भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1014, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1014

. भविष्यपर्व ] एकोनाशीतितमोऽध्यायः ९८९


एकोनाशीतितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णके समक्ष दो पिशाचोंका आगमन

वैशम्पायन उवाच
तेषामनु महाघोरौ पिशाचौ विकृताननौ ।
प्रांशू पिङ्गलरोमाणौ दीर्घजिह्वौ महाहनू ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन सबके पश्चात् दो महाभयंकर पिशाच वहाँ आये, जिनके मुख बड़े विकराल थे। वे दोनों ही ऊँचे कदके थे। उनके रोएँ पिङ्गल वर्णके थे। उनकी जिह्वाएँ बड़ी-बड़ी थीं और ठोड़ी बहुत चौड़ी थी ॥ १ ॥

लम्बकेशौ विरूपाक्षौ ही ही हा हेति वादिनौ ।
खादन्तौ मांसपिटकं पिबन्तौ रुधिरं बहु ॥ २ ॥
उन दोनोंके केश लंबे और नेत्र भयंकर थे। वे 'हा हा, ही ही' करते हुए बात करते थे और मांसकी पिटारीरूप शवका भक्षण करते तथा बहुत-सा रक्त पीते थे ॥ २ ॥

अन्त्रवेष्टितसर्वाङ्गौ दीर्घौ कृशकृशोदरौ ।
लम्बमानमहाप्रान्तशूलप्रोतशिरोधरौ ॥ ३ ॥
उनके सारे अङ्गोंमें दूसरे प्राणियोंकी आँतें लिपटी हुई थीं। वे विशालकाय थे; किंतु उनके पेट सटे हुए थे। वे लंबे और फैले हुए शूलोंमें पिरोये हुए नर-मुण्ड धारण किये हुए थे ॥ ३ ॥

कर्षन्तौ शवयूथानि बाहुभ्यां तत्र तत्र ह ।
हसन्तौ विविधं हासं स्वजातिसदृशं नृप ॥ ४ ॥
वदन्तौ बहुरूपाणि वचांसि प्राकृतानि च ।
और भुजाओं द्वारा जहाँ-तहाँसे झुंड-के-झुंड मुर्दे खींचे ला रहे थे। नरेश्वर ! वे दोनों पिशाच अपनी जातिके अनुरूप नाना प्रकारसे अट्टहास करते और भाँति-भाँतिके प्राकृत वचन बोलते थे ॥ ४ १/२ ॥

कम्पयन्तौ महावृक्षानूरुपादप्रघट्टनैः ॥ ५ ॥
सृक्किणी लेलिहन्तौ च दन्तान् कटकटायिनौ ।
अपनी जाँघों और पैरोंकी टक्करसे वे बड़े-बड़े वृक्षोंको भी हिला देते थे, जबड़े चाटते और दाँत कटकटाते थे ॥ ५ १/२ ॥

अस्थिस्नायुसमाकीर्णौ धमनीरज्जुसंततौ ॥ ६ ॥
वदन्तौ कृष्ण कृष्णेति माधवेति च संततम् ।
उनका सारा शरीर हड्डियों और स्नायुजालसे व्याप्त था; नस-नाड़ियाँ रस्सीकी भाँति सर्वत्र फैली दिखायी देती थीं। वे दोनों निरन्तर 'कृष्ण ! कृष्ण ! माधव !' इत्यादि नामोंका कीर्तन करते थे ॥ ६ १/२ ॥

कदा नु द्रक्ष्यते विष्णुः स इदानीं क्व तिष्ठति ॥ ७ ॥
स्वामिनः कुत्र वसतिः कुतो द्रष्टुं यतामहे ।
अत्र वा कुत्र देवेशः कुतो नु स्यात्सखे हरिः ॥ ८ ॥
वे कहते थे—'हमें भगवान् विष्णुका दर्शन कब होगा ? वे इस समय कहाँ होंगे ? हमारे स्वामी श्रीहरिका निवासस्थान कहाँ है ? हम किस तरह उनके दर्शनका प्रयत्न करें ? इस तपोवनमें देवेश्वर श्रीहरि कहाँ होंगे ? ॥ ७-८ ॥'

कुतः पद्मपलाशाक्षः साक्षादिन्द्रानुजो हरिः ।
यमाहुः पुण्डरीकाक्षं ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ९ ॥
तमजं पुरुषं विष्णुं द्रष्टुमभ्युद्यता वयम् ।
'जो साक्षात् इन्द्रके छोटे भाई हैं तथा जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं, वे श्रीहरि कहाँ मिलेंगे ? जिन्हें भक्तजन पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) कहते हैं और ब्रह्मज्ञानी पुरुष ब्रह्म कहते हैं, उन्हीं अजन्मा एवं सर्वव्यापी परम पुरुषका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ९ १/२ ॥

अन्तकाले जगन्नाथं प्रविवेश जगत्त्रयम् ॥ १० ॥
तमजं विश्वकर्तारं कुतो द्रक्ष्याम साम्प्रतम् ।
'प्रलयकालमें ये तीनों लोक जिन जगदीश्वरमें प्रवेश कर जाते हैं, उन अजन्मा विश्वस्रष्टा श्रीहरिका हम इस समय कैसे दर्शन करेंगे ॥ १० १/२ ॥

यस्य विस्तार एवैष लोकः प्राणिनिवासिनः ॥ ११ ॥
तं द्रष्टुं देवमीशानं यतामः साम्प्रतं हरिम् ।
'जो समस्त प्राणियोंके निवासस्थान हैं, ये सम्पूर्ण लोक जिनका ही विस्तार (या विराट्रूप) है, उन्हीं सर्वेश्वर देव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये इस समय हमलोग प्रयत्नशील हैं ॥ ११ १/२ ॥

दशा घोरतमा लोके विद्विष्टा सर्वजन्तुभिः ॥ १२ ॥
पैशाचीयं समुत्पन्ना कथं नौ प्राविशद् बलात् ।
नरमांसास्थिकलुषा सर्वभीतिप्रदायिनी ॥ १३ ॥
'सम्पूर्ण जन्तु जिससे द्वेष रखते हैं, जो जगत्में सबसे अधिक भयंकर अवस्था है, वही यह पिशाच-योनि न जानें हमें कैसे प्राप्त हुई ? और किस प्रकार बलपूर्वक हमारे भीतर प्रविष्ट हो गयी। यह मनुष्य और हड्डियोंको खानेके कारण कलुषित और सबको भय प्रदान करनेवाली है ॥ १२-१३ ॥

अहो नौ दुष्कृतं कर्म प्राक्तने कर्मसंचये ।
अत्रैव महती प्रीतिर्वर्तते सर्वदा तथा ॥ १४ ॥
'अहो ! हम दोनोंके पूर्वजन्मकी कर्मराशिमें केवल दुष्कर्मका ही संचय हुआ था, जिससे हमें यह कलङ्कित योनि प्राप्त हुई, तो भी हमें इसीमें सदा परम प्रसन्नता बनी रहती है ॥ १४ ॥

यावन्नौ दुष्कृतं कर्म तावत्स्थास्यति तादृशी ।
दशा सा सर्वविद्विष्टा प्राणिपीड़नकारिणी ॥ १५ ॥
जबतक हम दोनोंका दुष्कर्म शेष है, तबतक हमारी उन कर्मोंके अनुरूप ही यह पिशाचावस्था बनी रहेगी, जिससे

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