विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1006, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः [ ९८१
शङ्करं द्रष्टुकामोऽस्मि भूतभावनभावनम् ।
यावदागमनं मह्यं तावद् यत्ता भवन्त्विह ॥२०॥
'नरेशो ! मैं किसी कारणवश कैलास पर्वतको जाऊँगा । वहाँ जाकर समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान् शंकरका दर्शन करना चाहता हूँ । जबतक मैं लौट न आऊँ तबतक आपलोग यहाँ नगरकी रक्षाके लिये सतत सावधान रहें ॥ १९-२० ॥
मया विरहितां चेमां यदि जानाति पुण्ड्रकः ।
आगमिष्यति राजेन्द्रो योत्स्यते च पुरीमिमाम् ॥२१॥
'यदि राजेन्द्र पौण्ड्रक यह जान लेगा कि मैं द्वारकापुरीमें नहीं हूँ तो वह अवश्य आक्रमण करेगा और इस नगरीके साथ युद्ध छेड़ देगा ॥ २१ ॥
इमां निर्यादवीं कर्तुं शक्नोतीति च मे मतिः ।
यत्ता भवत राजेन्द्र्राः खड्गैः पाशैः परश्वधैः ॥२२॥
'राजेन्द्रगण ! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि पौण्ड्रक इस पुरीको यादवोंसे सूनी कर सकता है; अतः आपलोग खड्ग, पाश और फरसे लेकर युद्धके लिये सदा तैयार रहें ॥ २२ ॥
पाषाणैः कर्षणीयैश्च सन्नद्धा भवत स्वकैः ।
पिधाय च कपाटानि महाद्वाराणि यत्नतः ॥२३॥
'पाषाणों तथा आकर्षण करनेवाले अपने यन्त्रोंके द्वारा आपलोग सदा सन्नद्ध रहें । बड़े-बड़े फाटकोंकी किवाड़ें बंद करके यत्नपूर्वक पुरीकी रक्षा करें ॥ २३ ॥
एक एव महाद्वारो गमनागमने सदा ।
मुद्रया सह गच्छन्तु राज्ञो ये गन्तुमीप्सवः ॥२४॥
'नगरसे बाहर आने-जानेके लिये एक ही सदा बड़ा फाटक काममें लाया जाय। जो बाहर जाना चाहते हों, वे राजाकी मुद्रा (पास) लेकर उसके साथ जा सकते हैं॥ २४॥
न चामुद्रः प्रवेष्टव्यो द्वारपालस्य पश्यतः ।
यावदागमनं मह्यं तावदेवं भविष्यति ॥२५॥
'जिसके पास राजाकी मुद्रा न हो, वह द्वारपालके देखते-देखते नगरमें प्रवेश न करने पावे। जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक ऐसी ही व्यवस्था रहेगी ॥ २५ ॥
मृगया नात्र कर्तव्या न च क्रीडा बहिः पुरात् ।
ज्ञातव्याश्च परे स्वे च गमनागमने सदा ॥२६॥
'इस बीचमें शिकार खेलना बंद कर दिया जाय, नगरसे बाहर जाकर क्रीड़ा न की जाय। गमनागमनके समय सदा अपने और परायेकी पहिचान की जाय ॥ २६ ॥
एवमादिक्रिया कार्या यावदागमनं मम ।
इत्युक्त्वा यादवान् सर्वान् सात्यकिं पुनराह च ॥२७॥
'जबतक मेरा आना न हो तबतक इसी तरहकी व्यवस्था करनी चाहिये।' समस्त यादवोंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने पुनः सात्यकिसे इस प्रकार कहा ॥२७॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलास-यात्राविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी सात्यकि और उद्धवसे नगरकी रक्षाके विषयमें बातचीत तथा बलराम आदि यादवोंको भी रक्षाका भार सौंपकर उनका कैलासयात्राके लिये उद्यत होना
श्रीभगवानुवाच
सात्यके शृणु मद्वाक्यं यत्तो भव युधां वर ।
त्वं तु खड्गी गदी भूत्वा चापपाणिस्तनुत्रवान् ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—योद्धाओंमें श्रेष्ठ सात्यके ! मेरी बात सुनो। तुम स्वयं कवच पहनकर तलवार, गदा और धनुष हाथमें लिये नगरकी रक्षाके लिये प्रयत्नशील रहो ॥ १ ॥
तिष्ठ यत्नेन रक्षस्व पुरीं बह्वनृपाश्रयाम् ।
न च निद्रा त्वया कार्या रात्रौ यदुनृप प्रभो ॥ २ ॥
यदुकुलतिलक प्रभावशाली वीर ! द्वारकापुरी बहुसंख्यक क्षत्रियोंकी निवासभूमि है । तुम यत्नपूर्वक खड़े रहो और इसकी रक्षा करो। तुम्हें रातभर नींद नहीं लेनी चाहिये ॥ २ ॥
न च व्याख्या त्वया कार्या शास्त्राणां शास्त्रतत्पर ।
न च वादस्त्वया कार्यों वादिभिः सह वृष्णिप ॥ ३ ॥
शास्त्रपरायण सात्यके ! आजसे तुम्हें शास्त्रोंकी व्याख्यामें भी नहीं लगना चाहिये । वृष्णिवंशका पालन करनेवाले वीर ! अब तुम्हें वादियोंके साथ वाद भी नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥
त्वं हि योद्धा बली ज्ञाता धनुर्वेदस्यवेदवित् ।
तथा कुरु यथा वीर नोपहास्या भवेदियम् ॥ ४ ॥
वीर ! तुम योद्धा, बलवान्, ज्ञानवान् और धनुर्वेद-