भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1009

९८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

कुरुश्रेष्ठ ! तब भगवान् गरुड़ वहाँ आ पहुँचे, जिन्हें वेदकी राशिमाना गया है; वे बलवान्, पराक्रमी, योगी तथा शास्त्रों (शास्त्रज्ञों) के नेता हैं ॥ २ ॥
यज्ञमूर्तिः पुराणात्मा साममूर्द्धा च पावनः ।
ऋग्वेदपक्षवान् पक्षी पिङ्गलो जटिलाकृतिः ॥ ३ ॥
यज्ञ उनका स्वरूप है, वे पुराणात्मा और पावन हैं, सामवेद उनका मस्तक है, ऋग्वेद उनकी पाँखें हैं, पक्षधारी गरुड पिङ्गलवर्णके हैं, उनकी आकृति जटिल दिखायी देती है॥
ताम्रतुण्डः सोमहरः शक्रजेता महाशिराः ।
पन्नगारिः पद्मनेत्रः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ॥ ४ ॥
उनकी चोंच ताँबेके समान लाल है । वे अमृतका हरण करनेवाले हैं । उन्होंने युद्धमें इन्द्रको जीत लिया था। उनका मस्तक विशाल है । वे सर्पोंके शत्रु हैं और साक्षात् दूसरे विष्णुकी भाँति कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ४ ॥
वाहनं देवदेवस्य दानवीगर्भकृन्तनः ।
राक्षसासुरसंघानां जेता पक्षबलेन यः ॥ ५ ॥
वे देवाधिदेव भगवान् विष्णुके वाहन तथा दानव-पत्नियोंके गर्भका उच्छेद करनेवाले हैं । वे अपने पंखोंके बलसे राक्षसों और असुरोंके समूहपर विजय पाते हैं ॥ ५ ॥
प्रादुरासीन्महावीर्यः केशवस्याग्रतस्तदा ।
जानुभ्यामपतद् भूमौ नमो विष्णो जगत्पते ॥ ६ ॥
नमस्ते देवदेवेश हरे स्वामिन्निति ब्रुवन् ।
उस समय महापराक्रमी गरुड़ भगवान् केशवके सम्मुख प्रकट हुए और घुटनोंके बल पृथ्वीपर पड़पर प्रणाम करते हुए बोले—'जगत्पते ! विष्णो ! आपको नमस्कार है । देवदेवेश्वर ! हरे ! स्वामिन् ! आपके चरणोंमें मेरा प्रणाम है',॥
पस्पर्श पाणिना कृष्णः स्वागतं तार्क्ष्यपुङ्गवम् ॥ ७ ॥
इत्युवाच तदा तार्क्ष्यं यास्ये कैलासपर्वतम् ।
शूलिनं द्रष्टुमिच्छामि शङ्करं शाश्वतं शिवम् ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने गरुड़-जातिके पक्षियोंमें प्रधान गरुड़का अपने हाथसे स्वागतपूर्वक स्पर्श किया और उनसे तत्काल कहा—'मैं कैलासपर्वतको चलूँगा। सनातन देवता कल्याणस्वरूप भगवान् शङ्करका दर्शन करना चाहता हूँ' ॥
बाढमित्यब्रवीत् तार्क्ष्य आरुहौषं जनार्दनः ।
तिष्ठध्वमिति होवाच यादवान् पार्श्ववर्तिनः ॥ ९ ॥
तब गरुड़ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की । गरुड़पर आरूढ़ होकर भगवान् जनार्दनने आस-पास खड़े हुए यादवोंसे कहा—'तुम सब सतत सावधान रहना' ॥ ९ ॥
ततो ययौ जगन्नाथो दिशं प्रागुत्तरां हरिः ।
रवेण महता तार्क्ष्यस्त्रैलोक्यं समकम्पयत् ॥ १० ॥
तदनन्तर जगदीश्वर श्रीहरि पूर्वोत्तर दिशाकी ओर चले। गरुड़ने अपने महानादसे तीनों लोकोंको कम्पित कर दिया ॥
सागरं क्षोभयामास पद्भ्यां पक्षी व्रजंस्तदा ।
पक्षेण पर्वतान् सर्वान् वहन् देवं जनार्दनम् ॥ ११ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका भार वहन करके आगे बढ़ते हुए पक्षी गरुड़ने अपने पैरोंसे समुद्रको क्षुब्ध कर दिया और पंखोंकी हवासे समस्त पर्वतोंको कम्पित कर दिया ॥ ११ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वा आकाशेऽधिष्ठितास्तदा ।
तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षं वाग्भिरिष्टाभिरीश्वरम् ॥ १२ ॥
उस समय गन्धर्वोसहित देवता आकाशमें खड़े हो प्रिय वचनोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे ॥ १२ ॥
जय देव जगन्नाथ जय विष्णो जगत्पते ।
जयाजेय नमो देव भूतभावनभावन ॥ १३ ॥
(वे कहते थे—) 'जगन्नाथ ! देव ! आपकी जय हो ! जगत्पते ! विष्णो ! आपकी जय हो ! अजेय परमेश्वर ! आपकी जय हो ! देव ! भूतभावनभावन ! आपको नमस्कार है ॥
नमः परमसिंहाय दैत्यदानवनाशन ।
जयाजेय हरे देव योगिध्येय परागत ॥ १४ ॥
'उत्तम नृसिंहरूपधारी आपको नमस्कार है । आप दैत्यों और दानवोंका नाश करनेवाले हैं । अजेय हरे ! आपकी जय हो ! देव ! आप योगियोंके ध्येय और परमगति-स्वरूप हैं ॥ १४ ॥
नारायण नमो देव कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
आदिकर्त्तः पुराणात्मन् ब्रह्मयोने सनातन ॥ १५ ॥
'नारायण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हरे ! हरे ! आदिकर्त्ता ! पुराणात्मन् ! ब्रह्मयोने ! सनातन देव ! आपको नमस्कार है ॥
नमस्ते सकलेशाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
भक्तिप्रियाय भक्ताय नमो दानवनाशन ॥ १६ ॥
'सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है । आप निर्गुण एवं गुणस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है । आप भक्तिप्रिय और भक्तस्वरूप हैं । दानवनाशन ! आपको नमस्कार है ॥ १६ ॥
अचिन्त्यमूर्तये तुभ्यं नमस्ते सकलेश्वर ।
इत्यादिभिस्तदा देवं वाग्भिरीशानमव्ययम् ॥ १७ ॥
तुष्टुवुर्देवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः ।
'सकलेश्वर ! आपका स्वरूप अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है ।' इस प्रकारके वचनोंद्वारा देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों, सिद्धों और चारणोंने अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया ॥ १७ १/२ ॥
शृण्वन्नेवं जगन्नाथः स्तुतिवाक्यानि तानि च ॥ १८ ॥
ययौ सार्धं सुरगणैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।
यत्र पूर्वं स्वयं विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १९ ॥
लोकवृद्धिकरः श्रीमांल्लोकानां हितकाम्यया ।
जगदीश्वर श्रीकृष्ण उन स्तुतिवचनोंको सुनते हुए वेदपारंगत मुनियों और देवताओंके साथ उस स्थानपर गये,