विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1010, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः [ ९८५
जहाँ पूर्वकालमें लोकवृद्धि करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णुने लोकहितकी कामनासे अत्यन्त कठोर तप किया था ॥
वर्षायुतं तपस्तप्तं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २० ॥
यत्र विष्णुर्जगन्नाथस्तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ।
द्विधाकरोत् स्वमात्मानं नरनारायणाख्यया ॥ २१ ॥
प्रभावशाली भगवान् विष्णुने दस हजार वर्षोंतक वहाँ तपस्या की थी। जगदीश्वर विष्णुने अत्यन्त कठोर तप करके वहाँ अपने-आपको नर और नारायण नामसे विख्यात दो स्वरूपोंमें अभिव्यक्त किया था ॥ २०-२१ ॥
गङ्गा यत्र सरिच्छ्रेष्ठा मध्ये धावति पावनी ।
यत्र शक्रः स्वयं हत्वा वृत्रं वेदार्थतत्त्वगम् ॥ २२ ॥
ब्रह्महत्याविनाशार्थं तपो वर्षायुतं चरत् ।
उस क्षेत्रके मध्यभागमें सरिताओंमें श्रेष्ठ पावनी गङ्गा प्रखर गतिसे प्रवाहित होती रहती हैं। जहाँ इन्द्रने वेदार्थतत्त्वके ज्ञाता वृत्रासुरका वध करके लगी हुई ब्रह्महत्याका विनाश करनेके लिये दस हजार वर्षोंतक तप किया था ॥
यत्र सिद्धाश्च सिद्धाः स्युर्ध्यात्वा देवं जनार्दनम् ॥ २३ ॥
यत्र हत्वा रणे रामो रावणं लोकरावणम् ।
एतच्छासनमिच्छंश्च तपो घोरमतप्यत ॥ २४ ॥
जहाँ भगवान् जनार्दनका ध्यान करनेसे ही सिद्ध पुरुषोंको सिद्धि प्राप्त हुई है। रणभूमिमें लोकको रुलानेवाले रावणका वध करके भगवान् श्रीरामने इन्द्रद्वारा पालित हुई शास्त्राज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे जहाँ घोर तपस्या की थी॥
देवाश्च मुनयश्चैव सिद्धिं यान्ति शुचिव्रताः ।
यत्र नित्यं जगन्नाथः साक्षाद् वसति केशवः ॥ २५ ॥
देवता और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनि जहाँ सिद्धिको प्राप्त होते हैं और जहाँ जगदीश्वर केशव साक्षात् रूपसे नित्य निवास करते हैं ॥ २५ ॥
यत्र यज्ञाः प्रवर्तन्ते नित्यं मुनिगणैः सह ।
यस्याः स्मरणमात्रेण नरः स्वर्गं गमिष्यति ॥ २६ ॥
जहाँ मुनियोंके साथ यज्ञ नित्य होते रहते हैं। जिसके स्मरणमात्रसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ २६ ॥
स्वर्गसोपानमिच्छन्ति यां पुण्यां मुनिसत्तमाः ।
शत्रवो मित्रतां यान्ति यत्र नित्यं नृपोत्तम ॥ २७ ॥
यामाहुः पुण्यशीलानां स्थानमुत्तमधर्मिणाम् ।
यत्र विष्णुं समाराध्य देवाः स्वर्गं समाययुः ॥ २८ ॥
नृपोत्तम ! मुनिश्रेष्ठगण जिस पुण्यभूमिको स्वर्गकी सीढ़ी समझ उसे पानेकी इच्छा करते हैं तथा जहाँ शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। जिसे पुण्यशील उत्तम धर्मात्मा मनुष्योंका स्थान बताया गया है। जहाँ भगवान् विष्णुकी आराधना करके देवता स्वर्गलोकको प्राप्त होते हैं ॥ २७-२८ ॥
सिद्धक्षेत्रमिदं प्राहुर्ऋषयो वीतमत्सराः ।
विशालां बदरीं विष्णुस्तां द्रष्टुं सकलेश्वरः ॥ २९ ॥
सायाह्ने चामरगणैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
प्रविवेश महापुण्यमृषिजुष्टं तपोवनम् ॥ ३० ॥
मात्सर्यरहित ऋषि-मुनि जिसे सिद्ध पुरुषोंका क्षेत्र कहते हैं, उस विशाला बदरीका दर्शन करनेके लिये सर्वेश्वर श्रीकृष्णने सायंकालमें तत्त्वदर्शी मुनियों और देवताओंके साथ वहाँके परम पवित्र ऋषि-मुनिसेवित तपोवनमें प्रवेश किया ॥ २९-३० ॥
अग्निहोत्राकुले काले पक्षिव्याहारसंकुले ।
नीडस्थेषु विहङ्गेषु दुह्यमानासु गोषु च ॥ ३१ ॥
ऋषिष्वप्यथ तिष्ठत्सु मुनिवरेषु सर्वतः ।
समाधिस्थेषु सिद्धेषु चिन्तयत्सु जनार्दनम् ॥ ३२ ॥
अधिश्रितेषु हविषु ज्वाल्यमानेषु चाग्निषु ।
हूयमानेषु तत्रैव पावकेषु समन्ततः ॥ ३३ ॥
अतिथौ पूज्यमाने च संध्याविष्टे जगन्मणौ ।
स तस्यामथ वेलायां देवैः सह जनार्दनः ॥ ३४ ॥
विवेश बदरीं विष्णुर्मुनिजुष्टां तपोमयीम् ।
जिस समय सब ओर अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलित हो चुकी थी, पक्षियोंके कलरवसे तपोवन गूंज रहा था, विहङ्गम अपने-अपने घोंसलोंमें आ बैठे थे, गौएँ दुही जा रही थीं, मुनियोंमें उत्साही ऋषि-महर्षि सब ओर खड़े थे, सिद्धलोग समाधिस्थ होकर भगवान् जनार्दनका चिन्तन करते थे, हवनीय घृत आगपर चढ़ा दिये गये थे, सब ओर अग्निहोत्रकी अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठी थीं और उन अग्नियोंमें सब ओर आहुतियाँ दी जा रही थीं, अतिथियोंका सत्कार हो रहा था और जगत्को प्रकाशित करनेवाले सूर्य संध्याकालमें अस्त हो रहे थे, उसी वेलामें देवताओंके साथ सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्णने मुनिसेवित तपोमयी बदरीतीर्थकी भूमिमें प्रवेश किया ॥ ३१—३४ १/२ ॥
आश्रमस्याथ मध्यं तु प्रविश्य हरिरीश्वरः ॥ ३५ ॥
गरुडादवरुह्याथ दीपिकादीपिते तदा ।
प्रदेशे पुण्डरीकाक्षः स्थितस्तावत् सहामरैः ॥ ३६ ॥
बदरिकाश्रमके मध्यभागमें प्रवेश करके कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण दीपकोंसे प्रकाशित प्रदेशमें गरुड़से उतरकर देवताओंसहित खड़े हुए ॥ ३५-३६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥