भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1012

भविष्यपर्व ] अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ९८७

कृष्णोऽपि तद् यथायोगमुपयुज्य सहामरैः।
कृतं सर्वं मुनिवरा वर्धतां तप उत्तमम्॥ १६॥
देवताओंसहित श्रीकृष्णने भी उनके दिये हुए अर्घ्य आदिका यथायोग्य उपयोग करके कहा—'मुनिवरो! आपलोगोंने हमारा पूरा सत्कार कर दिया। आपलोगोंका उत्तम तप बढ़े'॥
इति ब्रुवन् पुराणात्मा प्रीतस्तेन गरुत्मता।
आसनं लम्भयामास रात्रौ देवो जनार्दनः॥ १७॥
इस प्रकार कहते हुए पुराणपुरुष जनार्दनदेव श्रीकृष्णने गरुड़जीके साथ प्रसन्नतापूर्वक रात्रिमें आसन ग्रहण किया॥
कुशलं पृष्टवान् भूयो मुनीनां भावितात्मनाम्।
अग्निहोत्रेषु तपसि तथा भृत्येषु सर्वतः॥ १८॥
फिर उन्होंने पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके अग्निहोत्र, तप और भृत्योंके भरण-पोषण आदि सभी कार्योंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा ॥ १८ ॥
एवमादि जगन्नाथः पृष्टवानीश्वरस्तदा।
सर्वत्र कुशलं तेऽत्र ब्रूयुः कृष्णस्य सर्वतः॥ १९॥
इस तरह जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णने जब उनसे कुशल-मङ्गल पूछा, तब वे श्रीकृष्णसे बोले--'प्रभो ! आपकी कृपासे हमें सर्वत्र कुशल है' ॥ १९ ॥
आतिथ्यं चक्रिरे ते तु नीवारैः फलमूलकैः।
देवानाम्थ सर्वेषां विष्णोः कृष्णस्य यत्नतः।
आतिथ्यमुपयुञ्जानस्ततः प्रीतोऽभवद्धरिः॥ २०॥
तत्पश्चात् उन ऋषियोंने नीवार और फल, मूल आदिके द्वारा समस्त देवताओं तथा विष्णुरूप श्रीकृष्णका यत्नपूर्वक आतिथ्य किया। उनका आतिथ्य ग्रहण करके भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां सप्तसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७७ ॥


अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी समाधि, महान् कोलाहल और उनके पास भागते हुए मृग आदिका आगमन

वैशम्पायन उवाच

ततः स भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः।
यत्र पूर्वं तपस्तप्तमात्मना यादवेश्वरः॥ १॥
गङ्गायाश्चोत्तरे तीरे देशं द्रष्टुमुपागतः।
स्वयमेव हरिः साक्षात् प्रविवेश तपोवनम्॥ २॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर जिनकी गतिका ज्ञान होना कठिन है, वे सर्वसमर्थ सर्वव्यापी भगवान् यदुनाथ गङ्गाजीके उत्तर तटपर उस स्थानको देखनेके लिये गये, जहाँ उन्होंने पूर्वकालमें स्वयं तप किया था। उन श्रीहरिने स्वयं ही उस साक्षात् तपोवनमे प्रवेश किया ॥ १-२ ॥
प्रविश्य सुचिरं देशं ददर्श च मनोरमम्।
निपसाद ततस्तस्मिन्नाश्रमे पुण्यवर्धनः॥ ३॥
उसमें प्रवेश करके वे उस परम सुन्दर एवं मनोरम देशका दर्शन करने लगे। तदनन्तर पुण्यकी वृद्धि करनेवाले भगवान् उस आश्रममें बैठे ॥ ३ ॥
समाधौ योजयामास मनः पद्मनिभेक्षणः।
किमप्येप जगन्नाथो ध्यात्वा देवेश्वरः स्थितः॥ ४॥
बैठनेके पश्चात् उन कमलनयन श्रीकृष्णने अपने मनको समाधिमें लगाया। वे देवेश्वर जगन्नाथ किसी अनिर्वचनीय तत्त्वका चिन्तन करते हुए उस समाधिमें दृढ़तापूर्वक स्थित हो गये ॥ ४ ॥
स्थिते देवगुरौ तत्र समाधौ दीपवद्धरौ।
तत्र शब्दो महाघोरः प्रादुरासीत् समन्ततः॥ ५॥
वायुशून्य स्थानमें निष्कम्पभावसे प्रज्वलित होनेवाले दीपकके समान जब वे देवगुरु श्रीहरि समाधिमें अविचलभावसे स्थित हो गये, तब वहाँ सब ओर बड़ा भयंकर शब्द प्रकट हुआ—॥ ५ ॥
खाद खादत मोदेत यात यात मृगानिमान्।
प्रेषयेह पुनः सर्वान् प्रसादाच्छार्ङ्गधन्वनः॥ ६॥
'खाओ ! खाओ ! मौज उड़ाओ ! जाओ ! जाओ इन मृगोंके पीछे। भगवान् श्रीहरिके प्रसादसे इन सबको फिर यहाँ हाँक लाओ ॥ ६ ॥
एष विष्णुरयं कृष्णो हरिरीश इतोऽच्युतः।
नमोऽस्तु विष्णो देवेश स्वामिन् माधव केशव॥ ७॥
'ये भगवान् विष्णु हैं ! ये श्रीकृष्ण हैं ! ये हरि ईश्वर अच्युत इधर बैठे हैं। विष्णो ! देवेश्वर ! स्वामिन् ! माधव ! केशव ! आपको नमस्कार है '॥ ७ ॥
इत्यादिशब्दः सुमहानाविरासीत् तदा निशि।
ततश्च सुमहानादः सिंहानां मृगविद्विषाम्॥ ८॥
इत्यादि रूपसे उस रातमें महान् कोलाहल होने लगा। तदनन्तर मृगद्रोही सिंह बड़े जोर-जोरसे दहाड़ने लगे ॥ ८ ॥
धावतां च शुनां राजन् मृगाननु विनर्दताम्।
मृगाणां भीतियुक्तानामृक्षाणां द्वीपिनां तथा॥ ९॥
गजानां नदतां राजन् बृंहितं च ततस्ततः।
महावातसमुद्भूतक्षुभितस्येव वारिधेः॥ १०॥