भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1013

९८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


राजन्! मृगोंके पीछे दौड़ते और भौंकते हुए कुत्तों, भयभीत मृगों, रीछों, व्याघ्रों और चिग्घाड़ते हुए हाथियोंका गर्जन चारों ओर इस प्रकार गूँजने लगा मानो प्रचण्ड वायुके वेगसे कम्पित एवं क्षुब्ध हुए महासागरका गम्भीर घोष सुनायी दे रहा हो॥ ९-१०॥

नादस्तैलोक्यवित्रासः प्रादुरासीत्तदा निशि।
श्रुत्वा शब्दं हरिर्देवस्तादृशं तत्र धिष्ठितः ॥ ११ ॥
समाधिक्षोभमासाद्य विश्वस्य च जगत्पतिः ।
ततः संचिन्तयामास कोऽयमेष महास्वनः ॥ १२ ॥

उस समय रात्रिमें तीनों लोकोंको भयभीत करनेवाला वह महानाद प्रकट हुआ। वैसे महान् कोलाहलको सुनकर वहाँ बैठे हुए सम्पूर्ण जगत्के अधिपति भगवान् श्रीकृष्णकी समाधि टूट गयी। वे सोचने लगे—'यह कैसा महान् कोलाहल हो रहा है ? ॥ ११-१२ ॥

कस्यायमीदृशः शब्दः स्तुतियुक्तो मम त्विति ।
अहोऽस्मिन् मृगयाशब्दः शुनां संचरतां वने ॥ १३ ॥
मृगाणामथ सर्वेषां नादश्च सुमहानयम्।
व्यामिश्रस्तुतियुक्ताभिर्वाग्भिर्मम समन्ततः ॥ १४ ॥

'यह किसका ऐसा शब्द सुनायी दिया है, जो मेरी स्तुतिसे युक्त है। अहो ! इस वनमें दौड़ते हुए कुत्ते और भागते हुए समस्त मृगोंका यह महान् कोलाहल, शिकार खेलनेकी यह बड़ी भारी आवाज आश्चर्यकी वस्तु है। चारों ओर फैला हुआ यह कोलाहल मेरी स्तुतिसे मिश्रित वचनों-द्वारा व्याप्त है' ॥ १३-१४ ॥

इति संचिन्त्य मनसा दिशो विप्रेक्ष्य सर्वतः ।
तत आस्ते हरिस्तत्र ज्ञातुं तस्य समुद्भवम् ॥ १५ ॥

मन-ही-मन ऐसा सोचकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टि-पात करके उस महान् कोलाहलका कारण जाननेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सावधान होकर बैठे ॥ १५ ॥

ततो मृगाः समाधावन् यत्र तिष्ठति केशवः ।
तांश्चैवानुचरो राजन् श्वगणः समपद्यत ॥ १६ ॥

राजन् ! इतनेहीमें बहुत-से मृग भागते हुए उधर ही आ निकले, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। साथ ही उनका पीछा करता हुआ कुत्तोंका झुंड भी आ पहुँचा ॥

अथ वै दीपिका राजञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।
ततस्तमोऽपि व्यनशद् दिवेव समपद्यत ॥ १७ ॥

राजन् ! तदनन्तर सैकड़ों और हजारों मशालें जल उठीं; जिनसे सारा अन्धकार नष्ट हो गया और दिनके समान प्रकाश फैल गया ॥ १७ ॥

ततो नु भूतसङ्घाश्च समदृश्यन्त तत्र ह ।
पिशाचाश्च महाघोरा नदन्तो बहु विस्वनम् ॥ १८ ॥
भक्षयन्तोऽथ पिशितं पिबन्तो रुधिरं बहु ।
प्रादुरासन् महाघोराः पिशाचा विकृताननाः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् वहाँ भूतोंके समुदाय दिखायी दिये । महा-भयंकर पिशाच गर्जते और भाँति-भाँतिके शब्द कर रहे थे। वे कच्चे मांस खाते और बहुत-सा रक्त पीते हुए वहाँ प्रकट हुए। उनका स्वरूप बड़ा भयंकर था। वे सभी पिशाच विकराल मुखवाले थे ॥ १८-१९ ॥

हन्यमाना हता राजन् पतन्तः पतिता मृगाः ।
इतश्चेतश्च धावन्तो बाणैर्विद्धा मृगा द्विपाः ॥ २० ॥

राजन् ! कितने ही मृग उन पिशाचोंद्वारा मारे गये और मारे जा रहे थे। कितने ही धराशायी हो चुके थे और बहुत-से तत्काल गिर रहे थे। बाणोंसे घायल हुए मृग और हाथी इधर-उधर भाग रहे थे ॥ २० ॥

ततो मृगसहस्राणि समुदीर्णानि भारत ।
यत्रासौ तिष्ठते देवस्तत्र याता निरन्तरम् ॥ २१ ॥
अन्तरीकृत्य देवेशं स्थितानीत्यनुशुश्रुम ।

भारत ! तत्पश्चात् जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे थे, वहाँ सहस्रों मृग लगातार भागते चले आये और देवेश्वर श्रीकृष्णको घेरकर खड़े हो गये। यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ २१ १/२ ॥

पिशाच्यो विकृताकाराः कराला रोमहर्षणाः ॥ २२ ॥
पुत्रवत्यः समापेतुर्यत्र तिष्ठति केशवः ।

थोड़ी ही देरमें बहुत-सी विकृत आकारवाली विकराल पिशाचियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं, जहाँ भगवान् केशव विराजमान थे। वे सब-की-सब पुत्रवती थीं, उनके दर्शनमात्रसे दूसरोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे ॥ २२ १/२ ॥

श्वगणस्तत्र राजेन्द्र चरत्येवं ततस्ततः ॥ २३ ॥
ततः स भगवान् विष्णुः सर्वमालोक्य चेष्टितः ।
विस्मयं परमं गत्वा पश्यन्नास्ते स्म केशवः ॥ २४ ॥

राजेन्द्र ! इसी प्रकार कुत्तोंका समुदाय भी वहाँ आकर इधर-उधर विचरने लगा। तत्पश्चात् उन मृगोंद्वारा घिरे हुए वे विष्णुरूप भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको वहाँ आया देख महान् आश्चर्यमें पड़कर उन सबकी ओर देखने लगे ॥ २३-२४ ॥

कस्यैष विस्तृतो नादः कस्य वायं जनोऽपतत् ।
को नु मां स्तौति भक्त्या वै भविष्ये प्रीतिमानहम् ॥ २५ ॥

वे सोचने लगे—'यह किसका महान् कोलाहल फैला हुआ है, अथवा यह किसका जन-समुदाय यहाँ आ पहुँचा है? कौन भक्तिभावसे मेरी स्तुति करता है? जिसके ऊपर मैं प्रसन्न होऊँगा ॥ २५ ॥

कस्य मुक्तिः समायाता प्रीते मयि सुदुर्लभा ।
इति संचिन्त्य भगवानास्ते प्राकृतवद्धरिः ॥ २६ ॥

'आज मेरे प्रसन्न होनेपर किसको परम दुर्लभ मुक्ति प्राप्त होना चाहती है।' इस प्रकार भगवान् श्रीहरि साधारण मनुष्य-के समान सोच-विचार करते हुए वहाँ बैठे रहे ॥ २६ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्रा-विषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥