विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1004, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | चतुःसप्ततितमोऽध्यायः | ९७९ |
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करूँगा। पुत्रकी प्राप्तिके लिये मैं अभी उत्तम पर्वत कैलासको जा रहा हूँ ॥ ३५ ॥
तत्रोपास्य महादेवं शंकरं नीललोहितम्।
ततो लब्धास्मि पुत्रं ते भवाद् भूतहिते रतात् ॥ ३६॥
'वहाँ नीललोहित वर्णवाले महान् देवता भगवान् शङ्करकी उपासना करके प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् शिवसे तुम्हारे लिये पुत्र प्राप्त करूँगा ॥ ३६ ॥
तपसा ब्रह्मचर्येण भवं शंकरमव्ययम्।
तोषयित्वा विरूपाक्षमादिदेवमजं विभुम् ॥३७॥
'तपस्या और ब्रह्मचर्य-पालनके द्वारा सबके उत्पादक अविनाशी अजन्मा सर्वव्यापी आदिदेव विरूपाक्ष भगवान् शंकरको संतुष्ट करके मैं उनसे पुत्र होनेका वर प्राप्त करूँगा ॥ ३७ ॥
गमिष्याम्यहमद्यैव द्रष्टुं शंकरमव्ययम्।
स च मे दास्यते पुत्रं तोषितस्तपसा मया ॥३८॥
'मैं आज ही अविनाशी भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये जाऊँगा। मेरेद्वारा किये गये तपसे संतुष्ट होकर वे मुझे पुत्र देंगे ॥ ३८ ॥
तत्र गत्वा महादेवं नमस्कृत्य सहोमया।
प्रविश्य बदरीं पुण्यां मुनिजुष्टां तपोमयीम् ॥ ३९॥
अग्निहोत्राकुलां दिव्यां गङ्गाम्बुप्प्लावितां सदा।
मृगपक्षिसमायुक्तां सिंहद्वीपिशताकुलाम् ॥४०॥
'वहाँ जाकर उमासहित महादेवजीको नमस्कार करके उन्हें संतुष्ट करूँगा। वहाँ पहुँचनेसे पहले मैं मुनियोंद्वारा सेवित तपोमयी पुण्यभूमि बदरीमें प्रवेश करूँगा, जो अग्निहोत्रके धूमसे व्याप्त है। वह दिव्य भूमि सदा गङ्गाजीके जलसे प्लावित रहती है। वहाँ पशु और पक्षियोंके समुदाय सब ओर विचरते हैं और सैकड़ों सिंह तथा व्याघ्र भरे रहते हैं ॥ ३९-४० ॥
बदरीफलसम्पूर्णां वानरक्षोभितद्रुमाम्।
वेत्रारूढमहावृक्षां कदलीखण्डमण्डिताम् ॥४१॥
'वह स्थान बेरके फलोंसे परिपूर्ण है। वानर वहाँके वृक्षोंको कम्पित करते रहते हैं। वहाँके विशाल वृक्षोंपर बेंतकी लताएँ फैली होती हैं। जहाँ-तहाँ केलोंके बगीचे उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ४१ ॥
मुनिभिर्वेदतत्त्वार्थविचारनिपुणैः सदा।
वेदनिश्चिततत्त्वार्थैः प्रमाणकुशलैर्युताम् ॥४२॥
'वेदके तात्त्विक अर्थोंका विचार करनेमे निपुण, वेदके सुनिश्चित सिद्धान्तके ज्ञाता और प्रमाणकुशल मुनि सदा वहाँ निवास करते हैं ॥ ४२ ॥
इदमेकमिदं तत्त्वमिति निश्चितमानसैः।
उपास्यमानामन्यत्र सिद्धैः सिद्धार्थतत्परैः ॥४३॥
'यह एकमात्र अद्वितीय तत्त्व है, यही परमार्थ है, इस प्रकार मनसे निश्चय करनेवाले सिद्धार्थपरायण सिद्धजन जहाँ-तहाँ उस भूमिकी उपासना करते हैं ॥ ४३ ॥
इतिहासपुराणज्ञैः सेव्यमानां महर्षिभिः।
गच्छद्भिः खर्गनिलयं परित्यज्य कलेवरम् ॥४४॥
'इतिहास-पुराणके ज्ञाता महर्षि, जो शरीर छोड़नेके बाद स्वर्गलोकको जानेवाले हैं, उस भूमिकाय सेवन करते हैं ॥ ४४ ॥
प्रसिद्धां महतीं देवीं यास्यामि सुकृतालयाम्।
इत्युक्त्वा विररामैव देवदेवो जनार्दनः ॥४५॥
'इस प्रकार उस प्रसिद्ध पुण्यस्थली दिव्य एवं विशाल बदरीपुरीको जाऊँगा'—ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन चुप हो गये ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलास-यात्राविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥७३।
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका यादवसभामें अपनी कैलासयात्राका विचार प्रकट करते हुए नगरकी रक्षाके लिये यादवोंको सावधान रहनेका आदेश देना
वैशम्पायन उवाच
प्रभातायां तु शर्वर्यां गन्तुमैच्छज्जनार्दनः।
हुताग्निः कृतकल्याणः समाप्तवरदक्षिणः ॥ १ ॥
गाश्च दत्त्वाथ विप्रेभ्यो नमस्कृत्य द्विजोत्तमान्।
आस्थानमण्डपं कृष्णः प्रविवेश जगत्पतिः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भगवान् श्रीकृष्णने अग्निहोत्र करके मङ्गलाचारके पश्चात् ब्राह्मणोंको उत्तम दक्षिणाएँ देकर उन्हें बहुत-सी गौएँ दीं और उन श्रेष्ठ द्विजोंको नमस्कार करके जगत्पति श्रीकृष्णने आस्थानमण्डप (सभाभवन) में प्रवेश किया ॥ १-२ ॥
आसनं महदास्थाय वृष्णीनाहूय सर्वशः।
बलभद्रं शिनेः पौत्रं हार्दिक्यं शुकसारणौ ॥ ३ ॥