विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1011, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९८६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
देवताओंसहित श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें ऋषियोंद्वारा आतिथ्यसत्कार
वैशम्पायन उवाच
ततो मुनिगणा दृष्ट्वा देवदेवमुपस्थितम्।
समाप्य चाग्निहोत्राणि सम्पूज्यातिथिसत्तमान्॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर मुनि-गण देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णको उपस्थित हुआ देख अग्निहोत्र पूरा करके उनके पास आये और उन श्रेष्ठतम अतिथियोंके स्वागत-सत्कारमें लग गये ॥ १ ॥
मुनयो दीर्घतपसः समाधौ कृतनिश्चयाः।
जटिनो मुण्डिनः केचिच्छिद्राधमनिसंतताः॥ २ ॥
वे मुनि दीर्घकालतक तपस्या करनेवाले और समाधिमें दृढ़ निश्चयके साथ लगे रहनेवाले थे। किन्हींके सिरपर बड़ी-बड़ी जटाएँ थीं और बहुत-से मुनि मूँड़ मुड़ाये हुए थे। कितने ही इतने दुर्बल हो गये थे कि उनका सारा शरीर नस-नाड़ियोंसे व्याप्त दिखायी देता था (उसपर रक्त और मांसका आवरण नहीं था) ॥ २ ॥
निर्मज्जा नीरसाः केचिद् वेताला इव केचन।
अश्मकुट्टाशनपराः पर्णभक्षास्तथा परे॥ ३ ॥
कितने ही रक्त और मज्जासे हीन थे। कितने ही वेतालों-के समान दृष्टिगोचर होते थे। कुछ लोग पत्थरसे कूट-कूटकर खाद्यपदार्थोंको खाते थे। बहुत-से मुनि पत्ते चबाकर रहते थे ॥ ३ ॥
वेदविद्याव्रतस्नाता निराहारा महातपाः।
स्मरन्तः सर्वदा विष्णुं तद्भक्तास्तत्परायणाः॥ ४ ॥
कितने ही वेदविद्याके व्रतको पूर्ण करके स्नातक हो चुके थे। कितने ही निराहार रहकर महान् तप करते थे। वे भगवान् विष्णुके भक्त थे और सदा उन्हींका स्मरण करते हुए उन्हींके भजन-चिन्तनमें तत्पर रहते थे ॥ ४ ॥
आसन्नमुक्तयः केचित् केचिद् ध्यानैकतत्पराः।
ध्यानेन मनसा विष्णुं दृष्टवन्तस्तपोधनाः॥ ५ ॥
किन्हींकी मुक्ति संनिकट थी। कितने ही एकमात्र ध्यानमें ही संलग्न रहते थे। कितने ही तपोधन ध्यानमग्न चित्तसे भगवान् विष्णुका साक्षात् दर्शन करते थे ॥ ५ ॥
संवत्सराशिनः केचित् केचिज्जलविहारिणः।
शक्रस्य भयदातारः श्रुतिस्मृतिपरायणाः॥ ६ ॥
कोई एक वर्षपर आहार करनेवाले थे। कोई जलके भीतर निवास या जलमात्रका आहार करनेवाले थे। कोई श्रौत-स्मार्त शुभ कर्मोंमें तत्पर रहकर इन्द्रको भी भय प्रदान करते थे ॥ ६ ॥
वसिष्ठो वामदेवश्च रैभ्यो धूम्रस्तथैव च।
जावालिः कश्यपः कण्वो भरद्वाजोऽथ गौतमः॥ ७ ॥
अत्रिरश्वशिरा भद्रः शङ्खः शङ्खनिधिः कुणिः।
पाराशर्यः पवित्राक्षो याज्ञवल्क्यो महामनाः॥ ८ ॥
कक्षीवानङ्गिरश्चैव मुनिर्दीप्ततपास्तथा।
असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः॥ ९ ॥
एते चान्ये च मुनयो द्रष्टुमीश्वरमव्ययम्।
आदायार्घ्यं यथायोगमुटजात्स्वात्समाययुः॥ १० ॥
तात ! वसिष्ठ, वामदेव, रैभ्य, धूम्र, जावालि, कश्यप, कण्व, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, अश्वशिरा, भद्र, शङ्ख, शङ्खनिधि, कुणि, पाराशर्य, पवित्राक्ष, महामना याज्ञवल्क्य, कक्षीवान्, अङ्गिरा मुनि, दीप्ततपा, असित, देवल तथा महातपस्वी वाल्मीकि—ये और दूसरे मुनि अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये यथायोग्य अर्घ्य लिये अपनी-अपनी कुटियासे आये ॥ ७-१० ॥
ते च गत्वा हरिं कृष्णं विष्णुमीशं जनार्दनम्।
भक्तिनम्रास्तदा देवं प्रणेमुर्भक्तवत्सलम्॥ ११ ॥
उन्होंने वहाँ जाकर उस समय भक्तिभावसे विनम्र हो पापहारी सर्वव्यापी ईश्वर भक्तवत्सल जनार्दनदेव श्रीकृष्णको प्रणाम किया ॥ ११ ॥
नमोऽस्तु कृष्ण कृष्णेति देवदेवेति केशवम्।
प्रणवात्मञ्जगन्नाथ नताः स्म शिरसा हरे॥ १२ ॥
'श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। देवदेव ! कृष्ण ! केशव ! प्रणवात्मन् ! जगन्नाथ ! हरे ! हम आपके चरणोंमें सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं ॥ १२ ॥
कृष्ण विष्णो हृषीकेश केशवेति च सर्वदा।
प्रणामप्रवणा विप्राः प्राहुरित्यं जगत्पतिम्॥ १३ ॥
'कृष्ण ! विष्णो ! हृषीकेश ! केशव ! आपको सर्वदा नमस्कार है !' इस प्रकार उन जगदीश्वरको प्रणाम करते हुए ब्राह्मणोंने उपर्युक्त बात कही ॥ १३ ॥
इदमर्घ्यमिदं पाद्यमिदं विष्टरमेव च।
कृतार्थाः सर्वदा देव प्रसन्नो नो जगत्पतिः॥ १४ ॥
तत्पश्चात् वे कहने लगे—'भगवन् ! यह आपके लिये अर्घ्य है, यह पाद्य है और यह आसन है। देव ! आपके दर्शनसे हम सदाके लिये कृतार्थ हो गये। आप जगदीश्वर हमपर प्रसन्न हैं ॥ १४ ॥
किं कुर्मः किं नु नः कृत्यं कश्चिद् दोषः प्रभो हरे।
इति प्राञ्जलयः सर्वे प्राहुर्देवस्य पद्यतः॥ १५ ॥
'हम आपकी क्या सेवा करें ? हमारे लिये क्या कर्तव्य है ? प्रभो ! हरे ! हमसे कोई अपराध तो नहीं बन गया !' इस प्रकार सबने भगवान्के सामने हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही ॥ १५ ॥