विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1003, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९७८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अथोवाच तदा देवी रुक्मिणी रुक्मभूषणा।
पुत्रमिच्छामि देवेश त्वत्तो माधव नन्दनम् ॥२०॥
उस समय सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हुई रुक्मिणी-देवीने भगवान्से कहा—'देवेश्वर ! माधव ! मैं आपसे आनन्ददायक पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ ॥ २० ॥
बलिनं रूपसम्पन्नं त्वयैव सदृशं प्रभो।
वृष्णीनामपि नेतारं वीर्यवन्तं तपोनिधिम् ॥२१॥
'प्रभो ! वह पुत्र आपके ही समान रूपवान्, बलवान्, पराक्रमी, तपोनिधि तथा वृष्णिकुलका नेता हो ॥ २१ ॥
सर्वशास्त्रार्थकुशलं राजविद्यापुरस्कृतम् ।
एवमादिगुणैर्युक्तं दातुमर्हसि सत्तम ॥२२॥
'वह सभी शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें निपुण तथा राजविद्या (ब्रह्मविद्या) के ज्ञाताओंमें अग्रगण्य हो सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पतिदेव ! आप मुझे ऐसे ही गुणोंसे सम्पन्न पुत्र प्रदान कीजिये ॥
त्वयि सर्वस्य दातृत्वं नित्यमेव प्रतिष्ठितम् ।
त्वं हि सर्वस्य कर्ता च दाता भोक्ता जगत्पतिः ॥२३॥
'आपमें सदा ही सब कुछ देनेकी शक्ति विद्यमान है; क्योंकि आप ही सबके दाता, कर्ता, भोक्ता और जगदी-श्वर हैं ॥ २३ ॥
विशेषतस्तु भृत्यानां शुश्रूषानियतात्मनाम् ।
वक्तव्यं किमु देवेश यदि भक्तास्मि केशव ॥२४॥
अनुग्रहो यदि स्यान्मे देवदेव जगत्पते ।
दातुमर्हसि पुत्रं त्वं वीर्यवन्तं जनार्दन ॥२५॥
'देवेश्वर ! केशव ! विशेषतः जो आपके भृत्य हैं, सदा नियमपूर्वक आपकी सेवामें मन लगाये रहते हैं, उन्हें आप अभीष्ट वस्तु प्रदान करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है। देवदेव ! जगत्पते ! जनार्दन ! यदि मैं आपकी भक्त हूँ और यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो आप मुझे पराक्रमी पुत्र प्रदान करें' ॥ २४-२५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तो देवदेवेशः प्रियया प्रीयमाणया ।
तया महिष्या रुक्मिण्या रुक्मिशत्रुर्यदूद्वहः ॥२६॥
प्रोवाच वचनं काले रुक्मिणीं यादवेश्वरः ।
दातास्मि तादृशं पुत्रं यं त्वमिच्छसि भामिनि ॥२७॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अपनी प्रसन्न हुई प्यारी रानी रुक्मिणीदेवीके ऐसा कहनेपर रुक्मीके शत्रु, यदुकुलतिलक, देवदेवेश्वर, यादवपति श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे यह समयोचित बात कही—'भामिनि ! तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही पुत्र मैं तुम्हे प्रदान करूँगा ॥ २६-२७ ॥
नित्यं भक्तासि मे देवि नात्र कार्या विचारणा ।
अवश्यं तव दास्यामि पुत्रं शत्रुनिबर्हणम् ॥२८॥
'देवि ! तुम सदा ही मेरी भक्त हो, इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अवश्य ही तुम्हें शत्रुनाशक पुत्र प्रदान करूँगा ॥ २८ ॥
पुत्रेण लोकाञ्जयति सतां कामदुघा हि ये ।
नरकं पुदिति ख्यातं दुःखं च नरकं विदुः ॥२९॥
'गृहस्थ पुरुष पुत्रद्वारा उन लोकोंपर विजय पाता है, जो पुरुषोंको उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाले होते हैं। नरक 'पुत्' नामसे विख्यात है, दुःखको भी नरक ही माना गया है ॥ २९ ॥
पुद्त्राणात् ततः पुत्रमिहेच्छति परत्र च ।
अनन्ताः पुत्रिणो लोकाः पुरुषस्य प्रिये शुभाः ॥३०॥
'उस पुत्-नामक नरक या दुःखसे वह पिता-माताका परित्राण करता है, इसलिये सारा जगत् इहलोक और परलोक-के लिये पुत्रकी अभिलाषा रखता है। प्रिये ! पुत्रवान् पुरुषके लिये अनन्त शुभ लोक विद्यमान हैं ॥ ३० ॥
पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा स मातरम् ।
तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते ॥३१॥
'पति ही गर्भ बनकर पत्नीके भीतर प्रवेश करता है, उस गर्भकी वह माता (जननी) होती है। उसके गर्भमें नूतन शरीर धारण करके वह (पति) पुनः दसवें मासमें जन्म लेता है ॥ ३१ ॥
पुत्रवन्तं बिभेतीन्द्रः किं नु तेनाशितं भवेत् ।
नापुत्रो विन्दते लोकान् कुपुत्राद् वन्ध्यतावरा ॥३२॥
'पुत्रवान्को देखकर इन्द्र भी डरते हैं। वे सोचते हैं, पता नहीं, यह मेरे किस वैभवका उपभोग करेगा ? पुत्रहीन मनुष्य पुण्यलोकोंको नहीं पाता है; परंतु कुपुत्र पैदा करनेकी अपेक्षा तो बाँझ रह जाना ही अच्छा है ॥ ३२ ॥
कुपुत्रो नरके यस्मात् सुपुत्रात् स्वर्ग एव हि ।
तस्माद् विनीतं सत्पुत्रं श्रुतवन्तं दयापरम् ॥३३॥
'कुपुत्र नरकमें गिराता है और सुपुत्रसे स्वर्ग भी सुलभ होता है। अतः विनयशील, विद्वान् और दयालु सत्पुत्रकी इच्छा करनी चाहिये ॥ ३३ ॥
विद्यया विनयो यस्माद् विद्यायुक्तं सुधार्मिकम् ।
इच्छेत् पुत्रं पुत्रकामः पुरुषो यत्नवान् बुधः ॥३४॥
'विद्यासे विनयकी प्राप्ति होती है, अतः पुत्रकी कामना-वाला प्रयत्नशील विद्वान् पुरुष विद्यायुक्त परम धार्मिक पुत्र पानेकी इच्छा करे ॥ ३४ ॥
तस्माद् दास्यामि ते पुत्रं विद्यावन्तं सुधार्मिकम् ।
एष गच्छामि पुत्रार्थं कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥३५॥
'अतः मैं तुम्हें विद्वान् एवं परम धर्मात्मा पुत्र प्रदान