भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1008

भविष्यपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः ९८३

दुर्गाढो नयमार्गोऽयमित्याहुस्तद्विदो जनाः।
चतुर्धा प्रोच्यते नीतिः सामदाने जनार्दन ॥२०॥
दण्डो भेदो मनुष्याणां निग्राहावग्रहे सदा।
दण्ड्येषु दण्डमिच्छन्ति समान्यं तु नये हरे ॥२१॥

इस नीतिमार्गमें प्रवेश करना बहुत ही कठिन है, ऐसा नीतिज्ञ पुरुष कहते हैं। जनार्दन ! चार प्रकारकी नीति बतलायी जाती है—साम, दान, दण्ड और भेद। मनुष्योंके निग्रह (दूसरेके द्वारा अपना अवरोध) और अवग्रह (अपने द्वारा दूसरोंका अवरोध) होनेपर सदा इन्हीं चार नीतियोंका प्रयोग होता है। हरे ! जो दण्डनीय (दुर्बल) हों, उन शत्रुओंके प्रति नीतिज्ञ पुरुष दण्ड-नीतिके ही प्रयोगकी इच्छा करते हैं और नीतिकी समता होनेपर अर्थात् शत्रु-के अपने समान बलशाली होनेपर उसके प्रति साम नीतिका ही प्रयोग अभीष्ट माना जाता है ॥ २०-२१ ॥

बलवत्स्वथ दानं तु त्रयाणामप्यगोचरे।
प्रयोक्तव्यो महाभेद इति नीतिमतां मतम् ॥२२॥

शत्रु बलवान् हों तो उनके प्रति दान-नीतिका प्रयोग उचित होता है (अर्थात् उन्हे कुछ भेंट देकर शान्त कर देना आवश्यक समझा जाता है)। जहाँ साम, दान और दण्ड—इन तीनों नीतियोंकी पहुँच न हो सके, वहाँ महान् 'भेद' का प्रयोग करना चाहिये, यह नीतिज्ञ पुरुषोंका मत है ॥ २२ ॥

तेषु तेष्वथ सर्वेषु प्रमाणं त्वां विदुर्बुधाः।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वं त्वयि समर्पितम् ॥२३॥

उन-उन सभी नीतियोंमें विद्वान् पुरुष आपको ही प्रमाण मानते हैं (आपने जिस अवसरपर जैसी नीतिका प्रयोग किया है, वहाँ वही उचित था, ऐसा लोगोंका मत है)। यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ ? सारा ज्ञान आपमें ही समर्पित है ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा विररामैव उद्धवो नीतिमत्तरः।
ततः स भगवान् विष्णुरेवमेव नृपोत्तम ॥२४॥
कामपालं महाबाहुमुवाच यदुसंसदि।
उग्रसेनं नृपं राजंस्तथा हार्दिक्यमेव च ॥२५॥
कामपालं पुनर्विष्णुरिदं प्रोवाच तत्त्ववित् ।
न प्रमादस्त्वया कार्यः सर्वदा यत्नवान् भव ॥२६॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर अतिशय नीतिमान् उद्धवजी चुप हो गये। राजन् ! तदनन्तर वे तत्त्ववेत्ता भगवान् श्रीकृष्णने इसी तरह यादव सभामें महाबाहु बलराम, महाराज उग्रसेन तथा कृतवर्मासे पूर्वोक्त बात कही। इसके बाद वे पुनः बलरामजीसे बोले—'भैया ! आपको प्रमाद नहीं करना चाहिये। आप सदा नगरकी रक्षाके लिये यत्नशील बने रहिये ॥ २४-२६ ॥

स्थिते त्वयि महाबाहो का पीडा जगतो भवेत्।
गदी भव सदा त्वार्य न क्रीडा सर्वदा भवेत् ॥२७॥

'महाबाहो ! आप रक्षाके लिये खड़े हो जायँ तो जगत्‌को क्या पीड़ा हो सकती है ? आर्य ! अब गदा उठाइये, सदा क्रीडा और मनोरञ्जनका ही अवसर नहीं होता है ॥

रक्ष त्वं सर्वदा यत्नात् पुरीं द्वारवतीं प्रभो।
नोपहास्या यथा स्याम तथा कुरु गदी भव ॥२८॥

'प्रभो ! आप सदा यत्नपूर्वक द्वारकापुरीकी रक्षा करें। हमें उपहासका पात्र न बनना पड़े, ऐसा प्रयत्न कीजिये और गदा लिये सदा रक्षाके लिये उद्यत रहिये ॥ २८ ॥

उत्साहः सर्वदा कार्यो निरुत्साहो न यत्नतः।
बाढमित्यब्रवीद् रामः कृष्णं वृष्णिकुलोद्भवम् ॥२९॥

'आपको सदा उत्साह बनाये रखना चाहिये। कभी उत्साहका अभाव न हो, इसके लिये यत्नशील रहना चाहिये।' तब बलरामजीने वृष्णिवंशावतंस श्रीकृष्णसे कहा—'बहुत अच्छा' ॥ २९ ॥

वृष्णयः सर्व एवैते स्वं स्वं सद्य समाययुः।
गन्तुमैच्छज्जगन्नाथः कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥३०॥

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सभी वृष्णिवंशी अपने-अपने घरको लौट गये। तब जगन्नाथ श्रीकृष्णने पर्वतप्रवर कैलासको जानेका विचार किया ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलास-यात्रा-विषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥


षट्सप्ततितमोऽध्यायः

गरुड़पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें जाना, मार्गमें देवताओं-मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच
ततः संचिन्तयामास गरुडं पक्षिपुङ्गवम्।
आगच्छ त्वरितं तार्क्ष्य इति विष्णुर्जगत्पतिः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्णने मन-ही-मन पक्षिराज गरुड़का चिन्तन करते हुए कहा—'तार्क्ष्य ! शीघ्र आओ' ॥ १ ॥

ततः स भगवांस्तार्क्ष्यो वेदराशिरिति स्मृतः।
बलवान् विक्रमी योगी शास्त्रनेत्रा कुरुद्वह ॥ २ ॥