भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1005

९८० -श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


उग्रसेनं महाबुद्धिमुद्धवं नीतिमत्तरम्।
यस्य बुद्धिं समाश्रित्य जीवन्ते यादवाः सुखम् ॥ ४ ॥
वहाँ महान् सिंहासनपर बैठकर उन्होंने समस्त वृष्णिवंशी वीरोंको बुलाया। बलभद्र, सात्यकि, कृतवर्मा, शुक, सारण, राजा उग्रसेन तथा उन महाबुद्धिमान् एवं नीतिशास्त्रके महान् पण्डित उद्धवको भी बुलाया, जिनकी बुद्धिका आश्रय लेकर समस्त यादव सुखसे रहते थे ॥ ३-४ ॥

नेता च यदुवृष्णीनां स तु धर्मपरः सदा।
यस्य विभ्यति देवाश्च नीतेस्तस्य महात्मनः ॥ ५ ॥
वे सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले और वृष्णिवंशी यादवोंके नेता थे। उन महात्माकी नीतिसे देवता भी सदा भयभीत रहते थे ॥ ५ ॥

यस्य बुद्धिवलाद् विष्णुः शशास पृथिवीं सदा।
तं च वृष्णिवरं वीरमुद्धवं देवसुप्रभम् ॥ ६ ॥
अन्यांनपि यदून सर्वानुवाच भगवान् हरिः।
जिनके बुद्धिवलसे भगवान् श्रीकृष्ण सदा पृथिवीका शासन करते थे तथा जो देवताओंके समान परम कान्तिमान् एवं वृष्णिवंशके प्रमुख वीर थे, उन उद्धवको तथा अन्य यादवोंको भी बुलाकर भगवान् श्रीहरिने उन सबसे कहा—॥ ६½ ॥

श‍ृण्वन्तु मम वाक्यानि यादवाः सर्व एव हि।
श‍ृणु चापि वचो मह्यं पितुरुद्धव मे सखे ॥ ७ ॥
'समस्त यादव मेरी बातें सुनें ! मेरे पिताके मित्र उद्धवजी ! आप भी मेरा वचन सुनिये ॥ ७ ॥

बाल्यात्प्रभृति यो यत्नो मम दुष्टनिबर्हणे।
प्रत्यक्षं भवता दृष्टं पूतनानेधनं नृप ॥ ८॥
केशी च निहतो बाल्ये मया बालेन यादवाः।
गोवर्धनो धृतः शैलो गावश्च परिपालिताः ॥ ९ ॥
'नरेश्वर उग्रसेन ! बाल्यकालसे लेकर अबतक दुष्टोंका संहार करनेके लिये मेरेद्वारा जो प्रयत्न हुआ है, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा है। यादवो ! बाल्यावस्थामें बालकरूपसे मैंने पूतनाको मारा, केशीका संहार किया, गोवर्धन पर्वत उठाया और गौओंकी रक्षा की ॥ ८-९ ॥

अभिषिक्तोऽस्मि शक्रेण देवानांमग्रतः स्थितः।
कंसोऽपि निधनं नीतो मया चाणूरमुष्टिकौ ॥१०॥
'मुझे देवताओंके आगे खड़ा करके देवराज इन्द्रने मेरा अभिषेक किया। मेरे हाथसे कंस मारा गया और चाणूर तथा मुष्टिकका भी संहार हुआ ॥ १० ॥

उग्रसेनोऽभिषिक्तश्च कृता द्वारवती मया।
अन्ये चापि नृपा राजन् बलिनो निहता मया ॥११॥
'महाराज उग्रसेनका अभिषेक हुआ और मैंने द्वारकापुरीका नवनिर्माण किया। राजन् ! अन्य बलवान् नरेश भी मेरेद्वारा मारे गये ॥ ११ ॥

योऽपि वीरो जरासंधो निगृहीतो बलान्मया।
भीमेन बलिना राजन्नयने मम यादवाः ॥१२॥
'यादवो ! और राजन् ! जो वीर राजा जरासंध था, उसका भी मैंने बलवान् भीमसेनके द्वारा बलपूर्वक दमन किया। मेरी नीतिके अनुसार ही जरासंधका संहार हुआ ॥ १२ ॥

शृगालो निहतः संख्ये गोमन्ताद् गच्छता मया।
योऽपि वीरो दुरात्मासौ दानवो नरको हतः ॥१३॥
'गोमन्त पर्वतसे जाते समय मैंने युद्धमें राजा शृगालका वध किया और वह जो वीर दुरात्मा दानव नरकासुर था, वह भी मेरे हाथसे मारा गया ॥ १३ ॥

निष्कण्टकमिमं लोकं कृतवान् राजसत्तमाः।
किं तु वीरो नृपो जज्ञे सखा भौमस्य यादवाः ॥१४॥
पौण्ड्रो वीर्यवतां नेता द्वेष्टा चासौ सदा मम।
'क्षत्रियशिरोमणि यादवो ! इस प्रकार मैंने इस लोकको निष्कण्टक (शत्रुहीन) बना दिया है। परंतु जो नरकासुरका सखा है, वह वीर राजा पौण्ड्रक अबतक शेष है। वह बलवानोंका नेता और मुझसे सदा द्वेष रखनेवाला है ॥१४½॥

शिष्यो द्रोणस्य राजेन्द्रो बली ब्रह्मास्त्रवित् कृती ॥१५॥
शास्त्रज्ञो नीतिमान् साक्षान्नेता सर्वस्य यत्नवान्।
योद्धा युद्धप्रियो राजा जामदग्न्य इवापरः ॥१६॥
'राजेन्द्र पौण्ड्रक द्रोणाचार्यका शिष्य, बलवान्, ब्रह्मास्त्रवेत्ता, रणकर्मकुशल, शास्त्रज्ञ, नीतिमान्, सबका साक्षात् नेता, यत्नशील, योद्धा और दूसरे परशुरामकी भाँति युद्धप्रेमी राजा है ॥ १५-१६ ॥

एकान्तशत्रुरस्माकं छिद्रान्वेपी सदा मम।
वाधिष्यते पुरीं योद्धाच्छिद्रं यदि लभेत सः ॥१७॥
'वह मेरा एकान्त शत्रु है और सदा मेरे छिद्र ढूँढ़ता रहता है। यदि वह थोड़ा-सा भी छिद्र पा जाय तो युद्धके लिये उद्यत होकर द्वारकापुरीको सताने लग जाय ॥१७॥

न ह्यल्पसाध्यो बलवान् पुण्ड्रस्येशो नृपोत्तमः।
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु प्रगृहीतशरासनाः ॥१८॥
यथा न बाधते राजा पुरीं यदुकुलाश्रयाम्।
'श्रेष्ठ नरेशो ! पुण्ड्र देशका बलवान् राजा पौण्ड्रक थोड़े-से साधनोंद्वारा वशमें आनेवाला नहीं है। अतः आपलोग सदा धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार खड़े रहें, जिससे यदुकुलकी निवासभूमि द्वारकापुरीको वह राजा पौण्ड्रक बाधा न दे सके ॥ १८½ ॥

अहं तु यास्ये कैलासं कुतश्चित् कारणान्नृपाः ॥१९॥