि प्राणिनो लोके बाल्यमादौ समास्थिताः ॥ १७ ॥
अज्ञानावृतचित्ताश्च कृत्याकृत्यं न जानते ।
तथा यौवनिनो भ्रान्ता विषयैर्बहुलीकृताः ॥ १८ ॥
यतन्ते श्रेयसे नैव ततो विषयसंस्थिताः ।
विषयाविष्टचित्ता हि मनुष्या न विजानते ॥ १९ ॥
'हम इस समय भी झुंड-के-झुंड कुत्ते साथ लिये प्राणियोंका वध करनेपर तुले हुए हैं। जगत्के प्राणी पहले बाल्यावस्थामें स्थित होते हैं, उस समय उनका चित्त अज्ञानसे आवृत्त होता है। इस कारण वे कर्तव्य और अकर्तव्यको नहीं जानते हैं। तदनन्तर जब वे युवावस्थामें प्रवेश करते हैं, उस समय विषयोंके आकर्षणसे उनकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है। साथ ही उनके पास विषयोंका संग्रह भी बढ़ जाता है। अतः विषयोंमें रचे-पचे रहकर वे कभी अपने कल्याणके लिये यत्न नहीं करते। जिनका चित्त विषयोंसे आविष्ट हो जाता है, वे मनुष्य यह नहीं समझ पाते कि कल्याणकारी कर्म क्या है ? ॥ १७-१९ ॥

तथा च वृद्धभावे तु व्याधिभिर्बहुभिर्वृताः ।
ज्वरादिभिर्महाघोरैर्नानादुःखविधायिभिः ॥ २० ॥
यतन्ते न हि वै श्रेयो विनष्टेन्द्रियगोचराः ।
'तत्पश्चात् जब वृद्धावस्था आती है, तब वे बहुत-सी व्याधियोंद्वारा घिर जाते हैं। नाना प्रकारके दुःख देनेवाले भयंकर ज्वर आदि रोग उन्हें धर दबाते हैं। फिर इधर-उधर भटकनेवाली इन्द्रियोंके वशीभूत होकर वे अपने कल्याणके लिये यत्न नहीं कर पाते ॥ २० १/२ ॥

ततो मृता गर्भवासे वसन्ति सततं नराः ॥ २१ ॥
विण्मूत्रकलिले घोरे दुःखैर्बहुभिरावृताः ।
'तदनन्तर मृत्यु हो जानेपर वे जीव गर्भवासमें आते हैं और विष्ठा एवं मूत्रकी कीचसे भरे हुए घोर गर्भाशयमें अनेक प्रकारके दुःखोंसे आक्रान्त होकर निरन्तर निवास करते हैं ॥ २१ १/२ ॥

च्यवन्ते तु ततो घोराद् गर्भात् संसारमण्डले ॥ २२ ॥
परस्परं विहिंसन्तः कुर्वन्तः कर्मसंचयम् ।
'इसके बाद वे उस घोर गर्भसे च्युत होकर पुनः संसार-चक्रमें पड़ जाते हैं। यहाँ भी वे एक दूसरेकी हिंसा करते हुए पापकर्मोंके ही संचयमें लगे रहते हैं ॥ २२ १/२ ॥

महत्येवं सदा घोरे संसारे दुःखसंकुले ॥ २३ ॥
पापानि बहुरूपाणि कुर्वतेऽज्ञानतस्तदा ।
'इस प्रकार दुःखोंसे भरे हुए महाघोर संसारमें वे अज्ञानवश सदा नाना प्रकारके पापकर्म ही किया करते हैं ॥ २३ १/२ ॥

संसारस्यैप महिमा विस्तृतः सर्वजन्तुषु ॥ २४ ॥
अच्छेद्यः शस्त्रसम्पातैरुपायैर्बहुभिः सदा ।
एतस्मान्न निवर्तन्ते मर्त्याः प्राकृतबुद्धयः ॥ २५ ॥
'संसारकी यह महत्ता (बन्धनकारी प्रभाव) सभी प्राणियोंमें विस्तारपूर्वक व्याप्त है। शस्त्रोंके प्रहारसे तथा और भी बहुत-से लौकिक उपायोंद्वारा इस संसारका उच्छेद नहीं किया जा सकता। ओछी बुद्धिवाले (देहात्मवादी) मनुष्य इस संसारसे विरक्त नहीं होते हैं ॥ २४-२५ ॥

इमं हत्वा मनुष्येन्द्रमिदमस्माद्धराम्यहम् ।
चोरयित्वा धनमिदं हरिष्याम्याददाम्यहम् ॥ २६ ॥
निर्भर्त्सयैनमिमं शान्तं हरिष्यामि धनं बली ।
इत्यादिव्याकुला मूर्खा यतन्ते प्राणिपीडनम् ॥ २७ ॥
'वे सोचते हैं कि—मैं इस नरेशका वध करके इससे यह धन हर लूँगा, इस धनको चुराकर घर ले जाऊँगा और उसे उपभोगमें लाऊँगा। यह शान्त और दुर्बल है और मैं बलवान् हूँ। मैं इसे डाँट-फटकारकर इसका धन हर लूँगा।' इन्हीं चिन्ताओंमें व्यग्र हुए मूर्ख मनुष्य दूसरे प्राणियोंको पीड़ा देनेका प्रयत्न करते रहते हैं ॥ २६-२७ ॥

अस्यैव दुःखमूलस्य संसारस्य सदा हरिः ।
भेषजं सर्वथा देवः शङ्खचक्रगदाधरः ।
आदिदेवः पुराणात्मा आत्मा ब्रह्मविदां सदा ॥ २८ ॥
'दुःखके मूल-कारण इस संसाररूपी रोगको सदाके लिये सब प्रकारसे मिटानेके निमित्त एकमात्र उत्तम ओषधि शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले, आदिदेव, पुराणपुरुष तथा ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा भगवान् श्रीहरि ही हैं ॥ २८ ॥

ते वयं सर्वयत्नेन द्रक्ष्यामः सर्वथा हरिम् ।
इत्थं पिशाचौ भाषन्तौ प्रादुरास्तां हरेः पुरः ॥ २९ ॥
'अतः हमलोग सर्वथा सम्पूर्ण प्रयत्न करके श्रीहरिका दर्शन करेंगे।' इस प्रकारकी बातें करते हुए वे दोनों पिशाच भगवान् श्रीकृष्णके सामने प्रकट हुए ॥ २९ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायामेकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राविषयक उन्नासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥

भविष्यपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ९९१


अशीतितमोऽध्यायः

घण्टाकर्ण और भगवान् श्रीकृष्णका एक दूसरेको अपना परिचय देना तथा घण्टाकर्णद्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन एवं समाधि लाभ

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचौ मांसभक्षकौ ।
ददर्शार्थ महाघोरौ दीपिकाधारिणौ हरिः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर उन भगवान् श्रीकृष्णने उन दोनों महाभयंकर मांसभक्षी पिशाचोंकी ओर देखा, जो हाथमें मशाल लिये वहाँ आये हुए थे ॥

विलोकर्याचक्रतुस्तौ पिशाचौ देवकीसुतम् ।
स्थितं सुखासने विष्णुं दृष्ट्वा लोकेश्वरेश्वरम् ॥ २ ॥
तौ च गत्वा समुद्देशं पिशाचौ केशवस्य ह ।
ततस्तावूचतुर्विष्णुमन्तरीकृत्य केशवम् ॥ ३ ॥

उन दोनों पिशाचोंने भी सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए लोकेश्वरोंके भी ईश्वर देवकीनन्दन श्रीकृष्णको देखा । उन्हें देखकर वे दोनों पिशाच उनके/केशवके निकट गये और उन्हें अपने बीचमे करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ २-३ ॥

को भवान् कस्य वा मर्त्य कुतश्चागम्यते त्वया ।
किमर्थमिह सम्प्राप्तो वने घोरे मृगाकुले ॥ ४ ॥

'मानवप्रवर ! आप कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? कहाँसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है ? वन्यपशुओंसे भरे हुए इस घोर वनमें आप किस लिये आये हैं ? ॥ ४ ॥

निर्मनुष्ये द्वीपिवृते पिशाचगणसेविते ।
श्वापदैः सेव्यमाने च विपिने व्याघ्रसंकुले ॥ ५ ॥

'यह वन मनुष्योंसे रहित, चीतोंसे आवृत, पिशाचोंसे सेवित, हिंसक जन्तुओंका निवासस्थान तथा व्याघ्रोंसे भरा हुआ है ( इसमें आप क्यों आये ? ) ॥ ५ ॥

सुकुमारोऽनवद्याङ्गः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ।
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः पद्माभः श्रीपतिः स्वयम् ॥ ६ ॥

'आप बड़े सुकुमार प्रतीत होते हैं । आपका प्रत्येक अङ्ग अनिन्द्य सौन्दर्यसे सम्पन्न है । आप साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते हैं । आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके सदृश सुन्दर एवं विशाल हैं । आपकी अङ्गकान्ति श्याम है । आप नील कमलके समान प्रकाशित होते हैं और साक्षात् श्रीपति-से प्रतीत होते हैं ॥ ६ ॥

अस्मत्प्रीतिकरः साक्षात् प्राप्तो विष्णुरिवापरः ।
देवो वा यदि वा यक्षो गन्धर्वः किन्नरोऽपि वा ॥ ७ ॥
इन्द्रो वा धनदो वापि यमोऽथ वरुणोऽपि वा ।
एकाकी विपिने घोरे ध्यानार्पितमना इव ॥ ८ ॥

'मानो हमे प्रसन्नता प्रदान करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु दूसरा रूप धारण करके आपके रूपमे यहाँ पधारे हैं । आप देवता हैं या यक्ष, गन्धर्व हैं या किन्नर ? इन्द्र हैं या कुबेर ? अथवा यम हैं या वरुण ? जो इस भयंकर वनमें मनको ध्यानस्थ-सा करके अकेले बैठे हैं ॥ ७-८ ॥

ब्रूहि मर्त्य यथातत्त्वं ज्ञातुमिच्छामि मानद ।
एवं पृष्टः पिशाचाभ्यामाह विष्णुरुरुक्रमः ॥ ९ ॥
क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्याः प्रकृतिस्थिताः ।
यदुवंशे समुत्पन्नः क्षात्रं वृत्तममुष्ठितः ॥ १० ॥

'दूसरोंको मान देनेवाले मानव ! आप ठीक-ठीक बताइये, मैं यथार्थ रूपसे आपका परिचय जानना चाहता हूँ ।'

उन दोनों पिशाचोंके इस प्रकार पूछनेपर महान् डगवाले भगवान् विष्णु बोले—'मैं क्षत्रिय हूँ । प्राकृत मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते और जानते हैं । यदुकुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये क्षत्रियोचित कर्मका अनुष्ठान करता हूँ ॥ ९-१० ॥

लोकानामथ पातास्मि शास्ता दुष्टस्य सर्वदा ।
कैलासं गन्तुकामोऽस्मि द्रष्टुं देवमुमापतिम् ॥ ११ ॥

'मैं तीनों लोकोंका पालक तथा सदा ही दुष्टोंपर शासन करनेवाला हूँ । इस समय भगवान् उमापति देवका दर्शन करनेके लिये कैलासपर्वतपर जाना चाहता हूँ ॥ ११ ॥

इत्येवं मम वृत्तान्तः कथ्यतां कौ युवामिति ।
युवामिह समायातौ किमर्थं ब्राह्मणाश्रमम् ॥ १२ ॥

'यही मेरा वृत्तान्त है, अब अपना परिचय दो, तुम दोनों कौन हो ? यह तो ब्राह्मणका आश्रम है, यहाँ तुम किसलिये आये हो ? ॥ १२ ॥

एषा हि महती पुण्या नानाविप्रनिषेविता ।
बदरीयं समाख्याता न क्षुद्रैराश्रिता क्वचित् ॥ १३ ॥
तपस्विभिस्तपोयुक्तैर्जुष्टा सिद्धनिषेविता ।
श्वगणा नात्र दृश्यन्ते पिशाचा मांसभोजनाः ॥ १४ ॥

'यह महान् पुण्यमय स्थान है, इसे बदरी कहते हैं । बहुत-से ब्राह्मण यहाँ वास करते हैं, क्षुद्र स्वभाववाले दुष्टोंने कभी इस भूमिमे स्थान नहीं पाया है । सिद्ध पुरुषोने सदा इसका सेवन किया है, तपस्यामे लगे हुए तपस्वी यहाँ सब ओर निवास करते हैं । यहाँ आजकी तरह झुंड-के-झुंड कुत्ते कभी नहीं देखे गये और न कभी मांसभक्षी पिशाचोंका ही दर्शन हुआ ॥ १३-१४ ॥

न हन्तव्या मृगाश्चात्र मृगया नात्र वर्तते ।
न तु क्षुद्रैः प्रवेष्टव्या न कृतघ्नैर्न नास्तिकैः ॥ १५ ॥

'यहाँ मृगोंको नहीं मारना चाहिये, क्योंकि यहाँ कभी मृगया नहीं होती है । जो क्षुद्रस्वभाववाले कृतघ्न और नास्तिक मनुष्य हैं, उन्हें इस तीर्थमें कदापि प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥

९९२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

अहमस्य तु देशस्य रक्षिता नात्र संशयः।
व्यतिक्रमो यदि भवेत् तस्य शास्तास्मि यत्नतः ॥ १६ ॥
'मैं इस देशका रक्षक हूँ, इसमें संशय नहीं है। यदि किसीके द्वारा मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन हुआ तो मैं यत्नपूर्वक उसका शासन करूँगा ॥ १६ ॥

कौ भवन्तौ क्व नु युवां कस्येयं महती चमूः।
नातः परं प्रवेष्टव्यमृषयस्त्वत्र संस्थिताः ॥ १७ ॥
विघ्नस्तत्र प्रवर्तेत तपःसु च तपस्विनाम्।
'तुम दोनों कौन हो ? कहाँ रहते हो ? यह विशाल सेना किसकी है ? इससे आगे इस वनमें प्रवेश नहीं करना चाहिये, क्योंकि यहाँ ऋषि रहते हैं। उन तपस्वी ऋषियोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ सकता है ॥ १७१/२ ॥

इहैव स्थीयतां तावद् वक्तव्यं च ततः सुखम् ॥ १८ ॥
अन्यथाहं निषेद्धा स्यां बलाद्वाक्यैस्तथैव च।
'सब लोग यहीं ठहर जायें और सुखपूर्वक बातें करें, अन्यथा मैं वाणीद्वारा तथा बलद्वारा भी रोकूँगा' ॥ १८१/२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टौ पिशाचौ तु वक्तुमेवोपचक्रतुः ॥ १९ ॥
तयोरेको महाघोरः पिशाचो दीर्घबाहुकः।
उवाच वचनं तत्र यथा हृदि समर्पितम् ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार पूछे जानेपर उन दोनों पिशाचोंने उनके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया। उन दोनोंमेंसे एक पिशाच बड़ा भयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके हृदयमें जैसी बात थी, उसीको वह वहाँ सुनाने लगा ॥ १९-२० ॥

पिशाच उवाच
श्रूयतामभिधास्यामि समाहितमना भव।
नमस्कृत्य जगन्नाथं हरिं कृष्णं जगत्पतिम् ॥ २१ ॥
आदिदेवमजं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम्।
वक्ष्यामि सकलं यद्वत् तथा शृणु यदीच्छसि ॥ २२ ॥
पिशाच बोला—अच्छा ! बताता हूँ, सुनिये और अपने चित्तको एकाग्र कर लीजिये। मैं पहले आदिदेव, अजन्मा, सर्वश्रेष्ठ, निष्पाप, पवित्र, पापहारी, जगदीश्वर, विश्वपालक, सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विष्णुको नमस्कार करके अपना सारा वृत्तान्त आपको ठीक-ठीक बताऊँगा, यदि आप सुनना चाहते हों तो सुनिये ॥ २१-२२ ॥

घण्टाकर्णोऽस्मि नाम्नाहं पिशाचो घोरदर्शनः।
मांसादो विकृतो घोरः साक्षान्मृत्युरिवापरः ॥ २३ ॥
मैं घण्टाकर्ण नामसे प्रसिद्ध पिशाच हूँ, मेरी दृष्टि बड़ी भयंकर है। मैं मांसभक्षी, विकृताङ्ग, घोर तथा साक्षात् दूसरे कालके समान प्राणियोंका हिंसक हूँ ॥ २३ ॥

धनदस्यानुगन्ताहं साक्षाद् रुद्रसखस्य च।
ममायमनुजः साक्षादन्तकस्यान्तको ह्ययम् ॥ २४ ॥
भगवान् शङ्करके सखा साक्षात् कुबेरका मैं अनुचर हूँ। यह मेरा सगा छोटा भाई है, जो कालका भी काल है ॥ २४ ॥

मृगयेयं सुमहती विष्णोः पूजार्थमुद्यता।
ममेयं वर्तते सेना श्वगणोऽपि ममैव तु ॥ २५ ॥
यह जो बड़ा भारी शिकार खेला जा रहा है, इसका उद्देश्य है भगवान् विष्णुकी पूजा। यह सेना मेरी है और यह कुत्तोंका झुंड भी मेरा ही है ॥ २५ ॥

आगतोऽहं महाशैलात् कैलासाद् भूतसेवितात्।
अहं पिशाचभावेन संविष्टः पापकर्मकृत् ॥ २६ ॥
मैं भूतोंसे सेवित महापर्वत कैलाससे यहाँ आया हूँ, पिशाच-वेषमें घिरा हुआ पापकर्मी हूँ ॥ २६ ॥

सततं दूषयन् विष्णुं घण्टामाबध्य कर्णयोः।
मम न प्रविशेन्नाम विष्णोरिति विचिन्तयन् ॥ २७ ॥
पहले मैं सदा विष्णुकी निन्दा करता था और कानोंमें घण्टा बाँधकर घूमता था कि कहीं मेरे इन कर्णकुहरोंमें विष्णुका नाम न प्रविष्ट हो जाय, मुझे सदा इसीकी चिन्ता बनी रहती थी ॥ २७ ॥

अहं कैलासनिलयमासाद्य वृषभध्वजम्।
आराध्य तं महादेवमस्तुवं सततं शिवम् ॥ २८ ॥
एक दिन कैलासवासी भगवान् शङ्करके पास पहुँचकर मैंने महादेव शिवकी आराधना की और तभीसे मैं निरन्तर उनके स्तवनमें लगा रहा ॥ २८ ॥

ततः प्रसन्नो मामाह वृणीष्वेति वरं हरः।
ततो मुक्तिर्मया तत्र प्रार्थिता देवसंनिधौ ॥ २९ ॥
इससे प्रसन्न हो भगवान् शङ्करने मुझसे कहा—'तुम कोई वर माँगो।' तब मैंने महादेवजीके समीप मुक्तिके लिये प्रार्थना की ॥ २९ ॥

मुक्तिं प्रार्थयमानं मां पुनराह त्रिलोचनः।
मुक्तिप्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः ॥ ३० ॥
मुक्तिके लिये प्रार्थना करते देख भगवान् त्रिलोचन फिर मुझसे बोले—'सबके लिये मुक्ति प्रदान करनेवाले तो केवल भगवान् विष्णु ही हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥

तस्माद् गत्वा च बदरीं तत्राराध्य जनार्दनम्।
मुक्तिं प्राप्नुहि गोविन्दान्नरनारायणाश्रमे ॥ ३१ ॥
'अतः तुम बदरीतीर्थमें जाकर वहाँ नर नारायणके आश्रममें श्रीजनार्दनकी आराधना करके उन्हीं गोविन्ददेवसे मोक्ष प्राप्त करो' ॥ ३१ ॥

इत्युक्तो देवदेवेन शूलिना शातवाहनम्।
तमेव परमं मन्वा गोविन्दं गरुडध्वजम् ॥ ३२ ॥
तस्मात् प्रार्थयमानः सन्मुक्तिं देशममुं गतः।
देवाधिदेव शूलधारी शिवके ऐसा कहनेपर मैंने गरुडध्वज गोविन्दके महत्त्वको समझा और उन्हींको सबसे श्रेष्ठ मानकर उनसे अपनी मुक्तिके लिये प्रार्थना करनेके उद्देश्यसे मैं इस देशमें आया हूँ ॥ ३२१/२ ॥

भविष्यपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ९९३


अन्यच्च शृणु मे कार्यं यदि कौतूहलं तव ॥ ३३ ॥
पुरी द्वारवती नाम पश्चिमस्योदधेस्तटे ।
यदुवृष्णिसमाकीर्णा सागरोर्मिसमाकुलाम् ॥ ३४ ॥
अध्यास्ते स हरिविष्णुस्तां पुरीं पुरुषोत्तमः ।
यदि तुम्हें कौतूहल हो, तो मेरे दूसरे कार्यको भी सुनो। पश्चिम समुद्रके तटपर द्वारवती नामसे प्रसिद्ध एक पुरी है, जिसमें यदु एवं वृष्णिवंशके लोग रहते हैं। वह पुरी समुद्रकी लहरोंसे व्याप्त है। उसीमें इस समय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं ॥ ३३-३४½ ॥

द्रष्टुं लोकहितार्थाय वसन्तं द्वारकापुरे ॥ ३५ ॥
निर्गतः साम्प्रतं मर्त्य वयमेतैः सहानुगैः ।
विष्णुः सर्वेश्वरः साक्षाद्द्रष्टव्योऽस्माभिरद्य वै ॥ ३६ ॥
मर्त्य ! लोकहितके लिये द्वारकापुरीमे निवास करनेवाले उन भगवान्का दर्शन करनेके उद्देश्यसे हम इन अनुचरोंके साथ इस समय निकले हैं। आज हमें साक्षात् सर्वेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन करना है ॥ ३५-३६ ॥

लोकानां प्रभवः पाता कर्ता हर्ता जगत्पतिः ।
आदिः स हि समस्तस्य प्रभवः कारणं हरिः ॥ ३७ ॥
वे श्रीहरि ही सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारण, पालक, कर्ता, हर्ता, जगदीश्वर, सबके आदिपुरुष, उद्गमस्थान और बीज हैं ॥ ३७ ॥

कर्ता समस्तस्य हरिः पुरातनः
प्रभुः प्रभूणामपि यः सदात्मकः ।
तमादिदेवं वरदं वरेण्यं
द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ३८ ॥
जो श्रीहरि समस्त जगत्के कर्ता, पुराण-पुरुष, प्रभुओंके भी प्रभु और सत्वरूप हैं, उन आदिदेव, वरदायक एवं वरेण्य भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं ॥ ३८ ॥

यस्य प्रसादाज्जगदेवमासीत्
सप्राणिगन्धर्वमहोरगौघम् ।
देवं जगद्योनिमजं जनार्दनं
द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ३९ ॥
जिनके कृपा-प्रसादसे प्राणियों, गन्धर्वों और बड़े-बड़े नागोंके समुदायसे युक्त यह जगत् इस रूपमें प्रकट हुआ था, उन जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत अजन्मा देव जनार्दन हरिका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं ॥ ३९ ॥

यस्योदराद् विश्वमिदं प्रसूतं
लयं च तस्मिन् समुपैति कल्पे ।
तस्यैव साक्षाद् वशवर्ति विश्वं
द्रक्ष्याम देवं पुरुषोत्तमं हरिम् ॥ ४० ॥
कल्पके आरम्भमें जिनके उदरसे यह विश्व प्रकट होता है और कल्पके अन्तमें पुनः उसीमे लीन हो जाता है। स्थितिकालमें भी यह सारा विश्व जिन साक्षात् श्रीहरिके ही अधीन रहता है, उन पुरुषोत्तमदेव श्रीहरिका हम दर्शन करेंगे ॥

स्रष्टा च योऽसौ सकलस्य देवः
पाता च हर्ता च हरिः स एव ।
द्रक्ष्याम नित्यं भुवनेश्वरं हरिं
पुराणमार्यं प्रभविष्णुमव्ययम् ॥ ४१ ॥
जो विष्णुदेव इस सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं तथा जो श्रीहरि ही इसका पालन और संहार करनेवाले भी हैं, उन आदिपुरुष, पुरातन देवता, प्रभावशाली, अविनाशी, नित्यस्वरूप, भुवनेश्वर श्रीहरिका हम नित्य दर्शन करेंगे ॥ ४१ ॥

अजस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता
भुवश्च कर्ता हरिरेक एव ।
तं योगिनो योगविशुद्धबुद्धिं
लभेम तेनैव मतिः समाकुला ॥ ४२ ॥
वे एकमात्र श्रीहरि ही अजन्मा ब्रह्माजीके भी उत्पादक, जगत्के रक्षक और भूतलके निर्माता हैं। योगसे विशुद्ध बुद्धिवाले उन परमेश्वरको हमलोग ध्यानयोगकी साधना करके प्राप्त करेंगे। हमारी चित्तवृत्ति उन्हींसे व्याप्त है ॥ ४२ ॥

निगीर्य विश्वं सकलं जगत्पतिः
शेते शिशुत्वं समवाप्य साक्षात् ।
वटस्य पत्रे जगतां निवासः
पादौ च विक्षिप्य करौ विधुन्वन् ॥ ४३ ॥
जगत्के पालक और तीनों लोकोंके निवास-स्थान श्रीहरि प्रलयकालमें सम्पूर्ण विश्वको अपने भीतर निगलकर साक्षात् शिशुभावको प्राप्त हो अक्षयवटके पत्रपर दोनों पैर फेंकते और हाथ हिलाते हुए शयन करते हैं ॥ ४३ ॥

यस्योदरे देवमुनिः पुरातनो
ददर्श लोकानखिलान् स मायया ।
प्रविश्य विश्वं सकलं यथावद्
बहिर्यथाभूतमभूदिदं महत् ॥ ४४ ॥
जिनके उदरमें प्रवेश करके पुरातन देवर्षि मार्कण्डेय मुनिने उन्हींकी मायासे इन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया था। उस समय वहाँ यह सारा महान् विश्व यथावत् रूपसे उसी प्रकार स्थित था, जैसा कि पहले उनके उदरसे बाहर अनुभवमें आया था ॥ ४४ ॥

निगीर्य विश्वं जगदादिकाले
शेते महात्मा जलधेर्घलौघे ।
देव्या श्रिया चामरलोलहस्तया
निषेव्यमाणः पुरुषोत्तमस्तदा ॥ ४५ ॥
पूर्वकालमें इस सम्पूर्ण जगत्को अपने भीतर लीन करके वे महात्मा पुरुषोत्तम एकार्णवके जलप्रवाहमें शयन करते थे और देवी लक्ष्मी हाथसे चँवर डुलाती हुई उनकी सेवा कर रही थीं ॥ ४५ ॥

नाभेश्च यस्याविरभूत् सपद्मं
पद्मं महत्कार्त्तस्वरप्रभं प्रभोः ।
जन्मास्पदं लोकगुरोर्यदासी-
द्विस्तारि पद्मं जगदादिसृष्टौ ॥ ४६ ॥


म० ६० ३२'-

१९४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जगतकी सृष्टिके प्रारम्भकालमें जिन भगवान्‌की नाभिसे सुवर्णके समान कान्तिमान् एक विशाल कमल प्रकट हुआ, जो अपने दलोंके साथ सुशोभित होता था । वह विस्तृत कमल ही लोकगुरु ब्रह्माजीका जन्मस्थान था ॥ ४६ ॥

दधार यो भूतपतिर्महान्महीं दंष्ट्राग्रसंस्थापितरूढमूलम् । नादं महामेघ इवादिकाले कुर्वन् वराहो मुनिगीतमूर्तिः ॥ ४७ ॥ हरिः पुराणः पुरुषोत्तमः प्रभुः कर्ता समस्तस्य समस्तसाक्षी । यज्ञात्मको यज्ञपतिर्जगत्पति- र्द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ४८ ॥

जिन महान् भूतनाथ विष्णुने आदिकालमें मुनियोंद्वारा प्रशंसित विग्रहवाले वराहरूप होकर महान् मेघके समान गर्जना करते हुए अपनी दाढ़के अग्रभागपर पृथ्वीके मूल भागको स्थापित करके उसे जलसे ऊपर उठाया था, जो पुराण-पुरुषोत्तम प्रभु श्रीहरि समस्त जगत्के कर्ता, साक्षी, यज्ञरूप एवं यज्ञके अधिपति हैं और समस्त जगत्का पालन करते हैं, उन्हीं परमेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ४७-४८ ॥

केचिद् बहुत्वेन वदन्ति देव- मेकात्मना केचिदिमं पुराणम् । वेदान्तसंस्थापितसत्त्वयुक्तं द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ४९ ॥

कोई आराधक उन विष्णुदेवका इन्द्र आदि अनेक देवताओंके रूपमें वर्णन करते हैं और कोई उपासक इन पुराण-पुरुषका एक रूपमें ही चिन्तन करते हैं । वेदान्त-शास्त्रमें प्रतिपादित विशुद्ध अद्वैत सत्तासे युक्त उन परमेश्वर-का दर्शन करनेके लिये हमलोग उद्यत हुए हैं ॥ ४९ ॥

अनेकमेके बहुधा वदन्ति श्रुतिस्मृतिन्यायविविष्टचित्ताः । आहुर्यमात्मानमजं पुराविदो द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ५० ॥

एक श्रेणीके विद्वान् श्रुति-स्मृति और न्यायमें अपने चित्तको लगाये रखकर जिन परमेश्वरका अनेक रूपोंमें अनेक प्रकारसे वर्णन करते हैं तथा पुराणवेत्ता पुरुष जिन्हें सबका आत्मा और अजन्मा बताते हैं, उन्हीं सर्वेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ५० ॥

यं प्राहुरीड्यं वरदं वरेण्य- मेकान्ततत्त्वं मुनयः पुरातनाः । यं सर्वगं देवमजं जनार्दनं द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ५१ ॥

जिन्हें प्राचीन मुनि स्तुति करनेके योग्य, वरदायक, वरेण्य और परमतत्त्वरूप बताते हैं । साथ ही जिन्हें सर्वव्यापी और अजन्मा कहते हैं, उन्हीं जनार्दनदेव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये हमलोग इस समय उद्यत हुए हैं ॥ ५१ ॥

यस्मिन् विश्वमिदं प्रोतमादिकाले जगत्पतौ । तं द्रष्टुमभिसंवृत्ताः किं नु वक्ष्याम साम्प्रतम् ॥ ५२ ॥

आदिकालमें जिन सूत्रस्वरूप जगदीश्वरमें यह सम्पूर्ण जगत् मनकेकी भाँति पिरोया गया था, उन्हीं भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं । अब इस समय और क्या कहें ? ॥ ५२ ॥

गच्छामो वयमन्यत्र गच्छ त्वं काममन्यतः । नियमोऽप्यस्ति नो मर्त्य यथेष्टं गच्छ साम्प्रतम् ॥ ५३ ॥ रात्रिमध्यमनुप्राप्तं नात्र कार्या विचारणा ।

मर्त्य ! अब हम अन्यत्र जाते हैं । तुम भी इच्छानुसार और कहीं जा सकते हो । हमारे नित्य नियमका भी समय आ गया है; क्योंकि आधी रात हो गयी, अतः इस समय तुम इच्छानुसार जहाँ चाहो, चले जाओ । इस विषयमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ५३३ ॥

इत्युक्त्वा घोररूपोऽसौ पिशाचो विकृताननः ॥ ५४ ॥ तस्मिन्नेव समे देशे पीत्वा च रुधिरं बहु । भक्षयित्वा यथाकामं मांसराशिं विचक्षणः ॥ ५५ ॥ अपः संस्पृश्य तत्रैव पार्श्वे संस्थाप्य साधनम् । अन्त्रपाशं महाघोरं संस्थाप्य विपुलं महत् ॥ ५६ ॥ आसनं कुशसंयुक्तं कृत्वा चाभ्युक्ष्य वारिणा । उत्सार्य श्वगणान् सर्वान् यत्नेन महता तदा ॥ ५७ ॥ सुखासनं समास्थाय समाधौ यतते श्वपः ।

ऐसा कहकर उस विकराल मुखवाले घोररूपधारी विचक्षण पिशाचने उसी समतल प्रदेशमें बहुत-सा रक्त पीकर इच्छानुसार मांसराशिका भक्षण किया । तत्पश्चात् जलका आचमन करके वहीं पार्श्वभागमें अपनी साधनसामग्री रख दी और अँतड़ियोंका महाभयंकर विशाल पाश भी वहीं बगलमें डाल दिया । इसके बाद कुशयुक्त आसन बिछाकर उसकी शुद्धिके लिये जल छिड़का और अपने सभी कुत्तोंको बड़े प्रयत्नसे दूर हटाया । तदनन्तर सुखासनपर बैठकर वह कुत्ता-पालक पिशाच समाधिके लिये यत्न करने लगा ॥ ५४-५७३ ॥

एकचित्तस्तदा भूत्वा नमस्कृत्य च केशवम् । इमं मन्त्रं पठन् घोरः पिशाचो भक्तवत्सलम् ॥ ५८ ॥

उस समय वह भयानक पिशाच एकचित्त हो भक्तवत्सल भगवान् केशवको नमस्कार करके इस मन्त्रमय स्तोत्रका पाठ करने लगा—॥ ५८ ॥

नमो भगवते तस्मै वासुदेवाय चक्रिणे । नमस्ते गदिने तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ॥ ५९ ॥

'उन चक्रधारी भगवान् वासुदेवको नमस्कार है, सबके

भविष्यपर्व] अशीतितमोऽध्यायः १९५


भीतर निवास करनेवाले देवता आप बुद्धिमान् गदाधरको नमस्कार है॥ ५९॥
ओं नमो नारायणाय विष्णवे प्रभविष्णवे।
मम भूयान्मनःशुद्धिः कीर्तनात् तव केशव॥ ६०॥
'प्रभावशाली, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दघन नारायणदेवको नमस्कार है। केशव ! आपके कीर्तनसे मेरे मनकी शुद्धि हो जाय॥ ६०॥
जन्मेदमीदृशं घोरं मा भून्मम दुरासदम्।
देवदूतो भविष्यामि स्मरणात् तव गोपते॥ ६१॥
'इन्द्रियोंके नियन्ता नारायण ! अब पुनः मुझे ऐसा दुःखप्रद भयङ्कर जन्म न प्राप्त हो। मैं आपके स्मरणसे देवदूत हो जाऊँ॥ ६१॥
तव चक्रप्रहारेण कायो नश्यतु मामकः।
मम भूयो भवो मा भूदेषा मे प्रार्थना विभो॥ ६२॥
'प्रभो ! आपके चक्रके प्रहारसे मेरा यह शरीर नष्ट हो जाय और फिर मुझे यह संसारबन्धन प्राप्त न हो, यही मेरी प्रार्थना है॥ ६२॥
अर्थिनां कल्पवृक्षोऽसि दाता सर्वस्य सर्वदा।
यत्र यत्र भवेज्जन्म तत्र तत्र भवान् हृदि॥ ६३॥
वर्त्ततां मम देवेश प्रार्थनैषा ममापरा।
'आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। सदा सबके दाता हैं। देवेश्वर ! जहाँ-जहाँ मेरा जन्म हो, वहाँ-वहाँ आप मेरे हृदयमें विराजमान रहें। यह मेरी दूसरी प्रार्थना है॥ ६३½॥
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं भवत्वेवं सदा मम॥ ६४॥
निर्विघ्ना प्रार्थना देव नमस्तेऽस्तु सदा मम।
'देव ! आपको नमस्कार है ! देव ! आपको नमस्कार है ! इस प्रकार मेरी प्रार्थना सदा निर्विघ्न चलती रहे। देव ! आपको सदा ही मेरा नमस्कार है॥ ६४½॥
यदा मे मरणं भूयात्तदा मा भूत् स्मृतिभ्रमः॥ ६५॥
दिने दिने क्षणं चित्तं त्वयि संस्थं भवत्विति।
एवं प्रेरय मां देव मा भूत् ते चित्तमीदृशम्॥ ६६॥
नृशंसोऽयं पिशाचोऽयं दयास्मिन् का भवेदिति।
'जब मेरा मरणकाल उपस्थित हो, उस समय मेरी स्मरणशक्तिमें भ्रम न उत्पन्न हो (मैं उस समय भी आपका ही स्मरण करता रहूँ)। देव ! प्रतिदिन और प्रतिक्षण मेरा चित्त आपमें ही स्थिर रहे। आप मुझे ऐसी ही प्रेरणा देते रहें। आपके चित्तमें कभी ऐसा भाव न आये कि 'यह क्रूर है, पिशाच है। इसपर क्या दया हो सकती है?'॥ ६५-६६½॥
एवं चिन्तय मां देव भृत्यो महामिति प्रभो॥ ६७॥
परपीडा न मत्तोऽस्तु नमस्ते भगवन् प्रभो।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु मा भूवन् साम्प्रतं हि मे॥ ६८॥
'प्रभो ! देव ! आप तो ऐसा ही विचार करें कि 'यह बेचारा मेरा सेवक है।' भगवन् ! प्रभो ! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरेद्वारा दूसरोंको पीड़ा न पहुँचे तथा अब मेरी इन्द्रियाँ विषयोंमें न फँसें॥ ६७-६८॥
अन्तकाले ममाप्येवं प्रसादात् तव केशव।
पृथिवी यातु मे घ्राणं रसनां यातु मे पयः॥ ६९॥
सूर्यश्च यातु मे चक्षुः स्पर्शं यातु च मारुतः।
श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनः प्राणं च गच्छतु॥ ७०॥
'केशव ! अन्तकालमें आपकी कृपासे मेरी भी ऐसी स्थिति हो- पृथिवी मेरी घ्राणेन्द्रियको ग्रहण करे, जल मेरी रसनेन्द्रियको अपना ले, सूर्य मेरी नेत्रेन्द्रियको तथा वायु मेरी त्वचा अपनेमें संयुक्त कर लें। इसी तरह आकाश भी मेरी श्रवणेन्द्रियको अपनेमें मिला ले तथा प्राण (चन्द्रमा) मेरे मनसे संयुक्त हों॥ ६९-७०॥
जलं मां रक्षतां नित्यं पृथिवी रक्षतां हरे।
सूर्यो मां रक्षतां विष्णो नमस्ते सूर्यतेजसे॥ ७१॥
'हरे ! जल सदा मेरी रक्षा करे। पृथिवी भी रक्षा करे। विष्णो ! सूर्यदेव मेरी रक्षा करें। आप सूर्यके समान तेजस्वी हैं, आपको नमस्कार है॥ ७१॥
वायुर्मा रक्षतां दुःखादाकाशं च जनार्दन।
न मनः सर्वगं देव रक्षतां विषयान्तरे॥ ७२॥
'जनार्दन ! वायु और आकाश दुःखसे मेरी रक्षा करें। देव ! सर्वस्वरूप परमात्माके चिन्तनमें लगा हुआ मेरा मन विषय और भेद-बुद्धिकी रक्षा न करे (अर्थात् वह न तो विषयपरायण हो, न भेद-बुद्धिको ही अपनाये)॥ ७२॥
मनो विपर्यये घोरे पुरुषाञ् हन्ति नित्यशः।
पापेषु योजयेत् पुंसः परपीडात्मकेषु च॥ ७३॥
'इसके विपरीत यदि मन घोर विपर्यय (विषय-सेवन आदि) में फँस जाय तो वह पुरुषोंका नाश कर डालता है। दूसरोंके पीड़नरूप पापोंमें फँसा देता है॥ ७३॥
मनस्तद् रक्षतां देव भूयो भूयो जनार्दन।
मा भून्मनसि कालुष्यं मनो मे निर्मलं भवेत्॥ ७४॥
'देव जनार्दन ! आप मेरे उस मनकी बारंबार रक्षा करें, मेरे मनमें मलिनता न रहे, मेरा मन निर्मल हो जाय॥ ७४॥
कलुषं तस्य यच्चित्तं नरके पातयत्यमुम्।
बाह्यानि निर्मलान्येवमिन्द्रियाणि भवन्त्युत॥ ७५॥
न तानि कार्यवन्तीह मनश्चेत् कलुषं भवेत्।
'क्योंकि जीवका जो मलिन चित्त है, वह उसे नरकमें गिराता है। मनके शुद्ध होनेसे बाह्य इन्द्रियाँ भी निर्मल हो जाती हैं और यदि मन मलिन हो तो वे इन्द्रियाँ भी मलिन होनेके कारण इस जगत्में कोई सत्कार्य नहीं कर सकतीं॥ ७५½॥
नाङ्गानां मुष्टिनामेध्यं गृहीत्वा यो व्यवस्थितः॥ ७६॥
बहिः प्रक्षालनं कुर्वन् किं भवेत् तस्य केशव।

९९६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

व्यर्थो हि केवलं तस्य प्रग्रहो बाह्यगोचरः ॥ ७७ ॥ 'केशव ! जो मनुष्य अपने अपवित्र मनको मुट्ठीमें किये बिना केवल अङ्गोंका बाहरसे प्रक्षालन करता है, उसे क्या लाभ होगा ? उसका केवल बाहरसे शुद्धिके लिये आग्रह व्यर्थ ही है ॥ ७६-७७ ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन चित्तं रक्ष जनार्दन ।
बलवानिन्द्रियग्रामो वारयैनं जनार्दन ॥ ७८ ॥
'अतः जनार्दन ! सम्पूर्ण प्रयत्नद्वारा आप मेरे चित्तकी रक्षा कीजिये। जीवोंकी याचना पूर्ण करनेवाले देव ! इन्द्रियोंका समूह बड़ा बलवान् है, इसे रोकिये ॥ ७८ ॥

परीवादाज्जगन्नाथ वाचं रक्ष दुरुद्वहाम् ।
परद्रव्यानन्मनो रक्ष परदाराज्जनार्दन ।
सर्वत्र मे दया भूयात् प्रसादात् तव केशव ॥ ७९ ॥
'जगन्नाथ ! मेरी दुर्बह वाणीको आप परनिन्दासे बचाइये। जनार्दन ! मेरे मनको पराये धन और परायी स्त्रीसे दूर रखिये। केशव ! आपकी कृपासे मेरे मनमें सब प्राणियोंके प्रति दया हो ॥ ७९ ॥

त्वय्येव भक्तिरचला भूयाद् भूतेषु मे दया ।
बहुनात्र किमुक्तेन शृणुष्वेदं वचो मम ॥ ८० ॥
'प्रभो ! आपमें ही मेरी अविचल भक्ति हो और समस्त प्राणियोंके प्रति दया हो । इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ ? मेरी यह एक ही बात सुन लीजिये ॥ ८० ॥

सुखे दुःखे च रागे च भोजने गमने तथा ।
जाग्रत्स्वप्नेषु सर्वत्र त्वय्येव रमतां मनः ॥ ८१ ॥
मामकं देवदेवेश नमस्तेऽस्तु जनार्दन ।
'देवदेवेश्वर ! जनार्दन ! सुखमें, दुःखमें, राग और भोजनमें, चलने-फिरनेमें तथा जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें सर्वत्र आपमें ही मेरा मन रमण करे, आपको नमस्कार है' ॥ ८१ १/२ ॥

इति ब्रुवन् घोरतमो जात्या हीनो न चित्ततः ॥ ८२ ॥
पिशाचो भगवद्भक्तः समाधिं समपद्यत ।
इस तरह बोलता हुआ वह अत्यन्त भयङ्कर पिशाच, जो केवल जातिसे निम्नकोटिका था, हृदयसे नहीं, समाधिस्थ हो गया । वह महान् भगवद्भक्त था ॥ ८२ १/२ ॥

दृढं बद्ध्वाऽऽत्मनः कायमान्त्रपाशेन मांसपः ॥ ८३ ॥
निश्चलेनैव मनसा सुखमास्ते स संयतः ।
ध्यायन् हरिं जगद्योनिं विष्णुं पीताम्बरं शिवम् ॥ ८४ ॥
वह मांसभक्षी पिशाच अपने शरीरको अँतड़ियोंके सुदृढ़ पाशसे बाँधकर निश्चलचित्तके द्वारा सुखपूर्वक संयतभावसे बैठ गया और जगत्‌की उत्पत्तिका कारणभूत, पीताम्बरधारी, मङ्गलकारी, सर्वव्यापी श्रीहरिका ध्यान करने लगा ॥ ८३-८४ ॥

मुकुन्दमादिपुरुषमेकाकारमनामयम् ।
नित्यं शुद्धं ज्ञानगम्यं कारणं सर्वदेहिनाम् ॥ ८५ ॥
जो नित्य, शुद्ध, ज्ञानगम्य, समस्त देहधारियोंके कारणभूत, रोग-शोकसे रहित, एकाकार (अद्वितीय) और आदिपुरुष हैं, उन मुकुन्ददेवका चिन्तन करने लगा ॥ ८५ ॥

नासिकाग्रं समालोक्य पठन् ब्रह्म सनातनम् ।
निर्वातस्थो यथा दीपः प्रोच्चरन् प्रणतः सदा ॥ ८६ ॥
नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाये सनातन ब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए, वायुशून्य प्रदेशमें जलनेवाले दीपककी भाँति अविचलभावसे स्थित हो, वह निरन्तर प्रणाम एवं मन्त्रपाठ करने लगा ॥ ८६ ॥

प्रणवं वाचकं मत्वा वाच्यं ब्रह्मेति निश्चितः ।
एकाग्रं सततं कृत्वा चित्तं विष्णौ समर्पितम् ॥ ८७ ॥
विकल्परहितं चित्तं हृदि मध्ये न्यवेशयत् ।
प्रणवको वाचक मानकर और परब्रह्म परमात्माको उसका वाच्यार्थ निश्चित करके उसने अपने चित्तको निरन्तर एकाग्र रखते हुए उसे भगवान् विष्णुमें समर्पित कर दिया । उस विकल्परहित चित्तको हृदयकमलके भीतर दृढ़तापूर्वक स्थापित कर दिया ॥ ८७ १/२ ॥

पुण्डरीके शुभदले समावेश्य जगत्पतिम् ॥ ८८ ॥
आस्ते सुखं महायोगी पिशिताशस्तदा महान् ।
त्रिधामानं जपंस्तत्र स्मरन् विष्णुं सनातनम् ॥ ८९ ॥
शुभ दलोंसे युक्त उस हृदयकमलके आसनपर जगदीश्वर श्रीहरिको प्रतिष्ठित करके वह महायोगी, महान् मांसभक्षी पिशाच वहाँ सुखपूर्वक बैठा रहा तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन रूपोंमें विराजमान सनातन विष्णुका वहाँ स्मरण करता रहा ॥ ८८-८९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां घण्टाकर्णचित्तसमाधावशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें घण्टाकर्णके चित्तकी समाधिविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥


एकाशीतितमोऽध्यायः

पिशाचको समाधि-अवस्थामें भगवान् विष्णुका साक्षात्कार

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचं दृष्टवांस्तदा ।चिन्तयन्तं खमात्मानं शुद्धबुद्धिसमन्वितम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर उन

भविष्यपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ९९७


भगवान् विष्णु ( श्रीकृष्ण ) ने उस समय उस पिशाचकी ओर देखा, जो अपने आत्मस्वरूप श्रीहरिका ही चिन्तन कर रहा था; वह शुद्ध बुद्धिसे सम्पन्न था ॥ १ ॥
आत्मन्यवस्थितं साक्षात् पठन्तं प्रणवं सकृत् ।
प्रार्थयन्तं स्वमात्मानमेकान्ते नियतं हरिः ॥ २ ॥
वह हृदयकमलमें स्थित हो साक्षात् प्रणवका प्रत्येक नाम या मन्त्रके साथ एक बार उच्चारण करता था और अपने आत्मस्वरूप विष्णुसे ही अभीष्ट मनोरथके लिये प्रार्थना करता था। इस प्रकार एकान्तमें नियमपूर्वक ध्यान लगाये घण्टाकर्णको श्रीहरिने देखा ॥ २ ॥
अचिन्तयज्जगन्नाथः कारणं पुण्यसंचये ।
ध्यात्वा तु सुचिरं विष्णुः कारणं पुण्यकर्मणः ॥ ३ ॥
उस समय उन जगदीश्वर श्रीहरिने सोचा कि इसके पुण्यसंचयमें क्या कारण है। उसके पुण्यकर्मके कारणके विषयमें चिरकालतक चिन्तन करके वे इस निश्चयपर पहुँचे ॥ ३ ॥
धनदस्योपदेशेन पठन् सुबहुशः क्षितौ ।
वासुदेवेति कृष्णेति माधवेति च मां सदा ॥ ४ ॥
यह कुबेरके उपदेशसे पृथ्वीपर अनेक वार वासुदेव, कृष्ण, माधव इत्यादि नाम ले-लेकर निरन्तर मेरा कीर्तन करता रहा है ॥ ४ ॥
जनार्दन हरे विष्णो भूतभावनभावन ।
नराकार जगन्नाथ नारायण परायण ॥ ५ ॥
इति मां नामभिर्नित्यं पठत्येष दिवानिशम् ।
स्वपञ्जाग्रंस्तथा तिष्ठन् भुञ्जन् गच्छंस्तथा वदन् ॥ ६ ॥
जनार्दन ! हरे ! विष्णो ! भूतभावनभावन ! नराकार ! जगन्नाथ ! नारायण ! परायण ! इत्यादि नामोंद्वारा नित्य दिन-रात मुझे ही पुकारता रहा है। सोते, जागते, खड़े होते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बोलते समय मेरे ही नामोंका कीर्तन करता आया है ॥ ५-६ ॥
भक्षयन् मांसपिटकं पिवञ्छोणितमेव वा ।
बाधमानश्च सुचिरं हत्वा चापि मृगान् बहून् ॥ ७ ॥
हनने भोजने चैव जाग्रत्स्वप्ने तथैव च ।
सर्वेष्वपि च कार्येषु कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ ८ ॥
एतस्य कर्मणः पाक एष घोरस्य कर्मणः ।
पिटारीकी पिटारी मांस खाते अथवा खून पीते समय भी यह मेरे नामोंकी रट लगाता रहा है। चिरकाल तक प्राणियोंको कष्ट देकर और बहुत-से मृगोंका वध करके भी उनके हनन और भोजनके समय, जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंमें तथा सभी कार्योंमें यह मुझ वासुदेवको ही कर्ता मानता आया है। इसके इस घोर कर्मके परिपाक ( विनाश ) का यह समय प्राप्त हुआ है ॥ ७-८ ½ ॥

निश्चित्यैवं जगन्नाथः प्रीतस्तस्य बभूव ह ॥ ९ ॥
अदर्शयत् स्वमात्मानमनन्यस्य जगत्पतिः ।
शुद्धेऽन्तःकरणे तस्य पिशाचस्यापि भूमिप ॥ १० ॥
ऐसा निश्चय करके वे जगन्नाथ उसपर बहुत प्रसन्न हुए। राजन् ! तदनन्तर जगदीश्वर श्रीहरिने उस अनन्य-भक्त पिशाचको भी उसके शुद्ध अन्तःकरणमें अपने स्वरूपका दर्शन कराया ॥ ९-१० ॥
स च घोरः पिशाचोऽपि ददर्शात्मनि केशवम् ।
पीतकौशेयवसनं पद्माक्षं श्यामलं हरिम् ॥ ११ ॥
उस भयङ्कर पिशाचने भी अपने अन्तःकरणमें रेशमी पीताम्बरधारी, कमलनयन, श्यामसुन्दर पापहारी केशवका दर्शन किया ॥ ११ ॥
शङ्खिनं चक्रिणं विष्णुं स्रग्विणं गदिनं विभुम् ।
किरीटिनं कौस्तुभिनं श्रीवत्साच्छादितोरसम् ॥ १२ ॥
वे भगवान् विष्णु हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा लिये हुए थे। उनके गलेमें वनमाला, मस्तकपर किरीट और वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उनका हृद्देश श्रीवत्सकी आभासे आच्छादित हो रहा था ॥ १२ ॥
नीलमेघनिभं कान्तं गरुडस्थं प्रभञ्जनम् ।
चतुर्भुजं शुभगिरं निश्चलं सर्वगं शिवम् ॥ १३ ॥
वे नीलवर्णके मेघकी भाँति कमनीय कान्ति धारण करते थे। गरुड़की पीठपर विराजमान थे और भवभय-भञ्जन करनेवाले थे। उनके चार भुजाएँ शोभा पाती थीं। उनकी वाणी मङ्गलमयी थी। वे सर्वव्यापी कल्याणस्वरूप प्रभु निश्चलभावसे खड़े थे ॥ १३ ॥
अनादिनिधनं नित्यं मायाविनममायिनम् ।
सत्ययुक्तं सदा शुद्धं बुद्धिगम्यं सदामलम् ॥ १४ ॥
उनका न कहीं आदि है न अन्त। वे नित्य मायावी ( मायापति ) हैं। उनपर किसीकी माया नहीं चलती है। वे सत्ययुक्त, सदा शुद्ध, बुद्धिगम्य तथा नित्य निर्मल हैं ॥ १४ ॥
मनस्येवं जगन्नाथं दृष्ट्वा विष्णुमनेकधा ।
अनुन्मील्यैव नयने कृतार्थोऽस्मीत्यमन्यत ॥ १५ ॥
इस प्रकार हृदयके भीतर प्रकट हुए जगदीश्वर विष्णुका बारंबार दर्शन करके आँख खोले बिना ही अपने आपको कृतार्थ मानने लगा ॥ १५ ॥
अथ दृष्टो हरिर्विष्णुः साक्षात् सर्वत्रगः शुभः ।
प्रसन्नो हि हरिर्मह्यं तेनाहं दृष्टवान् हरिम् ॥ १६ ॥
अहो ! अब सर्वव्यापी, शुभस्वरूप, साक्षात् भगवान् विष्णु हरिने मुझे दर्शन दिया है, निश्चय ही वे श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हैं; इसीसे मैं उनका दर्शन पा सका हूँ ॥ १६ ॥
सिद्धं मे जन्मनः कृत्यं किमतः कृत्यमस्ति मे ।
ग्रन्थयो मम निर्भिन्ना पश्यान्येवेन्द्रियाणि मे ॥ १७ ॥

९९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मेरे जन्मका प्रयोजन सिद्ध हो गया, इससे बढ़कर मेरे लिये अब और कौन-से कर्तव्य शेष हैं। मेरी अज्ञानमयी गांठें खुल गयीं और इन्द्रियाँ भी वशमें हो ही गयीं ॥ १७ ॥

प्रायेण जितमित्येव मनो मन्ये स्मृते हरौ ।
एषणाश्च निरस्ता मे प्रसन्नोऽहं तथाभवम् ॥ १८ ॥

श्रीहरिका स्मरण होनेपर मैं ऐसा मानता हूँ कि प्रायः मेरा मन जीत लिया गया। मेरी त्रिविध एषणाएँ (लोकैषणा, वित्तैषणा और पुत्रैषणा) दूर हो गयीं और मैं पूर्ण प्रसन्न हो गया ॥ १८ ॥

एतेभ्योऽपि पिशाचेभ्यो निर्मुक्तः साम्प्रतं तथा ।
योऽसौ ममानुजः साक्षात्स च भक्तस्तथा हरौ ॥ १९ ॥
कालेन चैव निर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ।

अब इन पिशाचोंसे भी सम्बन्ध छूट गया। वह जो मेरा सगा छोटा भाई है, वह भी भगवान् विष्णुका भक्त है, अतः समयानुसार मुक्त होकर वह भी विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेगा ॥ १९ १/२ ॥

इत्येवं चिन्तयित्वा स आन्त्रपाशं विभिद्य च ॥ २० ॥
क्रमेण प्राणानुन्मुच्य विलोक्य च दिशस्तथा ।
शरीरं सुगमं कृत्वा प्राविशत् स सुखेन ह ॥ २१ ॥

ऐसा सोचकर उसने आँतोंका पाश काट डाला और क्रमशः प्राणोंको उन्मुक्त करके सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखकर शरीरको सुगम करके उसके भीतर सुखपूर्वक प्रविष्ट हुआ ॥ २०-२१ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पिशाचस्य विष्णुसाक्षात्कारे एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसंगमें पिशाचको विष्णुका साक्षात्कारविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥


द्व्यशीतितमोऽध्यायः

घण्टाकर्णद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

पिशिताशो जगन्नाथं ददर्शाथ जगद्गुरुम् ।
समाधौ च यथा दृष्टं भूमौ चापि तथा हरिम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पिशाचने जगत्के स्वामी जगद्गुरु श्रीकृष्णका दर्शन किया। समाधि-अवस्थामें उसने श्रीहरिके रूपकी जैसी झाँकी की थी, उसी रूपमें उसने भूमिपर बैठे हुए श्रीकृष्णको देखा ॥ १ ॥

अयं विष्णुरयं विष्णुरित्येचे पिशिताशनः ।
समाधौ च यथा दृष्टः सोऽयमत्रापि दृश्यते ।
इत्युक्त्वा च पुनर्नृत्ते नृत्यन्निव हसन्निव ॥ २ ॥

उन्हें देखते ही वह मांसभक्षी पिशाच बोल उठा—'ये ही विष्णु हैं, ये ही विष्णु हैं; क्योंकि समाधिमें वे मुझे जिस रूपमें दिखायी दिये थे, उसी रूपमें यहाँ भी उनका दर्शन हो रहा है।' ऐसा कहकर वह पुनः नाचता और हँसता हुआ-सा कहने लगा—॥ २ ॥

अयं स चक्री शरशार्ङ्गधन्वा
गदी रथी सच्वजतूणपाणिः ।
सहस्रमूर्धा सकलाम्रेशो
जगत्प्रसूतिर्जगतां निवासः ॥ ३ ॥

'ये ही वे चक्रधारी, शार्ङ्ग-धनुष और बाण ग्रहण करनेवाले, गदाधर, रथारूढ तथा ध्वज एवं तरकस लिये रहनेवाले, सहस्र मस्तकवाले, सर्वदेवेश्वर, जगत्स्रष्टा तथा तीनों लोकोंके निवासस्थान श्रीहरि हैं ॥ ३ ॥

विष्णुर्जिष्णुर्जगन्नाथः पुराणः पुरुषोत्तमः ।
विश्वात्मा विश्वकर्ता यः सोऽयमेष सनातनः ॥ ४ ॥

'जिन्हें विष्णु, जिष्णु, जगन्नाथ, पुराणपुरुष, पुरुषोत्तम, विश्वात्मा और विश्वकर्ता कहा गया है, वे सनातन परमात्मा ये ही हैं ॥ ४ ॥

अस्यैव देवस्य हरेः स्तनान्तरे
विराजते कौस्तुभरत्नदीपः ।
यस्य प्रसादाज्जगदेतदादौ
विराजते चन्द्रमसेव रात्रिः ॥ ५ ॥

'इन्हीं श्रीनारायणदेवके वक्षःस्थलमें कौस्तुभमणिरूपी दीप उद्भासित होता है। जिसके प्रसादसे यह जगत् आदि-कालसे ही चन्द्रमासे रात्रिकी भाँति प्रकाशित हो रहा है ॥ ५ ॥

योऽसौ पृथ्वों दधाराशु दंष्ट्रया जलसंचयात् ।
योऽयमेव हरिः साक्षाद् वाराहं वपुराधितः ॥ ६ ॥

'जो वाराहरूपमें प्रकट हुए थे तथा जिन्होंने पृथ्वीको अपनी दाढ़द्वारा एकार्णवकी जलराशिसे तत्काल बाहर निकाला और जलके ऊपर स्थापित किया, वे साक्षात् श्रीहरि ये ही हैं ॥ ६ ॥

बद्ध्वा तथा दानवमुग्रपौरुषं
ददौ च शक्राय ततोऽनुराज्यम् ।
वलिं वलादेप हरिः स वामनः
स्तुतश्च भक्त्या मुनिभिः पुरातनैः ॥ ७ ॥

'उग्र पुरुषार्थवाले दानव बलिको बलपूर्वक बाँधकर इन्हीं वामनरूपधारी श्रीहरिने देवराज इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य अर्पित किया। उस समय प्राचीन महर्षियोंने भक्ति-भावसे इनकी स्तुति की थी ॥ ७ ॥

भविष्यपर्व ] | द्व्यशीतितमोऽध्यायः | ९९९

दंष्ट्राकरालः सुमहान् हत्वा यो दानवान् रणे।
निःशोकमखिलं लोकं चकारासौ जनार्दनः ॥ ८ ॥
'इन्हीं जनार्दनने विकराल दाढ़वाले महान् नृसिंह रूप होकर रणभूमिमें दानवोंको मारा और समस्त संसारको शोकरहित कर दिया ॥ ८ ॥

आदौ दधारैकभुजेन मन्दरं
निर्जित्य सर्वानसुरान् महार्णवे।
ददौ च शक्राय सुधामयं महान्
स एष साक्षादिह मामवस्थितः ॥ ९ ॥
'जिन्होंने आदिकालमें एक ही हाथसे मन्दराचलको धारण किया और महासागरके तटपर समस्त असुरोंको परास्त करके इन्द्रको अमृत प्रदान किया, वे ही ये साक्षात् महाविष्णु यहाँ मेरे निकट विराजमान हैं ॥ ९ ॥

यः शेते जलधौ नागे देव्या लक्ष्म्या सुखावहे।
हत्वा तौ दानवौ घोरौ मधुकैटभसंज्ञितौ ॥ १० ॥
'जो प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें मधु और कैटभ नामक दो भयंकर दानवोंका वध करके शेषनागकी सुखदायिनी शय्यापर लक्ष्मीदेवीके साथ शयन करते हैं (वे भगवान् विष्णु ये ही हैं) ॥ १० ॥

यमाहुराद्यं विबुधा जगत्पतिं
सर्वस्य धातारमजं जनित्रम्।
अणोरणीयांसमतिप्रमाणं
स्थूलात् स्थविष्ठं हरिमेव विष्णुम् ॥ ११ ॥
'देवता जिन्हें सबका आदि, जगदीश्वर, सबका धारण-पोषण करनेवाले, अजन्मा, जन्मदाता, अणुसे भी अत्यन्त अणु, परम महान्, स्थूलसे भी स्थूलतम, हरि एवं विष्णु कहते हैं (वे ये ही हैं) ॥ ११ ॥

यत्र स्थितमिदं सर्वं प्राप्ते लोकस्य नाशने।
आदौ यस्मात् समुत्पन्नं सोऽयं विष्णुरिति स्थितः ॥ १२ ॥
'लोकका संहार प्राप्त होनेपर यह सारा विश्व जिनमें ही स्थित होता है तथा सृष्टिके प्रारम्भमें जिनसे इसकी उत्पत्ति हुई है, वे ही ये भगवान् विष्णु यहाँ विराजमान हैं ॥ १२ ॥

यस्येच्छया सर्वमिदं प्रवृत्तं
प्रवर्तते चापि जनार्दनस्य।
अयं स विष्णुः पुरुषोत्तमः शिवः
प्रवर्तते मामिह यादवेश्वरः ॥ १३ ॥
'जिन जनार्दनकी इच्छासे यह सारा जगत् अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त हुआ है और हो रहा है, वे शिवस्वरूप पुरुषोत्तम विष्णु ये यादवेश्वर श्रीकृष्ण ही हैं, जो यहाँ मेरे पास आये हैं ॥ १३ ॥

भृगोर्वंशे समुत्पन्नो जामदग्न्य इति श्रुतः।
शिष्यत्वं समवाप्यैव मृगव्याधस्य यः स्थितः ॥ १४ ॥
जघान वीर्याद् बलिनं महारण्ये
कुठारशस्त्रेण गिरीशशिष्यः।
सहस्रबाहुं कृतवीर्यसम्भवं
हयैर्गजैश्चैव रथैश्च निर्गतम् ॥ १५ ॥
कुरुक्षेत्रं समासाद्य यश्चकार पितृक्रियाम्।
निःक्षत्रियमिमं लोकं कृतवानेकविंशतिः ॥ १६ ॥
'जो भृगुकुलमें उत्पन्न हो 'जामदग्न्य' के नामसे विख्यात हुए तथा मृगव्याध नामक रुद्रदेवताका शिष्यत्व ग्रहण करके स्थित हैं। महादेवजीके शिष्यभूत जिन परशुरामजीने महासमरमें कुठारनामक शस्त्रद्वारा बलवान् कृतवीर्यकुमार, सहस्रबाहु अर्जुनको जो हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनाएँ साथ लेकर चढ़ आया था, बलपूर्वक मार डाला। तत्पश्चात् कुरुक्षेत्रमें आकर जिन्होंने पितरोंका श्राद्धकर्म सम्पन्न किया और इक्कीस बार इस जगत्‌को क्षत्रियोंसे सूना कर दिया (वे ये ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं) ॥ १४-१६ ॥

रघोरथ कुले जातो रामो नाम जनार्दनः।
सीतया च श्रिया युक्तो लक्ष्मणानुचरः कृती ॥ १७ ॥
कृत्वा च सेतुं जलधौ जनार्दनो
हत्वा च रक्षःपतिमाशुगैः शरैः।
दत्त्वा च राज्यं स विभीषणाय
दशाश्वमेधैरयजच्च योऽसौ ॥ १८ ॥
'तदनन्तर जनार्दनदेव रघुकुलमें उत्पन्न हो 'राम' नामसे विख्यात हुए। 'सीता' नामवाली लक्ष्मी देवीके साथ इनका सम्बन्ध स्थापित हुआ। इनके छोटे भाई लक्ष्मण सदा इनके ही अनुगामी बने रहे। ये बड़े पुण्यात्मा एवं विद्वान् थे। इन रामरूपधारी जनार्दनने समुद्रमे सेतु बाँधकर अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा राक्षसराज रावणका वध किया और विभीषणको राज्य देकर दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया (वे ही ये रामस्वरूप विष्णु यहाँ उपस्थित हैं) ॥

वसुदेवकुले जातो वासुदेवेति शब्दितः।
गोकुले क्रीडते योऽसौ संकर्षणसहायवान् ॥ १९ ॥
'तदनन्तर वे श्रीहरि वसुदेवकुलमें उत्पन्न हो वासुदेव नामसे विख्यात हुए और गोकुलमें भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करने लगे। उस समय उनके बड़े भाई बलराम उनके सहायक थे ॥ १९ ॥

उत्तानशायी शिशुरूपधारी
पीत्वा स्तनं पूतनिकाप्रदत्तम्।
व्यसुं चकाराशु जनार्दनस्तदा
दनोः सुतां तामवसन् सुखं हरिः ॥ २० ॥
'जब वे शिशुरूप धारण करके खाटपर उत्तान सोये हुए थे, उस समय उन जनार्दनने पूतनाके दिये हुए स्तनको पीकर उस दानवीको तत्काल प्राणहीन कर दिया। फिर वे श्रीहरि वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ २० ॥

पयःपानं तथा कुर्वन् भक्षयन् दधिपिण्डकम्।
दाम्ना बद्धोदरो विष्णुर्मात्रा रुषितया दृढम् ॥ २१ ॥

१०००श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

'जब कुछ बड़े हुए, तब दूध पीते हुए छिपकर दही और माखनके लोंदे खा जाते थे। तब एक दिन रोषमें भरी हुई मैया यशोदाने उन भगवान् विष्णुकी कमरमें दृढ़ता-पूर्वक रस्सी बाँध दी ॥ २१ ॥

ततश्च दाम्ना सुदृढेन बद्धो
जघान योऽसौ यमलार्जुनौ च ।
क्रीडन् हरिर्गोकुलवासवासी
गोपीभिरास्वाद्य मुखं स्तनं च ॥ २२ ॥

'उस सुदृढ़ बन्धनसे बँधे हुए उन दामोदरने जुड़वे अर्जुन नामक वृक्षोंको तोड़ डाला। गोकुलवासमें रहते हुए बाल-रूपधारी श्रीहरि गोपियोंके साथ खेलते हुए कभी उनका स्तन पीते और कभी मुखका आस्वादन कर लेते थे ॥ २२ ॥

वृन्दावने वसन् विष्णुर्गोपैर्गोकुलवासिभिः ।
तत्र हत्वा हयं राजन् विरराजांशुमानिव ॥ २३ ॥

'वृन्दावनमें गोकुलवासी गोपोंके साथ रहते हुए श्रीहरि वहाँ अश्वरूपधारी केशीका वध करके सूर्यके समान शोभा पाने लगे ॥ २३ ॥

यः क्रीडते नागफणौ जनार्दनो
निषेव्यमाणः सह गोपदारकैः ।
महाह्रदे नागपतिं जगत्पति-
र्ममर्द्द वीर्यातिशयं प्रदर्शयन् ॥ २४ ॥

'जो जगदीश्वर जनार्दन गोपबालकोंसे सेवित हो नागके फनोंपर क्रीडा करते थे तथा जिन्होंने अपने अतिशय पराक्रमका परिचय देते हुए यमुनाके महान् ह्रदमें नागराज कालियको रौंद डाला था (वे ही ये भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उपस्थित हैं) ॥ २४ ॥

यो धेनुकं तालवने तत्फलैः सममच्छिनत् ।
हत्वा दानवमुग्रं तं गोपान् विस्मापयत्यसौ ॥ २५ ॥

'जिन्होंने तालवनमें तालफलोंके साथ ही भयंकर दानव धेनुकासुरका उच्छेद कर डाला और उसका वध करके गोपोंको आश्चर्यमें डाल दिया (वे ही ये विष्णु यहाँ उपस्थित हैं) ॥ २५ ॥

दधार यो गोधरमुग्रपौरुषान्
महामतिर्मेघसमागमे सति ।
विडम्बयञ्छक्रबलं प्रमोदयन्
गोपांश्च गोपीश्च स गोकुलं हरिः ॥ २६ ॥

'जिन परम बुद्धिमान् श्रीहरिने संवर्तक मेघोंके घिर आनेपर अपने उग्र पुरुषार्थसे गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया और इन्द्रके बलकी विडम्बना करते हुए गोपों, गोपियों और गोकुलको आनन्दमग्न कर दिया (वे ये ही हैं) ॥

गोपीनां स्तनमध्ये तु क्रीडते काममीश्वरः।
योऽसौ पिवंस्तदधरं मायामानुषदेहवान् ॥ २७ ॥

'मायासे मनुष्यरूप धारण करनेवाले जो परमेश्वर श्रीहरि गोपियोंके वक्षःस्थलपर उनके अधरामृतका पान करते हुए इच्छानुसार क्रीडा करते थे (वे ये ही हैं।) ॥ २७ ॥

गोपीभिरास्वाद्य मुखं विविक्ते-
शेते स्म रात्रौ सुखमेव केशवः ।
स्तनान्तरेष्वेव तदा च तासां-
कामीव कान्ताधरपल्लवं पिबन् ॥ २८ ॥

'जो केशव रात्रिके समय वृन्दावनके एकान्त प्रदेशमें गोपियोंके साथ उनके मुखारविन्दका आस्वादन करते हुए सुखपूर्वक सोते थे और कामी पुरुषके समान कान्ता (प्रेयसी) के अधर-पल्लव-रसका पान करते हुए उन गोपाङ्गनाओंके वक्षःस्थलोंपर ही शयन करते थे (वे प्रभु ये ही हैं) ॥ २८ ॥

अक्रूरेण समाहूतस्तेन गच्छन् हि यामुने ।
जले यो ह्यर्चितस्तेन नागलोके स एव हि ॥ २९ ॥

'कंसके बुलानेपर अक्रूरजीके साथ जाते हुए जिन श्रीहरिका यमुनाजीके जलमें प्रकट हुए नागलोकमें पूजन किया गया था और अक्रूरने यह बात प्रत्यक्ष देखी थी, वे ही ये भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे हैं ॥ २९॥

ततश्च गच्छन् बलवान्जनार्दनो
हत्वा तमुग्रं रजकं बलात् पथि ।
हृत्वा च वस्त्राणि यथेष्टमीश्वरो
ययौ सरामो मथुरां पुरीं हरिः ॥ ३० ॥

'तत्पश्चात् मथुराके मार्गपर चलते हुए बलरामसहित सर्वसमर्थ बलवान् जनार्दन श्रीहरिने उस उग्र स्वभाववाले धोबीको बलपूर्वक मारकर उसके हाथसे वस्त्र छीन लिये और उन्हें धारण करके मथुरापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३० ॥

लब्ध्वा च दामानि बहूनि कामदो
दत्त्वा वरं माल्यकृते महन्तम् ।
लब्ध्वानुलेपं सुरभिं च यादवः
कुब्जां चकाराशु महाङ्गरूपाम् ॥ ३१ ॥

'आगे जाकर उन्हें बहुत-से फूलोंके हार प्राप्त हुए, तब इच्छानुसार वर देनेवाले उन यदुनाथने मालीको महान् वर प्रदान किया। फिर कुब्जासे सुगन्धित अनुलेप पाकर उन्होंने शीघ्र ही उसे परम सुन्दर रूपवती बना दिया ॥ ३१॥

योऽसौ चापं समादाय मध्ये छित्त्वा महद् धनुः।
सिंहनादं महाँश्चक्रे कल्पान्ते जलदो यथा ॥ ३२ ॥

'जिन्होंने कंसका विशाल धनुष हाथमें लेकर उसे बीचसे ही तोड़ डाला और प्रलयकालके महान् मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे सिंहनाद किया (वे ये ही हैं) ॥ ३२ ॥

हत्वा गजं घोरमुदग्ररूपं
विषाणमादाय ततोऽनु केशवः ।
ननर्त रङ्गे बहुरूपमीश्वरः
कंसस्य दत्त्वा भयमुग्रवीर्यः ॥ ३३ ॥

भविष्यपर्व ]त्र्यशीतितमोऽध्यायः१००१

'तत्पश्चात् कुवलयापीड नामक प्रचण्ड रूपवाले भयंकर हाथीको मारकर उसके दाँत हाथमें लिये उग्र पराक्रमी भगवान् केशव कंसको भय देते हुए रङ्गशालामें नाना प्रकारसे नृत्य करने लगे ॥ ३३ ॥

योऽसौ हत्वा महामल्लं चाणूरं निहतद्विषम् ।
यादवेभ्यो ददौ प्रीतिं कंसस्यैव तु पश्यतः ॥ ३४ ॥

'जिन्होंने शत्रुहन्ता चाणूर नामक महामल्लको कंसके सामने ही मारकर यादवोंको आनन्द प्रदान किया (वे ही ये श्रीहरि यहाँ उपस्थित हैं) ॥ ३४ ॥

जघान कंसं रिपुपक्षघातिनं
पितृद्विषं यादवनामधेयम् ।
संस्थाप्य राज्ये हरिरुग्रसेनं
सान्दीपनं काश्यमुपागतो यः ॥ ३५ ॥

'इसके बाद उन श्रीहरिने अपने पिताके साथ द्वेष रखनेवाले, शत्रुपक्षघाती, यादवनामधारी कंसको मार डाला और उसके राज्यपर उग्रसेनको स्थापित करके वे विद्याध्ययनके लिये उन सान्दीपनि मुनिके समीप गये, जिनका जन्म काश-गोत्र अथवा काशि-जनपदमें हुआ था (परंतु जो अवन्ती-पुरीमें रहते थे) ॥ ३५ ॥

विद्यामवाप्य सकलां दत्त्वा पुत्रं महामुनेः ।
साग्रजोऽथ जगामाशु मधुरां यादवीं पुरीम् ॥ ३६ ॥

'उनसे सम्पूर्ण विद्या पाकर उन महामुनिको उनका मरा हुआ पुत्र वापस दे वे बड़े भाई बलरामसहित शीघ्र ही यादवोंकी राजधानी मथुरापुरीको लौट गये ॥ ३६ ॥

हत्वा निशुम्भं नरकं महामतिः
कृत्वा स घोरं कदनं जनार्दनः ।
ररक्ष विप्रान् मुनिवीरसंघान्
देवांश्च सर्वाञ्जगतो जगत्पतिः ॥ ३७ ॥

'परम बुद्धिमान् जगत्पति जनार्दनने निशुम्भ और नरकासुरका वध करके राक्षसोंका घोर संहार मचाकर ब्राह्मणों, मुनिसमूहों, वीरसमुदायों, समस्त देवताओं तथा जगत्की रक्षा की ॥ ३७ ॥

स एष भगवान् विष्णुद्य दृष्टो जनार्दनः ।
कृतकृत्योऽस्मि संजातः सायुज्यं प्राप्तवानहम् ॥ ३८ ॥

'वे ही ये भगवान् विष्णु जनार्दन आज मुझे दिखायी दिये हैं। इनके दर्शनसे मैं कृतकृत्य हो गया। मुझे सायुज्य मोक्ष मिल गया ॥ ३८ ॥

येन दृष्टो हरिः साक्षात् तस्य मुक्तिः करे स्थिता ।
सोऽयमेष हरिः साक्षात् प्रत्यक्षमिह वर्तते ॥ ३९ ॥

'जिसने साक्षात् श्रीहरिका दर्शन कर लिया मुक्ति उसके हाथमें आ जाती है। यहाँ ये साक्षात् श्रीहरि प्रत्यक्ष विद्यमान हैं ॥ ३९ ॥

नूनं जन्मान्तरे पूर्वं धर्मः संचित एव मे ।
यस्य पाकः समुत्पन्नो येनासौ दृश्यते मया ॥ ४० ॥

'निश्चय ही पहले अन्य जन्मोंमें मेरे द्वारा धर्मका संचय भी हुआ ही है। जिसके फलका उदय हुआ है। जिससे मुझे इनका दर्शन प्राप्त हो रहा है ॥ ४० ॥

सर्वथा पुण्यवानस्मि नष्टसंसारबन्धनः ।
किमस्मै दीयते वस्तु किं नु वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।
करिष्ये किमहं विष्णो वदस्वाद्य यथेप्सितम् ॥ ४१ ॥

'मैं सर्वथा पुण्यात्मा हूँ, मेरे संसार-बन्धनका नाश हो गया। मैं इन्हें कौन-सी वस्तु उपहारके रूपमें दूँ तथा इस समय इनसे क्या कहूँ ? विष्णो ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? आपकी जैसी इच्छा हो, उसे आज प्रकट कीजिये' ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा विस्तरं नादं ननर्द बहुशस्तदा ।
जहास विकृतं भूयो ननर्त पिशिताशनः ॥ ४२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर वह पिशाच बारंबार जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। उसने विकट अट्टहास किया, फिर वह नृत्य करने लगा ॥ ४२ ॥

नमो नमो हरे कृष्ण यादवेश्वर केशव ।
प्रत्यक्षं च हरेस्तत्र ननर्त विविधं नृप ॥ ४३ ॥

नरेश्वर ! वहीं भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही वह 'यादवेश्वर ! केशव ! कृष्ण ! हरे ! आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !!' ऐसा कहकर नाना प्रकारसे नृत्य करने लगा ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां घण्टाकर्णस्तुतौ द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें घण्टाकर्णद्वारा भगवान्की स्तुतिविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥


त्र्यशीतितमोऽध्यायः

घण्टाकर्णद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको उपहारसमर्पण, भगवान्का उसे वर देना और एक मरे हुए ब्राह्मणको जीवित करना

वैशम्पायन उवाच

विहस्य विकृतं भूयः प्रनृत्य च यथाबलम् ।
ब्राह्मणस्य हतस्याथ शवमादाय सत्वरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुनः विकट

१००२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

अट्टहास और यथाशक्ति नृत्य करके वह पिशाच तुरंत ही एक मारे गये ब्राह्मणका शव लेकर आया ॥ १ ॥

द्विधाकृत्य महाघोरं पिशितं केशशाड्वलम् । ततः खण्डं समादाय अद्भििरभ्युक्ष्य यत्नतः ॥ २ ॥ विधाय पात्रे सुशुभे नमस्कृत्य जनार्दनम् । इदं प्रोवाच देवेशं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥ ३ ॥

केशोंसे युक्त उस महाघोर मांसके दो टुकड़े करके एक टुकड़ेको लेकर उसने यत्नपूर्वक जलसे धोया, तत्पश्चात् उसे एक सुन्दर पात्रमें रखकर देवेश्वर जनार्दनको नमस्कार करके वह हाथ जोड़ प्रणतभावसे खड़ा हो गया और इस प्रकार बोला—॥ २-३ ॥

गृहाण मे जगन्नाथ भक्ष्यं योग्यं तव प्रभो । भवादृशैर्जगन्नाथ ग्राह्यं सर्वात्मना हरे ॥ ४ ॥

'जगन्नाथ ! प्रभो ! यह भक्ष्य आपके योग्य है । इसे ग्रहण कीजिये । जगदीश्वर ! हरे ! आप-जैसे प्रभुओंको भक्त-की यह भेंट सम्पूर्ण हृदयसे स्वीकार करनी चाहिये ॥ ४ ॥

भक्तिनम्रा वयं विष्णो नात्र कार्या विचारणा । दत्तं यद् भक्तिनम्रेण ग्राह्यं तत् स्वामिना हरे ॥ ५ ॥

'विष्णो ! हम भक्तिभावसे आपके प्रति विनम्र हैं, इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये । हरे ! भक्तिभावसे विनीत होकर सेवकने जो वस्तु अर्पित की है, उसे स्वामीको अवश्य ग्रहण करना चाहिये ॥ ५ ॥

नवं सुसंस्कृतं भक्ष्यं ब्राह्मण्यं शवमुत्तमम् । अस्माकं पिशिताशानां शास्त्रे नियतमेव हि ॥ ६ ॥

'यह तुरंतका मारा हुआ, संस्कारसम्पन्न, भक्षण करने योग्य, ब्राह्मणका उत्तम शव है । शास्त्रमें हम पिशाचोंके लिये इसके भोजनका विधान है ही ॥ ६ ॥

तस्माद् गृहाण भगवन् यदि दोषो न विद्यते । इत्युक्त्वा विकृतं भूयो विहस्य स तु कामतः ॥ ७ ॥ दातुमैच्छत् तदा खण्डमस्पृश्यं तु शवस्य ह ।

'अतः भगवन् ! यदि कोई दोष न हो तो आप इसे ग्रहण करें ।' ऐसा कहकर पुनः विकट अट्टहास करके उसने इच्छानुसार वह शवका न छूने योग्य टुकड़ा उस समय भगवान्‌को देनेकी इच्छा की ॥ ७॥

ततः प्रीतोऽभवत् तस्मै मनसापूजयच्च तम्॥ ८ ॥ अहोऽस्य स्नेहकारुण्यं मयि सर्वत्र वर्तते । इति संचिन्त्य मनसा प्रोवाच यदुपुङ्गवः ॥ ९ ॥

इससे भगवान् श्रीकृष्ण उसपर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'अहो ! इसके मनमें मेरे प्रति सर्वत्र स्नेह और करुणा विद्यमान है ।' मनमें ऐसा सोचकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने उससे कहा-॥

अलमेतेन सर्वत्र पिशाच पिशिताशन । अस्पृश्यं मादृशैरेतद् ब्राह्मण्यं शवमुत्तमम् ॥ १० ॥

'कच्चा मांस खानेवाले पिशाच ! सर्वत्र इस मांसका ही उपयोग या समर्पण व्यर्थ है । जिसे तुम ब्राह्मणका उत्तम शव बता रहे हो, यह मुझ-जैसे लोगोंके लिये छूने योग्य भी नहीं है ॥ १० ॥

ब्राह्मणः सर्वथा पूज्यो जन्तुभिर्धर्मकाङ्क्षिभिः । पिशाचा घोरकर्माणो यतन्ते ब्रह्महिंसने ॥ ११ ॥

'धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले जीवोंके लिये ब्राह्मण सर्वथा पूजनीय है । घोर कर्म करनेवाले पिशाच ही ब्राह्मणकी हिंसाके लिये प्रयत्न करते हैं ॥ ११ ॥

न हन्तव्याः सदा विप्रास्तद्धिंसा नरकावहा । तस्मादस्पृश्यमस्माभिर्नात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥

'ब्राह्मणोंकी हिंसा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह नरकमें ले जानेवाली है, अतः यह शव हमारे लिये सर्वथा अस्पृश्य है । इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥

भक्त्या प्रीतोऽस्मि भद्रं ते मनो निर्मलमेतया । मनःशुद्ध्यै कृतो यत्नस्ततःप्रीतोऽस्मि मांसप ॥ १३ ॥

'मांस खानेवाले पिशाच ! तुम्हारा भला हो । मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ; क्योंकि इससे मन निर्मल हो जाता है । तुमने मनःशुद्धिके लिये यत्न किया है । इसलिये मैं तुम-पर प्रसन्न हूँ ॥ १३ ॥

असत्संकीर्तनाच्छश्वच्छुद्धं हि करणं तव । अतीव मनसा प्रीत इत्युक्त्वा भगवान् हरिः ॥ १४ ॥ पस्पर्शाङ्गं तदा विष्णुः पिशाचस्याथ सर्वतः । करेण मृदुना देवः पापान्निर्मोचयन्हरिः ॥ १५ ॥

'मेरे नामोंका निरन्तर कीर्तन करनेसे तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हो गया । इसलिये मैं मनसे तुम्हारे ऊपर अधिक प्रसन्न हूँ ।' ऐसा कहकर भगवान् विष्णु हरिने उस समय अपने कोमल हाथसे उस पिशाचके सारे अङ्गोंका स्पर्श किया । ऐसा करके उन नारायणदेवने उसे पापसे मुक्त कर दिया ।१४-१५।

ततस्तस्याभवद् रूपं कामरूपसमप्रभम् । दीर्घकुञ्चितकेशाढ्यो दीर्घबाहुः सुलोचनः ॥ १६ ॥

उनके स्पर्श करते ही उस पिशाचका रूप कामदेवके समान कान्तिमान् हो गया । उसके सिरपर लंबे-लंबे घुँघराले केश शोभा देने लगे । भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र सुन्दर हो गये ॥ १६ ॥

समाङ्गुलिः समनखः समवक्त्रः समुन्नसः । पद्माक्षः पद्मवर्णाभः पद्मकेशरभूषणः ॥ १७ ॥

भविष्यपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः [ १००३


अँगुलियाँ समान और सुन्दर हो गयीं। नख भी समान-रूपसे सुन्दर दिखायी देने लगे। उसके समान और सुडौल मुखमें केवल नासिका ऊँची थी। आँखें प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर दिखायी देती थीं। अङ्गकान्ति नील-कमलके समान श्याम थी। वह कमलकेसररूपी आभूषणोंसे विभूषित था ॥

केयूरी चाङ्गदी चैव कौशेयवसनस्तदा।
ज्ञानवान्सत्त्वसम्पन्नः साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ १८ ॥
उसकी भुजाओंमें केयूर और अङ्गद नामक आभूषण शोभा दे रहे थे। शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित था। वह ज्ञानवान् और सत्त्वसम्पन्न होकर साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान शोभा पाता था ॥ १८ ॥

गन्धर्व इव गायंस्तु सिद्धः सिद्ध इव स्वयम् ।
साक्षात् स्पृष्टं तदा विष्णोः करेण मृदुपूर्वकम् ॥ १९ ॥
न नूनं तादृशं रूपमासीत् कालान्तरेष्वपि।
अद्यापि नैव मुनयो लभन्ते तादृशं वपुः ॥ २० ॥
वह गन्धर्वके समान गायक तथा साक्षात् सिद्धके समान सिद्धियोंसे सम्पन्न था। उस समय साक्षात् भगवान् विष्णुके हाथका कोमल स्पर्श पाकर उस पिशाचका रूप जैसा अलौकिक हो गया था, वैसा रूप कालान्तरमें भी किसीका नहीं था और आज भी मुनियोंको भी वैसा शरीर नहीं प्राप्त होता है ॥

कृत्वा सुबहुशो घोरं तपः परमदारुणम् ।
यच्च लब्धं तदा तेन पिशाचेन नृपोत्तम ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस पिशाचने बारंबार घोर एवं परम दारुण तप करके उस समय जो दिव्य रूप प्राप्त किया, वह अद्भुत था ॥ २१ ॥

को नु नाम जगन्नाथमाश्रितः सीदते नृप ।
स हि सर्वत्र कल्याणो यो हि नित्यं जनार्दनम् ॥ २२ ॥
ध्यायन् पठञ्जपन् वापि तस्य किं नास्ति भूपते ।
नरेश्वर ! जगदीश्वर भगवान् जनार्दनका आश्रय लेकर कौन मनुष्य कष्ट पा सकता है। उसका सर्वत्र कल्याण ही होता है। भूपाल ! जो प्रतिदिन उन भगवान् विष्णुका ध्यान, स्तोत्रपाठ अथवा मन्त्रजप करता है, उसे कौन-सी वस्तु सुलभ नहीं है ॥ २२३ ॥

ततः प्रोवाच भगवान् स्थितं काममिवापरम् ॥ २३ ॥
अक्षयः स्वर्गवासस्ते यावदिन्द्रो वसिष्यति ।
तावत् स्वर्गी भवानस्तु शासनान्मम नान्यतः ॥ २४ ॥
तब दूसरे कामदेवके समान खड़े हुए घण्टाकर्णसे भगवान्‌ने इस प्रकार कहा—'जबतक इन्द्र रहेंगे, तबतक स्वर्गलोकमे तुम्हारा अक्षय निवास बना रहेगा। तबतक तुम मेरे शासनसे स्वर्गमें ही रहो, अन्यत्र नहीं ॥ २३-२४ ॥

नष्टे शक्रे ततः स्वर्गात् सायुज्यं मम गच्छतु ।
योऽयं भ्राता तव स्वर्गी यावदिन्द्रो भवेत् तदा ॥ २५ ॥
'इस इन्द्रके बदल जानेपर तुम स्वर्गसे ऊपर उठकर मेरा सायुज्य प्राप्त कर लोगे। यह जो तुम्हारा भाई है, यह भी जबतक इन्द्र रहेंगे, तबतक स्वर्गीय सुखका उपभोग करेगा ॥ २५ ॥

वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते।
दातास्मि सर्वं सर्वत्र नात्र कार्या विचारणा ॥ २६ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो ! तुम्हारे मनमें जो कामना हो उसके अनुसार कोई वर माँगो। मैं सर्वत्र सब कुछ दे सकता हूँ, इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये' ॥

घण्टाकर्ण उवाच
यश्चेमं संगमं देव संस्मरेन्नियतात्मवान् ।
भक्तिस्तस्याचला देव त्वयि भूयाज्जनार्दन ॥ २७ ॥
घण्टाकर्ण बोला—देव ! जनार्दन ! जो अपने मनको संयममें रखकर हम दोनोंके इस समागमके प्रसङ्गका स्मरण करे, उसकी आपके प्रति अविचल भक्ति हो ॥ २७ ॥

मनःशुद्धिर्भवेत् तस्य मा भूत् कालुष्यता हरे ।
कालुष्यं मनसस्तस्य मा भूदेष वरो मम ॥ २८ ॥
हरे ! उसके मनकी शुद्धि हो जाय, उसमें मलिनता न रह जाय। उस पुरुषके मनका सारा कालुष्य मिट जाय, यह मेरा वर है ॥ २८ ॥

एवमस्त्विति देवेशः स्वर्गं गच्छेति केशवः ।
इन्द्रातिथिर्भवानस्तु त्वां प्रतीक्ष्य हरिः स्थितः ॥ २९ ॥
यह सुनकर देवेश्वर केशवने कहा—'ऐसा ही होगा, अब तुम स्वर्गको जाओ, इन्द्रके अतिथि बनो, इन्द्रदेव तुम्हारी प्रतीक्षामें खड़े हैं' ॥ २९ ॥

इत्युक्त्वा भगवान् कृष्ण उत्थाप्य ब्राह्मणं तदा ।
तेन स्तुतो जगन्नाथः पूजयित्वा च तं द्विजम् ॥ ३० ॥
ततो विसृज्य गोविन्दस्तस्माद् देशादुपागमत् ।
यत्र ते मुनयः सिद्धा अग्निहोत्रसमन्विताः ॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उस मरे हुए ब्राह्मणको जिलाकर उठा दिया, तब उस ब्राह्मणने उनका स्तवन किया, फिर वे जगदीश्वर गोविन्द उस ब्राह्मणका आदर-सत्कार करके उसे विदा दे, उस स्थानसे वहीं लौट गये, जहाँ वे सिद्ध मुनिगण अग्निहोत्रमें लगे हुए थे ॥ ३०-३१॥

स च स्वर्गी गतः स्वर्गमाज्ञया केशवस्य ह।
तस्मात् पठ सदा राजन् मनःशुद्धिं यदीच्छसि ।
मनश्च शुद्धं भवति पठतस्ते जगत्पते ॥ ३२ ॥
वह स्वर्गलोकका अधिकारी घण्टाकर्ण भगवान् श्रीकृष्ण-

१०७४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

की आज्ञासे स्वर्गलोकको चला गया । अतः राजन् ! यदि तुम अपने मनकी शुद्धि चाहते हो तो सदा इस प्रसङ्गका पाठ करो । जगत्पते ! इसका पाठ करनेसे तुम्हारा मन निश्चय ही शुद्ध हो जायगा ॥ ३२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि घण्टाकर्णमुक्तिप्रदाने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें घण्टाकर्णको मुक्तिप्रदानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥


चतुरशीतितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका कैलासपर पहुँचकर वहाँ बारह वर्षोंके लिये कठोर तपस्यामें संलग्न होना

वैशम्पायन उवाच

ततः स भगवान् विष्णुर्मुनिभ्यस्तत्त्वमादितः ।
कथयामास यद् वृत्तं पिशाचस्य महात्मनः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने मुनियोंसे महात्मा पिशाचका जो वृत्तान्त था, उसको आरम्भसे ही ठीक-ठीक कह सुनाया ॥ १ ॥

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे विस्मयं परमं गताः ।
अहोऽस्य कर्मणः पाकस्तव संदर्शनादिति ॥ २ ॥

वह सुनकर सभी मुनियोंको बड़ा विस्मय हुआ । वे बोले—'प्रभो ! आपके दर्शनसे इस पिशाचके कर्मका अद्भुत फल प्रकट हुआ' ॥ २ ॥

अर्चितो मुनिभिः सर्वैः प्रीतः प्रीतिमनां प्रियः ।
ततः प्रभाते विमले सूर्ये चाभ्युदिते सति ॥ ३ ॥
आरुह्य गरुडं विष्णुर्ययौ कैलासमुत्तमम् ।
भवद्भिस्तत्र गन्तव्यमित्युक्त्वा मुनिसत्तमान् ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् प्रीतिमानोंके प्रियतम श्रीहरिकी उन समस्त मुनियोंने अर्चना की, इससे वे बड़े प्रसन्न हुए । फिर निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर वे भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो उत्तम कैलास पर्वतको चले गये । जाते समय वे उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कह गये कि आपलोग भी वहाँ पधारियेगा ॥ ३-४ ॥

यत्र विश्वेश्वराः सिद्धास्तपस्यन्ति यतव्रताः ।
यत्र वैश्रवणः साक्षादुपास्ते शंकरं सदा ॥ ५ ॥

जहाँ इस विश्वपर शासन करनेवाले सिद्ध पुरुष व्रतका पालन करते हुए तपस्या करते हैं, जहाँ साक्षात् कुबेर सदा भगवान् शङ्करकी उपासना करते हैं ॥ ५ ॥

यत्र तन्मानसं नाम सरो हंसालयं महत् ।
यत्र भृङ्गीरिटिर्देवमुपास्ते शंकरं शिवम् ॥ ६ ॥
गाणपत्यमवाप्याथ हरपार्श्वचरः सदा ।

जहाँ वह हंसोंका निवासस्थान मानस नामक महान् सरोवर है । जहाँ भृङ्गीरिटि नामक शिवपार्षद अपने आराध्य-देव कल्याणस्वरूप भगवान् शङ्करकी उपासना करते हैं और गणपतिपद प्राप्त करके सदा महादेवजीके पास ही रहते हैं ॥

यत्र सिंहा वराहाश्च द्विपद्वीपिमृगैः सह ॥ ७ ॥
क्रीडन्ति वन्यरतयः परस्परहिते रताः ।
यत्र नद्यः समुत्पन्ना गङ्गाद्याः सागरंगमाः ॥ ८ ॥

जहाँ सिंह, सूअर, हाथी, बाघ और मृग सदा साथ-साथ खेलते और एक दूसरेके हितमें तत्पर रहकर जंगलकी पैदावारपर ही संतोष करते हैं, जहाँ गङ्गा आदि समुद्र-गामिनी नदियाँ प्रकट हुई हैं ॥ ७-८ ॥

यत्र विश्वेश्वरः शम्भुरच्छिनद् ब्रह्मणः शिरः ।
यत्रोत्पन्ना महावेत्रा भूतानां दण्डतां ययुः ॥ ९ ॥

जहाँ विश्वनाथ भगवान् शङ्करने ब्रह्माजीके सिरका उच्छेद किया था, जहाँ उत्पन्न हुए बड़े-बड़े बेंत प्राणियोंके लिये दण्डका काम देते हैं ॥ ९ ॥

उमया यत्र सहितः शंकरो नीललोहितः ।
ऋषिभिः प्रार्थितः पूर्वं ददौ यत्र गिरिः सुताम् ॥ १० ॥
शंकराय जगद्धात्रे शिवाय जगतीपते ।

जहाँ उमासहित नीललोहित भगवान् शङ्कर निवास करते हैं । पृथ्वीनाथ ! जहाँ पूर्वकालमें ऋषियोंके प्रार्थना करनेपर गिरिराज हिमवान्ने कल्याणकारी जगद्धाता भगवान् शिवको अपनी पुत्री प्रदान की थी ॥ १०१/२ ॥

यत्र लेभे हरिश्चक्रमुपास्य बहुभिर्दिनैः ॥ ११ ॥
पुष्करैः शतपत्रैश्च नेत्रेण च जगत्पतिम् ।

जहाँ श्रीहरिने बहुत दिनोंतक कमलों, शतदलों तथा अपने नेत्रद्वारा भी जगदीश्वर शिवकी आराधना करके उनसे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था ॥ १११/२ ॥

गुहां यत्र समाश्रित्य क्रीडन्ते सिद्धकिन्नराः ॥ १२ ॥
प्रियाभिः सह मोदन्ते पिबन्ते मधु चोत्तमम् ।

जहाँ सिद्ध और किन्नरगण गुफाका आश्रय लेकर अपनी प्रियतमाओंके साथ क्रीडा करते, आनन्दित होते और उत्तम मधु पीते थे ॥ १२१/२ ॥

यमुद्यत्य भुजैः सर्वैः पौलस्त्यो विरराम ह ॥ १३ ॥
तमारुह्य महाशैलं देवकीनन्दनो हरिः ।
मानसस्योत्तरं तीरं जगाम यदुनन्दनः ॥ १४ ॥

जिस पर्वतको अपनी सारी भुजाओंसे उठाकर रावण

भविष्यपर्व ] . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . चतुरशीतितमोऽध्यायः . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . [ १००५


दिग्विजयसे विरत हो गया था, उस महाशैल कैलासपर आरूढ़ हो यदुकुलको आनन्दित करनेवाले देवकीनन्दन श्रीहरि मानससरोवरके उत्तर तटपर गये ॥ १३-१४॥

तपश्चर्तुं किल हरिर्विष्णुः सर्वेश्वरः शिवः।
जटी चीरी जगन्नाथो मानुषं वपुरास्थितः ॥ १५ ॥
तपसे धृतचित्तस्तु शुचौ भूमावुपाविशत् ।

वे सर्वेश्वर शिवस्वरूप विष्णु—हरि वहाँ तपस्या करनेके लिये गये थे। मानव-शरीरधारी जगन्नाथ श्रीकृष्ण सिरपर जटा और शरीरमें चीरवस्त्र धारण किये तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके पवित्र भूमिपर बैठे ॥ १५ ॥

अवरुह्य ततो यानाद् गरुडाद्वेदसम्मितात् ॥ १६ ॥
द्वादशाब्दं तपश्चर्तुं मनो दधे ततो हरिः।

इस प्रकार वेदस्वरूप गरुड़ नामक वाहनसे उतरकर श्रीहरिने वहाँ बारह वर्षोंतक तपस्या करनेका विचार किया ॥ १६ ॥

फाल्गुनेन तु मासेन समारेभे जगत्पतिः ॥ १७ ॥
शाकभक्ष्यः कृतजपो वेदाध्ययनतत्परः।

जगदीश्वर श्रीकृष्णने वहाँ फाल्गुन माससे तपस्या आरम्भ की। वे शाक खाकर रहते, जप करते तथा वेदाध्ययनमें तत्पर रहते थे ॥ १७ ॥

किमुद्दिश्य जगन्नाथस्तपश्चरति मानवः ॥ १८ ॥
तं न विद्मो यथाकामं दुर्ज्ञेयेश्वरचिन्तना ।

राजन्! मानवरूपधारी जगदीश्वर श्रीहरि किस उद्देश्यसे इच्छानुसार तप करते थे, इसे हम नहीं जानते (सर्वसमर्थ ईश्वरके लिये पुत्रके उद्देश्यसे भी तपस्याकी कोई सङ्गति नहीं है)। वास्तवमें ईश्वरका संकल्प प्राणिमात्रके लिये दुर्ज्ञेय है—वे क्या सोचकर कौन-सा कार्य करते हैं, यह जानना सभीके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ १८ ॥

तपस्यति तदा विष्णौ पर्वते भूतसेविते ॥ १९ ॥
गरुडः कश्यपसुत इन्धनानि समाचिनोत् ।
होमार्थं वासुदेवस्य चरतस्तप उत्तमम् ॥ २० ॥

भूतोंसे सेवित कैलास पर्वतपर उन दिनों श्रीकृष्णके तपस्या करते समय कश्यपकुमार गरुड़जी उत्तम तपमें लगे हुए उन वासुदेवके हवन-कर्मकी सिद्धिके लिये समिधाएँ जुटाया करते थे ॥ १९-२० ॥

चक्रराजोऽथ पुष्पाणि संचिनोति तदा हरेः।
दिक्षु सर्वासु सर्वत्र ररक्ष जलजस्तदा ॥ २१ ॥
खङ्ग आहृत्य यत्नेन कुशान् सुबहुशस्तदा ।
गदा कौमोदकी चैव परिचर्यां चकार ह ॥ २२ ॥

चक्रराज सुदर्शन श्रीहरिके लिये फूल चुनता था। पाञ्चजन्य शङ्ख सम्पूर्ण दिशाओंमें सर्वत्र उनकी रक्षा करता था। नन्दक खङ्ग बड़े यत्नसे बहुसंख्यक कुश लाया करता था। कौमोदकी नामक गदा भी उनकी आवश्यक परिचर्या किया करती थी ॥ २१-२२ ॥

धनुःप्रवरमत्युग्रं शाङ्कं दानवभीषणम् ।
स्थितं हि पुरतस्तस्य यथेष्टं भृत्यवत् स्वयम् ॥ २३ ॥

धनुषोंमें श्रेष्ठ अत्यन्त उग्र शार्ङ्ग नामक धनुष, जो दानवोंको भयभीत करनेवाला था, सदा भगवान्‌के सामने भृत्यके समान इच्छानुसार स्वयं खड़ा रहता था ॥ २३ ॥

जुहोति भगवान् विष्णुरेधोभिर्बहुभिः सदा ।
आज्यादिभिस्तदा हव्यैरग्निं सम्पूज्य माधवः ॥ २४ ॥
सप्तार्चिषः समाप्तिं च समस्तव्यस्ततः कृती ।

भगवान् श्रीकृष्ण सदा बहुत-सी समिधाओंद्वारा आहुति देते थे। उस समय कर्मकुशल माधवने घृत आदि हवनीय पदार्थोंद्वारा अग्निका पूजन करके संक्षेप और विस्तारके साथ अग्निहोत्र कर्मको पूर्ण किया ॥ २४ ॥

एकस्मिन्नेकदा मासे भुञ्जानो नियतात्मवान् ॥ २५ ॥
द्वितीये त्वथ पर्याये भुञ्जन्नेकेन केशवः ।
एकस्मिन् वत्सरे भुञ्जंस्तथैवैकेन केनचित् ॥ २६ ॥

पहले वे एक महीनेमें एक बार खाकर मनको संयम-नियममें रखते हुए तप करने लगे। फिर वे केशव प्रत्येक दूसरे महीनेपर एक बार अन्न ग्रहण करने लगे। इस तरह समय बढ़ाते हुए वे एक वर्षमें एक बार किसी एक ही अन्नका आहार करने लगे ॥ २५-२६ ॥

समाप्य तत् तपः सर्वमेवमेव जगत्पतिः ।
द्वादशाब्दे तथा पूर्णे ऊनमासे जगत्पतिः ॥ २७ ॥
जुह्वन्नग्निं समास्थाय पठन् मन्त्रं जनार्दनः ।
आरण्यकं पठन् विष्णुः साक्षात् सर्वेश्वरो हरिः ।
आस्ते ध्यानपरस्तत्र पठन् प्रणवमुत्तमम् ॥ २८ ॥

इसी नियमसे वह सारी तपस्या पूर्ण करके जब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेमें केवल एक मासकी कमी रह गयी, तब वे जगदीश्वर जनार्दन सर्वव्यापी साक्षात् सर्वेश्वर श्रीहरि अग्निकी स्थापना करके मन्त्रपाठपूर्वक हवन करने लगे। आरण्यकका पाठ और उत्तम प्रणवका जप करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें मग्न हो गये ॥ २७-२८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां कृष्णतपोवर्णने चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकी तपस्याका वर्णनविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥

१००६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णके समीप इन्द्र आदि देवताओं तथा उमासहित भगवान् शिवका आगमन

वैशम्पायन उवाच

तत इन्द्रः स्वयं तत्र आरुह्य गजमुत्तमम्।
द्रष्टुं सर्वेश्वरं विष्णुं तपस्यन्तं समाययौ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर साक्षात् इन्द्र अपने उत्तम हाथी ऐरावतपर आरूढ़ हो तपस्यामें लगे हुए सर्वेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये ॥ १ ॥

ततो यमस्तु भगवानारुह्य महिषं वरम्।
किंकरैश्च स्वयं साक्षादाययौ नगमुत्तमम् ॥ २ ॥

इसके बाद साक्षात् भगवान् यम श्रेष्ठ महिषपर आरूढ़ हो अपने किङ्करोंके साथ उस उत्तम पर्वतपर आये ॥ २ ॥

प्रचेता हंसमारुह्य वारुणैश्च समन्वितः।
श्वेतच्छत्रसमायुक्तः श्वेतव्यजनवीजितः ॥ ३ ॥

श्वेत छत्रसे युक्त वरुण हंसपर आरूढ़ हो अपने सेवकोंके साथ वहाँ पधारे। उनके सेवक श्वेत चँवरसे उनके लिये हवा कर रहे थे ॥ ३ ॥

ययौ कैलासशिखरं द्रष्टुं केशवमञ्जसा।
अन्ये चापि तथा देवा आदित्या वसवस्तथा ॥ ४ ॥
रुद्राश्चैव तथा राजन् द्रष्टुं केशवमाययुः।

वे वरुण भी तपस्वी केशवका दर्शन करनेके लिये कैलास-शिखरपर गये थे। राजन् ! इसी प्रकार दूसरे देवता आदित्य, वसु और रुद्र आदि भी केशवका दर्शन करनेके लिये वहाँ पधारे थे ॥ ४½ ॥

सिद्धाश्च मुनयश्चैव गन्धर्वा यक्षकिन्नराः ॥ ५ ॥
सर्वाश्चाप्सरसो राजन् नृत्यगीतविशारदाः।

राजन् ! सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा नृत्य और गीतमें निपुण समस्त अप्सराएँ भी वहाँ आयीं ॥ ५½ ॥

ततो देवगणः सर्वः कैलासं समपद्यत ॥ ६ ॥
पर्वतो नारदश्चैव तथान्ये मुनिसत्तमाः।
विस्मयस्थितलोलाक्षाः सर्वदेवगणास्तथा ॥ ७ ॥
आश्चर्यं खलु पश्यध्वं न भूतं न भविष्यति।
योगिध्येयः स्वयं कृष्णो यत् तप्यति गुरुः स्वयम्।
को न्वत्र समयो भूयादिति ते मेनिरे गणाः ॥ ८ ॥

इस प्रकार सब देवता कैलास पर्वतपर आये । पर्वत, नारद तथा अन्य श्रेष्ठ मुनि एवं समस्त देवता आश्चर्यसे चकित-नेत्र होकर परस्पर कहने लगे—'यह आश्चर्यकी बात देखो ! ऐसा न तो हुआ है और न होगा । जो योगियोंके ध्येय हैं, वे साक्षात् जगद्गुरु श्रीकृष्ण स्वयं ही तप कर रहे हैं। इस तपस्याका क्या उद्देश्य हो सकता है, इसपर वे सभी समुदायोंके लोग विचार करने लगे ॥ ६-८ ॥

ततः समाप्ते सकले जगत्पते-
र्व्रते समूले सकलेश्वरः शिवः।
द्रष्टुं हरिं लोकहितैषिणं प्रभुं
ययौ भवान्या सह भूतसंघैः ॥ ९ ॥

तदनन्तर जब जगत्पति श्रीकृष्णका वह सारा व्रत मूलसहित परिपूर्ण हो गया, तब सकलेश्वर शिव पार्वती तथा भूतगणोंके साथ उन लोकहितैषी प्रभु श्रीहरिसे मिलनेके लिये गये ॥ ९ ॥

सार्धं कुवेरेण सगृह्यकेन
सख्या प्रियेण प्रभुरीश्वरः शिवः।
स्वयं जटी भूतपिशाचसंवृतः
शरी च खड्गी शशिखण्डशेखरः ॥ १० ॥

उनके साथ गुह्यकोंसहित प्रिय सखा कुबेर भी थे। सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान् शिव स्वयं सिरपर जटा धारण किये भूतों और पिशाचोंसे घिरे हुए थे, धनुष, बाण और खड्गसे युक्त थे। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र शोभा दे रहा था ॥ १० ॥

करेण विभ्रत्सहदर्भकुण्डिकां
करेण साक्षादपरेण दीपिकाम्।
अन्येन विभ्रन्महतीं स डिण्डिमां
शूलं च विभ्रन्नपरेण बाहुना ॥ ११ ॥
गुणान् स रुद्राक्षकृतान् समुद्वह-
ञ्जटाभिरापिङ्गलताम्रमूर्तिः ।
विराजमानः प्रभुरिन्दुशेखरो
वृषेण युक्तः स सितेन शंकरः ॥ १२ ॥

एक हाथमें कुशसहित कमण्डलु धारण किये, दूसरे हाथमें जलती मशाल लिये, तीसरे हाथमें विशाल डमरू धारण किये और चौथे हाथमें त्रिशूल लिये, गलेमें रुद्राक्षकी मालाएँ धारण किये, कुछ-कुछ पिङ्गल एवं ताम्रवर्णके शरीरवाले, जटाओंसे सुशोभित कल्याणकारी भगवान् चन्द्रशेखर श्वेत वृषभसे संयुक्त हो बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ११-१२ ॥

उमास्तनद्वन्द्वसमर्पितानन-
स्तया समाश्लिष्य निपीडिताधरः।
गङ्गाम्बुविक्षालितचन्द्रशेखर-
स्तां चापि वीक्षन् बहुशस्तदा शिवः॥ १३ ॥

उनके मुख-मण्डलकी दृष्टि देवी उमाके उरोजोंपर लगी हुई थी। भगवती उमा भी महादेवजीका आलिङ्गन करके उनका अधर-चुम्बन कर लेती थीं। भगवान् शिवका चन्द्रार्ध-

भविष्यपर्व ] षडशीतितमोऽध्यायः [ १००७

शोभित मस्तक गङ्गाजीके जलसे प्रक्षालित होता था और वे भगवान् शङ्कर उस समय बारंबार देवी उमाकी ओर देखते रहते थे ॥ १३ ॥

भस्माङ्गरगैरनुलेपिताननो महोरगैरुद्वद्धजटः सनातनः । शिरःकपालैः परिशोभितस्तदा द्रष्टुं हरिं केशवमभ्ययाच्छिवः ॥ १४ ॥

उनके मुखपर भस्मस्वरूप अङ्गराग लगा हुआ था। बड़े-बड़े सर्पोंसे उनकी जटाएँ बँधी हुई थीं । नरमुण्डोंकी मालासे सुशोभित वे सनातन शिव उस समय भगवान् केशवको देखनेके लिये उनके पास गये ॥ १४ ॥

यमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तं पुरातनं सांख्यनिबद्धदृष्टयः । यस्यापि देवस्य गुणान् समग्रां- स्तत्त्वांश्चतुर्विंशतिमाहुरेके ॥ १५ ॥

जिन्हें सांख्यदर्शी विद्वान् श्रेष्ठ, महान् एवं पुरातन पुरुष कहते हैं, जिन महादेवजीके समस्त गुणोंको ही एक श्रेणीके विद्वान् चौबीस तत्त्व कहते हैं ॥ १५ ॥

यमाहुरेकं पुरुषं पुरातनं कणादनामानमजं महेश्वरम् । दक्षस्य यज्ञं विनिहत्य यो वै विनाशय देवानसुरान् सनातनः ॥ १६ ॥

जिन्हें एकमात्र पुरातन पुरुष, कणाद नामसे प्रसिद्ध, अजन्मा महेश्वर कहा गया है; जिन सनातन महादेवने दक्षयज्ञका विध्वंस करके देवता और असुरोंको भी मार भगाया था ॥ १६ ॥

यं विदुर्भूततत्त्वज्ञं भूतेशं भूतभावनम् । वामदेवं विरूपाक्षमाहुस्तत्त्वविदो जनाः ॥ १७ ॥ महादेवं सहस्राक्षं कालमूर्तिं चतुर्भुजम् । रुद्रं रोदननामानमाहुर्विश्वेश्वरं शिवम् ॥ १८ ॥ अप्रमेयमनाधारमाहुर्महेश्वरा जनाः । नग्नं नग्नपरीतं तु नागिनं त्वग्निवर्चसम् ॥ १९ ॥ आहुर्विश्वेश्वरं शान्तं शिवमर्दि सनातनम् । तस्य मूर्तिरिमाः सर्वा धराद्याः सकला नृप ॥ २० ॥

जिन्हें तत्त्ववेत्ता पुरुष सम्पूर्ण भूतोंका तत्त्वज्ञ जानते हैं और जिन्हें भूतनाथ, भूतभावन, वामदेव तथा विरूपाक्ष कहते हैं। महादेव, सहस्राक्ष, कालमूर्ति, चतुर्भुज, रुद्र, रोदननामधारी और विश्वेश्वर शिव कहकर पुकारते हैं । जिन्हें शिवमक्त पुरुष अप्रमेय, आधाररहित, नग्न, नग्न पार्षदोंसे घिरा हुआ, नागयुक्त, अग्नितुल्य तेजस्वी, विश्वेश्वर, शान्तस्वरूप, आदि एवं सनातन शिव कहते हैं । राजन् ! ये पृथ्वी आदि सारे तत्त्व उन्हींकी मूर्ति हैं ॥ १७–२० ॥

भूमिरापोऽनलो वायुः खं सूर्यश्च तथा शशी । अग्निश्च यजमानश्च प्रकृतिश्चैवमष्टधा ॥ २१ ॥

पृथ्वीरहित जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, यजमान और प्रकृति—ये महादेवजीके आठ विग्रह हैं ॥

महादेवो महायोगी गिरीशो नीललोहितः । आदिकर्ता महाभर्ता शूलपाणिरुमापतिः । द्रष्टुं विश्वेश्वरं विष्णुं भूतसंघैः समाययौ ॥ २२ ॥

वे महादेव, महायोगी, गिरीश, नील-लोहित, आदिकर्ता, महाभर्ता, शूलपाणि एवं उमावल्लभ शिव जगदीश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये भूत-समूहोंके साथ वहाँ आये ॥ २२ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवागमनकथने पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवजीके आगमनका कथनविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥


षडशीतितमोऽध्यायः

पिशाचों, मुनियों और अप्सराओंके साथ उमासहित भगवान् शङ्करका श्रीकृष्णके समीप गमन

वैशम्पायन उवाच

तस्याग्रे समपद्यन्त भूतसंघाः सहस्रशः ।
घण्टाकर्णो विरूपाक्षः कुण्डधारः कुमुद्रहः ॥ १ ॥
दीर्घरोमा दीर्घभुजो दीर्घबाहुर्निरञ्जनः ।
ऊरुनेत्रः शतमुखः शतग्रीवः शतोदरः ॥ २ ॥
कुण्डोदरो महाग्रीवः स्थूलजिह्वो द्विबाहुकः ।
पार्श्ववक्त्रः सिंहमुख उन्नतांसो महाहनुः ॥ ३ ॥
त्रिबाहुः पञ्चबाहुश्च व्याघ्रवक्त्रः सिताननः ।
एते चान्ये च बहवो दीर्घास्या दीर्घलोचनाः ॥ ४ ॥
नृत्यन्तः प्रहसन्तश्च स्फोटयन्तः परस्परम् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय भगवान् शङ्करके आगे सहस्रों भूतसमूह चल रहे थे— घण्टाकर्ण, विरूपाक्ष, कुण्डधार, कुमुद्रह, दीर्घरोमा, दीर्घभुज, दीर्घबाहु, निरञ्जन, ऊरुनेत्र, शतमुख, शतग्रीव, शतोदर,

१०९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कुण्डोदर, महाग्रीव, स्थूलजिह्व, द्विबाहु, पार्श्ववक्त्र, सिंहमुख, उन्नतांस, महाहनु, त्रिबाहु, पञ्चबाहु, व्याघ्रवक्त्र और सितानन—ये तथा दूसरे भी बहुत-से बड़े-बड़े मुख और विशाल नेत्रवाले भूत नाचते, हँसते और परस्पर ताल ठोंकते थे ॥ १—४ १/२ ॥

तथान्ये घोररूपाश्च तथान्ये विकृताननाः ॥ ५ ॥
प्रेतभक्षाः प्रेतवाहा मांसशोणितभोजनाः ।

इनके अतिरिक्त भी बहुत-से घोर रूप और विकृत मुखवाले भूत थे, जो मुर्दे खाते, मुर्दोंको ढोकर ले जाते और मांस तथा रक्तका आहार करते थे ॥ ५ १/२ ॥

शवानि सुवहन्त्याशु भक्षयन्तस्ततस्ततः ॥ ६ ॥
पिबन्तो रुधिरं घोरं खण्डयन्तः शवान् बहून् ।

वे बहुत-से शव शीघ्रतापूर्वक इधर-उधरसे लाकर खाते थे, भयंकर रक्त पीते थे और बहुत-से शवोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ६ १/२ ॥

कराला वितता दीर्घा धमनीस्नायुसंतताः ॥ ७ ॥
नानाविधाः सुवीराश्च शूलाग्रप्रोतमानुषाः ।
शिरोमालावृताः केचिदान्त्रपाशावपाशिताः ॥ ८ ॥

वे सब-के-सब विस्तृत, विशाल और विकराल थे । उनके शरीरमें व्याप्त हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं । वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले भूत बड़े वीर थे । उन्होंने अपने शूलोंके अग्रभागमें कितने ही मनुष्योंकी लाशें पिरो रखी थीं । कितने ही भूत नरमुण्डोंकी मालाओंसे अलंकृत थे । कितनोंने अपने-आपको आँतड़ियोंके पाशोंसे बाँध रखा था ॥ ७-८ ॥

डिण्डिमैरट्टहासैश्च नादयन्तो वसुन्धराम् ।
कपालिनो भैरवाश्च जटिला मुण्डिनस्तथा ॥ ९ ॥
एवं बहुविधा घोराः पिशाचा विकृताननाः ।
तथान्ये मुनिवीराश्च ध्यायन्तः परमेश्वरम् ॥ १० ॥
पठन्तो वेदवाक्यानि साङ्गानि विविधानि च ।

कोई नगाड़े बजाते और कोई अट्टहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे । कपाली, भैरव, जटिल और मुण्डी—ये भाँति-भाँतिके विकृत मुखवाले चार प्रकारके घोर पिशाच तथा अन्य मुनिवीर वहाँ परमेश्वरका ध्यान और अङ्गोंसहित वेदोंके विविध वाक्योंका पाठ करते थे ॥ ९-१० १/२ ॥

कुण्डिकास्थकराः केचित् केचित् कुशविचारिणः ॥ ११ ॥
कौपीनवसनाः केचित् केचित् कार्पाससंवृताः ।

कोई कमण्डलुमें हाथ डाले हुए थे, कोई कुश लेकर विचर रहे थे, कितने ही वस्त्रकी जगह कौपीनमात्र धारण करते थे और कितनोंने सूती वस्त्रोंसे अपने अङ्गोंको ढक रखा था ॥ ११ १/२ ॥

स्तुवन्तः शंकरं भक्त्या स्तोत्रैर्माहेश्वरैस्तथा ॥ १२ ॥
एकत्र ते मुनिगणा अपरत्र गणास्तथा ।
अन्यत्र सिद्धगन्धर्वाः प्रियाभिः सह संगताः ॥ १३ ॥

वे सब-के-सब भक्तिभावसे शिवसम्बन्धी स्तोत्रोंद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे । एक ओर तो मुनिगण थे और दूसरी ओर प्रमथगण । इसी तरह एक ओर सिद्ध और गन्धर्व अपनी प्रियतमाओंके साथ वहाँ आये थे ॥ १२-१३ ॥

नृत्यन्ति नृत्यकुशला गायन्ति स्म च कन्यकाः ।
विद्याधरास्तथान्यत्र स्तुवन्तः शंकरं शिवम् ॥ १४ ॥

नृत्यकुशल गन्धर्वकन्याएँ नाचती और गाती थीं । अन्यत्र विद्याधरगण कल्याणकारी भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे ॥ १४ ॥

ननृतुस्तस्य पुरतो गच्छन्तोऽप्सरसां गणाः ।
एवमेतैर्महाघोरैः पिशाचैर्भूतकिन्नरैः ॥ १५ ॥
मुनिभिश्चैव प्रमथैः समं शर्वः समाययौ ।
यत्र विश्वेश्वरो विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १६ ॥
यत्र ते लोकपालाश्च तिष्ठन्ति स्म दिदृक्षया ।
उमया लोकभाविन्या गङ्गया चन्द्रशेखरः ॥ १७ ॥

उनके आगे-आगे चलती हुई अप्सराएँ नृत्य करती थीं । इस प्रकार इन महाभयंकर पिशाचों, भूतों, किन्नरों, मुनियों और प्रमथगणोंके साथ भगवान् शिव उस स्थानपर आये, जहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण अत्यन्त कठोर तपस्या करते थे और जहाँ उनके दर्शनकी इच्छासे लोकपालगण खड़े थे । लोकभाविनि उमा और गङ्गाके साथ भगवान् चन्द्रशेखर वहाँ गये ॥ १५-१७ ॥

स सर्वलोकप्रभवो भवो विभु-
र्जटी च साक्षात् प्रणवात्मकः कृती ।
द्रष्टुं हरिं विष्णुमुदारविक्रमो
ययौ यथेष्टं पिशिताशनैर्वृतः ॥ १८ ॥

सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी भगवान् भव साक्षात् प्रणवस्वरूप हैं । वे जटाधारी और कृतकृत्य हैं । उनका पराक्रम महान् है । वे पिशाचोंसे घिरकर यथेष्ट भावसे श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये गये ॥ १८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां महादेवागमने षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें महादेवजीका आगमनविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

शंकरजीसे देवताओंकी प्रार्थना