भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1007, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1007

९८२ श्रीमद्भागवते खिलभागे [ हरिवंशे


नामक उपवेदके विद्वान् हो। अतः ऐसा प्रयत्न करो, जिससे यह पुरी उपहासका पात्र न बने ॥ ४ ॥

सात्यकिरुवाच

करिष्यामि वचस्तुभ्यं यथाशक्ति जनार्दन ।
आज्ञा तव जगन्नाथ धार्या यत्नेन मे सदा ॥ ५ ॥

जनार्दन ! मैं यथाशक्ति आपके इन वचनोंका पालन करूँगा । जगन्नाथ ! मुझे सदा यत्नपूर्वक आपकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये ॥ ५ ॥

भृत्यवत् प्रचरिष्यामि कामपालस्य माधव ।
यावदागमनं तुभ्यं तावत्स्थास्यामि यत्नतः ॥ ६ ॥

माधव ! मैं भृत्यकी भाँति बलरामजीकी आज्ञाका अनुसरण करूँगा । जबतक आपका आना होगा, तबतक मैं यत्नपूर्वक पुरीकी रक्षामें लगा रहूँगा ॥ ६ ॥

प्रसादस्तव गोविन्द यदि स्यान्मयि माधव ।
किं नाम मे च दुःसाध्यं शत्रूणां निग्रहे रणे ॥ ७ ॥

गोविन्द ! माधव ! यदि आपकी कृपा मुझपर बनी रहे तो रणभूमिमें शत्रुओंका दमन करनेके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो मेरे लिये दुःसाध्य हो ॥ ७ ॥

यदि शक्रं यमं वापि कुवेरमपि पाशिनम् ।
सर्वानैतान् विजेष्यामि किमु पौण्ड्रं नृपोत्तमम् ॥ ८ ॥
गच्छ कार्यं कुरुष्वेदं यत्तोऽहं सततं हरे ।

यदि इन्द्र, यम, कुवेर अथवा पाशधारी वरुण भी युद्धके लिये आ जायें तो आपकी कृपासे इन सबपर विजय पा जाऊँगा; फिर नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको पराजित करना कौन बड़ी बात है । हरे ! जाइये, अपना यह कार्य कीजिये । मैं सतत सावधान रहूँगा ॥ ८½ ॥

उद्धवं पुनराहेदं कृष्णः पद्मानिभेक्षणः ॥ ९ ॥
शृणूद्धव त्वं वाक्यं मे कुर्यास्त्वेतत् प्रयत्नवान् ।

तत्पश्चात् कमलनयन श्रीकृष्णने पुनः उद्धवसे इस प्रकार कहा—'उद्धवजी ! मेरी यह बात सुनिये और इसका प्रयत्नपूर्वक पालन कीजिये ॥ ९½ ॥

रक्ष्या नयेन राजेन्द्र पुरी द्वारवती त्वया ॥ १० ॥
यत्तो भव सदा तात कुरु साह्यमत्र नः ।
लज्जा मम समुत्पन्ना वदतस्तव साम्प्रतम् ॥ ११ ॥

'राजेन्द्र ! आपको अपनी नीतिसे द्वारकापुरीकी रक्षा करनी चाहिये । तात ! आप सदा सावधान रहें और इस विषयमें हमलोगोंकी सहायता करें । इस समय यहाँ सब बातें कहनेमें मुझे बड़ा संकोच होता है ॥ १०-११ ॥

त्वं हि नेता समस्तस्य विद्यापारस्य सर्वतः ।
को नु शक्ष्यति मेधावी वक्तुं विद्यावतः पुरः ॥ १२ ॥

'जो सब प्रकारसे विद्याओंमें पारंगत हैं, उन सबके आप ही नेता हैं । कौन मेधावी पुरुष आप-जैसे विद्वान्‌के समक्ष कोई बात कह सकेगा ॥ १२ ॥

यत् कार्यं तद् भवान् वेत्ति ह्यकार्यं वापि सर्वतः ।
अतोऽहं विरमे तात वक्तुं सम्प्रति वृष्णिप ॥ १३ ॥

'जो करनेयोग्य कार्य है, उसे आप जानते हैं । जो सर्वथा नहीं करनेयोग्य है, वह भी आपसे अज्ञात नहीं है; अतः वृष्णिवंशका पालन करनेवाले तात ! मैं इस समय कुछ कहनेसे विराम लेता हूँ' ॥ १३ ॥

उद्धव उवाच

किमिदं तव गोविन्द वर्तते मां प्रति प्रभो ।
अहो प्रसन्नता मह्यं किंतु प्रीतिरियं तव ॥ १४ ॥

उद्धव बोले—गोविन्द ! प्रभो ! मेरे प्रति आपके मुँहसे यह कैसी बात निकल रही है ? अहो ! यह मेरे लिये प्रसन्नताकी बात है; किंतु यह आपका प्रेम ही इस रूपमें प्रकट हुआ है ॥ १४ ॥

जानाम्यहं जगन्नाथ प्रसादस्यैष विस्तरः ।
यस्य प्रसन्नो भवति तस्य किं नास्ति केशव ॥ १५ ॥

जगन्नाथ ! मैं समझता हूँ कि यह मुझपर आपकी कृपाका विस्तार ही व्यक्त हुआ है । केशव ! जिसपर आप प्रसन्न होते हैं, उसमें कौन-सी विशेषता नहीं है ॥ १५ ॥

त्वं हि सर्वस्य जगतः कर्ता हर्ता प्रधानतः ।
प्रभवः सर्वकार्याणां वक्ता श्रोता प्रमाणवित् ॥ १६ ॥

आप ही समस्त जगत्‌के प्रधानतः स्रष्टा और संहारक हैं । आप ही समस्त कार्योंके कारण, वक्ता, श्रोता और प्रमाणवेत्ता हैं ॥ १६ ॥

ध्याता ध्यानमयो ध्येय इति ब्रह्मविदो विदुः ।
जेता देवरिपूणां च गोप्ता नाकसदाम् भवान् ॥ १७ ॥

ब्रह्मज्ञानी मुनि आपको ही ध्याता, ध्यान और ध्येयरूपमें जानते हैं । आप देवद्रोहियोंको जीतनेवाले और स्वर्गवासियोंके रक्षक हैं ॥ १७ ॥

त्वन्नाथा वयमेवेति जीवामो निहतद्विषः ।
इयं नीतिरहं मन्ये नेता नीतेर्यतो भवान् ॥ १८ ॥

हमारे तो आप ही स्वामी और संरक्षक हैं; इसीलिये हम जी रहे हैं और हमारे शत्रु मारे गये हैं । यही मेरी नीति है और इसीको मैं मानता हूँ, क्योंकि आप ही नीतिके नेता हैं।

को नु नाम नयो वेद त्वां विना साम्प्रतं वद ।
नीतिस्त्वं सर्वकार्याणामिति मे निश्चिता मतिः ॥ १९ ॥

वेदस्वरूप परमात्मन् ! कहिये, इस समय आपके सिवा दूसरा कौन नीतिमार्गका दर्शन करानेवाला है । मेरा तो यह निश्चित विचार है कि आप ही समस्त कार्योंकी नीति हैं ॥

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